भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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त्रिपश्नाधिकार २८१ अनुवाद-(२७) इष्टकाल के सूर्य की क्रान्तिज्या को त्रिज्या से गुणा करके लम्बज्या से भाग देने पर उदयकालिक अग्रज्या आती है जिसको इष्टकाल के छाया कर्ण से गुणा करके त्रिज्या से भाग देने पर इष्टकाल की कर्णाग्रा आती है । विज्ञान भाष्य - २२वें श्लोक में कर्णाग्रा जानने की रीति बतलायी गयी है वही यह भी है अंतर केवल इतना है कि वहाँ क्रान्तिज्या को विषुवत्कर्ण से गुणा करके १२ से भाग दिया गया है और यहाँ क्रान्तिज्या को त्रिज्या से गुणा करके लम्बज्या से भाग दिया गया है जो एक ही है (देखो श्लोक १३ तथा २२) । जब सूर्य ईशान, अग्नि आदि चार कोणों में हो तब उन्नतांश या नतांश जानने की रीति- त्रिज्यावर्गार्धतोऽग्रज्यावर्गोनाद् द्वादशाहतात् । पुनर्द्वादशनिघ्नाच्च लभ्यते यत्फलं बुधैः ॥२८॥ शङ्कुवर्गार्धसंयुक्त विषुवद्वर्गभाजितात् । लब्धं तु करणी नाम तां पृथक्स्थापयेत्ततः ॥२९॥ विषुवच्छायाऽर्क वधादग्रज्यासङ्गुणात्तथा । भक्तात्फलाख्यं तद्वर्गसंयुक्तकरणीपदम् ॥३०॥ फलेन हीनं संयुक्तं दक्षिणोत्तरगोलयोः । याम्योर्याविदिशोश्शङ्कुरेवं यामोत्तरे रवौ ॥३१॥ परिभ्रमति शङ्कोश्च शङ्कुरुत्तरयोश्च सः । तत्तिज्यावर्ग विश्लेषान्मूलं दृग्ज्याऽभिधीयते ॥३२॥ अनुवाद-(२८) त्रिज्या के वर्ग का आधा करके उसमें से उदयकालिक अग्रज्या के वर्ग को घटाकर शेष को १२ से गुणा करके गुणनफल को फिर १२ से गुणा करने पर जो फल विद्वानों को मिलता है (२९) उसको शंकु के वर्गार्ध और पलभा के वर्ग के योगफल से भाग देते हैं, जो लब्धि आती है उसे करणी कहते हैं । इसको विद्वान् अलग रखते हैं। (३०) १२ को पलभा से गुणा करके गुणनफल को उदयकालिक अग्रज्या से भी गुणा करके जो आता है उसको भी शंकु के वर्गार्ध और पलभा के वर्ग के योगफल से भाग देते हैं और लब्धि को फल कहते हैं। फल के वर्ग को करणी में जोड़कर योगफल का वर्गमूल निकालते हैं, (३१) यदि सूर्य दक्षिण गोल में हो अर्थात् यदि सूर्य क्रान्ति दक्षिण हो तो वर्गमूल से फल को घटा दे और यदि सूर्य उत्तर गोल में हो तो वर्गमूल में फल को जोड़ दे । ऐसा करने से जो कुछ