सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
DevanagariHindipublished838 पृष्ठ
पृष्ठ 370, कुल 838 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 370
विप्रश्नाधिकार ३४७ २ चज्या (भा—नी) = २ च (ज्या भा * कोज्या नी — कोज्या भा * ज्या नी) = २ च (ज्या भा * कोज्या २८१° ३६' १४" — कोज्या भा * ज्या २८१° ३६' १४") = २ च{ज्या भा * कोज्या (३६०° — ७८° २३' ४६") — कोज्या भा * ज्या (३६०° — ७८° २३' ४६")} = २ च {ज्या भा * कोज्या ७८° २३' ४६" + कोज्या भा
- ज्या ७८° २३' ४६"} = २ * .०१६७५ (.२०११ ज्या भा + .९७६६ कोज्या भा) = .००६७४ ज्या भा + .०३२८२ कोज्या भा ∴ काल समीकरण (७) का रूप यह होगा ३४३७.७५ (.००६७४ ज्या भा + .०३२८२ कोज्या भा — .०४३.५ ज्या २ भा) = २३'.१७ ज्या भा + ११२'.८३ कोज्या भा — १४८'.० ज्या २ भा (८) इसमें इष्टकाल के सूर्य के मध्यम भोगांश भा का मान स्थापित करके ज्या भा, कोज्या भा इत्यादि के मान जाने जा सकते हैं जिससे इष्टकाल का काल- समीकरण जाना जा सकता है । यह असुओं में होगा । यह प्रकट है कि काल-समीकरण का यह मान सदा के लिए शुद्ध नहीं है क्योंकि इसका यह रूप उस समय आया है जब सूर्य का नीच २८१° ३६' १४" समझा गया है। सूर्य के नीच का सायन भोगांश प्रतिवर्ष १ कला के लगभग आगे बढ़ता है इसलिए १० या १५ वर्षों तक यही समझ लेने में अधिक अशुद्धि नहीं होगी । सूर्य की परम क्रान्ति के भी घटते रहने से कुछ अन्तर हो जाता है परन्तु इसकी गति बहुत मंद है इसलिए इसके कारण १०० वर्ष तक बहुत भेद नहीं हो सकता । यह बतलाया गया है कि वसंत सम्पात बिन्दु के यामोत्तरोल्लंघन के उपरान्त जितना समय नाक्षत्र घड़ी में बीता रहता है उसे नाक्षत्र काल (sidereal time) कहते हैं । यदि किसी समय का नाक्षत्रकाल ना हो और उसी समय स्पष्ट सूर्य का विषुवांश व हो तो स्पष्ट सूर्य के यामोत्तरोल्लंघन के उपरान्त ना — व समय बीता है । इसलिए उस समय के स्पष्ट सूर्य का नतकाल† (hour angle) या
† सूर्य या तारे के यामोत्तरोल्लंघन के समय से इष्टकाल तक जितना समय होता है उसको सूर्य या तारे का नतकाल (hour angle) कहते हैं । आजकल पूर्व नतकाल और पच्छिम नतकाल का भेद नहीं माना जाता जैसा कि पृष्ठ २६० में