सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४६ सूर्य-सिद्धान्त $+ २ च स्परे^२\ \frac{क}{२}ज्या (भा+नी) + \frac{५}{४}च^२ ज्या २ (भा-नी)$ $- २ च स्परे^२\ \frac{क}{२}ज्या (३ भा-नी) + \frac{१}{२}स्परे^४\ \frac{क}{२}ज्या ४ भा\cdots (६)$ बस इसी समीकरण से कल्पित सूर्य के विषुवांश अथवा सूर्य के मध्यम सायन भोगांश भा और स्पष्ट सूर्य के विषुवांश व का सम्बन्ध जाना जा सकता है। दाहिने पक्ष में भा के पश्चात् जितने पद आते हैं सब मिलकर काल-समीकरण (equation of time) कहलाते हैं। इन सब पदों में भी पहिले दो पद २च ज्या (भा-नी) - $स्परे^२\ \frac{क}{२} ज्या २ भा$ बड़े महत्व के हैं क्योंकि अन्य पदों के गुणक इतने छोटे हैं कि छोड़ दिये जा सकते हैं। इसलिए $व = भा + काल-समीकरण$ जहाँ $काल-समीकरण = २ च ज्या (भा-नी) - स्परे^२\ \frac{क}{२} ज्या २ भा$ यह रेडियन में प्रकट किया गया है। यदि असुओं में प्रकट करना है तो इसे ३४३७.७५ से गुणा कर देना चाहिए क्योंकि १ रेडियन = ३४३७'.७५ और विषुवद्- वृत्त की एक कला की गति एक असु में होती है। इसलिए असुओं में काल समीकरण का रूप यह होगा। $३४३७.७५\ { २ च ज्या (भा-नी) - स्परे^२\ \frac{क}{२} ज्या २ भा} \qquad (७)$ यदि च की जगह ०.०१६७५ और नी की जगह २८१°३६'१४" रख दिया जाय जो १६७६ वि० की मेष संक्रान्ति काल में सूर्य के नीच का सायन भोगांश* था तो
- सूर्य के नीचे का यह सायन भोगांश १८२५ ई० के Nautical Almanac पृष्ठ ६२६ के इस सूत्र से जाना गया है— Mean longitude of solar perigee $= 281^\circ 13' 15''.0 + 6189''.03\tau + 1''.63\tau^2 + 0''.012\tau^3$ जब कि २८१°१३'१५" सन् १६०० ई० की जनवरी की पहली तारीख के मध्यान्ह काल का नीच का सायन भोगांश है और $\tau$ उस समय से इष्टकाल तक का जूलियन शताब्दी का भिन्न है। १६७६ वि० की मेष संक्रान्ति के लिए $\tau = \frac{८१३७}{३६५२५}$ जब कि १६०० ई० की जनवरी के पहले मध्यान्ह से १६७६ वि० की मेष संक्रान्ति के मध्यान्ह तक के दिनों की संख्या ८१३७ है और ३६५२५ जूलियन शताब्दी के दिनों की संख्या है।