भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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त्रिप्रश्नाधिकार ३३५ वृत्त पर था उस समय इसका स्पष्ट विषुवांश (right ascension) ६ घंटा ५४ मिनट ७.०३ सेकण्ड था।* इसी प्रकार १८६० ई० की ४थी जुलाई के दिन यामोत्तरो- ल्लंघनकाल में सूर्य के केन्द्र का स्पष्ट विषुवांश ६ घंटा ५३ मिनट ५४.६१ सेकण्ड था। इससे मध्यम सावन दिन का मान निश्चय करो । पहले यह जानना आवश्यक है कि १८६० ई० की ४थी जुलाई के ६ घंटा ५३ मिनट ५४.६१ सेकण्ड (नाक्षत्रकाल) तक कितना समय नाक्षत्रकाल में बीता। यह स्पष्ट है कि एक सायन वर्ष में अर्थात् एक सायन मेष संक्रान्ति से दूसरी सायन मेष संक्रान्ति तक के समय में वसन्त सम्पात विन्दु जितने बार यामोत्तरोल्लंघन करता है उससे एक बार कम सूर्य यामोत्तरोल्लंघन करता है क्योंकि पृथ्वी की गति के कारण सूर्य प्रतिदिन एक अंश पूर्व की ओर बढ़ जाता है जिससे यह प्रतिदिन वसन्त सम्पात से ४ मिनट के लगभग पीछे यामोत्तरोल्लंघन करता है। इस तरह पिछड़ते पिछड़ते १ वर्ष में सूर्य पूरा १ दिन पिछड़ जाता है अर्थात् १ वर्ष में सूर्य का यामोत्तरोल्लंघन वसन्त सम्पात विन्दु के यामोत्तरोल्लंघन से १ बार कम पड़ जाता है। १८३६ ई० की चौथी जुलाई से १८६० ई० की ४थी जुलाई तक ५४ वर्ष होते हैं जिनमें १८४०, १८४४, १८४८ इत्यादि १३ अधिक वर्ष (लीप इयर) हैं और शेष ४१ वर्ष साधारण वर्ष हैं। इसलिए यह अवधि ४१ × ३६५ + १३ × ३६६ अर्थात् १९७२३ सावन दिन के समान हुई । ऊपर सिद्ध किया गया है कि एक वर्ष में वसन्त सम्पात विन्दु का यामोत्तरोल्लंघन सूर्य के यामोत्तरोल्लंघन से १ बार अधिक होता है इसलिए ५४ वर्षों में वसन्त सम्पात विन्दु का यामोत्तरोल्लंघन ५४ बार अधिक होगा। इस प्रकार उपर्युक्त अवधि में १९७२३ + ५४ = १९७७७ नाक्षत्र दिन हुए। इसलिए १८३६ ई० की ४थी जुलाई के सूर्य के यामोत्तरोल्लंघन काल से १८६० ई० की ४थी जुलाई के यामोत्तरोल्लंघन काल तक १९७७७ दिन ६ घंटा ५३ मिनट ५४.६१ से० - ६ घंटा ५४ मिनट ७.०३ सेकण्ड अर्थात् १९७७६ दिन २३ घंटा ५६ मिनट ४७.५८ से० समय नाक्षत्र काल में हुआ। इसलिए यह नाक्षत्र काल १९७२३ स्पष्ट सावन दिनों के समान हुआ । अब यदि उपर्युक्त नाक्षत्र काल को १९७२३ से भाग दे दिया जाय तो १ मध्यम सावन दिन का मान नाक्षत्र काल में २४ घंटा ३ मिनट ५६.५५५ सेकण्ड आता है। इसलिए *सूर्य के केन्द्र से होता हुआ ध्रुवप्रोतवृत्त विषुवद्वृत्त के जिस बिन्दु पर पहुँचता है उसका वसंत सम्पात से जो अन्तर होता है उसे सूर्य के केन्द्र का विषुवांश कहते हैं। यह अंश, कला, विकला तथा घंटा, मिनट, सेकण्ड दोनों में प्रकट किया जाता है। १ अंश ४ मिनट या १० पल के समान होता है।