सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
त्रिप्रश्नाधिकार ४०७ त्रा = त्रिभोन लग्न का नतांश आ = भूकेन्द्रिक अक्षांश व = विश्लेषांश घ = यथार्थ नतकाल श = यथार्थ शर क = यथार्थ क्रान्ति शा = स्पष्ट शर का = स्पष्ट क्रान्ति भु = शर लम्बन या नति लु = क्रान्ति लम्बन सूर्य-सिद्धान्त ने भोगांश लंबन का नाम हरिज और शर लंबन का नाम नति रखा है। अन्य सिद्धान्त ग्रन्थों में भोगांश लंबन को केवल लंबन या स्फुट लंबन और शर लंबन को नति कहा गया है। अब संक्षेप में यह बतलाया जायगा कि हमारे आचार्यों ने लम्बन के विषय में क्या लिखा है :- भास्कराचार्य ने लिखा* है कि किसी ग्रह की दैनिक गति को १५ से भाग देने पर उस ग्रह का परम लम्बन (क्षितिज लम्बन) आ जाता है। इसका कारण यह बतलाया गया है :- भूतल के किसी स्थान को स्पर्श करता हुआ समतल (horizontal plane) आकाश को जिस वृत्त पर काटता हुआ देख पड़ता है उसे उस स्थान का क्षितिज वृत्त कहते हैं। यह क्षितिज वृत्त आकाश के गोल को दो भागों में बांट देता है। इस क्षितिज वृत्त को स्पष्ट क्षितिज वृत्त (sensible horizon) कहते हैं। यदि पृथ्वी के केन्द्र से होता हुआ स्पष्ट क्षितिज वृत्त के समानान्तर दूसरा समतल आकाश की ओर बढ़ाया जाय तो यह आकाश को जिस वृत्त पर काटता है उसे उस स्थान का यथार्थ क्षितिज वृत्त (true या rational horizon) कहते हैं। चित्र ७८ में द भूतल पर द्रष्टा का स्थान और भ पृथ्वी का केन्द्र है। द से जो समतल पृथ्वी तल को छूता हुआ खींचा गया है वह चन्द्रमा की कक्षा को चा बिन्दु पर और सूर्य की कक्षा को सा बिंदु पर काटता है। इसलिए चा, सा बिंदु द स्थान की स्पष्ट क्षितिज पर है। यदि इसी के समानान्तर भ से होता हुआ एक समतल आकाश की ओर बढ़ाया जाय जो चन्द्र और सूर्य की कक्षाओं को क्रम से च और स बिन्दुओं पर काटे तो भ च स तल को द स्थान का यथार्थ क्षितिज कहते हैं। यह प्रकट है कि जिस समय चंद्रमा और सूर्य अथवा अन्य कोई ग्रह द स्थान के यथार्थ क्षितिज पर रहता है उस समय वह भ च स तल में रहता है जो द स्थान के स्पष्ट क्षितिज से नीचे है इसलिए वह द्रष्टा को नहीं देख पड़ेगा। ऐसी दशा में ग्रह स्पष्ट क्षितिज से जितना नीचे रहेगा उसका परिमाण चा पा या सा प है जो भ द अर्थात् पृथ्वी के अर्द्ध-व्यास के समान *गणिताध्याय पृष्ठ १६२ ।
४०८ सूर्य-सिद्धान्त चित्र ७८ है। इसलिए यह कहने में कुछ भी दोष नहीं है कि जब ग्रह किसी स्थान के यथार्थ क्षितिज पर रहता है तब वह उस स्थान के स्पष्ट क्षितिज से पृथ्वी के अर्द्धव्यास के समान नीचे रहता है अर्थात् उसका लंबन पृथ्वी के अर्द्धव्यास के समान होता है। यदि चा पा को चा च के समान और सा प को सा स के समान समझ लें तो बहुत अन्तर न पड़ेगा क्योंकि चा च या सा स पूरी कक्षा की तुलना में बहुत छोटा है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि जब ग्रह यथार्थ क्षितिज पर रहता है तब वह द्रष्टा की क्षितिज से अपनी कक्षा में पृथ्वी के अर्द्धव्यास के समान नीचे रहता है। यह पहले बतलाया जा चुका है (देखो पृष्ठ १६-१७) कि हमारे आचार्यों ने मान लिया था कि प्रत्येक ग्रह की योजनात्मक गति समान होती है। आगे आनेवाले भूगोलाध्याय के श्लोक ८१-८२ के अनुसार प्रत्येक ग्रह की दैनिक गति ११८४८.७२ योजन होती है। पृथ्वी का अर्द्धव्यास सूर्य सिद्धान्त के अनुसार ८०० योजन और सिद्धान्त शिरोमणि के अनुसार ७६०.५ योजन होता है (देखो मध्यमाधिकार पृष्ठ- ५३)। पिछले ग्रन्थ में लिखा हुआ पृथ्वी का अर्द्धव्यास ग्रह की दैनिक गति का ठीक पन्द्रहवां भाग है। पहले ग्रन्थ के अनुसार भी ग्रह की दैनिक गति पृथ्वी के अर्द्धव्यास
त्रिप्रश्नाधिकार ४०६ के प्रायः १५ गुने के समान है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि जिस समय ग्रह यथार्थ क्षितिज पर रहता है उस समय यह स्पष्ट क्षितिज से अपनी दैनिक गति के १५वें भाग के समान नीचे रहता है। अर्थात् ग्रह का परम लंबन उसकी दैनिक गति के १५वें भाग के समान होता है। एक दिन ६० घड़ी के समान होता है इसलिए ६० घड़ी में जो गति होती है उसका पन्द्रहवां भाग चार घड़ी की गति के समान हुआ। इसका अर्थ यह हुआ कि ग्रह चार घड़ी में जितना चलता है उतना ही उसका परम लंबन (कलाओं में) होता है। समय की इकाइयों में ग्रह का परम लंबन ४ घड़ी के समान होता है। यदि ग ग्रह की दैनिक कोणात्मक गति, य उसकी दैनिक योजनात्मक गति, ल परम लंबन, क पृथ्वी से ग्रह कक्षा की दूरी और त्र पृथ्वी का अर्द्धव्यास हो तो ऊपर लिखी बातें इस प्रकार भी प्रकट की जा सकती हैं :— ल = ग/१५ = य/(१५ क) = त्र/क क्योंकि यदि ग्रह बहुत दूर हो तो उसकी दैनिक योजनात्मक गति को अर्थात् १ दिन में ग्रह अपनी कक्षा का जितना धनु (arc) चलता है उसको कक्षा के अर्द्धव्यास से भाग देने पर उसकी दैनिक कोणात्मक गति ज्ञात होती है इसलिए ग = य/क । परन्तु य को १५ से भाग देने पर जो आता है वह पृथ्वी के अर्द्धव्यास के समान होता है इसलिए य/१५ = त्र । इससे सिद्ध हुआ कि हमारे आचार्यों ने परम लंबन का परिमाण जानने के लिए जो नियम बनाये थे वह आजकल के बनाये नियम से बहुत कुछ मिलते जुलते हैं (देखो पृ० ३८३) । परन्तु इसमें भूल यह थी कि ग्रह की योजनात्मक गति समान नहीं है जैसा कि आजकल के वेधों से सिद्ध होता है इसलिए हमारे आचार्यों के बताये हुए नियम से परम लंबन के जो मान आते हैं वे आजकल के वेधों द्वारा आये हुए परम लंबनों से बहुत भिन्न हैं। पृष्ठ ४१० की तुलनात्मक सारिणी से यह बात स्पष्ट हो जायगी । अब यह बतलाना आवश्यक है कि हमारे आचार्य ग्रह का परम लम्बन जानकर उसका स्पष्ट भोगांश लंबन और शर लंबन अथवा नति कैसे जानते थे । भास्कराचार्य जी लिखते हैं कि (१) जिस समय ग्रह खस्वस्तिक पर रहता है उस समय उसमें किसी प्रकार का लंबन नहीं होता क्योंकि पृथ्वी के केन्द्र से ओर द्रष्टा से
४१० सूर्य-सिद्धान्त
| भास्कराचार्य के | आजकल के बेधों से | आजकल के वेधों से ग्रह | अनुसार मध्यम | प्राप्त परम लम्बन | प्राप्त स्पष्ट बिम्ब | परम लम्बन |------------------------|------------------------ | | लघुतम | महत्तम | लघुतम | महत्तम
| विकला | विकला | विकला | विकला | विकला सूर्य | २३६.५ | ८.७ | ६.० | १८६० | १६५६ चन्द्रमा | ३१६२.३ | ३१८६ | ३७२० | १७४० | २०२८ मङ्गल | १२५.७ | ३.५ | १६.६ | ४.४ | २१.२ बुध | ६८२.१ | ६.४ | १४.४ | ४.८ | १०.६ गुरु | २०.० | १.४ | २.१ | ३१.६ | ४६.७ शुक्र | ३८४.५ | ५.० | ३१.४ | ६.६ | ६०.० शनि | ८.० | ०.८ | १.० | १५.८ | १६.५
ग्रह तक खींची गयी रेखाएँ एक* ही होती हैं । (२) जिस समय ग्रह त्रिभोन लग्न पर होता है अर्थात् जिस समय ग्रह क्रान्तिवृत्त के उस बिंदु पर होता है जो उदय लग्न से तीन राशि कम होता है तब ग्रह में भोगांश लंबन नहीं होता, केवल नति होती है । (३) जिस समय क्रान्तिवृत्त खस्वस्तिक से होता हुआ ऊर्ध्ववृत्त बनाता है और ग्रह क्रान्तिवृत्त पर होता है उस समय उसमें शरलम्बन नहीं होता, केवल भोगांश लम्बन होता है । अन्य दशाओं में लम्बन और नति क्या होती है यह जानने के नियम बतलाये गये हैं । पृष्ठ ४०६ में बतलाया गया है कि किसी समय का भोगांश लम्बन जानने के लिए पहले यह जानना आवश्यक है कि उसे समय के त्रिभोन लग्न का नतांश या
- इससे जान पड़ता है कि भास्कराचार्य ने पृथ्वी को पूर्ण गोल माना था क्योंकि तभी यह बात ठीक होती है ।
त्रिप्रश्नाधिकार ४११ उन्नतांश क्या है क्योंकि त्रिभोन लग्न के उन्नतांश की ज्या सूत्र (ख) का एक अंग है। त्रिभोन लग्न के नतांश की ज्या को दृक्क्षेप और उन्नतांश की ज्या को अथवा नतांश की कोटिज्या को दृग्गति कहा गया है। चित्र ७६ में दिखलाया गया है कि जब क्रान्तिवृत्त का उदय लग्न क्षितिज के पूर्व बिन्दु के दखिन होता है तब त्रिभोन लग्न यामोत्तरवृत्त से पच्छिम होता है क्योंकि त्रिभोन लग्न उदय लग्न से ३ राशि या ९० अंश कम होता है। त्रिभोन लग्न खस्वस्तिक और कदम्ब बिंदुओं से जाता हुआ ऊर्ध्ववृत्त क्रान्तिवृत्त से समकोण बनाता है और क्षितिज को फ बिन्दु पर काटता है। चित्र ७६ उ पू द फ = स स्थान का क्षितिज वृत्त उ ध ख म व द = स स्थान का यामोत्तर वृत्त ध = उत्तरी आकाशीय ध्रुव ख = खस्वस्तिक म = मध्य लग्न व पू = विषुवद्वृत्त त्र म त अ = क्रान्तिवृत्त त्र = त्रिभोन लग्न त = शरद सम्पात (सायन तुला) क = कदम्ब क ख त्र फ = त्रिभोन लग्न से जाता हुआ ऊर्ध्ववृत्त अ पू = उदय लग्न की अग्रा
४१२ सूर्य-सिद्धान्त इसलिए धनु अ द फ = ६०° = धनु पू अ द । यदि दोनों धनुओं से सामान्य खंड अ द निकाल दिया जाय तो अ पू = द फ गोलीय त्रिभुज अ त पू में ज्या ( अ पू ) ज्या ( अ त ) ────────── = ────────── ज्या अ त पू ज्या अ पू त परन्तु अ त पू विषुवद्वृत्त और क्रान्तिवृत्त के बीच का कोण अर्थात् सूर्य की परम क्रान्ति है और अ पू त कोण व द धनु के समान है जो स स्थान का लम्बांश है । परम क्रान्ति ज्या × ज्या ( त अ ) ∴ ज्या ( अ पू ) = ───────────────────────── लम्बज्या यही सूर्यग्रहणाधिकार के तीसरे श्लोक का तात्पर्य है । इसी ज्या अ पू का नाम उदय या उदय ज्या रखा गया है । परन्तु अ पू = द फ, जो म ख न कोण के समान है । अब यदि गोलीय समकोण त्रिभुज म ख न के धनु म ख का ज्ञान हो जाय तो धनु ख न का मान सहज ही जाना जा सकता है क्योंकि कोण ख न म समकोण है । यह स्पष्ट ही है कि म ख मध्य लग्न का नतांश है जो मध्य लग्न की उत्तर क्रान्ति व म और इष्ट स्थान के अक्षांश व ख का अन्तर है । क्रान्ति दक्षिण होती तो जोड़ना पड़ता । म ख की ज्या का नाम मध्य ज्या रखा गया है यह जानने की रीति उसी अधिकार के ४थे और ५वें श्लोकों में बतलाई गयी है । इसलिए समकोण गोलीय त्रिभु ख न म में ज्या ( न ख ) =ज्या ( ख म न ) × ज्या ( म ख ) यदि गोलीय त्रिभुज ख न म को समतल त्रिभुज (plane triangle ) मान लिया जाय तो ज्या ( ख म न ), =कोज्या ( म ख न) क्योंकि ख म न और म ख न का योग ६०° के समान होगा । इसलिए ज्या ( न ख ) =कोज्या ( म ख न ) ज्या ( म ख ) =कोज्या ( द फ ) × ज्या ( म ख ) =ज्या ( म ख ) √१ - ज्या² ( द फ ) =√ ज्या² ( म ख ) - ज्या² ( म ख) ज्या² ( द फ ) ∴ दृक् क्षेप = √मध्यज्या² - मध्यज्या² × उदय² दृग्गति = √१ - दृक्षेप²
त्रिप्रश्नाधिकार ४१३ यही सूर्यग्रहणाधिकार के ५-६ श्लोकों का अर्थ है, यहाँ त्रिज्या १ मानी गयी है । छेद = ( ज्या ३०° )² / दृग्गति = ( १/२ )² / दृग्गति = १ / (४ दृग्गति) लम्बन = ज्या विश्लेषांश* / छेद = ज्या विश्लेषांश / ( १ / ४ दृग्गति ) = ४ x दृग्गति x ज्या विश्लेषांश इससे लम्बन का जो परिमाण ज्ञात होगा वह घड़ियों में होगा । यह सूत्र पृष्ठ ४०६ के सूत्र ( ग ) से मिलता है जहाँ लि = ४ घड़ी = ग्रह का परम लम्बन, दृग्गति = त्रिभोन लग्न की उन्नतांश की ज्या = कोज्या त्रा और व = विश्लेषांश । शरलम्बन या नति के लिए केवल यह दिया हुआ है कि दृक्क्षेप को परम- लम्बन से गुणा करने पर नति आती है । यह रीति बहुत स्थूल है । लम्बन और नति की आवश्यकता सूर्य-ग्रहण की गणना करने में पड़ती थी । इसलिए हमारे ग्रन्थों में इसकी चर्चा सूर्यग्रहणाधिकार में की गयी है । परन्तु आजकल लम्बन से ग्रहों और ताराओं की दूरी का पता भी लगाया जाता है । यह बतलाया गया है कि क्षितिज लम्बन की ज्या = त्र / क । इसलिए यदि क्षितिज लम्बन की ज्या और भूकेन्द्र से द्रष्टा की दूरी त्र ज्ञात हो तो क सहज ही जाना जा सकता है । अब संक्षेप में यह बतलाया जायगा कि ग्रह का लम्बन कैसे नापा जाता है । किसी ग्रह का लंबन नापना—मान लो कि चित्र ८० में द, दा भूतल के ऐसे दो स्थान हैं जो एक ही देशान्तर रेखा पर हैं और जिनके अक्षांश भी शुद्धता- पूर्वक जान लिये गये हैं । जिस समय ग्रह च यामोत्तर वृत्त पर आता है उस समय द से उसका स्पष्ट नतांश ख द च अथवा न है और दा से उसका स्पष्ट नतांश खा दा च अथवा ना है । इन दोनों स्थानों के अक्षांशों का योग द भ दा ज्ञात है, इसलिए ∠ द च दा = ३६०° - ( ∠ च द भ + च दा भ + ∠ द भ दा ) = ३६०° - ( १८०° - न + १८०° - ना + ∠ द भ दा ) = न + ना - ∠ द भ दा
- ग्रह के भोगांश और त्रिभोन लग्न का अन्तर विश्लेषांश है ( देखो पृष्ठ ४०५)
४१४ सूर्य-सिद्धान्त परन्तु हमें द च दा कोण के जानने की आवश्यकता नहीं है । हमको तो द या दा से च का लम्बन जानना है अर्थात् हमको द च भ या दा च भ कोण जानना है जो द और दा से च के लम्बन हैं । मान लो द च भ = ल और दा च भ = ला और द च दा = च । अब ज्या ल = ज्या न × भ द / भ च ज्या ला = ज्या ना × भ दा / भ च = ज्या ना × भ द / भ च क्योंकि भ द और भ दा दोनों पृथ्वी की त्रिज्याएँ हैं इसलिए समान मानी जा सकती हैं । इसलिए ज्या ल / ज्या न = ज्या ला / ज्या ना अथवा ज्या ला = ज्या ला × ज्या न / ज्या ना परन्तु ल = च - ला ∴ ज्या ( च - ला ) = ज्या ला × ज्या न / ज्या ना
[Diagram: च at top vertex. ख on upper-left ray from center/surface. खा on upper-right ray from center/surface. Points on circle / geometry: द, व, दा, उ, भ (center), वा (bottom). ]
चित्र ८०
त्रिप्रश्नाधिकार ४१५ ⸫ ज्या च कोज्या ला — कोज्या च ज्या ला = ज्या ला ✕ ज्या न ————— ज्या ना यदि इस समीकरण के प्रत्येक पक्ष को ज्या च ज्या ला से भाग दिया जाय तो कोस्परे ला — को स्परे च = ज्या न ——————— ज्या च ज्या ना अथवा कोस्परे ला = कोस्परे च + ज्या त ——————— ज्या च ज्या ना इस प्रकार यह सिद्ध है कि यदि दो स्थानों से किसी ग्रह का नतांश वेध करके जान लिया जाय तो उन स्थानों के अक्षांशों के ज्ञान से द च दा कोण अर्थात् च की जानकारी हो सकती है। फिर च से ला की जानकारी उपर्युक्त समीकरण से की जा सकती है। यह तो स्पष्ट ही है कि चन्द्रमा को छोड़कर अन्य ग्रहों के लम्बन बहुत छोटे होते हैं इसलिए यदि इनके लम्बनों की ज्याओं के स्थान में इनके धनु ही रखे जायें तो कोई हानि नहीं हो सकती। ऐसी दशा में ज्या ( च — ला ) = ज्या ला ✕ ज्या न की जगह ————— ज्या ना च — ला = ला ✕ ज्या न लिखा जा सकता है। ————— ज्या ना ⸫ च = ला + ला ✕ ज्या न ————— ज्या ना = ला ( १ + ज्या न ) ————— ज्या ना = ला ✕ ज्या ना + ज्या न ———————————————— ज्या ना ⸫ ला = च ज्या ना ——————————————— ज्या न + ज्या ना = च ज्या ना ————————————————————————————————————— २ ज्या न + ना कोज्या न — ना (क) —————— —————— २ २ इस सूत्र से किसी ग्रह का वेध करके उसका साधारण लम्बन या क्षितिज लम्बन जाना जा सकता है क्योंकि यदि क्षितिज लम्बन लि हो तो
४१६ सूर्य-सिद्धान्त ज्या लि = ज्या ला / ज्या ना अथवा लि = ला / ज्या ना (ख) समीकरण (क) और (ख) को एकत्र करने से लि = च / [२ ज्या (न+ना)/२ कोज्या (न-ना)/२] = च / [ज्या न + ज्या ना] उदाहरण -- यदि द स्थान का उत्तर अक्षांश ५६°२०'३०" और दा का दक्षिण अक्षांश ३३°५५'५" हो तथा द और दा से मंगल ग्रह के यामोत्तर नतांश ६८°१४'६" और २५°२' हो तो मंगल का क्षितिज लम्बन क्या है ? द भ दा = ५६°२०'३०" + ३३°५५'५" = ६३°१५'३५" न+ना = ६८°१४'६" + २५°२' = ६३°१६'६" ∵ च = द च दा = न + ना - द भ दा = ६३°१६'६" - ६३°१५'३५" = ३१" ज्या न = ज्या ६८°१४'६" = .६२८७ ज्या ना = ज्या २५°२' = .४२३१ ∵ ज्या न + ज्या ना = १·३५१८ ∵ क्षितिज लंबन लि = ३१" / १·३५१८ = २२"·६३ यह प्रकट है कि इस रीति से च का मान जानने के लिए हमको दो स्थानों के अक्षांश जानना आवश्यक है। परन्तु यदि हम यह देखें कि जिस समय ग्रह यामोत्तर वृत्त पर है उस समय वह किसी पासवाले तारे से कितना ऊपर या नीचे दोनों स्थानों से देख पड़ता है तो च का मान सहज ही जाना जा सकता है। मान लो कि चित्र ८१ में च ग्रह का स्थान है और त उसी के पास वाले किसी तारे का स्थान है। द से देखने पर त से च का अन्तर त द च कोण के समान है और दा से इन दोनों का अन्तर त दा च कोण के समान है। इसलिए द च दा = त द च + त दा च + द त दा परन्तु तारा त इतनी दूर होता है कि द त दा कोण शून्य के समान होता है। इसलिए द च दा = त द च + त दा च
त्रिप्रश्नाधिकार ४१७
चित्र ८१
इस चित्र में द स्थान से, त से नीचे च देख पड़ता है और दा स्थान से त से ऊपर च देख पड़ता है। इसलिए च और त के अन्तरों का योग किया गया है। यदि दोनों स्थानों से, त के एक ही ओर च देख पड़े तो त द च और त दा च कोणों का अन्तर द च दा कोण के समान होता है। व्यवहार में ठीक एक ही देशान्तर रेखा के दो स्थानों से किसी ग्रह या तारे का वेध लेना कठिन है। परन्तु यदि दो स्थान ऐसे हों जिसके देशान्तरों के थोड़ा ही भेद हो तो भी उपर्युक्त नियम लागू हो सकता है क्योंकि इससे जो अशुद्धि होगी वह नहीं के समान होगी। केवल चन्द्रमा और मङ्गल ग्रह का लम्बन जानने के लिए यह रीति काम में लायी जा सकती है। मङ्गल के लिए भी यह रीति तभी शुद्ध हो सकती है जब वह पृथ्वी के बहुत पास हो अर्थात् सूर्य से ६ राशि के लगभग दूर हो। अन्य दूर के ग्रहों के लिए यह रीति उपयोगी नहीं है क्योंकि जब लंबन १० या १२ विकला से
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४१८ सूर्य-सिद्धान्त कम होता है तब इस रीति से काम लेने में वेध करने की कुछ भूलें ऐसी रह जाती हैं जिनसे फल बहुत अशुद्ध हो जाता है । चन्द्रमा इतने पास है कि यदि पृथ्वी को पूर्ण गोल मानना जाय जैसा कि उपर्युक्त नियम के लिए भ द और भ दा समान समझ लिये गये हैं तो भी कुछ स्थूलता रह जाती है। इसलिए चन्द्रमा का लंबन जानने के लिए भ द को भ दा के समान न समझ कर इनका यथार्थ परिमाण लेना पड़ेगा । यदि ज्या ल की जगह ल और ज्या ला की जगह ला रखा जाय तो ४१४ पृष्ठ के अनुसार. भ द ल = ――― × ज्या न भ च भ दा ला = ――― × ज्या न भ च भ द × ज्या न + भ दा × ज्या ना ∴ च = ल + ला = ――――――――――――――――― भ च त्र परन्तु क्षितिज लम्बन लि = ――― जहां त्र = पृथ्वी की त्रिज्या भ च त्र ∴ भ च = ―― लि त्र ∴ च × ―― = भ द × ज्या न + भ दा × ज्या ना लि च × त्र ∴ लि = ―――――――――――――― भ द × ज्या न + भ दा × ज्या न यहाँ न और ना चन्द्रमा के यथार्थ नतांश हैं। यदि भौगोलिक या स्पष्ट नतांश के अनुसार लि का मान जानना हो तो पृष्ठ ३८३ में बतलायी गयी रीति से भौगोलिक नतांश से यथार्थ मतांश जान लेना चाहिए। उपर्युक्त सूत्र से यह सिद्ध होता है कि द्रष्टा के स्थान में भिन्नता होने से क्षितिज लंबन में भिन्नता होती है क्योंकि भ द और भ दा बदलते रहेंगे। यह बात वेध से भी देखी गयी है कि भिन्न-भिन्न स्थानों में चन्द्रमा का क्षितिज लम्बन भिन्न-भिन्न देख पड़ता है । यह इस बात का प्रमाण है कि पृथ्वी पूर्ण गोल नहीं है वरन् अंडाकार है । सूर्य का लम्बन उपर्युक्त रीति से नहीं जाना जा सकता । इसके लिए कई रीतियां काम में लायी जाती हैं जिनमें से दो नीचे लिखी जाती हैं :- पहली रीति — भूतल पर दो स्थान द और दा ऐसे चुने जाते हैं जो विषवत् रेखा के निकट हैं और परस्पर बहुत दूर हैं। सरलता के लिए यह भी मान लो कि शुक्र की कक्षा शु शु और सूर्य भी विषुवत् रेखा के तल पर है जिस तल पर द, दा
विप्रश्नाधिकार ४१६
स्थान हैं। द, दा स्थानों से सूर्य के स बिन्दु तक दो स्पर्शरेखाएं द स और दा स खींचो। द स्थान का द्रष्टा यह ध्यान से देखता है कि शुक्र शु किस समय सूर्य बिम्ब के सामने पहुँच कर उसको भीतर से स्पर्श करता है। इसी प्रकार दा स्थान का द्रष्टा शुक्र और सूर्यबिम्ब के भीतरी स्पर्श का समय ध्यान से देख लेता है। इन दोनों
४२० सूर्य-सिद्धान्त वेधों के समय में जो अन्तर होता है उतने ही समय में शुक्र शु बिन्दु से शू बिन्दु पर अपनी कक्षा में जाता है अर्थात् उतने ही समय में शुक्र सूर्य की परिक्रमा शु स शू कोण के समान करता हुआ देख पड़ता है । यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि सूर्य के चारों ओर जाने वाली शुक्र की यह गति शुक्र और पृथ्वी की गतियों के अन्तर के समान है । परंतु हमको मालूम है कि शुक्र और पृथ्वी दोनों कितने समय में सूर्य की परिक्रमा करती हुई एक रेखा में आ जाती है, इसलिए शु स शू या द स दा कोण का परिमाण जाना जा सकता है । जब यह मालूम हो गया कि सूर्यबिम्ब के एक बिन्दु पर भूतल के दो स्थानों से कितना कोण बनता है तब चित्र ८० और ८१ में बतलायी गयी रीति से यह सहज ही जाना जा सकता है कि सूर्य का क्षितिज लम्बन क्या है । व्यवहार में यह रीति इतनी सुविधाजनक नहीं है जितनी देख पड़ती है क्योंकि शुक्र और पृथ्वी की कक्षाएँ एक ही तल में नहीं हैं, दूसरे द, दा स्थानों के देशान्तरों को बहुत ही शुद्धतापूर्वक जानने की आवश्यकता है। यह रीति डीलिस्ले (Delisle) ने चलायी थी। दूसरी रीति—इस रीति में द्रष्टा के स्थानों के देशान्तरों के जानने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती । यहाँ तो केवल यह देखा जाता है कि दो भिन्न-भिन्न स्थानों से शुक्र कितनी देर तक सूर्यबिम्ब के सम्मुख एक किनारे से दूसरे किनारे तक जाता हुआ देख पड़ता है। इस काम के लिए दो द्रष्टाओं के स्थान परस्पर बहुत दूर परन्तु उत्तर दखिन होने चाहिए। मान लो कि शु शुक्र और द दा भूतल पर द्रष्टा के दो स्थान एक ही तल पर अर्थात् कागज के तल पर हैं और सूर्य का बिम्ब प्रकट करने वाला वृत्त जिसका केन्द्र स है इस तल के समकोण पर है। दा स्थान के द्रष्टा को देख पड़ेगा कि शुक्र अपनी कक्षा में तीर की दिशा में चलता हुआ सूर्य बिम्ब को क ख रेखा में काटता हुआ जाता है। परन्तु द स्थान के द्रष्टा को देख पड़ेगा कि सूर्य के बिम्ब को शुक्र ग घ रेखा में काटता हुआ जाता है। जितनी देर में शुक्र सूर्य के सामने एक किनारे से दूसरे किनारे तक जाता हुआ देख पड़ता है वह समय प्रत्येक स्थान से ध्यानपूर्वक देख कर लिख लेना चाहिए। शुक्र जिस गति से सूर्य के बिम्ब को काटता हुआ निकल जाता है उसकी गणना सहज ही की जा सकती है। यह १ मिनट में ४ विकला के लगभग होती है। इसलिए जब यह मालूम है कि शुक्र क ख या ग घ रेखाओं को कितने समय में पार करता है तब इन रेखाओं के विकलात्मक मान सहज ही और बहुत शुद्धतापूर्वक जाने जा सकते हैं। इसलिए क ख और ग घ चापों के
त्रिप्रश्नाधिकार ४२१ चित्र ८३ आधे भागों के भी परिमाण जाने जा सकते हैं । परन्तु सूर्य बिम्ब का कोणात्मक मान विकलाओं में मालूम ही रहता है । इसलिए स च और स छ के विकलात्मक मान भी जाने जा सकते हैं क्योंकि रेखागणित के अनुसार-
२२ सूर्य-सिद्धान्त स छ² = स घ² - घ छ² और स च² = स ख² - ख च² स च और स छ की जानकारी हो जाने पर इन दोनों का अन्तर निकाल लेने से हमको च छ का ज्ञान हो जाता है। इससे च छ की दूरी मीलों में भी मालूम हो सकती है क्योंकि यदि दोनों त्रिभुज द शु दा और च शु छ सजातीय (Similar) समझ लिये जायें तो च छ शु छ ------ = ------ द दा शु द परन्तु शु छ और शु द का सम्बन्ध हमें केपलर के नियमों से मालूम है क्योंकि शु छ शुक्र से सूर्य की दूरी है और शु द शुक्र से पृथ्वी की दूरी है। इसलिए यदि शु छ ७२३ और शु द २७७ हो तो च छ ७२३ ------ = ------ द दा २७७ द दा पृथ्वी तल के दो स्थान हैं इसलिए इनकी परस्पर दूरी सहज ही जानी जा सकती है। इस प्रकार च छ का परिमाण मीलों में भी जाना जा सकता है। परन्तु उपर्युक्त रीति से च छ का परिमाण विकलाओं में भी जाना जा सकता है। इसलिए जब इसका परिमाण विकलाओं और मीलों दोनों में मालूम है तब यह सहज ही जाना जा सकता है कि सूर्य पृथ्वी से कितनी दूर है क्योंकि च छ का विकलात्मक मान च छ का मान मीलों में --------------------- = ---------------------- २०६२६५ पृथ्वी से सूर्य की दूरी २०६२६५ × च छ का मान मीलों में ∴ पृथ्वी से सूर्य की दूरी = --------------------------------- च छ का मान विकलाओं में इससे सूर्य का लंबन सहज ही जाना जा सकता है। हैली (Hally) ने १७७३ वि० में इस रीति का आविष्कार किया था। इन दोनों रीतियों में यह दोष है कि शुक्र और सूर्य के बिम्बों के भीतरी स्पर्श का समय ठीक-ठीक वेध करना बड़ा कठिन होता है। शुक्र की गति इतनी मन्द होती है और सूर्य के बिम्ब का किनारा इतना अस्पष्ट होता है कि स्पर्शकाल के समय में कई असुओं का अन्तर पड़ सकता है। क्षितिज लम्बन जानकर सूर्य और चन्द्रमा की दूरी जानना—यह बतलाया गया है कि क्षितिज लंबन की ज्या = त्र ÷ क, जहाँ त्र पृथ्वी की त्रिज्या और क भूकेन्द्र से ग्रह की दूरी है।
त्रिप्रश्नाधिकार ४२३ $\because$ कं = $\frac{पृथ्वी की त्रिज्या}{क्षितिज लम्बन की ज्या}$ क्षितिज लम्बन की ज्या को कलाओं और विकलाओं में प्रकट करने से सुविधा होती है इसलिए पृथ्वी की त्रिज्या को भी कलाओं और विकलाओं में लिखना चाहिए। यह बतलाया गया है कि त्रिज्या $\times$ २ $\times$ ३.१४१५९ = परिधि = ३६०° $\therefore$ त्रिज्या = $\frac{३६०°}{२\times३.१४१५६}$ = ५७°.२९५७७९५ = ३४३७'.७४६७७ = २०६२६४''.८०६२ = २०६२६५'' सूर्य का मध्यम क्षितिज लम्बन = ८''.८० $\therefore$ सूर्य की मध्यम दूरी = $\frac{२०६२६५}{८.८}$ = २३४३६ पृथ्वी की त्रिज्याओं में यह दूरी पृथ्वी की त्रिज्याओं में है जिसका विषुवद्वृत्तीय मान ३९६३.३ मील है । इसलिए सूर्य की दूरी = २३४३६ $\times$ ३९६३.३ मील = ९२८९५७८६ मील । चंद्रमा का मध्यम क्षितिज लम्बन = ५७'१''.८ = ३४२२'' $\therefore$ चंद्रमा की मध्यम दूरी = $\frac{२०६२६५}{३४२२}$ = ६०.३ पृथ्वी की त्रिज्याओं में = ६०.३ $\times$ ३९६३.३ = २३८६८७ मील सूर्य और चन्द्रमा के विस्तार—यदि किसी आकाशीय पिंड का कोणात्मक अर्द्धव्यास वेध से जान लिया जाय और उसका लम्बन भी ज्ञात हो तो उसका विस्तार भी जाना जा सकता है क्योंकि कोणात्मक अर्द्धव्यास की ज्या = $\frac{पिंड की त्रिज्या}{पिंड की दूरी}$ लम्बन की ज्या = $\frac{पृथ्वी की त्रिज्या}{पिंड की दूरी}$ $\therefore$ $\frac{पिण्ड की त्रिज्या}{पृथ्वी की त्रिज्या}$ = $\frac{पिण्ड की कोणात्मक अर्द्धव्यास की ज्या}{पिण्ड की लंबन की ज्या}$
४२४ सूर्य-सिद्धान्त सूर्य का अर्द्धव्यास १६' और लम्बन ८".८ है, इसलिए सूर्य की त्रिज्या १६' ९६० ──────── = ──── = ─── = १०६ पृथ्वी की त्रिज्या ८".८ ८.८ ∴ सूर्य की त्रिज्या = १०६ × पृथ्वी की त्रिज्या = १०६ × ३९६३.३ मील = ४३१६६६.७ मील = ४३२००० मील चन्द्रमा का अर्द्धव्यास १५' ३६".६ और लम्बन ५७' १".८ है ज्या १५' ३६".६ इसलिए चंद्रमा की त्रिज्या = पृथ्वी की त्रिज्या × ────────── ज्या ५७' १".८ १५' ३६".६ = पृथ्वी की त्रिज्या × ──────── ५७' १".८ = ३९६३.३ × .२७५ = १०८६.६ = १०९० मील चित्र ८४ में ∠ प भ च = चंद्रमा का कोणात्मक अर्द्धव्यास ∠ भ च द = चंद्रमा का लम्बन प च = चंद्रमा की त्रिज्या भ द = पृथ्वी की त्रिज्या वार्षिक लम्बन वार्षिक लम्बन—यह बतलाया गया है कि तारे हमसे इतनी दूर हैं कि भूतल के किसी दो स्थानों से देखने पर इनके लम्बन का पता नहीं लग सकता। परन्तु यदि पूरे वर्ष भर तक किसी तारे का वेध किया जाय तो पृथ्वी की वार्षिक- गति के कारण एक ही द्रष्टा से स्थानों में बहुत अंतर पड़ता जाता है जिससे देख पड़ता है कि तारे में भी कुछ लम्बन होता है। यह अभी सिद्ध हुआ है कि पृथ्वी से सूर्य की दूरी ६,३०,००००० मील के लगभग है। यह विदित ही है कि पृथ्वी एक वर्ष में सूर्य की परिक्रमा करती है। इस लिए ६ मास में पृथ्वी आधा परिक्रमा करती है। अब यदि किसी तारे का वेध किसी दिन किया जाय और फिर ६ महीने के बाद उसी तारे का वेध किया जाय तो द्रष्टा के स्थानों का अन्तर १८,६०,००,००० मील हो जाता है जिससे तारे की दिशा में कुछ परिवर्तन देख पड़ता है। यह परिवर्तन लम्बन के कारण होता है। जब द्रष्टा के
त्रिप्रश्नाधिकार ४२५ चित्र ८४ दो स्थानों का अंतर अठारह करोड़ साठ लाख मील दूर होता है तब भी सब तारों का लम्बन नहीं देख पड़ता है क्योंकि बहुत से तारे हमसे इतनी दूर हैं कि पृथ्वी की कक्षा का व्यास भी उनके सामने शून्य के समान है। इसलिए बहुत सूक्ष्म यंत्रों से भी थोड़े ही तारों का लंबन नापा जा सका है। वार्षिक लम्बन—किसी तारे का वार्षिक लंबन वह कोण है जो पृथ्वी की
४२६ सूर्य-सिद्धान्त चित्र ८५ पृथ्वी का कक्षा कक्षा के अर्द्धव्यास के सम्मुख तारे पर बनता है । चित्र ८५ में यदि भ पृथ्वी, स सूर्य और त किसी तारे के स्थान हों तो त का वार्षिक लम्बन कोण स त भ अथवा लु के समान है । जिस प्रकार चन्द्रमा या ग्रह का लम्बन जानने के लिए सूत्र स्थापित किये गये हैं उसी तरह तारे का लम्बन जानने का सूत्र भी स्थापित हो सकता है ।