सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रिप्रश्नाधिकार ४०७ त्रा = त्रिभोन लग्न का नतांश आ = भूकेन्द्रिक अक्षांश व = विश्लेषांश घ = यथार्थ नतकाल श = यथार्थ शर क = यथार्थ क्रान्ति शा = स्पष्ट शर का = स्पष्ट क्रान्ति भु = शर लम्बन या नति लु = क्रान्ति लम्बन सूर्य-सिद्धान्त ने भोगांश लंबन का नाम हरिज और शर लंबन का नाम नति रखा है। अन्य सिद्धान्त ग्रन्थों में भोगांश लंबन को केवल लंबन या स्फुट लंबन और शर लंबन को नति कहा गया है। अब संक्षेप में यह बतलाया जायगा कि हमारे आचार्यों ने लम्बन के विषय में क्या लिखा है :- भास्कराचार्य ने लिखा* है कि किसी ग्रह की दैनिक गति को १५ से भाग देने पर उस ग्रह का परम लम्बन (क्षितिज लम्बन) आ जाता है। इसका कारण यह बतलाया गया है :- भूतल के किसी स्थान को स्पर्श करता हुआ समतल (horizontal plane) आकाश को जिस वृत्त पर काटता हुआ देख पड़ता है उसे उस स्थान का क्षितिज वृत्त कहते हैं। यह क्षितिज वृत्त आकाश के गोल को दो भागों में बांट देता है। इस क्षितिज वृत्त को स्पष्ट क्षितिज वृत्त (sensible horizon) कहते हैं। यदि पृथ्वी के केन्द्र से होता हुआ स्पष्ट क्षितिज वृत्त के समानान्तर दूसरा समतल आकाश की ओर बढ़ाया जाय तो यह आकाश को जिस वृत्त पर काटता है उसे उस स्थान का यथार्थ क्षितिज वृत्त (true या rational horizon) कहते हैं। चित्र ७८ में द भूतल पर द्रष्टा का स्थान और भ पृथ्वी का केन्द्र है। द से जो समतल पृथ्वी तल को छूता हुआ खींचा गया है वह चन्द्रमा की कक्षा को चा बिन्दु पर और सूर्य की कक्षा को सा बिंदु पर काटता है। इसलिए चा, सा बिंदु द स्थान की स्पष्ट क्षितिज पर है। यदि इसी के समानान्तर भ से होता हुआ एक समतल आकाश की ओर बढ़ाया जाय जो चन्द्र और सूर्य की कक्षाओं को क्रम से च और स बिन्दुओं पर काटे तो भ च स तल को द स्थान का यथार्थ क्षितिज कहते हैं। यह प्रकट है कि जिस समय चंद्रमा और सूर्य अथवा अन्य कोई ग्रह द स्थान के यथार्थ क्षितिज पर रहता है उस समय वह भ च स तल में रहता है जो द स्थान के स्पष्ट क्षितिज से नीचे है इसलिए वह द्रष्टा को नहीं देख पड़ेगा। ऐसी दशा में ग्रह स्पष्ट क्षितिज से जितना नीचे रहेगा उसका परिमाण चा पा या सा प है जो भ द अर्थात् पृथ्वी के अर्द्ध-व्यास के समान *गणिताध्याय पृष्ठ १६२ ।