सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२ सूर्य सिद्धान्त अचिन्त्याव्यक्तरूपाय निर्गुणाय गुणात्मने । समस्तजगदाधारमूर्तये ब्रह्मणे नमः ॥१॥ अनुवाद—उस परब्रह्म को नमस्कार है जिसका रूप न तो ध्यान में आ सकता है और न प्रकट किया जा सकता है, जो निर्गुण है परन्तु जिससे सब गुण उत्पन्न हुए हैं और जो सम्पूर्ण विश्व का आधार है ॥ १ ॥ अल्पावशिष्टे तु कृते मयो नाम महासुरः । रहस्यं परमं पुण्यं जिज्ञासुर्ज्ञानमुत्तमम् ॥ २ ॥ वेदाङ्गमग्र्यमखिलं ज्योतिषां गतिकारणम् । आराधयन्विवस्वन्तं तपस्तेपे सुदुष्करम् ॥ ३ ॥ अनुवाद—सत्ययुग के कुछ शेष रहने पर मय नामक महा असुर ने सब वेदाङ्गों में श्रेष्ठ, सारे ज्योतिष पिंडों की गतियों का कारण बतलाने वाले, परम पवित्र और रहस्यमय उत्तम ज्ञान को जानने की इच्छा से कठिन तप करके सूर्य भगवान की आराधना की ॥ २-३ ॥ विज्ञान भाष्य—सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग की व्याख्या इसी अध्याय के १६वें श्लोक में की गयी है । वेदाङ्ग ६ हैं—शिक्षा, छन्द, व्याकरण, निरुक्त, कल्प और ज्योतिष । इनसे वेदों के समझने-समझाने में सहायता मिलती है, इसलिए यह वेदाङ्ग कहलाते हैं । वेदाङ्गों में ज्योतिष की श्रेष्ठता भास्कराचार्य जी ने इस प्रकार दिखलाई है—शब्द-शास्त्र वेद भगवान का मुख है, ज्योतिःशास्त्र आँख है, निरुक्त कान है, कल्प हाथ है, शिक्षा नासिका है, छन्द पाँव हैं, इसलिए जैसे सब अंगों में आँख श्रेष्ठ होती है वैसे ही सब वेदाङ्गों में ज्योतिःशास्त्र श्रेष्ठ है । तोषितस्तपसा तेन प्रीतस्तस्मै वरार्थिने । ग्रहाणां चरितं प्रादान्मयाय सविता स्वयम् ॥ ४ ॥ अनुवाद—उसकी तपस्या से संतुष्ट और प्रसन्न होकर सूर्य भगवान् ने स्वयम् वर चाहनेवाले मय को ग्रहों के चरित अर्थात् ज्योतिःशास्त्र का उपदेश दिया ॥ ४ ॥ विज्ञान भाष्य—पाश्चात्य ज्योतिषी ग्रह उन ज्योतिष्क पिंडों को कहते हैं जो सूर्य की परिक्रमा किया करते हैं । इस परिभाषा के अनुसार बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल, गुरु, शनि, युरेनस और नेपचून यह आठ ग्रह हैं, जिनमें से पिछले दो ग्रहों का पता