भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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त्रिप्रश्नाधिकार ३२१ ४थे स्तम्भ में जो चरखंड दिया हुआ है वह पासवाली दो राशियों के आदि बिंदुओं के चरांशों का अन्तर है जिससे जाना जाता है कि पहली राशि के आदि बिन्दु से अन्तिम बिन्दु तक चरांश में क्या अन्तर पड़ता है। जैसे- मेष राशि का चर खंड = वृषराशि के आदि बिंदु का चरांश = मेषराशि के आदि बिंदु का चरांश = - ६°७' - (४°१४') = - ६°७' + ४°१४' = - ४°५३' सिंह राशि का चरखंड = कन्या राशि के आदि बिंदु का चरांश - सिंह राशि के आदि बिंदु का चरांश = - १°२३' - (- ६°४७') = - १°२३' + ६°४७' = + ५°२४' ध्यान देने से प्रकट होता है कि पहली ६ राशियों के चरखंड दूसरी ६ राशियों के चरखंडों के परिमाण में क्रमानुसार समान हैं। केवल + या - चिह्नों में अन्तर है। ५वें स्तम्भ में प्रत्येक राशि के आदि विन्दु का विषुवांश दिया हुआ है। यदि इसको कलाओं में लिखा जाय तो इतने ही असुओं में वसन्त सम्पात से उस राशि का आदि बिन्दु लंका में उदय होगा। यदि पास वाली दो राशियों के विषुवांशों का अन्तर निकाला जाय तो यही ऊपरवाली राशि के उदयांश लंका में होंगे जो ६ठें स्तम्भ में दिया हुआ है। इसको कला में लिखा जाय तो यही संख्या लंका में उस राशि के उदयासु होंगे। लंका में राशि का जो उदयांश हो उसमें उसी राशि का चरखण्ड यदि धनात्मक हो तो जोड़ने और ऋणात्मक हो तो घटाने से इष्ट स्थान में उस राशि का उदयांश आता है जिसको कला में लिखने से उस राशि के उदयासुओं की संख्या भी प्राप्त हो जायगी। ८वें स्तम्भ में प्रत्येक राशि का उदयकाल उदयासुओं में न लिखकर घड़ी, पलों में लिखा गया है जो अधिक व्यवहारात्मक है परन्तु कुछ स्थूल है क्योंकि ६ असुओं का १ पल होता है और ६ से भाग देने पर पूरे पल जब नहीं आये हैं तब आधे से अधिक को १ मान लिया गया है और आधे से जो कम आये हैं उनको छोड़ दिया गया है। २१