भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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३७० सूर्य-सिद्धान्त पृथ्वी की किस ऊँचाई पर वर्तनांक क्या है। परन्तु इसके बिना जाने भी उपर्युक्त समीकरण का चलराशि कलन एक युक्ति से निकाला जा सकता है जिससे यथार्थ वर्तन का प्रायः ठीक-ठीक ज्ञान हो सकता है। इस युक्ति में $\frac{क}{क}$ को १ + छ मान लेना होता है जब कि छ का परिमाण अत्यन्त छोटा होता है क्योंकि का वातावरण के किसी स्तर की त्रिज्या है और क पृथ्वी की त्रिज्या है। यह भी ज्ञात है कि उस वातावरण की ऊँचाई जिसमें किरणों को झुका देने (वर्तन करने) का गुण होता है अधिक से अधिक ५० मील है। पृथ्वी की त्रिज्या अर्थात् क ४००० मील है, इसलिए $\frac{का}{क} = \frac{४०५०}{४०००} = १ + \frac{१}{८०}$। इससे स्पष्ट है कि छ = $\frac{१}{८०}$ और इसके वर्ग, घन इत्यादि इतने छोटे हैं कि छोड़ दिये जा सकते हैं। ऐसी कल्पना करने से व = $\int_{१}^{ध} \frac{ध ज्या न ता (धा)}{ध (धा^२ - ध^२ ज्या^२ न + २ छ धा^२)^{\frac{१}{२}}}$ = $\int_{१}^{ध} \frac{ध ज्या न ता (धा)}{धा (धा^२ - ध^२ ज्या^२ न)^{\frac{१}{२}}} \left( १ + \frac{२ छ धा^२}{धा^२ - ध^२ ज्या^२ न} \right)^{\frac{१}{२}}$ = $\int_{१}^{ध} \frac{ध ध ज्या न ता (धा)}{धा (धा^२ - ध^२ ज्या^२ न)^{\frac{१}{२}}} - \int_{१}^{ध} \frac{छ.धा.ध ज्या न ता (धा)}{(धा^२ - ध^२ ज्या^२ न)^{\frac{३}{२}}}$ सरल करने पर इसका रूप यह होगा— व = प स्परे न + फ स्परे$^३$ न (१) जहाँ प और फ कोई स्थिर राशियाँ हैं और न स्पष्ट नतांश है। प और फ के मान प्रत्यक्ष वेध से जाने जा सकते हैं। कैसिनी का सूत्र— कैसिनी नामक ज्योतिषी ने यह कल्पना किया कि वातावरण ऊपर से नीचे तक सजातीय है अर्थात् एक ही घनत्व का है। इस कल्पना से वर्तन का जो सूत्र ज्ञात हुआ वह ऊपर बतलाये गये सूत्र से मिलता जुलता है। इससे वर्तन का जो परिमाण जाना जाता है वह ८०° तक के नतांश के लिए सन्तोषप्रद है। यदि नतांश ८०° से अधिक हो तो वर्तन के परिमाण में स्थूलता रह जाती है।