भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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पृष्ठ 328

त्रिप्रश्नाधिकार ३०५ इस समय 'का' का भोगांश ६०° और इसकी क्रान्ति सायन वृष के अंतिम बिन्दु की क्रान्ति होगी । सायन वृष के अन्त की क्रान्तिज्या = ज्या ६०° × १३६७

३४३८ = २६७८ × १३६७

३४३८ = १२१० कला ∴ सायन वृष के अन्त की क्रान्ति = २०°३८' परन्तु २०°३८' की उत्क्रमज्या = २२२' ∴ २०°३८' की कोटिज्या = ३४३८ - २२२ = ३२१६' ∴ समीकरण ( १ ) से, ज्या ( व पू ) = ज्या ६०° × ३१४०

३२१६ = २६७८ × ३१४०

३२१६ = २६०८ कला ∴ व पू = ५७°४८' = ३४६८' ∴ मेष और वृष राशियों के सम्मिलित उदयासु = ३४६८ परन्तु मेष राशि के उदयासु = १६७० ∴ वृष राशि के उदयासु = १७९८ श्लोक में इसकी जगह १७६५ असु लिखे हैं । यह ऊपर बतलाया ही जा चुका है कि सायन मेष, वृष और मिथुन के सम्मिलित उदयासु ५४०० हैं और यह सिद्ध हुआ है कि सायन मेष और वृष के सम्मिलित उदयासु ३४६८ हैं, इसलिए मिथुन के उदयासु इन दोनों के अंतर अर्थात् १६३२ के समान हैं। श्लोक में १६३५ दिया है। यह अंतर गणना की स्थूलता के कारण है । अब यह सिद्ध हो गया है कि सूर्य की परम क्रान्ति २४° नहीं है वरन् सं० १६८० वि० में २३°२६'५७''.३५ है और प्रतिवर्ष ०''.४६८ के लगभग घटती जाती है [देखो पृष्ठ २६८] । इस प्रकार परम क्रान्ति में १ कला की कमी प्रायः सवा सौ वर्षों में होती है। इसलिए विक्रम की २१वीं शताब्दी के पहले ५० वर्षों २०