सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
त्रिप्रश्नाधिकारः ४२७ ज्या लु० स भ ――――― = ―― ज्या स भ त स त स भ ∵ ज्या लु = लु = ―― ✕ ज्या स भ त स त अर्थात् किसी तारे का वार्षिक लम्बन उस कोण की ज्या के अनुपात में होता है जो उस तारे और सूर्य के बीच भूकेन्द्र पर बनता है । यह स्पष्ट है कि जब कोण स भ त ९०° के समान होता है अर्थात् जब तारे का भोगांश सूर्य के भोगांश से ९०° आगे या पीछे होता है तब लम्बन का परिमाण महत्तम होता है । इसलिये किसी तारे का महत्तम लंबन वर्ष में दो बार देख पड़ता है । इसका सूत्र यह है :— स भ तारे का महत्तम लंबन = ―― स त यदि महत्तम लंबन को लू मान लिया जाय तो तारे का किसी समय का लम्बन लु = लू ✕ ज्या स भ त साधारणतः तारे के महत्तम लम्बन को ही तारे का लम्बन कहते हैं । ऊपर के सूत्रों में लु और लू रेडियन के दशमलव भिन्न में है। यदि इनको विकलाओं में लिखा जाय तो लू विकला स भ ―――― = ―― २०६२६५ स त इससे सिद्ध होता है कि यदि लू मालूम हो तो स त अर्थात् तारे की दूरी मालूम हो सकती है क्योंकि स भ तो मालूम ही है । उदाहरण—यदि किसी तारे का वार्षिक लंबन ०″.८ हो तो सूर्य से उस तारे की दूरी बतलाओ ? ०.८ स भ ―――― = ―― २०६२६५ स त २०६२६५ ∴ स त = ―――― ✕ स भ = २,५७,८३१ स भ .८ अर्थात् सूर्य पृथ्वी से जितनी दूर है उसकी २,५७,८३१ गुनी दूर सूर्य से वह तारा है । मीलों में यह दूरी = २,५७,८३१ ✕ ९,३०,००,००० = २,३९,७८,२८,३०,००,००० इससे यह सिद्ध है कि यदि तारों के दूरी मीलों में लिखी जाय तो बहुत बड़ी संख्या का व्यवहार करना आवश्यक होगा जिसमें सुभीता नहीं है । इसलिए
४. ग्रहयुत्यधिकार व भग्रहयुत्यधिकार (ग्रह समागम)
४२८ सूर्य-सिद्धान्त
ज्योतिषियों ने इतनी बड़ी दूरी को प्रकट करने के लिए एक और इकाई स्थिर की है जिसे प्रकाश वर्ष कहते हैं। एक वर्ष में प्रकाश जितनी दूर चलता है उसे प्रकाश वर्ष कहते हैं। यह कई प्रयोगों से सिद्ध हो गया है कि सूर्य का प्रकाश पृथ्वी तक ८ मिनट १८ सेकेन्ड में पहुँचता है अर्थात् प्रकाश की गति प्रति सेकेन्ड १,८६,०० मील है। इसलिए एक सायन वर्ष में प्रकाश ३६५.२४२२ × २४ × ६० × ६० × १८६००० मील अथवा ५८,६६,५८,८२,५०,८८० मील चलता है। इसलिए इसी दूरी को एक प्रकाश वर्ष कहते हैं।
यह भी याद रखना चाहिए कि जहां इतनी बड़ी दूरियों का हिसाब लगाया जाता है वहां लाखों मील की दूरी की भूल रह जाना साधारण बात है क्योंकि यदि
| नाम अंग्रेजी में | नाम हिन्दी में | वार्षिक लम्बन | पृथ्वी से सूर्य की दूरी का कितने गुनी दूरी | प्रकाश वर्ष में दूरी |
|---|---|---|---|---|
| α Centauri | ... | ०".७५० ± ०".०१ | २,८०,००० | ४.४ |
| 61 Cygni | ... | ०.३७ ± ०.०२ | ५,६०,००० | ८.८ |
| Sirius | लुब्धक | ०.३७ ± ०.०१ | ५,६०,००० | ८.८ |
| Procyon | प्रश्वा | ०.३१ | ६,६०,००० | ११ |
| Altair | श्रवण | ०.२८ ± ०.०२ | ७,४०,००० | १२ |
| Aldebaran | रोहिणी | ०.१७ ± ०.०२ | १४,००,००० | २२ |
| Capella | ब्रह्म हृदय | ०.१२ ± ०.०२ | १७,००,००० | २७ |
| Vega | अभिजित् | ०.१२ ± ०.०२ | १७,००,००० | २७ |
| Polaris | ध्रुव तारा | ०.०७ ± ०.०२ | ३०,००,००० | ४७ |
| Arcturus | स्वाती | ०.०२४ | ८७,००,००० | १४० |
| α Gruis | ... | ०.०१५ | १,४०,००,००० | २२० |
त्रिप्रश्नाधिकार ४२६ किसी तारे के लंबन के वेध करने में .००१ विकला की भूल रह जाय, जो असम्भव नहीं है, तो उसकी दूरी में बहुत अन्तर पड़ सकता है । पीछे एक सारिणी दी गई है जिससे जान पड़ेगा कि कुछ तारों के लम्बन और उनकी दूरियां क्या हैं । यह सारिणी R. S. Ball की Spherical Astronomy पृष्ठ ३२८ से ली गई है । प्रकाश वर्ष की दूरी की कल्पना इस प्रकार की जा सकती है । जब यह कहा जाता है कि आकाश मण्डल का सबसे चमकीला तारा लुब्धक हमसे ८.८ प्रकाश वर्ष दूर है तब इसका अर्थ यह भी होता है कि लुब्धक की जो किरण इस समय हमारी आँखों में पहुँच कर लुब्धक का परिचय करा रही है वह वहाँ से ८.८ वर्ष पहले चली थी अर्थात् यह आज की किरण लुब्धक की ८.८ वर्ष पहले की दशा बतला रही है । अब लुब्धक की क्या दशा है इसका ज्ञान आज से ८.८ वर्ष बाद हो सकता है, इसके पहले नहीं जैसे पत्र के द्वारा किसी दूर के मित्र का जो कुछ समाचार मिलता है वह उस समय का समाचार होता है जिस समय पत्र लिखा जाता है न कि इसके पहुँचने के समय का । आजकल दूरदर्शक यंत्रों से ऐसे तारों का भी परिचय मिला है जो यहाँ से लाखों प्रकाश वर्ष दूर हैं ।
चित्र ८६
४३० सूर्य-सिद्धान्त वार्षिक लम्बन के कारण तारा वर्ष भर में एक नन्हे से दीर्घवृत्त पर चलता हुआ जान पड़ता है । चित्र ८६ में स सूर्य है, प, पि, पु, पे चार विन्दुओं पर पृथ्वी अपनी वार्षिक परिक्रमा करती हुई दिखलाई गई है। न तारे का स्थान है। यदि प और स से दो रेखाएँ त तक खींच कर और आगे, त से भी बहुत दूर स्थित तारों के पास पहुँचायी जाय तो स सूर्य से देखने पर तारा ता स्थान पर पृथ्वी से देखने पर पा स्थान पर देख पड़ेगा । इसी तरह जब पृथ्वी पि पु और पे बिंदुओं पर रहेगी तब तारा क्रमा- नुसार पी, पू और पै बिन्दुओं पर देख पड़ेगा । इसका परिणाम यह होगा कि तारा पा पी पू पै बिंदुओं से बनी हुई कक्षा पर घूमता हुआ देख पड़ेगा । यह छोटी कक्षा क्रान्तिवृत्त प पि पू पे के समानान्तर तल पर होगी और इसका आकार दीर्घवृत्त की तरह का देख पड़ेगा । जो तारा क्रान्तिवृत्तीय ध्रुवों अर्थात् कदम्बों पर होता है उसकी कक्षा केवल वृत्त के आकार की देख पड़ती है क्योंकि ऐसी दशा में इस छोटी कक्षा का तल हमारे दृष्टिसूत्र से समकोण पर रहेगा । परन्तु जो तारा क्रान्तिवृत्त पर होता है वह मध्य स्थान से छः महीने तक पूरब और छः महीने तक पच्छिम देख पड़ेगा जैसे किसी वृत्त पर घूमता हुआ पिंड उस समय केवल आगे बढ़ता हुआ या पीछे हटता हुआ जान पड़ता है जब वृत्त का तल देखनेवाले के दृष्टिसूत्र की ही सीध में हो । तारे के वार्षिक लम्बन जानने की विधि भी प्रायः उसी तरह है जैसा चित्र ८१ में बतलाया गया है । परन्तु इस काम के लिए बहुत सूक्ष्म वेध रखना पड़ता है जिसकी चर्चा करने की आवश्यकता यहाँ नहीं जान पड़ती । भूचलन संस्कार (Aberration) यह ऊपर बतलाया गया है कि प्रकाश एक सेकंड में १,८६,००० मील चलता है । पृथ्वी भी वर्ष भर में सूर्य की परिक्रमा करती है जिससे यह अपनी कक्षा में प्रति सेकंड १८½ मील चलती है क्योंकि पृथ्वी की कक्षा का परिमाण २ π × ६,३०,००, ००० मील है और एक वर्ष में ३६५.२४२२ × २४ × ६० × ६० सेकंड होते हैं, इसलिए पृथ्वी की कक्षा को एक वर्ष के सेकंडों से भाग देने पर १८½ मील के लगभग आता है । इन दोनों गतियों के कारण दूरदर्शक यंत्र में आकाशीय पिंडों का जो स्थान देख पड़ता है वह यथार्थ स्थान से कुछ आगे या पीछे होता है । किसी पिंड के यथार्थ और स्पष्ट स्थानों में इन दोनों गतियों के कारण जो अंतर देख पड़ता है उसे भूचलन संस्कार (Aberration) कहते हैं । इसकी मीमांसा करने के पहले संक्षेप में यह बतलाना आवश्यक है कि प्रकाश की गति कैसे नापी गयी और दो गतियों के संयोग से पदार्थों के यथार्थ और स्पष्ट स्थानों में कैसा अंतर देख पड़ता है ।
त्रिप्रश्नाधिकार ४३१ प्रकाश की गति—प्रकाश की गति नापने की कई रीतियां हैं। इनमें से पहली रीति की चर्चा यहां की जायगी :— प्रकाश की चाल का पता रोमर नामक ज्योतिषी ने संवत् १७३२ विक्रमीय में लगाया। इसके पहले किसी की कल्पना में भी यह बात नहीं आयी थी कि एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने में प्रकाश को भी कुछ समय की आवश्यकता पड़ती है। रोमर ने कैसे इस बात का पता लगाया यह भी आश्चर्यजनक है। आप लोगों ने चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण कई बार देखा होगा। चंद्रग्रहण के समय पृथ्वी सूर्य और चन्द्रमा के बीच आ जाती है इसलिए चन्द्रमा पृथ्वी की छाया में पड़ जाता है। जब पूरा चन्द्रमा छाया में आ जाता है तब पूर्ण ग्रहण लगता है और जब कुछ ही भाग छाया में पड़ता है तब खंड ग्रहण लगता है। जैसे चन्द्रमा पृथ्वी के चारों ओर घूमता है और कभी आधा, कभी चोथाई, कभी तीन चौथाई देख पड़ता है वैसे ही वृहस्पति के चारों ओर चार पांच चंद्रमा चक्कर लगाते हैं। वृहस्पति के चंद्रमा इतने छोटे हैं कि बिना दूरबीन के देखे नहीं जा सकते। ये चंद्रमा घूमते-घूमते बहुत जल्दी-जल्दी वृहस्पति की छाया में चले जाते हैं इसलिए कुछ देर तक दिखाई नहीं पड़ते। इसलिए यह कहा जा सकता है कि जब बृहस्पति के चन्द्रमा उसकी छाया में पड़ जाते हैं तब उनका ग्रहण लगता है। इन ग्रहणों के समय भी गणना करके कई वर्ष पहले उसी प्रकार जान लिये जाते हैं जिस प्रकार सूर्य ग्रहण और चन्द्र ग्रहण के समय। जहाज वाले तो इन ग्रहणों को देख कर घड़ी का काम लेते हैं। बस इसी के सम्बन्ध में सोचते-सोचते रोमर को प्रकाश की गति का पता मिला। कल्पना कीजिए कि चित्र ८७ में स सूर्य है, प पा पि पृथ्वी के तीन स्थान अपनी कक्षा पर हैं और ग गा गि गुरु अथवा वृहस्पति के तीन स्थान वृहस्पति की कक्षा पर हैं। पृथ्वी और गुरु दोनों एक ही दिशा में सूर्य की परिक्रमा क्रमानुसार १ और १२ वर्ष में करते हैं। जिस समय सूर्य पृथ्वी और गुरु क्रम से स प और ग स्थानों में होते हैं उस समय पृथ्वी गुरु के बहुत पास होती है और जिस समय पृथ्वी पा पर, गुरु गा पर और सूर्य मध्य में होते हैं उस समय पृथ्वी गुरु से अत्यन्त दूर हो जाती है। प से पा पर पहुँचने में पृथ्वी को ६।। महीने लग जाते हैं। १३ महीने में पृथ्वी प से पा पर होती हुई फिर पि पर पहुँच कर सूर्य और गुरु के बीच आ जाती है। जैसे-जैसे पृथ्वी प से चल कर पा के पास होती जाती है तैसे-तैसे वृहस्पति के चन्द्रमा के ग्रहण का प्रत्यक्ष समय गणित से जाने हुए समय से पीछे पड़ता जाता है और जब पृथ्वी पा पर पहुँच जाती है और बृहस्पति गा पर अर्थात् पृथ्वी बृहस्पति से बहुत दूर हो जाती है तब गणित-सिद्ध काल से प्रत्यक्ष काल सबसे
४३२ सूर्य सिद्धान्त चित्र ८७ अधिक पिछड़ जाता है । रोमर ने ग्रहण काल जानने की रीति अनेक वेधों से निश्चित की थी, जब पृथ्वी गुरु से दूर और निकट प्रत्येक दशा में रही थी । इसलिए इस रीति से ग्रहण काल का जो समय आता था वह मध्यम मान के अनुसार ठीक होता था । इस काल से प्रत्यक्ष ग्रहण जितने परिमाण में पिछड़ता था उसका आरम्भ वह उस समय से करता था जिस समय पृथ्वी गुरु से अत्यन्त निकट रहती थी अर्थात् जब वह प बिन्दु की दशा में रहती थी । इसी प्रकार जब पृथ्वी पा से आगे बढ़ कर वृहस्पति के पास पहुँचती जाती थी तब गणित-सिद्ध काल से प्रत्यक्ष-ग्रहण काल का पिछड़ना कम पड़ता जाता था । जब पृथ्वी पि पर और वृहस्पति गि पर हो जाते थे तब प्रत्यक्ष और गणित-सिद्ध कालों का अन्तर शून्य हो जाता था अर्थात् प्रत्यक्ष
त्रिप्रश्नाधिकार [L1_right] ४३३
ग्रहण का समय भी वही होता था जो गणित से ठीक आता था । चित्र ८७ से जान पड़ेगा कि गणित से निकाले हुए ग्रहण के समय और प्रत्यक्ष ग्रहण के समय में जो सबसे अधिक अन्तर पड़ता है वह उन दोनों समयों के अन्तर के समान होगा जितने में गुरु के चंद्रमा का प्रकाश ग से प तक और ग₁ से प₁ तक जाता है अर्थात् यह अंतर उस समय के समान होगा जितने में प्रकाश पृथ्वी की कक्षा के व्यास के समान दूरी तै करता है । अनुभव से यह जाना गया है कि प₁ और प से देखने पर ग्रहण के समय में जो अन्तर पड़ता है वह सबसे अधिक होता है और १६ मिनट ३६ सेकेंड के समान होता है । पृथ्वी की कक्षा का अर्द्धव्यास ९,३०,००,००० मील के लगभग है इसलिए इसका व्यास १८,६०,००,००० मील हुआ । इसलिए जब प्रकाश इतनी दूर चलने में १६ मिनट ३६ सेकेंड का समय लेता है तब एक सेकेंड में इसकी गति १८,६०, ००,००÷९९६ = १,८६,००० मील के लगभग । इसके बाद कई अन्य वैज्ञानिकों ने प्रकाश की गति नापने के प्रयोग किये । इन सब प्रयोगों से जो फल निकले वे प्रायः एक से हैं । इन प्रयोगों से यह सिद्ध हो गया कि प्रकाश की गति १,८६,३५० मील है । जब यह सिद्ध हो गया कि प्रकाश गतिमान है तब यह समझ लेना कठिन नहीं है कि यदि गतिमान प्रकाश किसी दूसरी गतिवाली वस्तु में प्रवेश करे तो इसकी दिशा में परिवर्तन हो जायगा । उदाहरण के लिए मान लो कि एक रेलगाड़ी ६० मील प्रति घंटे के हिसाब से दौड़ी चली जा रही है । यदि एक बन्दूक रेलगाड़ी को लक्ष्य करके इस तरह चलायी जाय कि गोली गाड़ी की दिशा से समकोण बनाती हुई एक ओर घुसे और दूसरी ओर आर-पार निकल जाय तो क्या गोली गाड़ी के डब्बे के भीतर भी उसकी दिशा से समकोण बनाती जायगी ? जितनी देर में गोली रेलगाड़ी के समान दीवाल से पीछे की दीवाल तक पहुँचेगी उतनी देर में गाड़ी कुछ आगे बढ़ जायगी और गोली पीछे की दीवाल में घुसने के छेद के ठीक सामने न लगकर कुछ पीछे पड़ जायगी । कल्पना करो कि र ल गाड़ी का एक डब्बा है जो र की ओर ६० मील प्रति घंटे या ८८ फुट प्रति सेकेंड की गति से आगे बढ़ रहा है और ब स्थान से बन्दूक ऐसी दागी गई कि गोली ब ग दिशा में चलती हुई डब्बे में ग स्थान से घुसती है । जिस समय गोली ग पर आयी डब्बा र ल स्थिति में था । यदि गाड़ी स्थिर होती तो गोली घ स्थान पर छेद करती हुई बाहर निकल जाती । परन्तु बात ऐसी नहीं होने पाती क्योंकि जिस समम गोली ग छेद से घुसकर घ की ओर जाती रहती है उस समय गाड़ी भी आगे बढ़ी जा रही है । इसलिए जिस समय २८
४३४ सूर्य-सिद्धान्त गोली पीछे की दीवाल तक पहुंचे उस समय डब्बा रा ला स्थिति में हो गया और घ की जगह गा विन्दु सामने आ गया । इसलिए गोली गा पर छेद करती हुई देख पड़ेगी। डब्बे में बैठे हुए मुसाफिर कहेंगे कि गोली ग गा दिशा से आयी, इसलिए बन्दूक चलाने वाला वा स्थान की सीध में रहा होगा । चित्र ८८ जिस समय पानी बरस रहा हो और बूँदें खड़ी गिर रही हों उस समय यदि मनुष्य छतरी ठीक ऊपर थामे खड़ा हो तो भीगने से बच जाता है परन्तु यदि वह छतरी ठीक उसी तरह थामे आगे बढ़े तो वह भीगने से बच नहीं सकता क्योंकि उसके चलने के कारण खड़ी गिरती हुई बूंदें भी उसके मुँह पर तिरछी आती हुई पड़ती हैं। मनुष्य की चाल जितनी ही अधिक होगी उतनी ही तिरछी बूँदें उस पर पड़ेंगी । यह भी इसी बात का उदाहरण है । इसी प्रकार जब प्रकाश दूरदर्शक यन्त्र के भीतर प्रवेश करता है तब उसकी दिशा में परिवर्तन हो जाता है । कल्पना करो कि किसी तारे का यथार्थ स्थान त है और द्रष्टा की आँख इ पर है । यदि द्रष्टा अचल हो और वर्तन (refraction) भी
त्रिप्रश्नाधिकार ४३५ हो तो तारा द त दिशा में सदैव देख पड़ेगा, चाहे तारे से प्रकाश द्रष्टा की आंख में उसी क्षण पहुँच जाय जिस क्षण तारे से चलता है या उसके आने में कुछ देर लगे । परन्तु यदि यह मान लिया जाय कि द्रष्टा द दि दिशा में चल रहा है तो तारा उसको द त की दिशा में तभी देख पड़ेगा जब प्रकाश उसी क्षण द्रष्टा की आंख में पहुँचे जिस क्षण तारे से चलता है परन्तु यदि प्रकाश के त से द तक आने में कुछ समय लगता है तो तार द त दिशा में कदापि नहीं देख पड़ेगा । मान लो कि द म उस नली का अक्ष (axis) है जिसके मा दा और मि दि समानान्तर भुज हैं । जिस समय प्रकाश नली में म से अक्ष म द की ओर उतर रहा है यदि उसी समय नली अपने ही समानान्तर द दि की ओर जा रही है और जितनी देर में प्रकाश म द दूरी चलता है उतनी देर में नली द दा दूरी के समान आगे बढ़ती है तो चित्र ८ की तरह यह प्रकट है कि प्रकाश द पर न पहुँच कर दा पर चित्र ८६ पहुँचेगा । इससे यह जान पड़ेगा कि प्रकाश म दा दिशा से आ रहा है और तारा दा म की सीध में कहीं ता पर है । इस कारण यदि नली चलायमान हो और तारा त पर हो तो यह नली की अक्ष की दिशा में नहीं देख पड़ेगा वरन् दा म ता दिशा में देख पड़ेगा । अर्थात् तारे का स्पष्ट स्थान ता होगा जो यथार्थ स्थान से उसी दिशा की
४३६ सूर्य-सिद्धान्त ओर बढ़ा हुआ है जिस दशा में नली जा रही है। इस प्रकार इन दोनों गतियों के कारण तारे के यथार्थ और स्पष्ट स्थानों में त म ता कोण का अन्तर पड़ता है जिसे भूचलन संस्कार (Aberration) कहते हैं। यह जानना सहज है कि त म ता अथवा द म दा कोण का परिमाण क्या है क्योंकि म द दा त्रिभुज में द दा ज्या द म दा ------ = ------------- म दा ज्या म द दा परन्तु द दा पृथ्वी उतने समय की चाल है जितने समय में प्रकाश म दा के समान चलता है इसलिए द दा और म दा की दूरियों में वही अनुपात है जो पृथ्वी और प्रकाश की गतियों में है। परन्तु पृथ्वी प्रति सेकेन्ड १८ १/२ मील चलती है और प्रकाश १,८६,००० मील चलता है इसलिए ज्या द म दा द दा पृथ्वी की गति १८.५ ------------- = ---- = ------------- = -------- के लगभग ज्या म द दा म दा प्रकाश की गति १८६००० १ = ------- के लगभग १०००० यदि भूचलन संस्कार को भू माना जाय तो ज्या द म दा = ज्या भू = भू जब कि भू का मान रेडियन में हो । ऐसी दशा में १ भू = ------- × ज्या म द दा १०००० यदि भू को विकलाओं में लिखा जाय तो भू" १ १ -------- = ------------- ज्या म द दा = ------------ ज्या त द ता २०६२६५ १०००० १०००० अथवा भू" = २०".६३ ज्या त द सा २०".६३ को भूचलन संस्कार का स्थिराङ्क (coefficient of aberration) कहते हैं। इसका अधिक शुद्ध मान २०".४७ है। यदि त द सा कोण ६०° के समान हो तो यह स्पष्ट है कि भूचलन संस्कार का महत्तम मान २०".४७ होगा। यह स्पष्ट है कि भूचलन संस्कार के स्थिराङ्क में पृथ्वी की गति एक गुणक के रूप में वर्तमान है। परंतु पृथ्वी की गति सदा समान नहीं होती जिस समय पृथ्वी अपने नीच पर रहती है उस समय इसकी गति अत्यन्त तीव्र और जिस समय यह अपने उच्च पर रहती है उस समय इसकी गति अत्यन्त मंद रहती है। इसलिए पहली दशा में भूचलन संस्कार का स्थिराङ्क २०".८० और दूसरी दशा में २०".१३ होता है।
त्रिप्रश्नाधिकार ४३७ भूचलन संस्कार के कारण सूर्य, तारों और दूर के ग्रहों के भोगांश, शर, विषुवांश और क्रान्ति पर क्या प्रभाव पड़ता है इसकी व्याख्या विस्तार के भय से छोड़ दी जाती है। यहाँ इसकी चर्चा साधारण रीति से कर दी जाती है:— जिस प्रकार वार्षिक लंबन के कारण तारा अपने यथार्थ स्थान के चारों ओर एक छोटी सी कक्षा में घूमता हुआ देख पड़ता है उसी प्रकार भूचलन संस्कार के कारण भी वह अपने यथार्थ स्थान के चारों ओर एक छोटी सी कक्षा में घूमता हुआ देख पड़त। है। यह कक्षा भी क्रान्तिवृत्त के तल के समानान्तर होती है। इसकी कक्षा का आकार भी उसी प्रकार बदलता है जिस प्रकार लंबन के कारण तारे की कक्षा का आकार बदलता है। जिस समय इसका आकार दीर्घवृत्त की तरह होता है उस समय इसका दीर्घ अक्ष २०''.४७ के समान होता है और लघु अक्ष २०''.४७ ✕ज्या श के समान होती हैं जब कि श तारे का शर या विक्षेप हो । यह स्पष्ट ही है कि तारे का भूचलन संस्कार उसी दिशा में होता है जिस दिशा में पृथ्वी की गति होती है परन्तु जिस दिशा में पृथ्वी की गति होती है उससे ६०° आगे सूर्य रहता है क्योंकि पृथ्वी की गति भूकक्षा की स्पर्शरेखा की दिशा में होती है जो भूकक्षा के अर्द्धव्यास से ६०° का कोण बनाता और सूर्य भूकक्षा के केन्द्र पर रहता है। इसलिए यह सिद्ध हो गया कि तारे का भूचलन संस्कार क्रान्ति- वृत्त के उस बिन्दु की ओर होता है जो सूर्य से ६०° पीछे रहता है अर्थात् जिसका भोगांश सूर्य के भोगांश से ६०° कम होता है । जो तारा क्रान्तिवृत्तीय ध्रुव अर्थात् कदम्ब पर होता है वह वर्ष भर में अपने यथार्थ स्थान के चारों ओर एक वृत्त पर घूमता हुआ देख पड़ता है जिसके अर्द्धव्यास का कोणात्मक मान २०'.४६ होता है । जो तारा क्रान्तिवृत्त पर होता है वह क्रान्तिवृत्त पर ही अपने यथार्थ स्थान से २०''.४६ आगे और पीछे लोलक की तरह आन्दोलन (Oscillation) करता हुआ देख पड़ता है। इसलिए वर्ष भर में कुल अंतर ४०''.६ के समान पड़ता है। जो तारा किसी और स्थान में रहता है जिससे उसका शर मान लो श के समान होता है, वह वर्ष भर में एक दीर्घवृत्त पर घूमता हुआ देख पड़ता है जिसका केन्द्र तारे का यथार्थ स्थान होता है, जिसके दीर्घ अक्ष का आधा २०''.४६ और लघु अक्ष का आधा २०''.४६ ज्याश तथा जिसका तल क्रान्तिवृत्त के तल के समानान्तर होता है ! इस पर बहुत से पाठक पूछ बैठेंगे कि वार्षिक लंबन और भूचलन संस्कार में फिर अंतर क्या है। इसका उत्तर यह है कि वार्षिक लम्ब के कारण तारा जिस
४३८ सूर्य-सिद्धान्त कक्षा में घूमता हुआ देख पड़ता है उसका विस्तार तारे की दूरी पर अवलंबित है अर्थात् तारा जितना ही दूर होगा उसका लंबन उतना ही कम होगा जिसके कारण कक्षा का आकार भी छोटा होगा । सबसे निकट वाले तारे की जो कक्षा लंबन के कारण देख पड़ती है उसके दीर्घ अक्ष का आधा ०"•७६ से अधिक नहीं है । परन्तु भूचलन संस्कार के कारण तारे की जो कक्षा देख पड़ती है उसके दीर्घ अक्ष का आधा सदैव २०"•५० होता है और यह सब तारों के लिए समान होता है । दूसरी बात यह है कि यदि तारा उसी दिशा में हो जिस दिशा में सूर्य है अथवा सूर्य से ठीक १८०° पर हो तो लंबन का परिमाण शून्य होता है परन्तु भूचलन संस्कार का परिमाण महत्तम अर्थात् २०"•४७ होता है । तीसरे यह कि लंबन के कारण तारा सूर्य की ही ओर कुछ हटा हुआ देख पड़ता है परन्तु भूचलन संस्कार के कारण तारा उस बिन्दु की ओर हटा हुआ देख पड़ता है जो सूर्य से ६०° पीछे होता है । ग्रहों पर भूचलन संस्कार का प्रभाव दो तरह से पड़ता है, एक तो पृथ्वी की गति के कारण; दूसरा ग्रह की गति के कारण । यदि ग्रह की गति पृथ्वी की गति के समान हुई और उसी दिशा में हुई तो भूचलन संस्कार का अभाव होगा । अन्य दशाओं में भूचलन संस्कार क्या होगा इसकी गणना अगल-अलग सहज ही की जा सकती है । चन्द्रमा की गति प्रकाश की गति की तुलना में बहुत कम होती है इसलिए इसके कारण भूचलन संस्कार शून्य के समान समझा जा सकता है । पृथ्वी की गति के कारण भी चन्द्रमा में भूचलन संस्कार नहीं के समान होता है क्योंकि पृथ्वी के साथ-साथ चन्द्रमा भी वर्ष भर में सूर्य की परिक्रमा कर आता है । इसलिए चन्द्रमा में भूचलन संस्कार का प्रभाव शून्य के समान होता है । दैनिक भूचलन संस्कार—पृथ्वी की दैनिक गति के कारण विषुवत् रेखा का कोई बिन्दु दिन भर में २५,००० मील के लगभग चलता है क्योंकि विषुवत् रेखा पर पृथ्वी की परिधि २५,००० मील के लगभग लम्बी होती है । अन्य स्थानों की परिधि इससे छोटी होती है । इसलिए जब दिन भर में २५,००० मील की गति होती है तो एक सेकंड में ३/१० मील की गति सिद्ध हुई । परन्तु पृथ्वी की वार्षिक गति १८ १/२ मील प्रति सेकंड होती है । इसलिए पृथ्वी की दैनिक गति उसकी वार्षिक गति की ३/१० ÷ ३७/२ = ३/१० × २/३७ = ६/३७० = १/६२ । इसलिए वार्षिक गति के कारण जितना भूचलन संस्कार होता है उसका बासठवां भाग दैनिक गति के कारण विषुवत् रेखा पर होगा । अन्य स्थान पर इससे भी कम होगा इसलिए यह भी नहीं के समान समझ लेने में अनुचित नहीं है । भूचलन संस्कार आविष्कार—इसके आविष्कार की कथा बहुत ही रोचक है । परन्तु विस्तार के साथ लिखने की आवश्यकता नहीं है । ब्रैडली नामक
त्रिप्रश्नाधिकार ४३६ ज्योतिषी जिस समय अजगर नामक तारा पुंज के तीसरे तारे (γ Draconis) के वार्षिक लम्बन की जांच कर रहा था उस समय उसको जान पड़ा कि इस तारे का शर स्थिर नहीं रहता वरन् वर्ष भर में क्रमानुसार कुछ बदलता रहता है जिसका कारण उस समय तक की जितनी जानी हुई बातें थीं उनसे समझ में नहीं आता था । अंत में वह इस सिद्धांत पर पहुँचा कि पृथिवी की वार्षिक गति और प्रकाश की गति के कारण यह वार्षिक परिवर्तन सभी तारों में होता रहता है--ब्रैडली को इस घटना का अनुभव १७८६ विक्रमीय में हुआ था । इस प्रकार काल-समीकरण, वर्तन, लंबन, भूचलन-संस्कार इत्यादि नवीन आविष्कारों की मीमांसा सहित त्रिप्रश्नाधिकार का विज्ञान भाष्य समाप्त हुआ । इति
सूर्य-सिद्धान्त का विज्ञान भाष्य द्वितीय खण्ड [ चन्द्रग्रहणाधिकार, सूर्यग्रहणाधिकार, परिलेखाधिकार, ग्रहयुत्यधिकार, नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार, उदयास्ताधिकार, शृङ्गोन्नत्यधिकार, पाताधिकार, भूगोलाध्याय, ज्योतिषोपनिषदध्याय, मानाध्याय ] भाष्यकार स्व० महावीरप्रसाद श्रीवास्तव डा० रत्नकुमारी स्वाध्याय संस्थान इलाहाबाद
प्रकाशक डा० रत्नकुमारी स्वाध्याय संस्थान विज्ञान परिषद् भवन महर्षि दयानन्द मार्ग इलाहाबाद-२११००२ फोन नं० ५४४१३ प्रथम संस्करण, दिसम्बर १६४० [ विज्ञान परिषद् प्रयाग से ] द्वितीय संस्करण, मई १६८३ (स्वाध्याय संस्थान से) मूल्य रु० ४०.०० मुद्रक सरयू प्रसाद पाण्डेय नागरी प्रेस, अलोपीबाग, इलाहाबाद प्रस्तावना डॉ० रत्नकुमारी स्वाध्याय संस्थान की ओर से प्राचीन वाङ्मय के कई ग्रन्थ प्रकाशित किये जा चुके हैं—स्वामी सत्यप्रकाश और डॉ० उषा ज्योतिष्मती के ग्रन्थ, जैसे बखशाली-मेनुस्क्रिप्ट, शुल्ब-सूत्र ( संस्कृत और अंग्रेजी में ) । इसी परम्परा में हम स्वर्गीय श्री महाबीर प्रसाद श्रीवास्तव के सूर्य-सिद्धान्त का विज्ञान भाष्य प्रकाशित कर रहे हैं। यह गौरव हमें विज्ञान-परिषद्, प्रयाग की उदारता से प्राप्त हुआ है, जिसके लिए हम परिषद् के अधिकारियों के उपकृत हैं । इस ग्रन्थ के प्रकाशन का व्ययसाध्य कार्य सम्पादित करना हमारे लिए कठिन होता यदि हमें करनाल के आदरणीय रायसाहब चौधरी प्रताप सिंह जी और उनके द्वारा स्थापित न्यास से आर्थिक सहायता प्राप्त नहीं हुई होती । चौधरी साहब के हम अत्यन्त आभारी हैं। हम प्रथम खण्ड मार्च १६८२ में प्रकाशित कर चुके हैं, जिसमें मध्यमाधिकार, स्पष्टाधिकार और त्रिप्रश्नाधिकार हैं । इस दूसरे खण्ड में ११ अध्याय हैं । इस प्रकार कुल १४ अध्यायों में पूरा सूर्य-सिद्धान्त समाप्त हुआ । एस० रंगनायकी, १० मई, १६८३. एम० एस-सी०, डी० फिल, डी० एस-सी० निदेशिका
विषय-सूची अध्याय पृष्ठ चतुर्थ अध्याय— चन्द्रग्रहणाधिकार ४४१ पंचम अध्याय— सूर्यग्रहणाधिकार ५०६ षष्ठम अध्याय - परिलेखाधिकार ५४५ सप्तम अध्याय—ग्रहयुत्यधिकार ५७६ अष्टम अध्याय—नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार ६०४ नवम अध्याय—उदयास्ताधिकार ६५२ दशम अध्याय—शृंगोन्नत्यधिकार ६८१ एकादश अध्याय—पाताधिकार ७०१ द्वादश अध्याय--भूगोलाध्याय ७१८ त्रयोदश अध्याय—ज्योतिषोपनिषदध्याय ७७३ चतुर्दश अध्याय--मानाध्याय ७६४ परिशिष्ट ८०६ ग्रन्थ सूची ८१०
चतुर्थ अध्याय चन्द्रग्रहणाधिकार (संक्षिप्त वर्णन) [ १ श्लोक-सूर्य और चन्द्रमा के मध्यव्यास के मान । २-३ श्लोक-प्रत्येक के स्पष्ट व्यास जानने की रीति तथा चंद्रमा की कक्षा में सूर्य का स्पष्ट व्यास (योजनों और कलाओं में) जानने की रीति । ४-५ श्लोक-चंद्रमा की कक्षा में पृथ्वी की छाया के व्यास का मान जानने की रीति । ६ श्लोक-चंद्रमा के पात के कहाँ रहने से ग्रहण हो सकता है । ७ श्लोक-किस तिथि में ग्रहण हो सकता है । ८ श्लोक- अमावस्या और पूर्णमासी के अन्तकाल के सूर्य और चंद्रमा को स्पष्ट करने की रीति । ९ श्लोक-ग्रहण क्यों पड़ता है । १० श्लोक-ग्रस्त भाग का परिमाण जानने की रीति । ११ श्लोक-सर्वग्रास ग्रहण होगा या खंड ग्रहण अथवा ग्रहण न पड़ेगा यह निश्चय करने की रीति । १२-१५ श्लोक-ग्रहण और सर्वग्रास ग्रहण कितने समय तक रहेगा यह जानने की रीति । १६ श्लोक-ग्रहण के आरंभकाल और अन्तकाल जानने की रीति । १७ श्लोक-सर्वग्रास ग्रहण के आरंभकाल और अन्तकाल जानने की रीति । १८-२१ श्लोक-किस समय कितना भाग ग्रस्त रहेगा यह जानने की रीति । २२-२३ श्लोक-ग्रास का परिमाण जानकर इष्टकाल जानने की रीति । २४-२५ श्लोक-ग्रहण का चित्र खींचने के लिये वलन जानने की आवश्यकता । २६ श्लोक-इष्टकाल में बिम्ब का अंगुलात्मक मान जानने की रीति । ] सूर्य और चंद्रमा में ग्रहण किस प्रकार लगता है यह जानने के लिए पहले प्रकाश के कुछ गुणों की जानकारी आवश्यक है । इसलिए पहले संक्षेप में इन्हीं पर विचार किया जायगा । यह सबके अनुभव की बात है कि रात को दीपक के उजेले में दीवाल पर किसी वस्तु की जो छाया पड़ती है वह कहीं हल्की और कहीं गहरी होती है । गहरी छाया बीच में होती है और हल्की छाया गहरी छाया को घेरे रहती है । यदि वस्तु दीवाल के पास हो तो गहरी छाया बड़ी होती है और हल्की छाया कम । ज्यों-ज्यों वह वस्तु दीवाल से दूर होती जाती है परंतु दीपक के निकट त्यों-त्यों छाया का विस्तार तो बढ़ता जाता है परंतु गहरी छाया कम होती जाती है और हल्की छाया अधिक । यदि वस्तु दीपक से छोटी हो तो एक स्थिति ऐसी भी आ जायगी जिसमें गहरी छाया बिल्कुल नहीं पड़ेगी, केवल हल्की छाया दीवाल पर देख पड़ेगी ।
४४२ सूर्य-सिद्धान्त
हां, यदि वस्तु दीपक से बड़ी हो तो गहरी छाया दीवाल पर सदैव पड़ेगी । दीवाल के जिस भाग पर गहरी छाया पड़ती है उस भाग पर दीपक के प्रकाश का कोई अंश नहीं पहुँचता परन्तु हल्की छाया में दीपक का प्रकाश कुछ न कुछ अवश्य पहुँचता है । यदि कोई कीड़ा दीवाल पर गहरी छाया में हो तो उसे दीपक बिल्कुल नहीं देख पड़ेगा परन्तु हल्की छाया में उसे दीपक का कोई न कोई भाग अवश्य देख पड़ेगा । इसकी परीक्षा यों की जा सकती है :— एक दीपक या लम्प जलाकर रख लो । थोड़ी दूर पर एक पेंसिल, गोली या ऐसी चीज़ जो दीपक से छोटी हो खड़ी कर दो या टाँग दो । कुछ और दूर पर एक पतला कागज़ हाथ में इस प्रकार थामो कि इस पर पेंसिल की गहरी और हल्की दोनों छाया पड़ें । गहरी छाया में सुई से एक छेद कर दो और इसी से देखो कि दीपक देख पड़ता है या नहीं । दीपक नहीं देख पड़ेगा । हल्की छाया में सुई से छेद करके देखो । दोपक का कुछ अंश देख पड़ेगा । रेखागणित से यह जाना जा सकता है कि गहरी छाया कहाँ पड़ेगी और हल्की छाया कहाँ पड़ेगी । इनके विस्तार आदि का पता लगाना भी गणित से सम्भव है । सूर्य, चन्द्रमा में ग्रहण कैसे पड़ता है यह जानने के लिए गहरी और हल्की छाया का गणित करना पड़ता है इसलिए इस पर अच्छी तरह विचार करना आवश्यक है । आगे गहरी छाया को केवल छाया और हल्की छाया को परिछाया कहा जायगा । मान लो र एक प्रकाशमान पिंड और च एक अपारदर्शक पिंड है । दोनों पिंड गोलाकार हैं । र से प्रकाश की किरणें चारों दिशाओं में फैलती हैं परन्तु जो किरणें च पिंड पर पड़ती हैं वे इसके आगे नहीं बढ़ने पातीं । इन दोनों पिंडों को सीधी स्पर्श करती हुई रेखाएँ खींची जायें तो वे त बिन्दु पर परस्पर मिलकर एक दूसरे को काटती हुई आगे बढ़ेंगी । आ त ई सूची (cone) के आकार का होगा । यही च पिंड से बनी हुई छाया की सीमा होगी । इसके ऊपर, नीचे, इधर उधर छाया नहीं पड़ेगी । (देखो चित्र ६०) । इन दोनों पिंडों को छूती हुई जो रेखाएँ ता बिन्दु पर मिलती हैं इनसे परिछाया की सीमा बनती है । यदि एक पट (पर्दा) छाया में इस प्रकार रखा जाय कि वह र, च पिंडों के केन्द्रों को मिलानेवाली रेखा से समकोण पर रहे तो इस पट पर छाया का जो वृत्त बनेगा उसका व्यास छ छा होगा और परिछाया के वृत्त का व्यास उ ऊ होगा जिसमें छाया का व्यास भी शामिल है (देखो चित्र ६१) । यदि उ छ खंड में किसी जगह प बिंदु पर एक छेद कर दिया जाय और इसी छेद से प्रकाशमान पिंड देखा जाय तो पिंड का वह ऊपरी भाग देख पड़ेगा जो पा बिन्दु के ऊपर है । यह पा बिन्दु प आ
चन्द्रग्रहणाधिकार ४४३ उ क ख ग घ छ ट छा प क झ उ फ ऊ चित्र ६१ आ इ ई चित्र ६० ल पा अ र चित्र ६२
४४४ सूर्य्य-सिद्धान्त स्पर्शरेखा को बढ़ाने से प्रकाशमान पिंड पर निश्चय किया जाता है। यदि ऊ छा खंड में कहीं छेद किया जाय तो प्रकाशमान पिंड के नीचे का भाग देख पड़ेगा। परन्तु यदि छेद छ छा खंड में किया जाय तो प्रकाशमान पिंड का कोई भाग नहीं देख पड़ेगा। सारांश यह कि यदि द्रष्टा अ आ त रेखा के ऊपर परन्तु ता अ उ के नीचे कहीं रहेगा तो उसे र पिंड का ऊपरी भाग अवश्य देख पड़ेगा परन्तु नीचे वाला भाग नहीं देख पड़ेगा। इसी प्रकार इ ई त रेखा के नीचे और अ ई ऊ रेखा के ऊपर द्रष्टा के रहने से प्रकाशमान पिंड का नीचे वाला भाग अवश्य देख पड़ेगा परन्तु ऊपर वाला भाग नहीं देख पड़ेगा। यदि पट त विन्दु पर लाया जाय तो यहाँ छाया नाममात्र को भी नहीं रहेगी। प्रकाशमान पिंड देख तो नहीं पड़ेगा परन्तु इसकी चमक चारों ओर कुछ अवश्य देख पड़ेगी। यदि पट त से और दूर किया जाय तो एक ओर ही दृश्य देख पड़ेगा। क ख और ग घ परिछाया के खंडों में तो पहले की ही तरह बात देख पड़ेगी परन्तु ख ग खंड में जो छाया की सीमा बनाने वाली रेखाओं के बीच में है प्रकाशमान पिंड का किनारे वाला पूरा भाग देख पड़ेगा परन्तु बीच में अन्धकार रहेगा (देखो चित्र ६२)। चित्र से यह प्रकट ही है कि ख ग के बीच किसी विन्दु से च पिंड को स्पर्श करती हुई जो रेखाएँ खींची जायेंगी वह र पिंड के ऊपर नीचे दोनों ओर पहुँचेंगी। पिंड गोल है इसलिए बीच में अन्धकारमय होने से कंकण की तरह देख पड़ेगा। यह सब दृश्य प्रयोग द्वारा देखे जा सकते हैं। एक गोल लम्प, गेंद तथा लकड़ी के चौखटे में तने हुए पट, बस तीन चीजें इसके लिए पर्याप्त हैं। र पिंड की जगह गोल लम्प और च की जगह गेंद को समझना चाहिए। अंधेरी रात में किसी स्थान में यह प्रयोग सहज ही किया जा सकता है। इसी प्रयोग से सूर्य ग्रहण की सारी बातें समझ में आ सकती हैं। र को रवि या सूर्य और च को चन्द्रमा समझना चाहिए। पट की जगह पृथ्वी को समझना चाहिए। जिस तरह यह पिंड के निकट रहने पर छाया और परिछाया दोनों में रहता है परन्तु दूर रहने पर केवल परिछाया या छाया की सीमा बनाने वाली रेखाओं के बीच में रहता है, इसी तरह पृथ्वी भी कभी चन्द्रमा के निकट रहने से चन्द्रमा की छाया और परिछाया दोनों में रहती है और कभी दूर रहने से केवल प र छाया में ही रहती है। पृथ्वी चन्द्रमा से बहुत बड़ी है इसलिए सारी पृथ्वी छाया या परिछाया में नहीं पड़ सकती। पृथ्वी का जो भाग छाया में पड़ जाता है वहाँ के निवासियों को सूर्य बिलकुल नहीं देख पड़ता। इसलिये सूर्य का पूर्णग्रहण या सर्वग्रहण (total eclipse of the sun) होता है। पृथ्वी का जो भाग परिछाया में पड़ता है वहाँ के