सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
८ सूर्य सिद्धान्त मान समान नहीं होता । इसलिए मध्यम सावन दिन का जो मान होता है वही समय घड़ियों के द्वारा जाना जाता है । ऐन्दव तिथि या चान्द्र तिथि—चन्द्रमा आकाश में चक्कर लगाता हुआ जिस समय सूर्य के बहुत पास पहुँचता है उस समय अमावस्या होती है । एक अमावस्या से दूसरी अमावस्या तक के समय को चान्द्रमास कहते हैं। इसका मध्यम मान २९•५३०५८७६४६ मध्यम सावन दिन का होता है । अमावास्या के बाद चन्द्रमा सूर्य से आगे पूर्व की ओर बढ़ता जाता है और जब १२ अंश आगे हो जाता है तब पहली तिथि (परिवा) बीतती है, १२ अंश से २४ अंश तक का जब अन्तर रहता है तब दूइज रहती है। २४ अंश से ३६ अंश तक जब चन्द्रमा सूर्य से आगे रहता है तब तीज रहती है। जब अन्तर १६८ से १८० अंश तक होता है तब पूर्णिमा होती है, १८० अंश से १९२ अंश तक जब चन्द्रमा आगे रहता है तब १६वीं तिथि अथवा परिवा (प्रतिपदा) होती है, १९२° से २०४° तक दूइज होती है, इत्यादि । पूर्णिमा के बाद चन्द्रमा सूर्यास्त से प्रति दिन कोई २ घड़ी (४८ मिनट) पीछे निकलता है। पूर्णिमा से अमावस्या तक के १४, १५ दिन को कृष्णपक्ष कहते हैं। अमावस्या को ३०वीं तिथि भी कहते हैं, इसीलिए पंचांगों में अमावस्या के लिए ३० लिखते हैं। सौरमास—सूर्य जिस मार्ग से चलता हुआ आकाश में परिक्रमा करता है उसको क्रांतिवृत्त कहते हैं। इसके बारहवें भाग को राशि कहते हैं। सूर्यमंडल का केन्द्र जिस समय एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है उस समय दूसरी राशि की संक्रान्ति होती है। एक संक्रान्ति से दूसरी संक्रान्ति तक के समय को सौरमास कहते हैं। १२ सौर मास परिमाण में भिन्न-भिन्न होते हैं; इसका कारण यह है कि सूर्य की गति सर्वदा समान नहीं होती । जब सूर्य की गति तीव्र होती है तब वह एक राशि को जल्दी पूरा कर लेता है और वह सौरमास छोटा होता है। इसके प्रतिकूल जब सूर्य की गति मन्द होती है तब सौरमास बड़ा होता है। वर्ष—जितने प्रकार के महीने होते हैं उतने ही प्रकार के वर्ष होते हैं, बारह चान्द्र मासों का एक चान्द्रवर्ष, १२ सावन मासों का एक सावनवर्ष तथा बारह सौरमासों का एक सौरवर्ष होता है। हमारे ज्योतिषी परम्परा से यही मानते आये हैं। परन्तु १३वें श्लोक में दूसरे पद का सीधा अर्थ यह है कि १२ मासों का वर्ष होता है, जिसको दिव्यदिन कहते हैं। इसलिए जिन बारह मासों का वर्ष कहा गया है वह अन्य मास नहीं हैं, केवल सौरमास हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि सूर्य सिद्धान्त में केवल सौर वर्ष की चर्चा है और सौर वर्ष को ही वर्ष माना गया है, अन्य को नहीं।
मध्यमाधिकार ६ दिव्यदिन—पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव पर देवताओं के रहने का तथा दक्षिणी ध्रुव पर राक्षसों के रहने का स्थान बतलाया गया है। इसलिए उत्तरी ध्रुव को देव- लोक तथा दक्षिणी ध्रुव को असुरलोक कहते हैं। जिस समय सूर्य विषुववृत्त पर आता है उस समय दिन और रात समान होते हैं। यह घटना वर्ष में केवल दो बार होती है। ६ महीने तक सूर्य विषुववृत्त के उत्तर तथा ६ महीने तक दक्षिण रहता है। पहली छमाही में उत्तर गोल में दिन बड़ा और रात छोटी तथा दक्षिण गोल में दिन छोटा और रात बड़ी होती है। दूसरी छमाही में ठीक इसका उलटा होता है। परन्तु जब सूर्य विषुववृत्त के उत्तर रहता है तब वह उत्तरी ध्रुव पर (सुमेरु पर्वत पर) ६ महीने तक सदा दिखाई देता है और दक्षिणी ध्रुव पर इस समय में नहीं दिखाई पड़ता। इसलिए इस छमाही को देवताओं का दिन तथा राक्षसों की रात कहते हैं। जब सूर्य ६ महीने तक विषुववृत्त के दखिन रहता है तब उत्तरी ध्रुव पर देवताओं को नहीं देख पड़ता और राक्षसों को ६ महीने तक दक्षिणी ध्रुव पर बराबर देख पड़ता है। इसलिए इस छमाही को देवताओं की रात और असुरों का दिन कहा गया है। इसलिए हमारे १२ महीने देवताओं अथवा राक्षसों के एक अहोरात्र के समान होते हैं। सुरासुराणामन्योन्यमहोरात्रं विपर्ययात् । षट् षष्टिसङ्गुणं दिव्यं वर्षमासुरमेव च ॥१४॥ अनुवाद—जो देवताओं का दिन होता है वही असुरों की रात होती है और जो देवताओं की रात होती है वह असुरों का दिन कहलाता है। यही देवता या असुर के अहोरात्र का ६० × ६ गुना दिव्य या असुर वर्ष कहलाता है। विज्ञान भाष्य—जैसे ३६० सावन दिन के एक सावन वर्ष की कल्पना की गयी है उसी प्रकार ३६० दिव्य दिन का एक दिव्य वर्ष माना गया है। इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि हमारे ३६० वर्षों का देवताओं का एक वर्ष होता है। तद्द्वादशसहस्राणि चतुर्युगमुदाहृतम् । सूर्याब्दसंख्यया द्वित्रिसागरैरयुताहतैः ॥१५॥ सन्ध्यासन्ध्यांशसहितं विज्ञेयं तच्चतुर्युगम् । कृतादीनां व्यवस्थेयं धर्मपादव्यवस्थया ॥१६॥ युगस्य दशमो भागः चतुस्त्रिद्वयेक सङ्गुणः । क्रमात्कृतयुगादीनां षष्ठांशः सन्ध्ययोः स्वकः ॥१७॥ अनुवाद—इन बारह हजार दिव्य वर्षों का एक चतुर्युग होता है जिसकी संख्या सौर वर्षों में तैंतालीस लाख बीस हजार (४३२००००) होती है। इसमें संध्या और संध्यांश के वर्ष भी मिले हुए हैं। एक चतुर्युग में सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और
१० सूर्य सिद्धान्त कलियुग चार युग होते हैं; जिनके मान धर्म के चरणों के अनुसार होते हैं। चतुर्युग के दसवें भाग का चार गुना सत्ययुग, तीन गुना त्रेता, दो गुना द्वापर और एक गुना कलियुग होता है। प्रत्येक युग के छठें भाग के समान उसकी दोनों संध्याएँ होती हैं ॥ १५-१७ ॥ विज्ञान-भाष्य—१४वें श्लोक में बतलाया गया है कि सुरों या असुरों के ३६० दिन का एक दिव्य वर्ष होता है। तेरहवें श्लोक में बतलाया गया है कि देवताओं का एक दिन एक सौर वर्ष के समान होता है इसलिए यह स्पष्ट है कि देवताओं का एक वर्ष ३६० सौर वर्षों के समान हुआ। १५वें श्लोक के अनुसार १२००० दिव्य वर्षों का अथवा १२००० × ३६० (अर्थात् ४३२००००) सौर वर्षों का एक चतुर्युग होता है। चतुर्युग को महायुग भी कहते हैं। एक महायुग में चार युग सत्ययुग; त्रेता, द्वापर और कलियुग होते हैं इसीलिए इसको चतुर्युग भी कहते हैं। सत्ययुग में धर्म चार चरण होता है, त्रेता में तीन चरण, द्वापर में दो चरण और कलियुग में एक चरण । इसी तरह एक महायुग में सत्ययुग चार भाग, त्रेता तीन भाग, द्वा.पर दो भाग और कलियुग एक भाग होता है। इसलिए दिव्य वर्षों में सौर वर्षों में दोनों संध्याओं सहित सत्ययुग का मान हुआ ४८०० १७२८००० ;, त्रेता ,, ३६०० १२९६००० ,, द्वापर ,, २४०० ८६४००० ;; कलियुग ,, १२०० ४३२००० महायुग १२००० ४३२०००० प्रत्येक युग की दोनों सन्ध्याएँ उसके छठें भाग के समान होती हैं इसलिए एक संध्या (सन्धि-काल) बारहवें भाग के समान हुई। युग के आदि में जो संध्या होती है उसको आदि संध्या और अन्त में जो संध्या होती है उसको संध्यांश कहते हैं। इनके मान यह हुए :— दिव्य वर्षों में सौर वर्षों में सत्ययुग की आदि वा अन्त संध्या ४०० १४४००० त्रेता की ,, ,, ३०० १०८००० द्वापर की ,, ,, २०० ७२००० कलियुग की ,, ,, १०० ३६००० जैसे एक, अहोरात्र में प्रातः और सायं दो संध्याएँ होती हैं वैसे ही चतुर्युग के प्रत्येक युग में दो संध्याएँ होती हैं, एक आरम्भ में और एक अन्त में।
मध्यमाधिकार ११ युगानां सप्ततिस्सैका मन्वन्तरमिहोच्यते । कृताब्दसङ्ख्या तस्यान्ते सन्धिः प्रोक्तो जलप्लवः ॥१८॥ ससन्धयस्ते मनवः कल्पे ज्ञेयाश्चतुर्दश । कृतप्रमाणः कल्पादौ संधिः पञ्चदश स्मृताः ॥१९॥ अनुवाद—७१ महायुगों का एक मन्वन्तर होता है, जिसके अंत में सत्ययुग के समान संध्या होती है। इसी संध्या में जलप्लव होता है। संधि सहित १४ मन्वन्तरों का एक कल्प होता है, जिसके आदि में भी सत्ययुग के समान एक संध्या होती है; इसलिए एक कल्प में १४ मन्वन्तर और १५ सत्ययुग के समान संध्याएँ हुईं ॥१८-१९॥ विज्ञान भाष्य—चतुर्युग के प्रत्येक युग में दो संध्याएँ मानी गयी हैं; परन्तु मन्वन्तर के केवल अंत में एक संध्या मानी गयी है जिसका मान सत्ययुग के समान होता है। १ मन्वन्तर ७१ महायुगों का अर्थात् ७१ × ४३२०००० = ३०६७२०००० सौरवर्षों का होता है। प्रत्येक मन्वन्तर के अंत में १७२८००० सौर वर्षों की एक संध्या होती है तथा कल्प के आदि में भी इसीके समान एक संध्या होती है। इस प्रकार १ कल्प = १४ मन्वन्तर + १५ सत्ययुग के समान संध्याएँ = १४ × ७१ महायुग + १५ सत्ययुग = ९९४ महायुग + (१५ × ४) / १० महायुग [क्योंकि सत्ययुग = महायुग का ४/१० ] = ९९४ + ६ महायुग = १००० महायुग अथवा = १००० × १२००० = १२०००००० दिव्य वर्ष अथवा = १००० × ४३२०००० = ४३२००००००० सौर वर्ष महायुग अथवा मन्वन्तर के यह मान मनुस्मृति इत्यादि धर्मशास्त्रों से मिलते हैं; परन्तु आर्यभट ने अपने आर्यभटीय में युगों के मान कुछ भिन्न दिये हैं। इनके अनुसार १ कल्प में १४ मनु और १ मनु में ७२ चतुर्युग के प्रत्येक युग सत्ययुग त्रेता, द्वापर और कलियुग समान १ होते हैं । इस प्रकार स्पष्ट है कि आर्यभट के अनुसार एक कल्प में १४ × ७२ = १००८ चतुर्युग होते हैं । १. देखिये २३वें श्लोक का विज्ञान भाष्य ।
१२ सूर्य सिद्धान्त इत्थं युगसहस्रेण भूतसंहारकारकः । कल्पो ब्राह्ममहः प्रोक्तं शर्वरी तस्य तावती ॥२०॥ अनुवाद—इस प्रकार एक हज़ार महायुग का एक कल्प होता है जो ब्रह्मा के एक दिन के समान है । इतने ही समय की ब्रह्मा की एक रात होती है, जिसमें सृष्टि का लय हो जाता है ॥ २० ॥ विज्ञान भाष्य—ब्रह्मा के दिन और रात का बहुत ही अच्छा चित्र भगवान कृष्ण ने श्री मद्भगवद्गीता में आठवें अध्याय में यों किया है :— "सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद् ब्रह्मणो विदुः । रात्रिं युगसहस्रां तां तेऽहोरात्रविदो जनाः ॥ १७ ॥ अव्यक्ताद् व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे । रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्त संज्ञके ॥ १८ ॥ भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते । रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे ॥ १९ ॥ अर्थात् "(१७) अहोरात्र को (तत्त्वतः) जाननेवाले पुरुष समझते हैं कि (कृत, त्रेता, द्वापर और कलि इन चार युगों का महायुग होता है और ऐसे) हज़ार महा- युगों का समय ब्रह्मदेव का एक दिन होता है और ऐसे ही हज़ार युगों की (उसकी) एक रात्रि होती है । (१८) 'ब्रह्मदेव के दिन का आरंभ होने पर अव्यक्त से सब व्यक्त (पदार्थ) निर्मित होते हैं और रात्रि होने पर उसी पूर्वोक्त अव्यक्त में लीन हो जाते हैं । (१९) हे पार्थ ! भूतों का यही समुदाय (इस प्रकार) बार-बार उत्पन्न होकर अवश होता हुआ, अर्थात् इच्छा हो या न हो रात होते ही लीन हो जाता है और दिन होने पर (फिर) जन्म लेता है ।'*" परमायुश्शतं तस्य तयाऽहोरात्रसङ्ख्यया । आयुषोऽर्धमितं तस्य शेषात्कल्पोऽयमादिमः ॥ २१ ॥ कल्पादस्माच्च मनवः षड् व्यतीतास्ससंशयः । वैवस्वतस्य च मनोः युगानां त्रिघनो गतः ॥ २२ ॥ अष्टाविंशाद्युगादस्माद्यातमेकं कृतं युगम् । अतः कालं प्रसंख्याय सङ्ख्यामेकत्र पिण्डयेत् ॥ २३ ॥ अनुवाद—(२१) ब्रह्मा की आयु उन्हीं के दिन-मान से सौ वर्ष की होती है । इस समय ब्रह्मा की आधी आयु बीत चुकी है, शेष आधी आयु का यह पहला कल्प *गीता रहस्य पृष्ठ ७३४, ७३५
मध्यमाधिकार १३' है। (२२) इस कल्प के संधियों सहित ६ मनु बीत गये हैं और सातवें मनु वैवस्वत के २७ महायुग बीत गये हैं, तथा (२३) अठाईसवें महायुग का सत्ययुग बीत गया है; इसलिए काल गणना के लिए इतनी संख्याओं को एकत्र कर लेना चाहिये ॥ २१-२३॥ विज्ञान भाष्य—आयु का परिमाण सौ वर्ष का माना गया है। मनुष्य की परम आयु सौ सौर वर्षों की होती है, देवता की आयु सौ दिव्य वर्षों की होती है और एक दिव्य वर्ष ३६० सौर वर्षों का होता है। इसी तरह ब्रह्मा की आयु सौ ब्राह्म वर्षों की समझनी चाहिये । एक ब्राह्म वर्ष ३६० ब्राह्म दिनों का और एक ब्राह्म दिन (अहोरात्र) दो कल्प अथवा २००० महायुगों का होता है। इस गणना से ब्रह्मा के ५० वर्ष बीत गये हैं, इक्यावनवें वर्ष का पहला दिन (कल्प) आरंभ हो गया है जिसके संधियों सहित ६ मनु, २७ महायुग और २८वें महायुग का सत्ययुग बीत गया है। यहाँ यह स्मरण रखना चाहिये कि यह बात सत्ययुग के अंत में कही जा रही है; जैसा कि दूसरे श्लोक के 'अल्पावशिष्टेतु कृते'* इत्यादि से प्रकट है। इस गणना से वर्तमान कल्प के आरम्भ से २८ वें महायुग के सत्ययुग के अन्त तक का समय यों निकलता है :— सौर वर्षों में कल्प की आदि संध्या = १७,२८,००० ६ मन्वन्तर = ६ x ३०,६७,२०,००० = १,८४,०३,२०,००० ६ मन्वन्तरों की ६ संध्याएँ = ६ x १७,२८,००० = १,०३,६८,००० सातवें मन्वन्तर के २७ महायुग = = २७ x ४३,२०,००० = ११,६६,४०,००० २८वें महायुग का सत्ययुग = १७,२८,०००
∴ कल्प के आरम्भ से वर्तमान महायुग के सत्ययुग के अन्त तक का समय = १,९७,०७,८४,००० इस समय १६७६ वि० में कलियुग के ५०२३ वर्ष बीते हैं; इसलिए यदि कल्प के आरम्भ से अब तक का समय जानना हो तो ऊपर सत्ययुग के अन्त तक के सौर वर्षों में त्रेता के १२,९६,००० सौर वर्ष, द्वापर के ८,६४,००० सौर वर्ष तथा कलियुग के ५०२३ वर्ष और जोड़ देने चाहिये । इस प्रकार कल्प के आरम्भ से अब तक का समय हुआ १, ९७, २६, ४६, ०२३ सौर वर्ष। संकल्प के मंत्र में समय की गणना इसी प्रकार की गई है जिसका समय संबन्धी भाग यह है :—
*देखिये १६वें श्लोक का विज्ञान भाष्य
१४ सूर्य सिद्धान्त प्रवर्तमानस्याद्य ब्रह्मणो द्वितीये परार्धे श्री श्वेतवाराह कल्पे वैवस्वत मन्वन्तरे अष्टाविंशति तमे कलियुगे कलि प्रथम चरणे...बौद्धावतारे वर्तमानेऽस्मिन् वर्तमाने संवत्सरेऽमुकनाम वत्सरेऽमुकायने अमुक ऋतौ अमुकमासे अमुकपक्षे अमुकतिथौ अमुक- वासरे अमुकनक्षत्रे संयुक्ते चन्द्रे...तिथौ...। आर्यभट के मत से कल्प के आरम्भ से कलियुग के आरम्भ तक का समय = ६ मनु + २७ चतुर्युग + ३/४ चतुर्युग† = ६ × ७२ + २७ + ३/४ चतुर्युग = ४३२ + २७ + ३/४ चतुर्युग = ४५९ ३/४ × ४३, २०,००० सौर वर्ष = (४६० - १/४) × ४३, २०,००० " = १,९८,७२,००,००० - १०,८०,००० सौर वर्ष = १,९८,६१,२०,००० सौर वर्ष । इसमें यदि ५०२३ वर्ष और जोड़ दिये जायें तो १६७६ वि० में कल्प के आरम्भ से जितने सौर वर्ष बीते हैं वह निकल आवेंगे । ब्रह्मगुप्त भास्कराचार्य इत्यादि ने आर्यभट के इस मत को नहीं माना है । उनके मत से कल्प के आरम्भ से अब तक की सौर वर्षों की संख्या वही आती है, जो सूर्य सिद्धान्त के अनुसार आती है । बीते हुए ६ मन्वन्तरों के नाम हैं—(१) स्वायम्भुव, (२) स्वारोचिष, (३) औत्तमि, (४) तामस, (५) रैवत और (६) चाक्षुष । वर्तमान मन्वन्तर का नाम वैवस्वत है । वर्तमान कल्प को श्वेत-वाराह-कल्प कहते हैं । ग्रहर्क्षदेवदैत्यादिसृजतोस्य चराचरम् । कृताद्रिवेदा दिव्याब्दाः शतघ्ना वेधसो गताः ॥२४॥ अनुवाद—ग्रह, नक्षत्र, देव, दैत्य, मनुष्य, पशु, पक्षी, पर्वत, वृक्ष इत्यादि चराचर जगत के बनाने में ब्रह्मा को ४७,४०० दिव्य वर्ष अथवा ४७,४०० × ३६० = १,७०,६४,००० सौर वर्ष लग गये । (इसलिए कल्प के आदि से इतने समय के बाद सारी सृष्टि तैयार हुई) ॥ २४ ॥ विज्ञान भाष्य—सूर्य सिद्धान्त का यह मत है कि कल्प के आदि में सृष्टि की रचना नहीं थी । इसके लिए ब्रह्मा को १,७०,६४,००० सौर वर्ष लगाने पड़े थे । †काहो मनवोढ (१४) मनुयुग शख (७२) गतास्ते च (६) मनुयुग छना (२७) च । कल्पादेर्युगपादा ग (३) च गुरु दिवसाच्च भारतात्पूर्वम् ॥ ३ ॥ आर्य- भटीय प्रथम पाद, बा० उदयनारायण सिंह द्वारा संपादित ।
मध्यमाधिकार १५ दूसरे आर्यभट का भी यही मत है; परन्तु ब्रह्मगुप्त भास्कराचार्य इत्यादि के गणित से जान पड़ता है कि इनको यह मत मान्य नहीं था, क्योंकि इन्होंने ग्रहों का स्थान जानने के लिए कल्प के आदि से गणना की है; परन्तु सूर्य सिद्धान्त ने सृष्टि के तैयार होने में जितना समय लगा है उसको ग्रह गणित में छोड़ दिया है। पश्चाद्व्रजन्तोऽतिजवान्नक्षत्रैस्ससतं ग्रहाः । नीयमानाश्च लम्बन्ते तुल्यमेव स्वमार्गगाः ॥२५॥ प्राग्गतित्वमतस्तेषां भगणैः प्रत्यहं गतिः । परिणाहवशाद्भिन्नाः तद्वशाद्भानि भुञ्जते ॥२६॥ शीघ्रगस्त्वर्क्षमल्पेन कालेन महताऽल्पगः । तेषां तु परिवर्तेन पौष्णान्ते भगणास्स्मृतः ॥२७॥ अनुवाद—(२५) शीघ्रगामी नक्षत्रों के साथ सदैव पश्चिम की ओर चलते हुए ग्रह अपनी-अपनी कक्षा में समान परिमाण में हारकर पीछे रह जाते हैं; (२६) इसलिए वह पूर्व की ओर चलते हुए देख पड़ते हैं और कक्षाओं की परिधि के अनुसार उनकी दैनिक गति भी भिन्न देख पड़ती है; इसलिए नक्षत्र चक्र को भी यह भिन्न समय में अर्थात् (२७) शीघ्र चलनेवाले थोड़े समय में और कम चलने वाले बहुत समय में पूरा करते हैं। रेवती के अंत में पूरे होनेवाले चक्र को भगण कहते हैं ॥२५-२७॥ विज्ञान भाष्य—इन तीन श्लोकों में ग्रहों की गति का सिद्धान्त बतलाया गया है; इसलिए यह बड़े महत्व के श्लोक हैं। इनसे संक्षेप में यह पता चलता है कि भारत के प्राचीन ज्योतिषी ग्रहों के बारे में क्या विचार रखते थे। २५वें श्लोक में बतलाया गया है कि आकाश में जितने तारे देख पड़ते हैं वह सब ग्रहों के साथ पश्चिम की ओर जा रहे हैं; परन्तु नक्षत्रों के बहुत शीघ्र चलने के कारण ग्रह पीछे रह जाते हैं और इसीसे पूर्व की ओर चलते हुए देख पड़ते हैं। इनकी पूरब की ओर बढ़ने की चाल तो समान है, परन्तु इनकी कक्षाओं का विस्तार भिन्न होने से इनकी गति भी भिन्न देख पड़ती है। इसका रहस्य आगे के चित्र से प्रकट होगा — मान लीजिये कि दिये हुए चित्र में भीतरी वृत्त १० इंच का और बाहरी १५ इंच का है और मान लीजिये कि ख और ग स्थानों से, जो क केन्द्र की सीध में हैं दो चींटियां १ इंच प्रति सेकंड की चाल से भीतरी और बाहरी वृत्त की परिक्रमा करने को चलती हैं; तो यह स्पष्ट है कि बाहरी वृत्त पर चलनेवाली चींटी एक परिक्रमा १५ सेकंड में और भीतरी वृत्त पर चलने वाली चींटी एक परिक्रमा १० सेकंड में कर डालेगी। इससे यह सिद्ध हुआ कि समान रेखात्मक गति से चलने पर भिन्न-भिन्न आकार की कक्षा का चक्कर भिन्न-भिन्न समय में होगा । परन्तु २७वें श्लोक में
१६ सूर्य सिद्धान्त चित्र १ कहा गया है कि शीघ्र चलनेवाले ग्रह थोड़े काल में तथा मंद चलने वाले ग्रह अधिक काल में चक्कर पूरा करते हैं। यहाँ कुछ विरोध जान पड़ता है, परन्तु यह विरोध नहीं है; क्योंकि पहले श्लोक में जो समान गति बतलायी गई है वह योजनात्मक गति है और इस श्लोक में गति का मान कोणात्मक (Angular velocity) है। एक चक्कर ३६० अंशों का होता है; इसलिए बाहरी वृत्त का एक इंच, केन्द्र पर ३६०°/१५ = २४° का कोण बनाता है और भीतरी वृत्त का एक इंच ३६०°/१० = ३६° का कोण बनाता है। इसलिए यद्यपि चींटियों की रेखात्मक (rectilinear) गति १ इंच प्रति सेकंड होने से समान है यद्यपि इनकी कोणात्मक गति प्रति सेकंड भिन्न है। बाहरी चींटी प्रति सेकंड २४° तथा भीतरी ३६° चलती है। इसलिए यह स्पष्ट है कि शीघ्र चलनेवाली कम समय में तथा मंद चलनेवाली अधिक समय में चक्कर पूरा करेगी। २७वें श्लोक में भगण की परिभाषा भी दी गयी है। रेवती नक्षत्र के अंत से आरम्भ करके पूरब की ओर बढ़ता हुआ जब ग्रह एक चक्कर लगाकर फिर वहीं रेवती के अंत में आ जाता है तब वह एक भगण (नक्षत्र गण जो २७ हैं) पूरा करता है। इसलिए भगण को चक्कर भी कहते हैं।
मध्यमाधिकार १७ इस सिद्धान्त के अनुसार यह मानना पड़ेगा कि ग्रहों की दूरी और उनके भगण- काल में एक विशेष सम्बन्ध है। जो ग्रह जितना ही दूर है उसका भगण काल (चक्कर लगाने का समय) उतना ही अधिक है। यह सम्बन्ध यहाँ बहुत संक्षेप में बतला दिया जाता है। इसकी पूरी व्याख्या भारतीय तथा पाश्चात्य ज्योतिषियों के सिद्धान्तों की तुलना करते हुए भूगोलाध्याय नामक बारहवें अध्याय में की जायगी। जब सभी ग्रहों की रेखात्मक गतियाँ समान मान ली जायं तब यह सहज ही सिद्ध हो सकता है कि ग्रहों की दूरियों का परस्पर सम्बन्ध क्या है; क्योंकि यह जानना तो कुछ कठिन नहीं है कि कौन ग्रह कितने दिन में एक चक्कर लगा लेता है। जब यह मालूम हो गया कि शनि एक चक्कर स्थूल रीति से ३० वर्ष में लगाता है और सूर्य १ वर्ष में और दोनों की रेखात्मक गतियाँ समान हैं तब यह स्वयंसिद्ध है कि सूर्य की कक्षा की ३० गुनी शनि की कक्षा है; क्योंकि ३० वर्ष में सूर्य अपनी कक्षा का ३० गुना चलता है और शनि अपनी कक्षा को केवल एक ही बार पूरा कर पाता है। इसलिए शनि की कक्षा = ३० × सूर्य की कक्षा । अर्थात् पृथ्वी से शनि की दूरी, सूर्य की दूरी की ३० गुनी है । इसी प्रकार और ग्रहों की दूरी भी जानी जा सकती है। आजकल की गवेषणाओं से जाना गया है कि ग्रहों की परस्पर दूरियों का सम्बन्ध इतना सरल नहीं है और न इनकी रेखात्मक गति ही समान है। अब तो यह सिद्ध होता है कि पृथ्वी से जितनी सूर्य की दूरी है उसका लगभग १० गुना शनि पृथ्वी से दूर है। विकलानां कला षष्ट्या तत् षष्ट्या भाग उच्यते । तत्त्रिंशता भवेद्राशिः भगणो द्वादशैव ते ॥ २८ ॥ अनुवाद- ६० विकलाओं की एक कला, ६० कलाओं का एक भाग या अंश, ३० भागों या अंशों की एक राशि तथा १२ राशियों का एक भगण होता है ॥२८॥ विज्ञान भाष्य - यह कोण नापने की इकाइयां हैं । पूरे नक्षत्रचक्र को भगण कहते हैं। यदि इस चक्कर के १२ समान भाग किये जायं तो प्रत्येक भाग को राशि कहते हैं। राशि के तीसवें भाग को अंश, अंश के साठवें भाग को कला तथा कला के साठवें भाग को विकला कहते हैं। इनमें से भगण और राशि का प्रयोग तो केवल उस आकाश-स्थित चक्र के लिए होता है जिसके तल (plane) में सूर्य पृथ्वी की परिक्रमा करता हुआ देख पड़ता है और अन्य ग्रह इधर उधर कुछ हटकर परिक्रमा करते हैं। परन्तु अंश, कला और विकला का प्रयोग अन्य कोणों के नापने में भी किया जाता है । आजकल अंश को संक्षेप में लिखने की रीति यह है कि अंश का परिमाण बतलाने वाले अंक के ऊपर तनिक-सा दाहिने हटकर एक छोटा-सा वृत्त २
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मध्यमाधिकार १६ जाने वाले अंक का सूचक शब्द, फिर सैकड़े के स्थान में लिखे जाने वाले अंक का सूचक शब्द क्रम से रख दिये जाते हैं। जैसे ३२५ कहना हुआ तो पहले ५ का सूचक कोई शब्द पंच, इषु, मार्गण इत्यादि लिखकर उसके पीछे २ का सूचक कोई शब्द द्वि, अश्वि, यम इत्यादि लिखा जाता है, फिर ३ का सूचक त्रि, अग्नि, शिखि इत्यादि लिखा जाता है। इस तरह ३२५ को हम पंचाश्विशिखि या इषुयमाग्नि लिख सकते हैं। सूर्य्य सिद्धान्त, ब्राह्मस्फुट-सिद्धान्त तथा सिद्धान्त-शिरोमणि में संख्याओं के लिखने की यही परिपाटी है। प्रथम आर्यभट के आर्यभटीय तथा दूसरे आर्यभट के महा- सिद्धान्त में संख्या लिखने की रीतियां इससे भिन्न हैं । एक महायुग में ग्रहों के जितने भगण होते हैं वह सूर्य्य सिद्धान्त के अनुसार ऊपर दिये गये हैं। आर्यभट तथा ब्रह्मगुप्त के सिद्धान्तों के अनुसार महायुगीय भगणों के मानों में कुछ अंतर है तथा आजकल सूक्ष्मयंत्रों की सहायता से भगणों के जो मान जाने गये हैं वह भी किसी सिद्धान्त के अनुसार नहीं मिलते वरन् थोड़ी सी भिन्नता रखते हैं। अगले पृष्ठ में हम सूर्य्य सिद्धान्त, ब्रह्मगुप्त-सिद्धान्त तथा आधुनिक भगण- कालों के मान तुलनात्मक दृष्टि से देते हैं, जिनसे यह प्रकट होगा कि हमारे प्राचीन ज्योतिषियों के निकाले हुए भगण काल में और आजकल के सूक्ष्मयंत्रों के द्वारा निकाले हुए भगण काल में कितना कम अंतर है । जितने समय में किसी ग्रह का एक भगण या चक्कर पूरा होता है उसको भगण काल कहते हैं। इसके निकालने की रीति सिद्धान्त के अनुसार यह है कि एक महायुग में जितने भगण उस ग्रह के होते हैं उससे महायुग के सौर वर्षों में भाग दे दीजिये तो १ भगण काल (सौर वर्षों में) निकल आवेगा । अब इसको चाहे आप दशमलव भिन्न में लिखिये और चाहे सावन दिनों में । सावन दिनों में भगणकाल निकालने के लिए सबसे सुगम रीति यह है कि महायुग में जितने सावन दिन हों उनमें महायुगीय भगण का भाग दे दीजिये, जितनी लब्धि आवे वह सावन दिन है । शेष की घड़ी, पल, विपल इत्यादि बना लीजिये । जैसे १ घड़ी में ६० पल होते हैं वैसे ही १ पल में ६० विपल की तथा १ विपल में ६० प्रतिविपल की भी कल्पना की जा सकती है । इन श्लोकों में जिन नये शब्दों का प्रयोग हुआ है वह हैं ग्रह-शीघ्र, चन्द्रोच्च और पात । इन शब्दों को समझने के लिए पहले हमको अपने ऋषियों की उन कल्पनाओं का ज्ञान होना चाहिये जिन्हें उन्होंने ग्रहों की चाल के सम्बन्ध में मान रखी थीं । उन्होंने पृथ्वी को अचल समझा था और सूर्य्य, चन्द्रमा, ग्रहों और नक्षत्रों को पृथ्वी की परिक्रमा करते हुए समझा था । परन्तु इतने से ही ग्रहों की गतियों का हिसाब ठीक-ठीक नहीं निकलता था; इसलिए उन्होंने ग्रहशीघ्रों की कल्पना की थी। वह यह तो देखते ही थे कि दो ग्रह बुध और शुक्र सूर्य के आसपास ही रहते हैं; इसलिए
२० सूर्य सिद्धान्त ग्रहों के भगणकाल का कोष्टक | ग्रह | सूर्यसिद्धान्त के अनुसार | | | | ब्रह्मगुप्त सिद्धान्त के अनुसार | | | | आधुनिक खोज के अनुसार | | | | | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | | | दिन | घड़ी | पल | विपल | दिन | घड़ी | पल | विपल | दिन | घड़ी | पल | विपल | | रवि | ३६५ | १५ | ३१ | ३१.४ | ३६५ | १५ | ३० | २२.५ | ३६५ | १५ | २२ | ५६.८७ | | चंद्र | २७ | १९ | १८ | १.६ | २७ | १९ | १८ | ० २५ | २७ | १९ | १७ | ५८.६६ | | चंद्रोच्च | ३२३२ | ५ | ३७ | १३.६ | ३२३२ | ४४ | २ | ४५ | ३२३२ | २४ | ३१ | १४.०८८ | | चन्द्रपात या राहु | ६७६४ | २३ | ५६ | २३.५ | ६७६२ | १५ | १४ | १४.७ | ६७६८ | १६ | ४४ | २४.००० | | बुध | ८७ | ५८ | १० | ५५.७ | ८७ | ५८ | ११ | ४३.७ | ८७ | ५८ | ६ | २४.६८६ | | शुक्र | २२४ | ४१ | ५४ | ५०.६ | २२४ | ४१ | ५२ | ३४.७ | २२४ | ४२ | २ | ४७.४८६ | | मंगल | ६८६ | ५६ | ५.० | ५.८७ | ६८६ | ५२ | ५२ | ३३.७ | ६८६ | ५८ | ४६ | २.५१९ | | गुरु | ४३३२ | १६ | १४ | २०.६ | ४३३२ | १४ | २४ | १६.२ | ४३३२ | ३५ | ५ | १७.४६ | | शनि | १०७६५ | ४६ | २३ | ४.१ | १०७६५ | ४८ | ५४ | ५१.२ | १०७५६ | १३ | १० | ५७.४६ | —मराठी के भारतीय ज्योतिषशास्त्र पृ० २०२ से उद्धृत ।
मध्यमाधिकार २१
इनका स्थान जानने के लिए सबसे पहले यह जानना चाहिये कि सूर्य कहां है। सूर्य का स्थान जान लेने पर यह निश्चय हो जाता है कि बुध सूर्य से या तो २८¹ अंश के लगभग आगे होगा या पीछे और शुक्र सूर्य से या तो ४७² अंश के लगभग आगे होगा या पीछे । इसीलिए २६वें श्लोक में सूर्य, बुध और शुक्र का महायुगीय भगण समान बतलाया गया है। परन्तु यह जानने के लिए कि बुध या शुक्र सूर्य से कितना आगे या पीछे है बिना इनके शीघ्रों या शीघ्रोच्चों के स्थानों के जाने काम नहीं चल सकता । इनके शीघ्रोच्चों के भगण काल उस समय के समान हैं जितने समय में आजकल के मतानुसार बुध या शुक्र सूर्य की परिक्रमा करते हैं। इसलिए बुध या शुक्र के शीघ्रोच्च के भगण काल से उस समय को समझना चाहिये जितने समय में यह नक्षत्र चक्र की परिक्रमा नहीं, वरन सूर्य की परिक्रमा करते हैं। मंगल, गुरु और शनि के शीघ्रोच्चों की बात उपर्युक्त दो ग्रहों के शीघ्रोच्चों से न्यारी है। इनके शीघ्रों का भगण काल वही माना गया है जो सूर्य का है। इसका अर्थ यह हुआ कि मंगल, गुरु और शनि के शीघ्रोच्च वह बिन्दु हैं जो १ वर्ष में पूरे नक्षत्र चक्र की परिक्रमा कर आते हैं। किन्तु सूर्य भी १ वर्ष में नक्षत्र चक्र की एक परिक्रमा कर लेता है; इसलिए मंगल, गुरु और शनि के शीघ्रोच्च सूर्य के पास ही रहते हैं। इन शीघ्रोच्चों के संबंध में दूसरे अध्याय में विशेष चर्चा की जायगी । मन्दोच्च अथवा उच्च— ऊपर बतलाया गया है कि चन्द्रमा का उच्च एक महायुग में ४,८८,२०३ भगण करता है, इसलिए एक भगणकाल सूर्य सिद्धान्त के मत से ३२३२ सावन दिन, ५ घड़ी, ३७ पल और १३.६ विपल होता है। चन्द्रमा का उच्च चन्द्रकक्षा का वह बिन्दु है जो पृथ्वी से चन्द्र-कक्षा के अन्य विन्दुओं की अपेक्षा सबसे अधिक दूरी पर है। जब चन्द्रमा इस विन्दु पर रहता है तब बहुत दूर होने के कारण आकार से अत्यन्त छोटा देख पड़ता है और गति भी बहुत मंद होती है। चन्द्र-कक्षा में चन्द्रोच्च से १८०° पर एक बिन्दु ऐसा भी है जो पृथ्वी के बहुत पास है। जब चन्द्रमा इस विन्दु पर आता है तब उसकी गति सबसे तीव्र हो जाती है और बहुत पास होने के कारण आकार भी बहुत बड़ा देख पड़ता है। चन्द्रमा की इस विषम गति के कारण यह सहज ही नहीं बतलाया जा सकता कि किसी समय उसका स्थान क्या होगा । ऊपर यह भी १. बुध का सूर्य से महत्तम अन्तर १६° १२' और २८° ४८' के बीच होता है। २. शुक्र का सूर्य से महत्तम अन्तर ४७° से अधिक नहीं होता । (Outlines of Astronomy by Herschel pp. 281 and 291)
२२ सूर्य सिद्धान्त बतलाया गया है कि चन्द्रमा का भगण काल २७.३२१६७ मध्यम सावन दिन का होता है। इससे चन्द्रमा का जो स्थान निकलता है वह मध्यम स्थान कहलाता है। इस मध्यम-स्थान से चन्द्रमा कभी कुछ आगे और कभी कुछ पीछे देख पड़ता है। चन्द्रमा प्रत्यक्ष जिस स्थान पर देखा जाता है उसको स्पष्ट स्थान कहते हैं। मध्यम स्थान से स्पष्ट स्थान का सबसे अधिक अन्तर ५°२′ ३०″ होता है। इतने कोण की जो ज्या (sine) होती है उसी के समान अन्तर पर पृथ्वी से चन्द्र-कक्षा का केन्द्र माना गया है और चन्द्रमा इसी केन्द्र की परिक्रमा करता हुआ पृथ्वी के चारों ओर घूमता हुआ देख पड़ता है। चित्र २ में प पृथ्वी का केन्द्र है, च चन्द्र-कक्षा का केन्द्र है और पच चित्र २ चित्र ३ चित्र ४ ५°२′ ३०″ की ज्या है। चन्द्रमा उ चा नी वृत्त पर घूमता हुआ पृथ्वी की परिक्रमा करता है। यह स्पष्ट है कि जब चन्द्रमा उ पर होता है तब वह प से अत्यन्त अधिक दूरी पर रहता है और जब नी पर रहता है तब अत्यन्त निकट रहता है। उ को चन्द्रोच्च (apogee) तथा नी को नीच (perigee) कहते हैं। यह उ बिन्दु
मध्यमाधिकार २३ आकाश में एक ही जगह स्थिर नहीं रहता वरन् मन्दमति से पूरब की ओर बढ़ता रहता है । चन्द्रमा का उच्च १ चक्कर प्रायः ३२३२ सावन दिनों में कर लेता है। अन्य ग्रहों के उच्च या मन्दोच्च और भी मंदगति से पूरब की ओर बढ़ते हैं। आज- कल इस कल्पना से काम नहीं लिया जाता। गणित से यह सिद्ध किया गया है कि चन्द्रमा पृथ्वी की और पृथ्वी तथा अन्य ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हैं और परिक्रमा करने का मार्ग वृत्ताकार नहीं वरन् दीर्घ-वृत्ताकार है। इस सम्बन्ध में कुछ कहने के पहिले दीर्घ-वृत्त के कुछ गुणों का बतला देना आवश्यक है। उ चा नी एक दीर्घ- वृत्त का चित्र है (चित्र ३) । उ नी को दीर्घ अक्ष तथा चा ची को लघु अक्ष कहते हैं और इन दोनों अक्षों के मिलने के विन्दु क को दीर्घ वृत्त का केन्द्र कहते हैं। केन्द्र पर लघु अक्ष तथा दीर्घ अक्ष के दो समान भाग हो जाते हैं। दीर्घ अक्ष पर केन्द्र से समान दूरी पर न ना दो ऐसे बिन्दु होते हैं जिनको यदि दीर्घ-वृत्त के किसी बिन्दु प, पा या पी से मिला दिया जाय तो प न + पना = पान + पाना = पीन + पीना । न, ना बिन्दुओं को दीर्घवृत्त की नाभि कहते हैं। यदि उ चा नी चन्द्र-कक्षा मान लिया जाय तो पृथ्वी का स्थान न होगा । न से चन्द्र कक्षा की दूरी उ बिन्दु पर सबसे अधिक तथा नी बिन्दु पर सबसे कम है, इसलिए उ विन्दु चन्द्रमा का उच्च या मन्दोच्च कहलायेगा और नी बिन्दु चन्द्रमा का नीच । यदि मन्दोच्च का स्थान ज्ञात हो तो नीच का स्थान सहज ही जाना जा सकता है, क्योंकि यह सदैव उच्च से १८०° पर रहता है। इसी प्रकार पृथ्वी, मङ्गल, बुध, शुक्र इत्यादि भी दीर्घवृत्त में सूर्य की परिक्रमा करते हैं और सूर्य इन कक्षा-वृत्तों की नाभि पर रहता है। उच्च स्थान पर गति बहुत मंद और नीच स्थान पर बहुत तीव्र क्यों होती है, इसका कारण आकर्षण शक्ति की घटती-बढ़ती है। जब ग्रह उच्च पर रहता है तब उसका अंतर अत्यन्त अधिक होने के कारण आकर्षण शक्ति अत्यन्त कम होती है, जिससे ग्रह की गति मंद पड़ जाती है और जब वह नीच पर होता है तब अंतर अत्यन्त कम होने से आकर्षण शक्ति अत्यन्त अधिक होती है, जिससे ग्रह की गति बहुत तीव्र हो जाती है। इसके सम्बन्ध में कई नियम जाने गये हैं, जो केपलर के सिद्धान्त के नाम से प्रसिद्ध हैं, जिनकी चर्चा स्पष्टाधिकार नामक दूसरे अध्याय में उचित स्थान पर की जायगी । पात—सूर्य जिस मार्ग पर चलता हुआ १ वर्ष में आकाश का चक्कर लगाता हुआ जान पड़ता है, उसको क्रान्ति-वृत्त कहते हैं। इसी तरह चन्द्रमा, जिस मार्ग पर चलता हुआ पृथ्वी की परिक्रमा लगाता है उसको चन्द्र-कक्षा कहते हैं। क्रान्ति-वृत्त और चन्द्र-कक्षा एक ही तल पर नहीं हैं और समानान्तर भी नहीं हैं; इसलिए यह दोनों कक्षाएँ एक दूसरे से दो विन्दुओं पर मिलती हुई जान पड़ती हैं; जैसे दो उड़ती हुई पतंगों की डोरियां एक दूसरी से बहुत दूर रहती हुई भी एक विन्दु पर मिलती
२४ सूर्य सिद्धान्त
हुई जान पड़ती हैं और उन पतंगों की गतियों में भिन्नता होने से यह बिन्दु एक ही दिशा में नहीं देख पड़ता । इन्हीं बिन्दुओं को चन्द्रमा के पात कहते हैं। चन्द्रमा अपनी कक्षा में चलता हुआ आधे भ्रमण काल तक क्रान्तिवृत्त के उत्तर और आधे भ्रमण काल तक क्रान्तिवृत्त के दक्खिन रहता है। जब वह अपने पात पर पहुँचता है तब या तो वह क्रान्तिवृत्त से उत्तर की ओर बढ़ता है और/या दक्खिन की ओर । जिस पात पर पहुँच कर वह उत्तर की ओर जाता है उसे उत्तर पात (Ascending node) और जिस पात पर पहुँच कर वह दक्खिन की ओर जाता है उसे दक्खिन पात (Descending node) कहते हैं। उत्तर पात को राहु तथा दक्खिन पात को केतु भी कहते हैं। जब चन्द्रमा पूर्णमासी या अमावस्या के समय इन्हीं पातों के पास होता है तब चन्द्र-ग्रहण या सूर्य-ग्रहण लगता है; इसीलिए यह कल्पना हो गयी कि राहु और केतु राक्षस हैं, जो ग्रहण के कारण होते हैं। कुछ लोग पृथ्वी की छाया की नोक को राहु और चन्द्रमा की छाया की नोक को केतु मानते हैं; परन्तु यह भ्रम है। इन पातों के स्थान भी स्थिर नहीं हैं वरन् पश्चिम की ओर खिसकते हुए जान पड़ते हैं। जितने समय में यह पश्चिम की ओर खिसकते हुए एक परिक्रमा कर लेते हैं उतने समय को इनका भगण-काल कहते हैं। इसी तरह अन्य ग्रहों के पातों के बारे में समझ लेना चाहिये । यह पश्चिम की ओर क्यों खिसकते हैं, इसका कारण भौतिक ज्योतिर्विज्ञान (Physical Astronomy) में बहुत ही सूक्ष्मगणित के द्वारा समझाया गया है, जो उचित स्थान पर इस विज्ञान भाष्य में भी समझाया जायगा । चित्र ४ में यदि स र सा क को सूर्य का मार्ग अर्थात् क्रान्तिवृत्त समझा जाय और च र चा क को चन्द्रकक्षा तो र और क बिन्दु चन्द्रमा के पात कहलाते हैं। चन्द्रमा तीर की दिशा में भ्रमण करता हुआ जब र पात से आगे बढ़ता है तब क्रान्तिवृत्त से उत्तर हो जाता है और र चा क भाग तक उत्तर रहता है, इसलिए र पात को उत्तर पात कहते हैं । क बिन्दु पर पहुँच कर चन्द्रमा क्रान्तिवृत्त से दक्खिन जाता है, इसलिए क दक्खिन पात कहा जाता है। भारतीय ज्योतिषी चन्द्रमा के उत्तर पात को राहु तथा दक्षिण पात को केतु कहते हैं । चा र सा कोण क्रान्तिवृत्त और चन्द्रकक्षा के तलों के बीच का कोण है, जिसका मान ५° के लगभग है। इसी कोण को चंद्रमा का विक्षेप कहते हैं, जिसकी चर्चा इसी अध्याय के ६८वें श्लोक में की गयी है । यहाँ यह प्रश्न किया जा सकता है कि ऊपर जो भगण काल दिये हुए हैं वह कैसे जाने गये और भिन्न-भिन्न मतों में अन्तर क्यों है। इसका उत्तर भास्कराचार्य जी के मतानुसार यों है :— सातु तत्तद्भाषाकुशलेन तत्तत् क्षेत्रसंस्थानज्ञेन श्रुत गोलेनैव श्रोतुं शक्यते, नान्येन । ग्रह मन्द शीघ्रोच्च पाताः स्व स्वमार्गेषु गच्छन्तः एतावतः पर्ययान् कल्पे
मध्यमाधिकार २३ कुर्व्वन्तीत्यत्रागम एव प्रमाणम् । स चागमो महता कालेन लेखकाध्यापकाध्येतृ दोषैर्बहुधा जातः; तदा कतमस्य प्रामाण्यम् ? अथ यद्येवमुच्यते गणितस्कन्ध उपपत्तिमानेवागमः प्रमाणम् । उपपत्त्या ये सिध्यन्ति भगणास्ते ग्राह्याः । तदपि न । यतोऽतिप्राज्ञेन पुरुषे- णोपपत्तिर्ज्ञातुमेव शक्यते । न तया तेषां भगणानामियत्ता कर्तुं शक्यते; पुरुषायुषो- ऽल्पत्वात् । उपपत्तौ तु ग्रहः प्रत्यहं यन्त्रेण वेध्यः, भगणान्तं यावत् । एव शनैश्चरस्य तावद्वर्षाणां त्रिंशता भगणः पूर्य्यते । मन्दोच्चानान्तु वर्षशतैरनेकैः । अतो नायमर्थः पुरुषसाध्य इति । अत एवातिप्राज्ञा गणकाः साम्प्रतोपलब्ध्यनुसारिणं प्रौढ़गणकस्वीकृतं कमप्यागममङ्गीकृत्य ग्रहगणित आत्मनो गणितगोलयोनिरतिशयं कौशलं दर्शयितुं तथाऽन्यैर्भ्रान्ति ज्ञानेनान्यथोदितानर्थांश्च निराकर्त्तुमन्यान् ग्रन्थान् रचयन्ति । ग्रह गणित इति कर्त्तव्यतायामस्माभिः कौशलं दर्शनायं भवत्वागमो योऽपिको ऽप्ययमाशयस्तेषाम् ।* अर्थ--किन्तु यह रीति केवल वही जान सकता है जिसने (ज्योतिःशास्त्र की) विशेष भाषा में कुशलता प्राप्त की हो, नक्षत्रादि के स्थानों को जानता हो और जिसने भूगोल खगोल के बारे में अच्छी तरह सुना हो । अपने अपने मार्गों में जाते हुए ग्रह, मन्दोच्च, शीघ्रोच्च तथा पात एक कल्प में इतने भगण करते हैं, इसका प्रमाण आगम अर्थात् परम्परागत ज्ञान ही है । किन्तु अधिक समय बीतने के कारण लेखकों, अध्यापकों तथा पढ़ने वालों की भूल से आगम अनेक हो गये हैं ! इसलिए प्रश्न होता है कि कौन-सा आगम प्रमाण माना जाय । यदि ऐसा कहा जाय कि जो आगम गणित के अनुसार खरा सिद्ध हो उसी को प्रमाण मानकर जो भगण निकले वही माने जायें तो यह भी ठीक नहीं है । क्योंकि अत्यन्त ज्ञानी पुरुष भी केवल रीति के ही जानने में समर्थ हो सकता है; परन्तु रीति से ग्रहों के भगण की संख्या नहीं निकाल सकता । कारण यह है कि मनुष्य की आयु बहुत थोड़ी होती है और उपपत्ति जानने के लिए ग्रह को प्रतिदिन वेध करना होता है, जब तक कि भगण पूरा न हो । इस तरह शनिश्चर का एक भगण ३० वर्षों में पूरा होता है। मन्दोच्चों के भगण तो अनेक शताब्दियों में पूरे होते हैं । इसलिए यह कार्य पुरुषसाध्य नहीं है । इसलिए बुद्धिमान गणक किसी ऐसे आगम को मानकर जो उस समय ठीक समझा जाता हो और जिसको प्रतिष्ठाप्राप्त गणक ने स्वीकार कर लिया हो, अपनी गणित तथा गोल सम्बन्धी ग्रहों की गणना की कुशलता दिखाने के लिए तथा भ्रमवश जो कुछ अनर्थ- कारी दोष आ गये हैं उनके दूर करने के लिए, दूसरे ग्रंथ बनाते हैं । उनका यह अभिप्राय है कि हमको ग्रहों की ठीक गणना करने में कुशलता दिखानी चाहिये, आगम चाहे जो हो । *सिद्धान्त शिरोमणि गणिताध्याय पृ० १६-१७ (कलकत्ते का छपा । द्वितीय संस्करण)
२६ सूर्य सिद्धान्त सूर्य, बुध और शुक्र के भगण के सम्बन्ध में भास्कराचार्य जी कहते हैं कि कल्प में जितने वर्ष होते हैं उतने ही सूर्य के भगण होते हैं। इसलिए सूर्य का भगण काल ही वर्ष है। बुध और शुक्र रवि के पास कभी कुछ आगे और कभी कुछ पीछे सदा अनुचर की तरह रहते हैं। इसलिए इनके भगण भी रवि भगण के समान हुए । सूर्य का भगण काल जानने के लिए यह युक्ति बतलायी गयी है— समतल भूमि में एक वृत्त खींचकर उसमें दिशाओं के चिह्न लगा लो । जब सूर्य उत्तरायण हो तब जिस दिन वह पूर्व दिशा से कुछ ही दक्षिण होकर उदय हो उस दिन वृत्त के मध्य में गड़ी हुई कील के द्वारा उदय होते हुए सूर्य को बेध लो । इसके बाद एक वर्ष तक सूर्य के उदय की गणना करनी चाहिये । एक वर्ष में ३६५ बार उदय होगा । अन्तिम उदय पहले दिन के उदय-स्थान के कुछ दक्षिण होगा । इन दोनों में अन्तर हो वह लिख लो । दूसरे दिन फिर उदय होते हुए सूर्य को बेध करो । इस दिन यह पूर्व दिशा से कुछ उत्तर हो कर उदय होगा । पिछले दिन के उदय स्थान से कितना उत्तर होकर उदय होता है इसको भी जान लो । फिर अनुपात के द्वारा यह जान लो कि जब ६० घड़ी में इतना उत्तर बढ़ता है तब पहला अन्तर कितने समय में हुआ होगा। इस प्रकार १५ घड़ी ३० पल २२ विपल ३० प्रति- विपल और ३६५ सावन दिनों में सूर्य का उदय उसी स्थान पर होता है जिस स्थान पर वर्ष के आरम्भ में हुआ था । इसलिए यही समय सूर्य का भगण काल हुआ । फिर अनुपात के द्वारा यह जान लो कि जब १ वर्ष में उतने सावन दिन होते हैं तब १ कल्प वर्षों में कितने सावन दिन होते हैं, इत्यादि । आजकल वसन्त-सम्पात जानने के लिए जो रीति काम में लायी जाती है उससे भास्कराचार्य जी की बतलायी हुई रीति बहुत कुछ मिलती है। अन्तर यह है कि भास्कराचार्य जी ने क्षितिजवृत्त पर बेध करने को कहा है और आजकल याम्योत्तर- वृत्त पर बेध किया जाता है, जिससे लम्बन और प्रकाश वक्रीभवन के कारण कोई भूल नहीं हो सकती; दूसरा अंतर यह पड़ता है कि आजकल के यन्त्र बहुत सूक्ष्म हैं पर भास्कराचार्य की बतलायी हुई रीति में कोरी आंख से ही काम लिया गया है। चन्द्र भगण की उपपत्ति भी गोल यन्त्र के द्वारा जिसमें नक्षत्र-चक्र, क्रान्तिवृत्त, विषुवद्वृत्त, चंद्रकक्षा, ग्रहकक्षा इत्यादि बने रहते हैं, वेध करके जानना चाहिये । इसका वर्णन बहुत विस्तार के साथ करने की आवश्यकता नहीं जान पड़ती । यह केवल इसलिए लिखा गया है कि प्राचीन ज्योतिषी भी बेध के द्वारा ग्रन्थ में दी हुई बातों की परीक्षा करते थे और जो ठीक निकलता था उसी को मानते थे ।
मध्यमाधिकार २७ चन्द्रोच्च का भगणकाल जानने की रीति प्रतिदिन गोल यंत्र के द्वारा चंद्रमा का बेध करके स्पष्ट गति निकालनी चाहिये । जिस दिन गति सबसे कम हो उस दिन मध्यम और स्पष्ट चन्द्रमा के स्थानों में अंतर नहीं होता । यही चंद्रमा के उच्च का स्थान है। इसी प्रकार प्रतिदिन वेध करते-करते जब चन्द्रमा की गति फिर परम अल्प हो तब उसी स्थान को उच्च समझना चाहिये । यह स्थान पहले स्थान से कुछ आगे रहता है। कितना आगे हो जाता है यह जानकर अनुपात के द्वारा यह गणित कर लेना चाहिये कि उच्च की दैनिक गति कितनी होती है तथा एक भगण काल कितने दिन में पूरा होता है । चन्द्रपात का भगण काल जानने की रीति-प्रति दिन चन्द्रमा का बेध करते हुए यह देखना चाहिये कि किस दिन चन्द्रमा का दक्षिण विक्षेप कम होते-होते शून्य हो जाता है। जिस समय विक्षेप शून्य हो उस समय चन्द्रमापात स्थान पर होता है । इसी प्रकार जब दूसरे चक्कर में चंद्रमा का दक्षिण विक्षेप कम होते-होते शून्य हो जाय तब समझना चाहिये कि वह अपने पात पर पहुँच गया । दूसरी बार पात का स्थान पहले स्थान से कुछ पश्चिम होता है, इसीलिए यह कहा जाता है कि पात की गति विलोम होती है अर्थात् पश्चिम की ओर होती है। फिर अनुपात के द्वारा जानना चाहिये कि जब इतने दिन में पात इतना चलता है तो एक दिन में कितना चलेगा । यही पात की दैनिक गति समझनी चाहिये । इसी प्रकार यह भी जानना चाहिये कि एक कल्प में कितने भगण होते हैं । मंगल, गुरु और शनि के शीघ्रोच्चों के सम्बन्ध में- जब सूर्य, शनि, गुरु या मंगल से आगे रहता है तब ग्रह मध्यम स्थान से कुछ आगे रहते हैं और जब सूर्य पीछे रहता है तब ग्रह मध्यम स्थान से पीछे रहते हैं; इसलिए विद्वानों ने यह कल्पना की कि इन तीनों के शीघ्रोच्च सूर्य के साथ ही रहते हैं और ग्रहों को अपनी ओर अर्थात् सूर्य की ओर आकर्षित करते हैं; इसलिए इनके शीघ्रोच्चों के भगण सूर्य के समान होते हैं । भानामष्टाक्षिखस्वद्रित्रिद्विद्व्यष्टशरेन्दवः । भोदया भगणैः स्वैः स्वैरूनाः स्वस्वोदया युगे ॥३४॥ अनुवाद-१ महायुग में नक्षत्रों के १,५८,२२,३७,८२८ भगण होते हैं। किसी ग्रह के महायुगीय भगण को नक्षत्र के महायुगीय भगण में से घटा देने से जो बचता है उतने ही बार एक महायुग में वह ग्रह पूर्व क्षितिज में उदय होता है ।।३४।। विज्ञान भाष्य-१२वें श्लोक के विज्ञान भाष्य में नाक्षत्र-अहोरात्र की परिभाषा दी गयी है। एक नाक्षत्र-अहोरात्र में तारे पश्चिम की ओर चलते हुए एक