भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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२८२ सूर्य-सिद्धान्त आता है वही आग्नेयादि कोणों का शंकु अर्थात् कोण शंकु कहलाता है। (३२) जब सूर्य दक्षिण में होता है तब कोण शंकु मध्याह्न के पहले अग्निकोण में और मध्याह्न के पीछे नैऋत्य कोण में होता है। परन्तु जब सूर्य उत्तर में होता है तब कोण शंकु मध्याह्न के पहले ईशान कोण में और मध्याह्न के पीछे वायव्य कोण में होता है। कोणशंकु और त्रिज्या के वर्गों के अंतर का वर्गमूल निकालने से दृग्ज्या होती है। विज्ञान भाष्य — इन ५ श्लोकों का सार यह है :— ⎛ त्रिज्या² ⎞ ⎜ ────── — अग्रज्या² ⎟ × १४४ ⎝ २ ⎠ करणी = ─────────────────────────── १२² ─── + पलभा २ १२ × पलभा × अग्रज्या फल = ─────────────────────────── १२² ─── + पलभा² २ कोण शंकु = √करणी + फल² ± फल दृग्ज्या = √ त्रिज्या² — कोण शंकु² जिस समय सूर्य ईशान, अग्नि, नैऋत्य या वायव्य कोणों में रहता है उस समय इसका जो उन्नतांश (Altitude) होता है उसकी ज्या को कोण शंकु और जो नतांश होता है उसकी ज्या को दृग्ज्या कहते हैं; किसी अन्य समय के नतांश ज्या को भी दृग्ज्या तथा उन्नतांश ज्या को शंकु कहते हैं। इसलिए इस शंकु और १२ अंगुल वाले शंकु के भेद को अच्छी तरह ध्यान में रखना चाहिए। इसलिए जब सूर्य का दिगंश (Azimuth) ४५° होता है तब यह क्षितिज से जितने अंश ऊपर रहता है उस अंश की ज्या कोण शंकु हुई और खस्वस्तिक से जितना नीचे रहता है उस अंश की ज्या दृग्ज्या हुई। इसलिए चित्र ५७ के समीकरण (क), (ख), या (ग) की सहायता से कोण शंकु या दृग्ज्या का मान सहज ही निकल सकता है। समीकरण (ग) इस प्रकार है— ज्या (क्रान्ति) — कोज्या (नतांश) × ज्या (अक्षांश) ज्या (अग्रा) = ────────────────────────────────────────── ज्या (नतांश) × कोज्या (अक्षांश) जब सूर्य ईशान, अग्नि, नैऋत्य या वायव्य कोण में होता है तब अग्रा ४५ अंश के समान होती है, इसलिए ऐसी दशा में ज्या (अग्रा) = ज्या ४५° = १/√२