भारतकोश
संग्रह पर लौटें

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

३४६ सूर्य-सिद्धान्त $+ २ च स्परे^२\ \frac{क}{२}ज्या (भा+नी) + \frac{५}{४}च^२ ज्या २ (भा-नी)$ $- २ च स्परे^२\ \frac{क}{२}ज्या (३ भा-नी) + \frac{१}{२}स्परे^४\ \frac{क}{२}ज्या ४ भा\cdots (६)$ बस इसी समीकरण से कल्पित सूर्य के विषुवांश अथवा सूर्य के मध्यम सायन भोगांश भा और स्पष्ट सूर्य के विषुवांश व का सम्बन्ध जाना जा सकता है। दाहिने पक्ष में भा के पश्चात् जितने पद आते हैं सब मिलकर काल-समीकरण (equation of time) कहलाते हैं। इन सब पदों में भी पहिले दो पद २च ज्या (भा-नी) - $स्परे^२\ \frac{क}{२} ज्या २ भा$ बड़े महत्व के हैं क्योंकि अन्य पदों के गुणक इतने छोटे हैं कि छोड़ दिये जा सकते हैं। इसलिए $व = भा + काल-समीकरण$ जहाँ $काल-समीकरण = २ च ज्या (भा-नी) - स्परे^२\ \frac{क}{२} ज्या २ भा$ यह रेडियन में प्रकट किया गया है। यदि असुओं में प्रकट करना है तो इसे ३४३७.७५ से गुणा कर देना चाहिए क्योंकि १ रेडियन = ३४३७'.७५ और विषुवद्- वृत्त की एक कला की गति एक असु में होती है। इसलिए असुओं में काल समीकरण का रूप यह होगा। $३४३७.७५\ { २ च ज्या (भा-नी) - स्परे^२\ \frac{क}{२} ज्या २ भा} \qquad (७)$ यदि च की जगह ०.०१६७५ और नी की जगह २८१°३६'१४" रख दिया जाय जो १६७६ वि० की मेष संक्रान्ति काल में सूर्य के नीच का सायन भोगांश* था तो

  • सूर्य के नीचे का यह सायन भोगांश १८२५ ई० के Nautical Almanac पृष्ठ ६२६ के इस सूत्र से जाना गया है— Mean longitude of solar perigee $= 281^\circ 13' 15''.0 + 6189''.03\tau + 1''.63\tau^2 + 0''.012\tau^3$ जब कि २८१°१३'१५" सन् १६०० ई० की जनवरी की पहली तारीख के मध्यान्ह काल का नीच का सायन भोगांश है और $\tau$ उस समय से इष्टकाल तक का जूलियन शताब्दी का भिन्न है। १६७६ वि० की मेष संक्रान्ति के लिए $\tau = \frac{८१३७}{३६५२५}$ जब कि १६०० ई० की जनवरी के पहले मध्यान्ह से १६७६ वि० की मेष संक्रान्ति के मध्यान्ह तक के दिनों की संख्या ८१३७ है और ३६५२५ जूलियन शताब्दी के दिनों की संख्या है।

विप्रश्नाधिकार ३४७ २ चज्या (भा—नी) = २ च (ज्या भा * कोज्या नी — कोज्या भा * ज्या नी) = २ च (ज्या भा * कोज्या २८१° ३६' १४" — कोज्या भा * ज्या २८१° ३६' १४") = २ च{ज्या भा * कोज्या (३६०° — ७८° २३' ४६") — कोज्या भा * ज्या (३६०° — ७८° २३' ४६")} = २ च {ज्या भा * कोज्या ७८° २३' ४६" + कोज्या भा

  • ज्या ७८° २३' ४६"} = २ * .०१६७५ (.२०११ ज्या भा + .९७६६ कोज्या भा) = .००६७४ ज्या भा + .०३२८२ कोज्या भा ∴ काल समीकरण (७) का रूप यह होगा ३४३७.७५ (.००६७४ ज्या भा + .०३२८२ कोज्या भा — .०४३.५ ज्या २ भा) = २३'.१७ ज्या भा + ११२'.८३ कोज्या भा — १४८'.० ज्या २ भा (८) इसमें इष्टकाल के सूर्य के मध्यम भोगांश भा का मान स्थापित करके ज्या भा, कोज्या भा इत्यादि के मान जाने जा सकते हैं जिससे इष्टकाल का काल- समीकरण जाना जा सकता है । यह असुओं में होगा । यह प्रकट है कि काल-समीकरण का यह मान सदा के लिए शुद्ध नहीं है क्योंकि इसका यह रूप उस समय आया है जब सूर्य का नीच २८१° ३६' १४" समझा गया है। सूर्य के नीच का सायन भोगांश प्रतिवर्ष १ कला के लगभग आगे बढ़ता है इसलिए १० या १५ वर्षों तक यही समझ लेने में अधिक अशुद्धि नहीं होगी । सूर्य की परम क्रान्ति के भी घटते रहने से कुछ अन्तर हो जाता है परन्तु इसकी गति बहुत मंद है इसलिए इसके कारण १०० वर्ष तक बहुत भेद नहीं हो सकता । यह बतलाया गया है कि वसंत सम्पात बिन्दु के यामोत्तरोल्लंघन के उपरान्त जितना समय नाक्षत्र घड़ी में बीता रहता है उसे नाक्षत्र काल (sidereal time) कहते हैं । यदि किसी समय का नाक्षत्रकाल ना हो और उसी समय स्पष्ट सूर्य का विषुवांश व हो तो स्पष्ट सूर्य के यामोत्तरोल्लंघन के उपरान्त ना — व समय बीता है । इसलिए उस समय के स्पष्ट सूर्य का नतकाल† (hour angle) या

† सूर्य या तारे के यामोत्तरोल्लंघन के समय से इष्टकाल तक जितना समय होता है उसको सूर्य या तारे का नतकाल (hour angle) कहते हैं । आजकल पूर्व नतकाल और पच्छिम नतकाल का भेद नहीं माना जाता जैसा कि पृष्ठ २६० में

३४८ सूर्य-सिद्धान्त स्पष्ट सावन काल* = ना - व उसी समय मध्यम सूर्य का नतकाल ना - भा है ∴ मध्यम सावन काल = ना - भा = (ना - व) + (व - भा) = स्पष्ट सावन काल + काल समीकरण इसलिए यह सिद्ध हो गया कि काल समीकरण वह समय है जिसे स्पष्ट सावन काल में बीजगणित की रीति से जोड़ देने पर मध्यम सावन काल आ जाता है । उदाहरण—१६७६ वि० की बसंत पंचमी की मध्यरात्रि के समय काल समीकरण क्या है ? पहले सूर्य का मध्यम सायन भोगांश जानना चाहिए । इस समय सूर्य का मध्यम स्थान ६ रा० ०° १२′ ६′′ था (देखो पृष्ठ १४७) । १६७६ वि० की मेष संक्रान्तिकाल में अयनांश २२° ३७′ ३८′′ था (देखो पृष्ठ २५२) । मेष संक्रान्ति से २८३ दिन पीछे इस वर्ष वसंत पंचमी हुई थी (देखो पृष्ठ ३६) । इसलिए २८३ दिन में अयन की गति ५८′′.६६ × २८३ / ३६५.२५ = ४५′′.५ इसलिए वसंत पंचमी की मध्यरात्रि में मध्यम अयनांश २२° ३७′ ३८′′.१ + ४५′′.५ = २२° ३८′ २३′′.६ हुआ । स्पष्ट अयनांश जानने के लिए अक्ष विचलन संस्कार भी करना चाहिए परन्तु विस्तार के भय से यह संस्कार छोड़ दिया जाता है । इसलिए २२° ३८′ २३′′.६ को ही स्पष्ट अयनांश मान लिया जाता है । अब, सूर्य का मध्यम स्थान = ६ रा० ०° १२′ ६′′ अयनांश = २२° ३८′ २४′′ ∴ सूर्य का सायन मध्यम भोगांश = १० रा० ०° ५०′ ३३′′ = ३००° ५०′ ३३′′ इसलिए सूत्र (८) के अनुसार, काल समीकरण = २३′.१७ ज्या ३००° ५०′ ३३′′

  • ११२′.८३ कोज्या ३००° ५०′ ३३′′ बतलाया गया है । यदि यामोत्तरोल्लंघन काल से २२ घंटा समय हो गया है तो कहेंगे कि नतकाल २२ घंटा है यद्यपि प्राचीन मतानुसार इस समय पूर्वनत २ घंटा होगा ।
  • यहाँ सावन काल का आरम्भ मध्यान्ह से माना गया है ।

त्रिप्रश्नाधिकार ३४६ — १४८'·० ज्या (२ × ३००°५०'३३") = २३'·१७ (— ज्या ५६°६'२७")

  • ११२'·८३ (कोज्या ५६°६'२७") — १४८' ज्या ६०१°४१'६"* = — २३'·१७ × ·८५८६
  • ११२'·८३ × ·५१२६ — १४८' (— ·८८०४) = — १६'·८६ + ५७'·८४ + १३०'·३० = + १६८'·२५ = + १६८·२५ असु = + २८ पल यदि अधिक शुद्धता की आवश्यकता हो तो समीकरण (६) की सहायता से काल समीकरण का मान जानना चाहिए। यह भी ध्यान रहे कि सूर्य का जो मध्यम स्थान ऊपर लिया गया है वह सूर्य-सिद्धान्त की रीति से जाना गया है। यदि शुद्ध वेध से सूर्य का मध्यम सायन भोगांश निकाला† .जाय तो ३०१°५'२" होता है। इसलिए यदि समीकरण (६) तथा वेधसिद्ध मध्यम सायन भोगांश से काल समीकरण निकाला जाय तो नाटिकल अलमैनेक में दिए हुए काल समीकरण के समान होगा। काल समीकरण प्रकट करने का वक्र (curve) असुओं में काल समीकरण का रूप सूत्र (७) में यह है ३४३७.७५ { २ च ज्या (भा — नी) — स्परे२ क/२ ज्या २ भा }
  • ६०१°४१'६" = ३६०° + २४१°४१'६' = ३६०° + १८०° + ६१°४१'६" ∴ ज्या ६०१°४१'६" = ज्या (१८०° + ६१°४१'६") = — ज्या ६१°४१'६" † इसकी रीति यह है :— १८७६ वि० की मेष संक्रान्ति काल में १६२२ के नाटिकल अलमैनेक के अनुसार सूर्य का मध्यम सायन भोगांश २०°४४'५८" था। मेष सक्रान्ति से वसन्त पंचमी की अर्द्धरात्रि तक २८४.४१६७ मध्यम सावन दिन होते हैं और सूर्य के मध्यम सायन भोगांश की गति प्रतिदिन ०°.९८५६४७३१५३६ होती है। इनको गुणा कर देने से २८०°.३३४५६२५ अथवा २८०°२०' ४"·४ आता है। इसको मेष संक्रान्ति काल के सायन मोगांश में जोड़ देने से ३०१°५'२"·४ हुआ।

३५० सूर्य-सिद्धान्त यदि नी को २८१° ३६' मान लिया जाय तो भा - नी = भा - २८१° ३६' = भा - (३६०° - ७८° २४') = भा + ७८° २५' - ३६०° = भा + ७८° २४'† इसलिए उपर्युक्त सूत्र का रूप यह होगा ३४३७.७५ { २ च ज्या (भा + ७८° २४') - स्परे² क/२ ज्या २ भा } इसमें च और स्परे² क/२ के मान उत्थापन करने और सरल करने पर यह रूप होगा । ११५.१६५ × ज्या (भा + ७ ° २४') - १४७.६६५ ज्या २ भा (क) इससे दो वक्र खींचे जा सकते हैं जिनके समीकरण क्रमानुसार यह हैं र = ११५.५६५ ज्या (भा + ७८° २४') (ख) रा = - १४७.६६५ ज्या २ भा (ग) यदि भा की जगह ०, ३०, ६०, ६०, इत्यादि मान उत्थापित किये जायं तो सरल करने पर र, रा और काल-समीकरण के मान पृष्ठ ३५१ की सारिणी के अनुसार होंगे । इस सारिणी में सौर और अंग्रेजी तारीखें भी दे दी गयी हैं । इन्हीं तारीखों में काल-समीकरण के यह मान ठीक होते हैं । और तारीखों के काल-समीकरण जानने के लिए चित्र ६४ से काम लेना चाहिये । सौर मास की जो तारीखें लिखी हैं वह संक्रान्ति के हिसाब से हैं । जैसे ६ मीन का अर्थ है निरयन मीन संक्रान्ति से ६वां दिन, ६ सिंह का अर्थ है निरयन सिंह संक्रान्ति से ६ठां दिन । पहले बतला दिया गया है कि काल-समीकरण सूर्य के नीच के मध्यम सायन भोगांश और सूर्य की परम क्रान्ति पर अवलम्बित है जो स्थिर नहीं है इसलिए काल- समीकरण के जो मान सारिणी या चित्र ६४ में दिए हुए हैं वह भी सदा के लिए शुद्ध नहीं हैं । इनमें सूक्ष्म अन्तर प्रति वर्ष हो रहा है । सूर्य का मध्यम सायन भोगांश प्रतिवर्ष १ कला के लगभग बढ़ रहा है । इस प्रकार ६० वर्ष में एक अंश का अन्तर † किसी कोण में ३६० अंश जोड़ने या घटाने से उस कोण की ज्या, और कोटिज्या इत्यादि के मानों में कोई अन्तर नहीं पड़ता और न उस कोण के मान में ही कोई अन्तर पड़ता है ।

त्रिप्रश्नाधिकार ३५१ हो जाता है। इसलिए ६० वर्षों तक समीकरण के मान वही समझे जाँय जो सारिणी या चित्र ६४ से विदित होते हैं तो बहुत भूल नहीं पड़ेगी।

भाराकालसमीकरणनिरयन सौरमासअंग्रेजी तारीख
अंशपलला पलपल
+ १८.८+ १८.८६ मीन२३ मार्च
३०+ १८.२- २१.४- ३ २६ मेष२२ अप्रैल
६०+ १२.४- २१.४- ६६ वृष२३ मई
९०+ ३.६+ ३.६८ मिथुन२२ जून
१२०- ६+ २१.४+ १५.४७ कर्क२३ जुलाई
१५०- १४ ४+ २१.४+ ७६ सिंह२२ अगस्त
१८०- १८.८- १८.८६ कन्या२२ सितम्बर
२१०- १८.२- २१.४- ३६.६५ तु२२ अक्टूबर
२४०- १२.४- २१.४- ३३.८५ वृश्चिक२१ नवम्बर
२७०- ३.६- ३.६७ धनु२२ दिसम्बर
३००+ ६.१+ २१ ४+ २७.५८ मकर२१ जनवरी
३३०+ १४.४+ २१.४+ ३५.८८ कुम्भ२० फरवरी
३६०+ १८.८+ १८.८६ मीन२३ मार्च

अब वक्र खींचने की रीति संक्षेप में समझायी जाती है (देखो चित्र ६४) । सूर्य के मध्यम सायन भोगांश भा को भुज (abscissa) और र, रा को कोटि (ordinate) माना गया है। भा की जगह ३०, ६०, ६० इत्यादि रखने से र, रा के जो मान आये हैं वह बिन्दुओं में प्रकट करके सब को मिला दिया गया है ।

३५२ सूर्य-सिद्धान्त इससे दो वक्र बन गये हैं। दो पासवाली ऊर्ध्वाधर (vertical) रेखाओं के बीच का अन्तर ३ अंश और दो पासवाली क्षितिज (horizontal) रेखाओं के बीच का अन्तर एक पल माना है। जब भा शून्य होता है तब र + १८.६ पल होता है और रा शून्य होता है इसलिये शून्य भोगांश के सामने धनात्मक दिशा में १९वीं क्षैतिज रेखा पर र के लिए एक बिन्दु बना दिया है। जब भा ३० अंश होता है तब र + १८.२ और रा - २.१४ होते हैं। इसलिए ३० भोगांश के सामने धनात्मक दिशा में १८वीं

त्रिप्रश्नाधिकार ३५३ क्षैतिज रेखा पर एक बिन्दु र के लिए और ऋणात्मक दिशा में २१वीं और २२वीं क्षैतिज रेखाओं के बीच एक बिन्दु रा के लिए स्थिर किया गया है। इसी प्रकार अन्य बिन्दु भी स्थिर किये गये हैं। र प्रकट करनेवाले जितने बिन्दु हैं उनको मिला देने से ख ख ख ख वक्र बन गया है। इसी प्रकार रा प्रकट करने वाले बिन्दुओं को मिला देने से खा खा खा खा वक्र बन गया है। इन दोनों वक्रों की सहायता से क क क क वक्र इस प्रकार खींचा गया है— शून्य भोगांश पर र = + १८.८ और रा = ० । इन दोनों का योग भी

  • १८.८ ही होगा इसलिए क क क क वक्र का बिंदु भी + १८.८ पर होगा अर्थात् इस दशा में ख ख ख ख और क क क क वक्रों के बिंदु सामान्य होंगे । ३० भोगांश पर र = + १८.२ और रा = - २१.४ । इन दोनों का योग - ३.२ है । इसलिए क क क क वक्र का बिंदु ऋणात्मक दिशा में तीसरी क्षैतिज रेखा पर होगा । ६०° भोगांश पर र = + १२.४ और रा = - २१.४ । इन दोनों का योग - ६ है । इसलिए क क क क वक्र का बिंदु ऋणात्मक दिशा में ६वीं क्षैतिज रेखा पर होगा । ६० भोगांश पर र = + ३.६ और रा = शून्य इसलिए क क क क वक्र का बिंदु धनात्मक दिशा दिशा में चौथी क्षैतिज रेखा पर होगा। यह बिंदु क क क क और ख ख ख ख दोनों वक्रों पर होगा, इत्यादि । क क क क वक्र य भुज को (Axis of x को ) जहां चार बिंदुओं पर काटता है वहां यह प्रकट होता है कि काल-समीकरण शून्य है। इन समयों में सूर्य का मध्यम भोगांश क्रम से २३, ८२, १६० और २७३.५ के लगभग होते हैं। यह भोगांश क्रम से मेष की २ री, मिथुन की १ ली, सिंह की १६ वीं और धनु की १०वीं तिथियों को होते हैं। इसलिए इन तिथियों में काल-समीकरण शून्य होता है । इसका अर्थ यह है कि इन तिथियों में स्पष्ट काल और मध्यम काल एक ही होते हैं। १७वीं तुला को काल समीकरण - ४१ पल है। इसका अर्थ यह है कि इस तिथि को स्पष्ट सावन काल में अथवा धूप-घड़ी के समय में ४१ पल घटाने से मध्यम काल (यांत्रिक घड़ी का समय) ज्ञात होगा । इसी प्रकार मकर की २६वीं तिथि को काल समीकरण + ३६ पल है, अर्थात् इस दिन धूप-घड़ी के समय में ३६ पल जोड़ने से मध्यम काल ज्ञात होगा ।
  • यह ऊर्ध्वाधर और क्षैतिज रेखाएं चित्र में नहीं दिखलायी गई हैं। इनका अनुमान भोगांश के अंकों और बगल में दिये हुए धनात्मक यह ऋणात्मक १०, २०, ३० के अंकों से किया जा सकता है। २३

३५४ सूर्य-सिद्धान्त अब यह सिद्ध हो गया कि जो लोग रेल या तारघर से मिली हुई घड़ी के समय को ही धूप-घड़ी का भी समय समझ कर लग्न निकालते हैं उनका लग्न शुद्ध नहीं होता क्योंकि धूप और मध्यम घड़ियों में कभी-कभी ४१ पल अथवा १६ मिनट का अंतर रहता है । इसके सिवा देशान्तर के कारण भी अन्तर पड़ता है क्योंकि भारतवर्ष के रेल या तार- घर की घड़ियों का समय ग्रीनविच के* मध्यम समय से ५ १/२ घंटा अथवा १३ घड़ी ४५ पल आगे रखा जाता है । इसलिए यह समय केवल उन स्थानों के मध्यम काल के अनुसार ठीक होता है जो ग्रीनविच से ५ १/२ घंटा अथवा ८२° ३०' पूर्व हैं । मिरजापुर ग्रीनविच से ८२° ३८' १०'' पूर्व है । इसलिए मिरजापुर का मध्यम काल भारतीय मध्यम काल से ८' १०'' अथवा ८ असु या सवा पल अधिक है । यदि सवा पल का विचार न किया जाय तो कहा जा सकता है कि भारतीय मध्यम काल जो रेलवे और तार-घरों में प्रयोग किया जाता है मिरजापुर के मध्यम काल के समान होता है । इसलिए पूर्व के स्थानों के मध्यम काल जानने के लिए देशान्तर का संस्कार जोड़ना चाहिये और पच्छिम के स्थानों का मध्यम काल जानने के लिए देशान्तर का संस्कार घटाना चाहिए । यह नीचे के उदाहरणों से स्पष्ट होगा :- उदाहरण १-प्रयाग में जिस समय सूर्योदय के उपरान्त धूप-घड़ी के अनुसार १६ घड़ी १५ पल बीतता है उस समय रेलवे की घड़ी में क्या समय होगा जब सूर्य का निरयण भोगांश उदय काल में ३रा ५° १' ६'' हो ? इस दिन सूर्य कर्क राशि के ६ठे अंश पर है इसलिए कर्क की ६ठी तिथि है । सारिणी में कर्क की ७वीं तिथि को काल समीकरण + १५.४ पल है । इसलिए सारिणी से केवल यही पता लग सकता है कि इस दिन काल समीकरण + १५ पल के लगभग है । चित्र ६४ से जहाँ काल-समीकरण का वक्र दिया हुआ है यह पता चल सकता है कि कर्क की ६ठी तिथि को काल समीकरण १५.४ पल से अधिक था या कम । देखने से स्पष्ट है कि ७ कर्क के दिन क क क क वक्र के बिंदु की जो कोटि है उससे कम ७ कर्क के पहले के दिनों में है इसलिए यह निश्चय होता है कि ६ कर्क को काल समीकरण + १५.४ पल से कुछ कम है और ४ कर्क को यह ठीक + १५ पल है । इसलिए अभीष्ट काल-समीकरण + १५.३ पल के लगभग है । यह धनात्मक है इसलिए १६ घड़ी १५ पल में इसे जोड़ना चाहिए । इसलिए जब प्रयाग में धूप-घड़ी

  • कुछ लोग समझते हैं कि तार-घर की घड़ी में मदरास का समय रहता है परन्तु यह भ्रम है। मदरास में एक वेधशाला अवश्य है और पहले वही समय सब घड़ियों में रखा जाता था परन्तु अब नियम बदल दिया गया है ।

त्रिप्रश्नाधिकार ३५५ के अनुसार ६ कर्क को १६ घड़ी १५ पल होता है तब प्रयाग का मध्यम काल १६ घड़ी ३०.३ पल होगा । परन्तु प्रयाग का मध्यम काल भारतीय मध्यम काल से कम होता है क्योंकि प्रयाग देशान्तर ग्रीनविच से ८१°५५'१५'' पूर्व है और भारतीय मध्यम काल ग्रीनविच से ८२°३०' पूर्व होता है। इसलिए भारतीय मध्यम काल का देशान्तर प्रयाग के देशान्तर से ३४'४५'' पूर्व है । जब देशान्तर में १° का अंतर होता है तब समय में ४ मिनट या १० पल का अंतर हो जाता है और जब देशान्तर में १ कला का अंतर होता है तब समय में १ असु का अंतर पड़ता है इसलिए जब ३४'४५'' का अंतर है तब समय में ३५ असु या ६ पल के लगभग अंतर पड़ेगा । भारतीय मध्यम काल के देशान्तर से प्रयाग पच्छिम में है इसलिए भारतीय मध्यम काल प्रयाग के मध्यम काल से आगे है। इसलिए अभीष्ट काल में भारतीय मध्यम काल १६ घड़ी ३०.३ पल+६ पल = १६ घड़ी ३६ पल के लगभग होगा । यह ६ घंटा ३८ मिनट २४ सेकंड के समान है । इस दिन सूर्योदय से मध्याह्न तक का स्पष्ट सावन काल १६ घड़ी ४३ पल है (देखो पृष्ठ ३३१) जो ६ घंटा ४१ मिनट १२ सेकंड है। परन्तु मध्यान्ह ठीक १२ बजे होता है इसलिए १२ घंटा - ६ घंटा ४१ मिनट १२ सेकंड = ५ घंटा १८ मिनट ४८ सेकंड पर सूर्य का उदय हुआ होगा । सूर्योदय का स्पष्ट काल = ५ घं० १८ मि० ४८ से० सूर्योदय से इष्ट समय तक का मध्यमकाल = ६ घं० ३८ मि० २४ से० ∴ रेल घड़ी का समय = ११ घं० ५७ मि० १२ से० अर्थात् इस समय रेल की घड़ी में ११ बजकर ५७ मिनट और १२ सेकंड होगा । उदाहरण २-यदि मध्यान्ह के बाद घड़ी में जो रेल की घड़ी से मिली हुई है ५ बजकर २४ मिनट हुए हों तो काशी और प्रयाग की धूपघड़ियों में क्या समय होंगे ? इस दिन सूर्योदय काल में सूर्य का भोगांश ६रा १५°२३'३४'' है । सूर्य तुला राशि के १६वें अंश पर है इसलिए इस दिन तुला नामक सौर मास की १६वीं तिथि है । चित्र ६४ से प्रकट है कि तुला की ५वीं तिथि को काल समीकरण - ३७.५ पल और २०वीं तिथि को - ४१ पल है। इससे सिद्ध होता है कि १५ दिन में - ३.५ पल के लगभग काल समीकरण बढ़ा है । इसलिए ११ दिन में

३५६ सूर्य-सिद्धान्त अर्थात् तुला की १६वीं तिथि को काल समीकरण - २७ बढ़कर - ४०.२ पल हो जायगा जो - १६ मिनट के लगभग है। यह बतलाया गया है कि मध्यम काल = स्पष्ट सावन काल + काल समीकरण ∵ ५ घंटा २४ मिनट = स्पष्ट सावन काल + (- १६ मिनट) ∴ स्पष्ट सावन काल = ५ घंटा २४ मिनट + १६ मिनट = ५ घंटा ४० मिनट यह समय ग्रीनविच से ८२ १/२ अंश पूर्व के देशान्तर-रेखा पर स्थित स्थानों की धूपघड़ियों में होगा क्योंकि भारतवर्ष भर के तारघरों और रेल के स्टेशनों की घड़ियाँ इसी देशान्तर रेखा के मध्यम काल से मिली रहती हैं। काशी ग्रीनविच से ८३° ३' ४" अथवा ८३° ३' पूर्व है जो ८२° ३०' से ३३' अधिक है इसलिए काशी का स्पष्ट सावन काल उपयुक्त सावन काल से ३३ असु अथवा ५ १/२ पल अधिक होगा जो २ मिनट १२ सेकन्ड अथवा २ मिनट के समान है। इसलिए उस समय काशी की धूप-घड़ी में ५ बजकर ४२ मिनट हुआ रहेगा । प्रयाग का देशान्तर ८१° ५५' १५" पूर्व है इसलिए यह ८२° ३०' से ३४' ४५" पच्छिम है। इसलिए यहाँ की धूप-घड़ी ३४ ३/४ असु या २ मिनट १६ सेकंड पीछे होगी। इसलिए प्रयाग की धूपघड़ी में इस समय ५ घंटा ३७ मिनट ४१ सेकंड होगा। उदाहरण ३—दूसरे उदाहरण में जो समय दिया हुआ है उस समय प्रयाग में क्या लग्न होगा ? पहले सूर्योदय का स्पष्ट काल जानना आवश्यक है। इसके लिए प्रयाग का चर काल जानना चाहिए । सूर्य का निरयन भोगांश = ६ रा १५° २३' ३४" १६८२ वि० की १६ तुला को अयनांश = २२° ४१' ६" [दे० पृ० २५३] ∴ सूर्य का सायन भोगांग = ७ रा ८° ४' ४०" = ७ रा ८° ५' = ६ राशि + ३८° ५' ∴ सूर्य की क्रान्ति ज्या = ज्या ३८° ५' × ज्या २३° २७' [दे० पृ० १२३] = ˙६१६८ × ˙३९७६ = ˙२४५४

त्रिप्रश्नाधिकार ३५७ $\therefore$ क्रान्ति = १४°१२' सूर्य का सयन भोगांश ६ राशि से अधिक है, इसलिए यह दक्षिण क्रान्ति है । चर ज्या = स्परे अक्षांश $\times$ स्परे क्रान्ति = स्परे २५°२५' $\times$ स्परे १४°१२' = .४७५२ $\times$ .२५३० = .१२०२ $\because$ चरांश = ६°५४' $\because$ चर पल = ६१ पल = २७ मिनट ३६ सेकंड क्रान्ति दक्षिण है इसलिए धूपघड़ी में ६ बज कर २७ मिनट ३६* सेकंड पर प्रयाग में सूर्य का उदय होगा । परन्तु इस दिन काल समीकरण - १६ मिनट है । इसलिए सूर्योदय काल में प्रयाग का मध्यम काल = ६ बजकर २७ मिनट ३६ सेकंड - १६ मिनट = ६ बजकर ११ मिनट ३६ सेकंड प्रयाग के सूर्योदय काल में भारतवर्ष का मध्यम काल क्या होगा यह जानने के लिए २ मिनट १६ सेकंड और जोड़ना होगा क्योंकि प्रयाग २ मिनट १६ सेकंड पच्छिम है इसलिए यहाँ का मध्यम या स्पष्टकाल भारतवर्ष के मध्यम काल से इतना ही पीछे होगा, इसलिए प्रयाग में सूर्योदय के समय रेल की घड़ी में ६ बजकर १३ मिनट ३५ सेकंड हुआ रहेगा । सूर्योदय से मध्यम मध्यान्ह काल १२ घंटा - ६ घंटा १३ मिनट ३५ सेकंड अथवा ५ घंटा ४६ मिनट २५ सेकंड पर होता है और संध्या के ५ बजकर २४ मिनट तक ११ घंटा १० मिनट २५ सेकंड होता है । यह २७ घड़ी ५६ पल के समान है । इसलिए इष्टकाल में सूर्योदयोपरान्त २७ घड़ी ५६ पल है । यह मध्यम सावन काल है । इसको नाक्षत्र काल में बदल कर लग्न जानने में सुविधा होगी । ६ सावन घड़ी = ६ नाक्षत्र घड़ी + १ नाक्षत्र पल (पृष्ठ ३२६) $\because$ २८ सावन घड़ी = २८ नाक्षत्र घड़ी + ५ नाक्षत्र पल $\because$ २७ घड़ी ५६ पल (सावन) = २७ घड़ी ५६ पल + ५ पल (नाक्षत्र) = २८ घड़ी १ पल (नाक्षत्र)

  • वर्तन (Refraction of light) के कारण सूर्योदय इससे भी कुछ पहले होता है जिसकी चर्चा आगे की जायगी ।

३५८ सूर्य-सिद्धान्त उदयकाल में सूर्य का निरयन भोगांश = ६^{रा} १५° २३.′ ३४″ = ६^{रा} १५° २४′ इसलिए उदयकाल में तुला राशि का १५° २४′ लग्न है । प्रयाग में तुला राशि का उदयकाल ५ घड़ी ४२ पल है । जब ३०° का उदय ५ घड़ी ४२ पल में होता है तब १५° ,, २ घड़ी ५१ पल में होगा और ३०′ ,, ५ पल ४२ वि० में होगा ६′ ,, १ पल ८ वि० में होगा ∴ १५° २४′ का उदय २ घड़ी ५५ पल ३४ वि० में होगा अर्थात् तुला का भुक्तकाल = २ घड़ी ५६ पल के लगभग ∴ तुला का भोग्यकाल = २ घड़ी ४६ पल के लगभग वृश्चिक का उदयकाल = ५ ,, ४४ ,, धनु का ,, ५ ,, १५ ,, मकर का ,, ४ ,, २५ ,, कुंभ का ,, ३ ,, ४८ ,, मीन का ,, ३ ,, ४१ ,, कुल का योग २५ ,, ३६ ,, अर्थात् सूर्योदय से २५ घड़ी ३६ पल तक मीन राशि का उदय हो चुका । इसलिए इष्टकाल में मेष राशि उदय हो रही है इसलिए यही उदय लग्न है । इसी को साधारणतः लग्न कहते हैं । यह जानने के लिए कि मेष राशि का कौन बिंदु लग्न है अनुपात से काम लेना चाहिये । इष्टकाल = २८ घड़ी १ पल मीन के अंत का उदयकाल २५ घड़ी ३६ पल मेष का भुक्तकाल = २ घड़ी २५ पल = १४२ पल मेष का उदयकाल = ४ घड़ी ४ पल = २४४ पल २४४ पल: १४२ पल :: ३० अंश: भुक्तांश ∴ भुक्तांश = (१४२ × ३०) / २४४ = १७° २७.′५ ∴ मेष का १७° २७.′५ लग्न है ।

त्रिप्रश्नाधिकार ३५६ उदाहरण ४—यदि प्रयाग में सूर्योदय काल के स्पष्ट सूर्य का निरयन भोगांश ६रा १५°२३' ३४" हो तो उस दिन उज्जैन में जिस समय सूर्य यामोत्तरवृत्त पर आवेगा उस समय भारतीय मध्यम काल क्या होगा ? उज्जैन ग्रीनविच से ७५°४६' पूर्व देशान्तर और २३°६' उत्तर अक्षांश पर है । प्रयाग का देशान्तर ८१°५५' १५" और उत्तर अक्षांश २५°२५' है । उज्जैन प्रयाग से ८१°५५' १५" - ७५°४६' = ६°९' १५" पच्छिम है। इसलिए उज्जैन का स्पष्ट मध्यान्ह प्रयाग के स्पष्ट मध्यान्ह से २४ मिनट ३७ सेकंड पीछे होगा । तीसरे उदाहरण में बतलाया गया है कि प्रयाग में धूपघड़ी के अनुसार ६ बजकर २७ मिनट ३६ सेकंड पर सूर्योदय होगा। इसलिए सूर्योदय के समय नतकाल = १२ घंटा - ६ घं० २७ मि० ३६ से० = ५ घंटा ३२ मि० २४ से० अर्थात् सूर्योदय के ५ घंटा ३२ मिनट २४ सेकंड उपरान्त स्पष्ट मध्यान्ह होगा। परन्तु सूर्योदय के समय भारतीय मध्यमकाल ६ घंटा १३ मिनट ३५ सेकंड होता है इसलिए प्रयाग में स्पष्ट मध्यान्ह के समय भारतीय मध्यकाल = ६ घंटा १३ मि० ३५ से० + ५ घं० ३२ मि० २४ से० = ११ घंटा ४५ मिनट ४६ सेकंड उज्जैन प्रयाग से २४ मिनट ३७ सेकंड पच्छिम है इसलिए यहाँ स्पष्ट मध्यान्ह प्रयाग के स्पष्ट मध्यान्ह से २४ मिनट ३७ सेकंड पीछे होगा। परन्तु प्रयाग के स्पष्ट मध्यान्ह के समय भारतीय मध्यम काल ११ घंटा ४५ मिनट ४६ सेकंड होता है, इसलिए उज्जैन के स्पष्ट मध्यान्ह के समय रेल की घड़ी में १२ बजकर १० मिनट २६ सेकंड हुआ रहेगा । पृष्ठ ८० की टिप्पणी में लिखा गया है कि किरणों के झुक जाने के कारण गणना के समय से सूर्योदय कुछ पहले हो जाता है। इसलिए यह बतलाना आवश्यक है कि किरणों का झुकना क्या है और इससे दिन के परिमाण में जो अन्तर पड़ जाता है उसका संशोधन कैसे करना चाहिये । वर्तन (REFRACTION OF LIGHT) हवा, जल, कांच, अभ्रक ऐसे पदार्थ हैं जिनमें प्रकाश घुसकर दूसरी ओर चला जाता है। इसलिए ये पारदर्शक (transparent) कहलाते हैं। जब प्रकाश एक समजातीय (homogeneous) पारदर्शक पदार्थ से दूसरे समजातीय पारदर्शक

३६० सूर्य-सिद्धान्त पदार्थ में जाता है तब उसकी दिशा वही नहीं रहती जो पहले पारदर्शक पदार्थ में होती है। इस घटना को किरण का वर्तन या केवल वर्तन कहते हैं। इसको कुछ लेखकों ने किरणवक्रौभवन का नाम दिया है परन्तु कई बातों की सुविधा के विचार से इसको वर्तन कहना अच्छा जान पड़ता है। इससे किसी वस्तु के यथार्थ और स्पष्ट स्थानों में बड़ा अन्तर देख पड़ता है। कभी-कभी वस्तुएँ विचित्र रूप धारण कर लेती हैं। परन्तु इन सब घटनाओं की चर्चा करने के लिए यह स्थान उचित नहीं है। यहाँ केवल उतना ही बतलाया जायगा जितना ज्योतिष से सम्बन्ध रखता है। अनुभव के लिए एक छोटा सा उदाहरण देना पर्याप्त होगा :- चित्र ६५ पानी भरा हुआ गिलास धूप में रख दो और देखो कि गिलास का कितना भाग धूप से प्रकाशित होता है। पानी गिरा कर गिलास को फिर उसी जगह रख दो। इस बार गिलास का कुछ कम भाग प्रकाशित होगा। चित्र ६५ में ग गा एक गिलास है। यदि पानी भर कर यह धूप में रखा जाय तो ग से भ तक प्रकाशित देख पड़ता है अर्थात् यह देख पड़ता है कि धूप गिलास के पेंदे के किनारे तक भी पहुँचती है। परन्तु पानी गिरा कर गिलास को फिर वहीं रख देने पर देख पड़ता है कि अब गिलास का केवल ग ख भाग प्रकाशित रहता है, पेंदे तक धूप जाती ही नहीं। इससे यह प्रकट होता है कि हवा में यदि किरण स गा ख दिशा में होती है तो पानी में घुसने ही यह गा भ दिशा में हो जाती है।

विप्रश्नाधिकार ३६१ यदि प्रकाश की कोई किरण स प एक सजातीय पारदर्शक पदार्थ ह ह से दूसरे सजातीय पारदर्शक पदार्थ ज ज में प विन्दु से प्रवेश करके प न दिशा में चलती हुई न विन्दु से वह फिर ह ह पदार्थ में निकल आती है तो न सा और स प किरणें समानान्तर होती हैं । स प को आपात किरण (incident ray) प न को वर्तित किरण (refracted ray) और न सा को निर्गत किरण (emergent ray) कहते हैं । यदि प विन्दु पर ल प ला लम्ब (Normal) हो तो स प ल कोण को आपात कोण (angle of incidence) और न प ला कोण को वर्तित कोण (angle of refrac- tion) कहते हैं । आपात और वर्तित किरणों तथा प्रवेश विन्दु का लम्ब एक ही तल में रहते हैं । आपात और वर्तित कोणों में जो परस्पर सम्बन्ध होता है वह नीचे के सूत्र से प्रकट किया जाता है— आपात कोण की ज्या / वर्तित कोण की ज्या = स्थिर संख्या यदि आपात कोण को अ, वर्तित कोण को व और स्थिर संख्या को ध से सूचित किया जाय तो उपर्युक्त सूत्र का सरल रूप यह होगा ज्या अ / ज्या व = ध; अथवा ज्या अ = ध × ज्या व

चित्र ६६

अ के बदलने से व भी इस तरह बदलेगा कि इन दोनों की ज्याओं का सम्बन्ध सदैव ध के समान होगा । ध का परिणाम दो पारदर्शक पदार्थों के गुण के

३६२ सूर्य-सिद्धान्त अनुसार बदलता है । इसको पहले पारदर्शक पदार्थ से दूसरे पारदर्शक पदार्थ का वर्तनाङ्क (index of refraction) कहते हैं । जब प्रकाश पतले पारदर्शक पदार्थ से घन पारदर्शक पदार्थ में जाता है तब वर्तित किरण लम्ब की ओर झुक जाती है अर्थात् वर्तित कोण आपात कोण से छोटा होता है । परन्तु जब प्रकाश घने पदार्थ से पतले पदार्थ में जाता है तब वह लम्ब से दूर हो जाता है । चित्र ६६ में ज ज पदार्थ ह ह पदार्थ से घना है इसलिए ज ज में वर्तित किरण लम्ब की ओर हो गई है और ज ज से निकल कर ह ह में आते समय वह लम्ब से दूर हो गयी है । यदि प्रकाश की दिशा उलट जाय अर्थात् ज ज में इसकी दिशा न प हो तो ह ह में इसकी दिशा प स हो जायगी । कई पारदर्शक पदार्थों में होता हुआ प्रकाश जिस जिस वक्र या टूटी हुई रेखा से जाता है यदि दिशा उलट जाय तो उसी उसी रेखा से वह लौट भी आता है । मान लो ह ह, हि हि तीन पारदर्शक पदार्थों के स्तर हैं जो परस्पर समानान्तर हैं । चित्र ६७ यदि ह ह से हा हा का वर्तनाङ्क धा हो और ह ह से हि हि का वर्तनांक धि है तो हा हा से हि हि के वर्तनाङ्क का ज्ञान सहज ही हो सकता है । यह परीक्षा से अनुभव किया जा सकता है कि यदि प्रकाश ह ह से हा हा और हि हि होता हुआ फिर ह ह में प्रवेश करे तो इसकी जो दिशा पहले ह ह में होती है वही अन्त में भी होती है अर्थात् ह ह और हा हा के प्रवेश बिंदु पर जो अ पात कोण बनता है वही हि हि से ह ह में निकलते समय निर्गत बिंदु पर भी बनता है । वर्तन के नियम के अनुसार

विप्रश्नाधिकार ३६३ ज्या अ = घा X ज्या वा; ज्या अ = धि X ज्या वि ∵ घा X ज्या वा = धि X ज्या वि अथवा ज्या वा / ज्या वि = धि / घा इससे यह सिद्ध होता है कि यदि एक पदार्थ ह ह से दूसरे पदार्थ हा हा का वर्तनाङ्क धा हो और पहले ही पदार्थ से तीसरे पदार्थ हि हि का वर्तनांक धि हो और यदि हा हा से हि हि में जाने वाली किरण का आपात कोण वा और वर्तित कोण वि हो तो दूसरे पदार्थ हा हा से तीसरे पदार्थ हि हि में जाने वाली किरण का वर्तनाङ्क धि ÷ घा होगा । ज्योतिष संबंधी वर्तन—खगोल पिंडों से जो प्रकाश पृथ्वी पर आता है उसकी किरणें जब वातावरण में घुसती हैं तब इनमें वर्तन होता है। ऐसे वर्तन को ज्योतिष संबंधी वर्तन (Astronomical refraction) कहते हैं। वातावरण का घनत्व ऊपर से नीचे तक एक सा नहीं है। जैसे जैसे पृथ्वी से दूरी अधिक होती जाती है तैसे तैसे वातावरण पतला होता जाता है इसलिए कुल वातावरण सजातीय नहीं है। खगोलीय पिंड से आती हुई किरण जब वातावरण में प्रवेश करती है तब पहले बहुत पतले स्तर में जाती है और ज्यों ज्यों पृथ्वी के निकट पहुंचती आती है त्यों त्यों कम घने से अधिक घने स्तर में आने के कारण वह लम्ब की ओर कुछ कुछ झुकती हुई पृथ्वी पर पहुँचती है। इसलिए वातावरण में इसका मार्ग वक्र होता है। पृथ्वी पर पहुँचते समय किरण की जो दिशा होती है उसी में खगोलीय पिंड देख पड़ता है। किसी तारे से कोई किरण त क की दिशा में क तक सीधी आकर क स्थान पर वातावरण में प्रवेश करती है। इस स्थान से इसकी राह सीधी नहीं रहती। क से द्रष्टा के स्थान द तक किरण को वातावरण के भिन्न-भिन्न स्तरों में घुसना पड़ता है जो क्रमशः घनी होती जाती हैं। इसलिए किरण भी क्रमशः वक्र होती जाती है और अन्त में द तक पहुँच जाती है। इस वक्र के द बिन्दु पर द ति स्पर्शरेखा है। द्रष्टा को जान पड़ता है कि तारा द ति दिशा में है। यदि द से द ता रेखा क त के समानान्तर खींची जाय तो द ता* दिशा में तारा उस समय देख पड़ता जब किरण को झुका देनेवाला वातावरण न होता। इसलिए वातावरण का प्रभाव यह हुआ कि

  • बिलकुल शुद्ध दिशा द त है परन्तु त तारा इतनी दूर है कि त द ता कोण शून्य के समान है।

३६४ सूर्य-सिद्धान्त ख ति त ता द चित्र ६८ तारे का स्पष्ट स्थान ता से ति हो गया अर्थात् तारा खस्वस्तिक ख की ओर कुछ चढ़ा हुआ देख पड़ता है । इसलिए वर्तन के कारण खगोलीय पिंड का नतांश कुछ कम हो जाता है और उन्नतांश उतना ही अधिक हो जाता है । चित्र में इस वर्तन का परिमाण ता द ति कोण के समान है । त का यथार्थ नतांश ता द ख और स्पष्ट नतांश ति द ख है । जिस समय खगोलीय पिंड क्षितिज में रहता है उस समय उसका वर्तन सबसे अधिक ३५' के लगभग होता है । अब यह प्रकट हो गया होगा कि वातावरण के कारण किसी खगोलीय पिंड का स्पष्ट स्थान वही नहीं होता जो यथार्थ में होना चाहिए । इसलिए यदि वर्तन का संस्कार न किया जाय तो गणना में कुछ भूल रह जाती है । नीचे एक सारिणी* दी

  • R. S. Ball's Spherical Astronomy page 120.

विप्रश्नाधिकार ३६५ जाती है जिससे यह जान पड़ेगा कि वर्तन के कारण किसी तारे का नतांश कितना कम हो जाता है। यह सारिणी उस समय की है जिस समय वातावरण का दबाव ३० इंच ऊँचे पारे के दबाव के समान होता है और तापक्रम ५०° फारनहैट के समान होता है। इससे भिन्न अवस्था में कुछ अंतर हो जाता है।

स्पष्ट नतांशवर्तनस्पष्ट नतांशवर्तनस्पष्ट नतांशवर्तन
०°०″३५°४१″७०°२′ ३६″
५°५″४०°४६″७५°३′ ३४″
१०°१०″४५°५८″८०°५′ १६″
१५°१६″५०°१′ ६″८५°९′ ५१″
२०°२१″५५°१′ २३″८७°१४′ २३″
२५°२७″६०°१′ ४१″८८°१८′ १६″
३०°३४″६५°२′ ४″८८° ४०′२२′ २३″
९०°३५′ लगभग

इस सारिणी से किसी तारे का यथार्थ नतांश सहज ही जाना जा सकता है। जैसे यदि किसी तारे का स्पष्ट नतांश ६०° हो तो इसका यथार्थ नतांश ६०° १′ ४१″ होगा। यह भी ध्यान देने की बात है कि जो तारा ठीक सिर के ऊपर (खस्वस्तिक पर) रहता है उसका स्पष्ट और यथार्थ स्थान एक ही होता है और यदि स्पष्ट नतांश ४५° से कम हो तो उसका वर्तन १′ से अधिक नहीं होता है। यदि स्पष्ट नतांश २०° से अधिक न हो तो प्रति १° नतांश के लिए १″ वर्तन होता है। वातावरण सम्बन्धी वर्तन की साधारण मीमांसा— सरलता के लिए यह समझ लेना अच्छा होगा कि पृथ्वी पूर्ण गोल है और वातावरण में नीचे से ऊपर तक पतले-पतले स्तर हैं जिनके केन्द्र भी वही हैं जो पृथ्वी