भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 31, कुल 838 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 31

८ सूर्य सिद्धान्त मान समान नहीं होता । इसलिए मध्यम सावन दिन का जो मान होता है वही समय घड़ियों के द्वारा जाना जाता है । ऐन्दव तिथि या चान्द्र तिथि—चन्द्रमा आकाश में चक्कर लगाता हुआ जिस समय सूर्य के बहुत पास पहुँचता है उस समय अमावस्या होती है । एक अमावस्या से दूसरी अमावस्या तक के समय को चान्द्रमास कहते हैं। इसका मध्यम मान २९•५३०५८७६४६ मध्यम सावन दिन का होता है । अमावास्या के बाद चन्द्रमा सूर्य से आगे पूर्व की ओर बढ़ता जाता है और जब १२ अंश आगे हो जाता है तब पहली तिथि (परिवा) बीतती है, १२ अंश से २४ अंश तक का जब अन्तर रहता है तब दूइज रहती है। २४ अंश से ३६ अंश तक जब चन्द्रमा सूर्य से आगे रहता है तब तीज रहती है। जब अन्तर १६८ से १८० अंश तक होता है तब पूर्णिमा होती है, १८० अंश से १९२ अंश तक जब चन्द्रमा आगे रहता है तब १६वीं तिथि अथवा परिवा (प्रतिपदा) होती है, १९२° से २०४° तक दूइज होती है, इत्यादि । पूर्णिमा के बाद चन्द्रमा सूर्यास्त से प्रति दिन कोई २ घड़ी (४८ मिनट) पीछे निकलता है। पूर्णिमा से अमावस्या तक के १४, १५ दिन को कृष्णपक्ष कहते हैं। अमावस्या को ३०वीं तिथि भी कहते हैं, इसीलिए पंचांगों में अमावस्या के लिए ३० लिखते हैं। सौरमास—सूर्य जिस मार्ग से चलता हुआ आकाश में परिक्रमा करता है उसको क्रांतिवृत्त कहते हैं। इसके बारहवें भाग को राशि कहते हैं। सूर्यमंडल का केन्द्र जिस समय एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है उस समय दूसरी राशि की संक्रान्ति होती है। एक संक्रान्ति से दूसरी संक्रान्ति तक के समय को सौरमास कहते हैं। १२ सौर मास परिमाण में भिन्न-भिन्न होते हैं; इसका कारण यह है कि सूर्य की गति सर्वदा समान नहीं होती । जब सूर्य की गति तीव्र होती है तब वह एक राशि को जल्दी पूरा कर लेता है और वह सौरमास छोटा होता है। इसके प्रतिकूल जब सूर्य की गति मन्द होती है तब सौरमास बड़ा होता है। वर्ष—जितने प्रकार के महीने होते हैं उतने ही प्रकार के वर्ष होते हैं, बारह चान्द्र मासों का एक चान्द्रवर्ष, १२ सावन मासों का एक सावनवर्ष तथा बारह सौरमासों का एक सौरवर्ष होता है। हमारे ज्योतिषी परम्परा से यही मानते आये हैं। परन्तु १३वें श्लोक में दूसरे पद का सीधा अर्थ यह है कि १२ मासों का वर्ष होता है, जिसको दिव्यदिन कहते हैं। इसलिए जिन बारह मासों का वर्ष कहा गया है वह अन्य मास नहीं हैं, केवल सौरमास हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि सूर्य सिद्धान्त में केवल सौर वर्ष की चर्चा है और सौर वर्ष को ही वर्ष माना गया है, अन्य को नहीं।