सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
चन्द्रग्रहणाधिकार ४४५ निवासियों को सूर्य का खंडग्रहण (partial eclipse) देख पड़ता है। यदि पृथ्वी पर छाया न पहुँचे तो वह उसी स्थिति में रहेगी जो क ख ग घ पट से दिखायी गयी है। ऐसी दशा में पृथ्वी का जो भाग छाया की सीमा बनाने वाली रेखा के बीच में होगा वहाँ कंकण ग्रहण (annular eclipse) देख पड़ेगा। जिस तरह चंद्रमा की छाया या परिछाया में पृथ्वी के आ जाने से सूर्य में पूर्ण ग्रहण खंड ग्रहण, अथवा कंकण ग्रहण देख पड़ता है उसी तरह पृथ्वी की छाया में जब चंद्रमा आ जाता है तब प्रकाशहीन हो जाता है। इसी को चन्द्रग्रहण कहते हैं। यदि चंद्रमा का पूर्ण पिंड छाया में आ जाय तो पूर्ण चन्द्रग्रहण (total eclipse of the moon) और अधूरा पिंड छाया में आवे तो खंड चंद्रग्रहण (partial eclipse of the moon) पड़ता है। इस स्थिति में चंद्रमा निवासी सूर्य में ही ग्रहण लगता हुआ देखेंगे परंतु उनको कंकण ग्रहण देखने का सौभाग्य नहीं हो सकता क्योंकि चंद्रमा से पृथ्वी का आकार बड़ा होने के कारण चंद्रमा कभी छाया से बाहर नहीं जा सकता है। चित्र से यह भी स्पष्ट है कि छाया में पहुँचने के पहले परिछाया मे घुसना आवश्यक है। यह स्मरण रखना चाहिए कि चंद्रग्रहण तभी देख पड़ता है जब चंद्रमा पृथ्वी की छाया में जाता है। यदि चंद्रमा केवल परिछाया में जाय तो ग्रहण नहीं देख पड़ेगा, हाँ कुछ मलिनता अवश्य आ जाती है। ऊपर जो कुछ कहा गया है उससे स्पष्ट है कि सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी की परस्पर दूरियों के अनुसार छाया और परिछाया का परिमाण भी कम या अधिक हो सकता है। यह बात पहले ही बतलायी जा चुकी है कि सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी तथा चंद्रमा ओर पृथ्वी के बीच की दूरी घटती बढ़ती रहती है। दूरी के घटने बढ़ने से इन पिंडों के कोणात्मक आकार घटे बड़े देख पड़ते हैं (देखो पृष्ठ ८४-८५) इसलिए कोणात्मक आकारों का परिमाण जानने के लिए इनकी स्पष्ट दूरियों का जानना आवश्यक है। परंतु त्रिप्रश्नाधिकार में यह बतलाया गया है कि किसी पिंड के आकार, लम्बन और उसकी स्पष्ट दूरी में परस्पर क्या संबंध है। इसलिए लंबन या दूरी दोनों में से किसी के जान लेने से यह जाना जा सकता है कि छाया का परिमाण किस समय कितना होता है। चित्र १३ से यह जाना जाता है कि चंद्रग्रहण के समय चंद्रमा की कक्षा में पृथ्वी की छाया का व्यास कितना बड़ा होता है। मान लो कि चित्र १३ में च चंद्रमा है जो पृथ्वी की छाया में स बिंदु पर प्रवेश कर रहा है, इसलिए यह रा पा स्पर्श रेखा को छू रहा है क्योंकि सूर्य और
४४६ सूर्य-सिद्धान्त रा सू र ग सा का हा पा पृ पी चित्र ६३ च म भू श
चन्द्रग्रहणाधिकार ४४७ पृथ्वी की सामान्य स्पर्शरेखाओं रा पा और री पी से ही पृथ्वी की छाया बनती है जिसकी नोक न है। सूर्य और पृथ्वी की त्रिज्याएँ र रा और प पा स्पर्शरेखा रा पा के समकोण पर हैं। प रि रेखा पा रा के समानान्तर है। पहले यह जानना आवश्यक है कि कोण स प छ किसके समान है क्योकि यह कोण पृथ्वी के केन्द्र पर छाया की उस त्रिज्या से बनता है जो चंद्रमा की कक्षा में है इसलिए इससे चंद्रकक्षा में छाया के आकार का पता चलेगा। ∠ रि प र = रि र / प र = (रा र - रा रि) / प र = (रा र - पा प) / प र = (रा र / प र) - (पा प / प र) = सूर्य की त्रिज्या - सूर्य का लंबन = त्र - ल त्र और ल से सूर्य की त्रिज्या और लंबन सूचित किये गये हैं। ∠ स प छ = ∠ प स पा - ∠ प न पा = ∠ प स पा - ∠ रि प र क्योंकि प रि और न पा रा समान्तर हैं और न प र दोनों को काटता है। यहाँ ∠ प स पा = प पा / प स = चंद्रमा का लंबन = ला ला को चंद्रमा का परम लंबन या क्षितिज लंबन मान लेने में बहुत अंतर नहीं पड़ेगा। इसलिए ∠ स प छ = ला - (त्र - ल) = ल + ला - त्र इससे यह सिद्ध हुआ कि यदि सूर्य और चन्द्रमा के क्षितिज लम्बनों के योगफल से सूर्य की त्रिज्या का कोणात्मक मान घटा दिया जाय तो जो कुछ शेष रहता है उसी के समान चन्द्रकक्षा में पृथ्वी की छाया की त्रिज्या का कोणात्मक मान होता है। इसी को भूभाद्र्ध भी कहते हैं। अनुभव से जाना गया है कि पृथ्वी के वातावरण के कारण इसकी छाया उपर्युक्त गणितसिद्ध छाया से १/५० गुणा बड़ी होती है क्योंकि ऊपर के गणित में पृथ्वी के केवल ठोस पिंड का विचार किया है, इसके वातावरण का नहीं। उदाहरण- यदि सूर्य का लंबन ६'', चन्द्रमा का लंबन ५८' १'' और सूर्य त्रिज्या १६' १३'' हो तो चंद्रकक्षा में पृथ्वी की छाया की त्रिज्या बतलाओ ? भूभाद्र्ध = ल + ला - त्र = ६'' + ५८' १'' - १६' १३''
४४६ सूर्य-सिद्धान्त = ५८' १०" - १६' १३" = ४१' ५७" । यह गणितसिद्ध छाया की त्रिज्या है। वातावरण के कारण छाया का १/५० गुना बढ़ जाता है। इसलिए कुल छाया = ४१' ५७" + (४१' ५७"/५०) = ४१' ५७" + ५०" = ४२' ४७" यह प्रकट है कि चन्द्रकक्षा में भूभाद्वं (पृथ्वी की छाया की त्रिज्या) का परिमाण सदैव एकसा नहीं रहता क्योंकि यह सूर्य और चन्द्रमा के लंबन तथा सूर्य की कोणात्मक त्रिज्या पर अवलंबित है और यह तीनों बातें पृथ्वी से सूर्य और चन्द्रमा की दूरियों पर अवलंबित हैं जो सदैव घटा बढ़ा करती हैं। अब यह बतलाया जायगा कि इस विषय पर सूर्य-सिद्धान्त का क्या मत है। सूर्य और चन्द्र बिम्बों का मध्यम व्यास तथा चन्द्रकक्षा में सूर्य का स्पष्ट व्यास— सार्धानि षट् सहस्राणि योजनानि विवस्वतः । विष्कम्भो मण्डलस्येन्दोः साशीतिस्तु चतुश्शती ॥१॥ स्वभ्यासौ त्रिज्याऽभ्यस्तौ स्वमन्दश्रवणोद्धृतौ । स्पष्टौ स्वको स्वकौ भूमेस्तथा सूची शशाङ्कवत् ॥२॥ स्फुटस्वभुक्तिगुणितो मध्यभुक्त्या हृतो स्वकौ । रवेस्स्वभगणाभ्यस्तः शशाङ्कभगणोद्धृतः ॥३॥ अनुवाद—(१) सूर्य के मण्डल का मध्यम व्यास ६५०० योजन और चंद्रमा के मण्डल का मध्यम व्यास ४८० योजन है। (२) जिस समय किसी का स्पष्ट व्यास जानना हो तो उसके मध्यम व्यास को उस समय की उसकी स्पष्टगति से गुणा कर दो और गुणनफल को उसकी मध्यमगति से भाग दे दो। सूर्य के स्पष्ट व्यास को सूर्य के महायुगीय भगण से गुणा करके गुणनफल को चन्द्रमा के महायुगीय भगण से भाग देने पर (३) अथवा सूर्य के स्पष्ट व्यास को चन्द्रकक्षा से गुणा करके और गुणनफल को सूर्य की कक्षा से भाग देने पर जो आता है वही चन्द्रकक्षा में सूर्य के स्पष्ट व्यास का परिमाण है। चन्द्रकक्षा में सूर्य और चन्द्रमा के व्यास को १५ से भाग देने पर सूर्य और चन्द्रमा के व्यास कलाओं में ज्ञात हो जाते हैं। विज्ञान भाष्य—इन तीन श्लोकों का सार यह है— सूर्य बिम्ब का मध्यम व्यास = ६५०० योजन चन्द्र बिम्ब का मध्यम व्यास = ४८० योजन
चन्द्रग्रहणाधिकार ४४६ स्फुट व्यास = मध्यम व्यास ✕ स्फुट गति / मध्यम गति चन्द्रकक्षा में सूर्य का स्फुट व्यास = सूर्य का स्फुट व्यास ✕ सूर्य का महायुगोय भगण / चन्द्रमा का महायुगीय भगण अथवा = सूर्य का स्फुट व्यास ✕ चन्द्रकक्षा / सूर्य की कक्षा यहां यह शंका उत्पन्न हो सकती है कि क्या सूर्य का योजनात्मक आकार भी घटता बढ़ता है क्योंकि ऊपर बतलाया गया है कि सूर्य का स्फुट (स्पष्ट) व्यास उसकी स्फुट गति पर अवलंबित है जो सदा घटती बढ़ती रहती है। परन्तु बात यह नहीं है। सूर्य का योजनात्मक आकार स्फुट गति के अनुसार कदापि घटता बढ़ता नहीं है, हां कलात्मक या कोणात्मक आकार अवश्य बदलता है जिसकी मीमांसा स्पष्टाधिकार पृष्ठ ८४-८६ में अच्छी तरह की गयी है। यहां मध्यम व्यास और स्फुट व्यास का परिमाण यद्यपि योजनों में बतलाया गया है तथापि इसे कोणात्मक ही समझना चाहिए क्योंकि इस जानने की जो रीति भास्कराचार्य जी१ ने लिखी है उससे यह अर्थ निकलता है। भास्कराचार्य जी कहते हैं कि जिस दिन सूर्य की स्पष्ट या स्फुट गति मध्यम गति के समान हो उस दिन उदयकाल में ३४३८ इकाइयों के समान दो लकड़ियां लेकर इनके दो सिरों को मिलाकर२ मूल स्थानों में आंख रखकर सूर्य के बिंब को इस प्रकार बेधो कि इन लकड़ियों के आगेवाले सिरे बिम्ब के उत्तर और दखिन वाले किनारों को स्पर्श करें। इसी दशा में लकड़ियों के सिरों को इस प्रकार कस दो कि आगेवाले सिरों की दूरी में कोई भेद न पड़े। अब इन सिरों की दूरी को उसी इकाई से नापो जिससे लकड़ियों की लम्बाई नापी गयी है। यह अन्तर जितनी इकाइयों के समान होगा उतनी ही कला सूर्य के बिम्ब का व्यास होगा। भास्कराचार्य जी के अनुसार यह व्यास ३२′३१″३३‴ होता है। यदि इसको ३२′३०″ या ३२′·५ माना जाय और सूर्य की कक्षा३ का मान ४३,३१,५०० योजन लिया जाय तो सूर्य- बिम्ब का योजनात्मक मान इस प्रकार प्राप्त होगा :— १. गणिताध्याय पृष्ठ १७१-१७२ २. आजकल यह काम परकार (dividers) की नोकों से किया जा सकता है। आंख उस विन्दु पर होनी चाहिए जहां कम्पास की दोनों भुजाएं मिलती हों। ३. भूगोलाध्याय श्लोक ८६ ।
४५० सूर्य-सिद्धान्त चित्र ९४ कोई कक्षा = ३६०° = २१,६००' ∵ सूर्य की कक्षा भी २१,६०० कला के समान है परन्तु योजनों में यह ४३,३१,५०० के समान है इसलिए २१६००' = ४३,३१,५०० योजन ∵ ३२.५' = (३२.५ × ४३३१५००) / २१६०० योजन = ६५१७ योजन सूर्य-सिद्धान्त ने सूर्य का मध्यम व्यास ६५०० योजन माना है इससे प्रकट होता है कि इस ग्रन्थ में सूर्य का उदयकालिक बिम्ब ३२' ३०" से कम लिया गया है जो ठीक भी है क्योंकि वर्तन के कारण उदयकालिक बिम्ब यथार्थ से कुछ बड़ा देख पड़ता है । इस तरह यह सिद्ध है कि सूर्य या चन्द्र बिम्बों का योजनात्मक मान कलात्मक मानों से ही जाना गया है । मध्यम व्यास से स्फुट व्यास जानने का जो नियम बतलाया गया है वह कुछ स्थूल है क्योंकि सूर्य या चन्द्रमा की स्फुटगति का परिवर्तन उसी अनुपात से नहीं होता चित्र ९५
चन्द्रग्रहणाधिकार ४५१ जि अनुपात से इनके कोणात्मक बिम्बों का परिवर्तन होता है। (देखो स्पष्टाधिकार पृष्ठ ८८) । चन्द्रकक्षा में सूर्य का स्पष्ट व्यास जानने के दो नियम बतलाये गये हैं जो वास्तव में एक ही नियम के दो रूप हैं। चित्र ६५ में यदि र रा सूर्य की कक्षा, और च चा चन्द्रमा की कक्षा के खंड मान लिये जायें, भ पृथ्वी का केन्द्र हो और यदि र रा सूर्य बिम्ब के समान मान लिया जाय तो चन्द्रकक्षा में यह बिम्ब च चा के समान होगा। यह स्पष्ट ही है कि च चा भ च चन्द्रकक्षा का व्यासार्ध —— = —— = ——————————— र रा भ र सूर्यकक्षा का व्यासार्ध चन्द्रकक्षा = —————— स सूर्यकक्षा क्योंकि दो वृत्तों की परिधियों में वही अनुपात होता है जो उनके व्यासार्धों में होता है। इसलिए र रा × चन्द्रकक्षा च चा = —————————— सूर्यकक्षा सूर्य का स्पष्ट व्यास × चन्द्रकक्षा = ———————————————— सूर्य की कक्षा इस प्रकार चन्द्रकक्षा में सूर्य के स्पष्ट व्यास के जानने का दूसरा नियम सिद्ध हो गया। अब यह बतलाना कठिन नहीं है कि पहला इसका रूपान्तर किस प्रकार है। यह पहले ही बतलाया जा चुका है कि हमारे आचार्यों का मत है कि प्रत्येक ग्रह की दैनिक योजनात्मक गति समान होती है। इसलिए यह सिद्ध है कि प्रत्येक ग्रह एक महायुग या कल्प में जितने योजन चलता है वह सब ग्रहों के लिए एक सा है। ग्रह एक महायुग में जितने योजन चलता है उसको यदि ग्रह के महायुगीय भगण से भाग दे दिया जाय तो ग्रह की कक्षा का मान योजनों में निकल आवेगा, इसको यों भी लिखा जा सकता है :— ग्रह की महायुगीय गति (योजनों में) —————————————— = ग्रह की कक्षा (योजनों में) ग्रह का महायुगीय भगण यदि ग्रह की महायुगीय योजनात्मक गति को म मान लिया जाय और सूर्य के महायुगीय भगण को र तथा चन्द्रमा के महायुगीय भगण को च मान लिया जाय तो उपर्युक्त नियम के अनुसार
४५२ सूर्य-सिद्धान्त $\frac{म}{र} =$ सूर्य की कक्षा और $\frac{म}{च} =$ चन्द्रकक्षा यदि दूसरे समीकरण के प्रत्येक पक्ष को पहले समीकरण के समपक्ष (corres- ponding sides) से भाग दे दिया जाय तो $\frac{म}{च} \div \frac{म}{र} = \frac{चन्द्रकक्षा}{सूर्य की कक्षा}$ अथवा $\frac{र}{च} = \frac{चन्द्रकक्षा}{सूर्य की कक्षा}$ इस प्रकार सूर्य के स्फुट व्यास का पहला नियम भी सिद्ध हो गया । यहाँ यह बतला देना आवश्यक है कि सूर्य का स्फुट व्यास तथा सूर्य की कक्षा का विस्तार यथार्थ में उतना नहीं है जितना हमारे सिद्धान्त ग्रन्थों में बतलाया गया है । अनेक बेधों से यह सिद्ध हो गया कि सूर्य का लम्बन ९ कला से अधिक नहीं होता इसलिए पृथ्वी से इसकी दूरी लम्बन के सूत्र के अनुसार (देखो त्रिप्रश्नाधिकार पृष्ठ ३८४) ९ करोड़ २६ लाख मील है और इसके पिंड का व्यासार्ध ४, ३२, ८६० मील है (देखो पृष्ठ ६६) । यदि योजन का परिमाण ५ मील के समान समझा जाय (देखो पृष्ठ ५४) तो सूर्य का व्यासार्ध = $\frac{४३२८६०}{५} =$ ८६५७८ योजन, और सूर्य की मध्यम दूरी = $\frac{९,२६,००,०००}{५} =$ १,८५,२०,००० योजन यह परिमाण हमारे सिद्धान्त के परिमाणों से कितना भिन्न है यह नीचे की तालिका से स्पष्ट हो जायगा जहां सब परिमाण योजनों में दिये जाते हैं :-
| सूर्यसिद्धान्त | सिद्धान्त शिरोमणि | R. S. Ball's Spherical Astronomy |
|---|---|---|
| सूर्य बिंब का व्यास | ६५०० | ६५२२ |
| सूर्य की मध्यम दूरी | ६८८३७८ | ६८८३७७ |
| चन्द्र बिंब का व्यास | ४८० | ४८० |
| चन्द्रमा की मध्यम दूरी | ५१५६६ | ५१५६६ |
चन्द्रग्रहणाधिकार ४५३ तीसरे श्लोक के उत्तरार्द्ध में यह भी बतलाया गया है कि चन्द्रमा की कक्षा में सूर्य बिम्ब का जो व्यास योजनों में हो उसको १५ से भाग देने पर इसका परिमाण कलाओं में आ जायगा। इसका कारण यह है कि चन्द्रकक्षा का विस्तार ३२४००० योजन माना गया है जो ३६० अंश या २१६०० कला के समान भी है इसलिए जब २१६०० कला = ३२४००० योजना तब १ कला = ३२४००० / २१६०० = १५ योजन जिसका अर्थ यह हुआ कि चन्द्रकक्षा का १५ योजन एक कला के समान होता है । चन्द्रकक्ष में भूछाया के व्यास का परिमाण— शशाङ्ककक्ष्यागुणितो भाजितो वाऽर्ककक्ष्यया । विष्कम्भश्चन्द्रकक्ष्यायां तिथ्याप्तो मानलिप्तिकाः ॥४॥ स्फुटेन्दुभुक्तिभूव्यासगुणिता मध्ययोद्धृता । लब्धं सूची महीव्यासस्फुटार्कश्रवणान्तरम् ॥५॥ मध्येन्दुव्यासगुणितं मध्यार्कव्यासभाजितम् । विशोध्य लब्धं सूच्यास्तु तमो लिप्ताश्च पूर्ववत् ॥६॥ अनुवाद—(४) चन्द्रमा की स्पष्ट गति को पृथ्वी के व्यास से गुणा करके गुणनफल को चन्द्रमा की मध्य गति से भाग देने पर जो लब्धि आती है उसे सूची कहते हैं। सूर्य के स्फुट व्यास से पृथ्वी के व्यास को घटाकर (५) शेष को चंद्रमा के मध्यम व्यास से गुणा करके और गुणनफल को सूर्य के मध्यम व्यास से भाग दे दो । लब्धि को सूची से घटा देने पर जो शेष आवेगा वह चन्द्रकक्षा में पृथ्वी की छाया का व्यास योजनों में आ जायगा । इसको पहले की तरह १५ से भाग दे देने पर भूछाया का व्यास कलाओं में ज्ञात हो जायगा । विज्ञान भाष्य—यहाँ चन्द्रमा और सूर्य की स्पष्ट गतियों को चा और रा अक्षरों से सूचित किया जायगा । यदि चन्द्रमा और सूर्य के महायुगीन भगणों को महायुगीन सावन दिनों से भाग दे दिया जाय और लब्धि की कलाएं बनायी जायें तो चन्द्रमा और सूर्य की मध्यम दैनिक गतियाँ क्रमानुसार ७६०' ०५६ और ५६' ०१३६२ होती हैं। पृथ्वी का व्यास १६०० योजन माना गया है (देखो मध्यमा- धिकार श्लोक ५६) । इन मानों के आधार पर उपर्युक्त दो श्लोकों को संक्षेप में इस प्रकार लिखा जा सकता है— सूची = १६०० x चा / ७६०·५६ सूर्य का स्फुट व्यास = ६५०० x रा / ५६·१३६२ (देखो श्लोक २) ।
४५४ सूर्य-सिद्धान्त चन्द्रकक्षा में भूछाया का योजनात्मक व्यास = १६०० चा / ७६०·५६ - ( ६५०० रा / ५६·१३६२ - १६०० ) × ४८० / ६५०० यदि इसको १५ से भाग दे दिया जाय तो चन्द्रकक्षा में भूछाया का कालात्मक व्यास = १०६ २/३ × चा / ७६०·५६ - ३२ × रा / ५६·१३६२ + ७·८८ जिस समय चन्द्रमा और सूर्य की स्पष्ट गतियां इनकी मध्यम गतियों के समान होंगी उस समय चा / ७६०·५६ और रा / ५६·१३६२ एक के समान होंगे । ऐसी दशा में भूछाया का कलात्मक व्यास १०६·६७ - ३२ + ७·८८ = ८२·५५ चित्र ६३ की सहायता से आरंभ में यह बतलाया जा चुका है कि भूभार्ध अर्थात् चन्द्रकक्षा में पृथिवी की छाया का अर्धव्यास ४१' ५७" होता है जिससे पृथिवी की छाया का व्यास ८४' के लगभग आता है । इसलिए यह स्पष्ट है कि सूर्य-सिद्धान्त के नियम से पृथिवी की छाया का व्यास जितना आता है वह नवीन रीति से निकाले हुए व्यास के प्रायः समान ही होता है यद्यपि उसके उपकरण स्थूल और अशुद्ध हैं । भारतीय रीति से भूछाया के व्यास का जो परिमाण आता है वह तीन पदों १०६·६७, ३२ और ७·८८ के योग वियोग से सिद्ध होता है ।
चन्द्रग्रहणाधिकार ४५५ इसी तरह नवीन रीति से भूभाद्धं का परिमाण भी तीन पदों ५८' १'', १६'१३'' और ६'' के योग वियोग से व्यक्त किया जा सकता है (देखो ४३८ पृष्ठ का उदाहरण) । इन तीन पदों के दूने क्रम से ११६' २'', ३२' २६'' और १८'' है । इनमें ३२'२६'' भारतीय नियम के दूसरे पद से बिल्कुल मिलता है, पहला पद यहाँ ११६' और वहाँ १०७ कला है और तीसरा पद यहाँ १८'' और वहाँ ८' के लगभग है इसलिए पहले और तीसरे पदों का योग ११६' के लगभग हो जाता है । इससे प्रकट है कि हमारे सिद्धान्त से भूभार्ध का जो रूप सिद्ध होता है वह नवीन रूप से केवल इस बात में भिन्न है कि सूर्य का आकार और उसकी दूरी हमारे यहाँ बहुत कम मानी गयी है । उपपत्ति : कल्पना करो कि भ पृथ्वी का केन्द्र, प फ पृथ्वी का व्यास, र सूर्य का केन्द्र, त ध सूर्य का व्यास, च मध्यम चन्द्रमा का केन्द्र, चा स्पष्ट चन्द्रमा का केन्द्र, त प खा और ध फ गा पृथ्वी और सूर्य की सामान्य स्पर्शरेखाएं, तथा थ प का और द फ धा रेखाएं र भ के समानान्तर हैं। यह स्पष्ट है कि खा गा स्पष्ट चन्द्रमा के तल में पृथ्वी की छाया का व्यास है जो भूकेन्द्र से देखने पर मध्यम चन्द्रमा की कक्षा में ख ग के समान होगा। यदि भ का और भ धा बढ़ाये जायें तो मध्यम चन्द्रमा की कक्षा में क, घ विन्दुओं पर मिलेंगे। चित्र ६६ से स्पष्ट है कि भूछाया का व्यास खा गा = का धा - (का खा + गा घा) = प फ - (का खा + गा घा) समजातीय त्रिभुज प का खा और प थ त में, प का / प थ = का खा / त थ इसी तरह फ गा / फ ध = गा घा / द ध परन्तु प का = फ गा और प थ = फ ध ∵ का खा / त थ = गा घा / द ध = (का खा + गा घा) / (त थ + द ध) = (का खा + गा घा) / (त ध - थ द) ∵ प का / प थ = (का खा + गा घा) / (त ध - प फ) ... ... ...(१) समजातीय त्रिभुज का भ धा और क भ घ में भ चा / भ च = का धा / क घ
४५६ सूर्य-सिद्धान्त परन्तु भ चा और भ च पृथ्वी से स्पष्ट और मध्यम चन्द्रमा की दूरियां हैं और यह बताया गया है कि कोणीय वेग कर्ण के वर्ग के प्रतिलोम के अनुसार बदलता है (देखो स्पष्टाधिकार पृष्ठ ८८) इसलिए स्थूल रूप से यह माना जा सकता है कि कोणीय वेग कर्ण के भी प्रतिलोम के अनुसार बदलता है जैसा कि सूर्य-सिद्धान्त के नियम से प्रकट होता है । इसलिए भ चा / भ च = चंद्रमा की मध्यम गति / चंद्रमा की स्पष्ट गति = म / स ∵ म / स = का घा / क घ = प फ / क घ ∴ क घ = प फ × स / म = भू व्यास × स्पष्टगति / मध्यम गति इसी क घ का नाम श्लोक ४ में सूची रखा गया है । समजातीय त्रिभुज भ का खा और भ क ख इत्यादि से सिद्ध हो सकता है कि भ चा / भ च = का खा / क ख = गा घा / ग घ = का खा + गा घा / क ख + ग घ ...(२) समीकरण (१) और (२) में प का और भ चा समान हैं इसलिए प ध × का खा + गा घा / त ध - प फ = भ च × का खा + गा घ / क ख + ग घ या प थ / भ च = त ध - प फ / क ख + ग घ परन्तु प थ या भ र पृथ्वी से सूर्य की मध्यम दूरी और भ च पृथ्वी से चन्द्रमा की मध्यम दूरी है जिनका अनुपात = ४३३१५०० / ३२४००० = १३·३७ क्योंकि सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार ४३३१५०० योजन सूर्य की कक्षा और ३२४००० योजन चन्द्रमा की कक्षा के विस्तार हैं, तथा ६५०० / ४८० = १३·५४, सूर्य और चन्द्रमा के मध्यम व्यासों का अनुपात है जो १३·३७ के प्रायः समान है। इसलिए यह मान लेने में कोई हर्ज नहीं कि प थ / भ च = ६५०० / ४८० = सूर्य का मध्यम व्यास / चन्द्रमा का मध्यम व्यास ∴ ६५०० / ४८० = तध - प फ / क ख + ग घ
चन्द्रग्रहणाधिकार ४५७ क ख + ग घ = (त ध - प फ) × ४८०/६५०० परन्तु क ख + ग घ = क घ - छ ग = सूची - चंद्रकक्षा में भूछाया और त ध - प फ = सूर्य का स्पष्ट ब्यास - पृथ्वी का व्यास सूची - चंद्रकक्षा में भूछाया = (सूर्य का स्पष्ट व्यास - पृथ्वी का व्यास) × ४८०/६५०० ∴ चन्द्रकक्षा में भूछाया = सूची - (सूर्य का स्पष्ट व्यास - पृथ्वी का व्यास) × ४८०/६५०० यही ४, ५ श्लोकों का तात्पर्य है । ग्रहण कब सम्भव होता है— भानोर्भार्धे महोच्छाया तत्तुल्येऽर्कसमेऽथवा । शशाङ्कपाते ग्रहणं कियद्भागाधिकोनके ॥६॥ तुल्यौ राश्यादिभिः स्याता ममावास्यान्तकालिकौ । सूर्येन्दु पौर्णमास्यन्ते भार्धे भागादिभिस्समौ ॥७॥ अनुवाद—(६) सूर्य से ६ राशि के अंतर पर पृथ्वी की छाया होती है । यदि सूर्य से इतनी ही दूरी पर अथवा सूर्य के ही समान राशि अंश पर अथवा इनसे कुछ ही कम या अधिक दूरी पर चन्द्रमा का पात हो तो सूर्य और चन्द्रमा में ग्रहण लगता है । (७) सूर्य और चन्द्रमा के राशि अंश कला विकला इत्यादि अमावस्या के अन्त में समान होते हैं और पूर्णमासी के अंत में ठीक ६ राशि के अंतर पर होते हैं । विज्ञान भाष्य—चित्र ६३ से प्रकट है कि पृथ्वी की छाया का केन्द्र छ या न सूर्य और पृथ्वी के केन्द्रों को मिलाने वाली रेखा र प न पर सदैव रहता है इसलिए पृथ्वी की छाया सूर्य से सदैव १८०° या ६ राशि आगे रहती है । इसलिए जब चन्द्रमा सूर्य से १८०° के लगभग आगे रहता है तभी यह पृथ्वी के छाया में प्रवेश कर सकता है अन्यथा नहीं । परन्तु जब चन्द्रमा सूर्य से १८०° आगे रहता है तब पूर्णिमा का अंत होता है इसलिए पूर्णिमा के अंत काल के लगभग चंद्रग्रहण लग सकता है । इसी प्रकार जब चन्द्रमा सूर्य के सामने आकर उसको ढक लेता है तभी सूर्य ग्रहण लगता है परन्तु यह बात तभी संभव है जब सूर्य और चन्द्रमा के भोगांश प्रायः समान होते हैं अर्थात् जब अमावस्या होती है । इसलिए यह प्रकट है कि चन्द्र- २
४५८ सूर्य-सिद्धान्त ग्रहण पूर्णिमा के अंत में और सूर्यग्रहण अमावस्या के अंत में लगते हैं। (देखो चित्र ६७) अब यह प्रश्न हो सकता है कि प्रत्येक पूर्णिमा और अमावस्या के अंत में चन्द्रग्रहण या सूर्यग्रहण क्यों नहीं लगता ? इसका कारण यह है कि चन्द्रमा का कक्षातल क्रान्तिवृत्त के कक्षातल से भिन्न है। इन दोनों का परम अंतर ५° के लगभग है जिसे चन्द्रमा का परमविक्षेप या परम शर कहते हैं (देखो मध्यमाधिकार पृ० ७४- ७५) । परंतु सूर्य और चन्द्रमा के बिम्बार्ध १६' के लगभग तथा पृथ्वी की छाया का व्यासार्ध अथवा भूभार्ध ४२' के लगभग होता है (देखो पहले का उदाहरण) इसलिए जब चन्द्रमा अपनी कक्षा में ऐसी जगह रहता है जो क्रान्तिवृत्त के पास हो और क्रान्तिवृत्त से जिसका अन्तर १६' + ४२' = ५८' के लगभग या इससे भी कम हो तभी ग्रहण हो सकता है । यह स्थिति उसी समय सम्भव है जब अमावस्या या पूर्णमासी के लगभग चन्द्रमा अपनी कक्षा और क्रान्तिवृत्ति के मिलन बिन्दुओं अर्थात् पातों के पास हो । परन्तु चन्द्रमा के पात एक दूसरे से सदैव १८०° के अंतर पर होते हैं इसलिए यह
चन्द्रग्रहणाधिकार ४५६ प्रकट है कि जब अमावस्या या पूर्णमासी के समय सूर्य के भोगांश के समान ही या इसके लगभग राहु या केतु किसी का भोगांश हो तभी ग्रहण लग सकता है अन्यथा नहीं । यह बात चित्र ६८ से अच्छी तरह स्पष्ट हो जायगी :- चित्र ६८ पूर्णिमान्त काल में :- छा = पृथ्वी की छाया का केन्द्र च = चन्द्रमा का केन्द्र च छा या श = चन्द्रमा का शर (विक्षेप) म = भूछाया और चन्द्रमा के व्यासार्धों का योग प = चंद्रमा का पात च क या चा = चन्द्रमा की प्रति घड़ी भोगांश गति क ख या शा = " " " शर की गति छ छा या रा = भूछाया अथवा सूर्य की प्रतिघड़ी भोगांश गति
४६० सूर्य-सिद्धान्त
क च रेखा पर क का, छ छा के समान काट लो और का से क ख के समान और समानान्तर का खा खींचो, च खा को मिलाकर खा की ओर क्रान्तिवृत्त के व बिन्दु तक खींचो । यही च खा व चन्द्रमा का आपेक्षिक मार्ग होगा, यदि यह मान लिया जाय कि भूछाया छ बिन्दु पर स्थिर है । यदि छ से च ब पर छ फ लम्ब डाला जाय तो यही चन्द्रमा और भूछाया के केन्द्रों की निकटतम दूरी होगी । यदि छ को केन्द्र मानकर म के समान त्रिज्या से वृत्त खींचा जाय जो च ब को दो बिन्दुओं स, सा पर काटे तो यही दो बिन्दु आपेक्षिक मार्ग पर चन्द्रमा के स्पर्श और मोक्षकाल के स्थान होंगे । यदि इन पर बिन्दुओं से च क के समानान्तर रेखाएँ खींची जायँ तो ये चन्द्रमा के यथार्थ मार्ग के जिन बिन्दुओं पर पहुँचेंगी वही स्पर्श और मोक्षकाल के यथार्थ स्थान होंगे । यदि क च ख कोण को इ और का च खा कोण को ई मान लिया जाय तो स्परे इ = $\frac{क ख}{क च} = \frac{शा}{चा}$ स्परे ई = $\frac{का खा}{का च} = \frac{क ख}{का च} = \frac{शा}{क च - क का} = \frac{शा}{चा - रा}$ कोण च छ फ और छ च फ का योग समकोण के समान है क्योंकि च ब पर छ फलम्ब खींचा गया है परन्तु छ च फ और फ च क कोणों का योग भी समकोण के समान है क्योंकि चछ छप पर लम्ब है और च क, छ प के समानान्तर है । इसलिए कोण च छ फ = कोण फ च क = ई, $\because$ छ फ = च छ कोज्या ई = श कोज्या ई यदि श कोज्या ई का मान भूछाया और चंद्रमा के व्यासार्धों के योग से अधिक होगा तो ग्रहण नहीं लगेगा । परन्तु यदि श कोज्या ई, म से छोटा होगा तो ग्रहण अवश्य लगेगा । यदि यह जानना हो कि खंड ग्रहण लगेगा या सर्वग्रास तो दोनों का अंतर निकालना चाहिये । यदि म — श कोज्या ई का मान चन्द्रमा के व्यास से छोटा. हो तो समझना चाहिये कि खंड ग्रहण लगेगा और यदि इसका मान चन्द्रमा के व्यास से बड़ा हो तो सर्वग्रास ग्रहण लगेगा क्योंकि चित्र ६६ से प्रकट है कि म — श कोज्या ई = चन्द्रमा का ग्रसित भाग । इसलिए यदि ग्रसित भाग चन्द्रमा के व्यास से कम होगा तो स्पष्ट है कि सर्वग्रास ग्रहण नहीं लग सकता । परन्तु यदि ग्रसित भाग चन्द्रमा के व्यास के अधिक है जो सर्वग्रास ग्रहण अवश्य लगेगा ।
चन्द्रग्रहणाधिकार ४६१ चित्र ६६ चित्र ६६ चन्द्रमा और भूछाया का उस समय का चित्र है जब कि चन्द्रमा भूछाया से निकटतम अन्तर पर रहता है अर्थात् जब चन्द्रमा चित्र ६८ के फ बिन्दु पर रहता है और भूछाया छ पर । यह स्पष्ट है कि छ झ भूछाया का व्यासार्धं और च ज चन्द्रमा का व्यासार्धं है । चन्द्रमा का ग्रसित भाग ज झ के समान है । अब देखना है कि ज झ का परिमाण क्या है ? ज झ = छ झ - छ ज = छ झ - (च छ - च ज) = छ झ + च ज - च छ = म - श कोज्या ई यदि म - श कोज्या ई शून्य के समान हो अर्थात् यदि म = श कोज्या ई तो ग्रहण नहीं लगेगा क्योंकि चन्द्रमा भूछाया को स्पर्श करता हुआ निकल जायगा । ऐसी दशा में भूछाया के केन्द्र से पात का अन्तर छ प का परिमाण यों निकलेगा - यह प्रकट है कि कोण च प छ = इ, ∵ स्परे इ = च छ / छ प ∴ छ प = च छ / स्परे इ = श / स्परे इ परन्तु ऊपर मान लिया गया है कि म = श कोज्या ई
४६२ सूर्य-सिद्धान्त $\because$ श = $\frac{म}{कोज्या ई}$ $\therefore$ छ प = $\frac{म}{कोज्या ई \times स्परे इ}$ = म छेरे ई कोस्परे इ इस प्रकार यह सिद्ध हुआ कि जब पात से भूछाया का अंतर म छेरे ई कोस्परे इ के समान या अधिक होगा तब ग्रहण नहीं लगेगा और कम होगा तो ग्रहण अवश्य लगेगा। परन्तु ऊपर माना गया है कि स्परे इ = $\frac{शा}{चा} =$ $\frac{चन्द्रमा के शर की गति}{चन्द्रमा के भोगांश की गति}$ स्परे ई = $\frac{शा}{चा-रा} =$ $\frac{चन्द्रमा के शर की गति}{सूर्य और चन्द्रमा की गतियों का अंतर}$ और म = भूछाया और चन्द्रमा के व्यासार्धों का योग इसलिए यह तीनों गुणक चन्द्रमा और सूर्य की गतियों पर निर्भर हैं जो अस्थिर हैं इसलिए छ प का मान भी अस्थिर है। यहाँ इ क्रान्तिवृत्त और चन्द्रकक्षा के बीच का कोण है इसलिए वह ज्ञात है परन्तु ई अज्ञात है इसलिए पहले ई को ही जानना चाहिए। ऊपर के सम्बन्ध से स्पष्ट है कि $\frac{स्परे ई}{स्परे इ} = \frac{शा}{चा-रा} \div \frac{शा}{चा} = \frac{चा}{चा-रा}$ $\because$ स्परे ई = $\frac{चा}{चा-रा} \times स्परे इ$ $\because$ इ, चा और रा के मध्यम मान क्रमशः ५°६′, ७६०′३५″ और ५९′८″ है। इसलिए $\frac{चा}{चा-रा} = \frac{७६०′३५″}{७६०′२५″-५९′८″} = \frac{७६०′३५″}{७०१′२७″} = १\cdot०८०८४$ $\therefore$ स्परे ई = $१\cdot ०८०८४ \times स्परे ५^\circ ६^\prime$ = $१\cdot ०८०८४ \times \cdot ०६०१$ = $\cdot ०६७४$ $\therefore$ ई = $५^\circ ३४^\prime$ $\therefore$ छ प = म छेरे ई को स्परे इ = $\frac{म}{कोज्या ई स्परे इ}$
चन्द्रग्रहणाधिकार ४६३ म = ———————————————— कोज्या ५° ३४' स्परे ५° ६' परन्तु म == भूछाया और चन्द्रमा के व्यासार्धों का योग ∵ म का मध्यम मान = भूछाया का मध्यम व्यासार्ध + चन्द्रमा का मध्यम व्यासार्ध भूछाया का मध्यम व्यासार्ध = चन्द्रमा का मध्यम लंबन + सूर्य का मध्यम लंबन
- सूर्य का मध्यम व्यासार्ध = ५७' ११" + ८"·५ - १६' ४" = ४१' १८"·५ इसका १/६० और बढ़ाने पर भूछाया का मध्यम व्यासार्ध = ४१' १८"·५ + ४१"·६ = ४२' ८" = ४२'·१३५ और चन्द्रमा का मध्यम व्यासार्ध = १५' ३५" = १५'·५८३ ∴ म = ४२'·१३५ + १५'·५८३ = ५७'·७२ ५७'·७२ ∴ छ प = ————————————— कोज्या ५° ३४' स्परे ५° ६' ∴ लरि (छ प) = लरि ५७'·७२ - लरि कोज्या ५° ३४' - लरि स्परे ५° ६' = १·७६१४ - ६·६६७६ - ८·६५४६ = २·८०८६ ∴ छ प = ६४४' = १०° ४४' यह चन्द्रग्रहण की मध्यम सीमा है। इसी प्रकार यह जाना जा सकता है कि छ प का महत्तम मान १२° ३६' और लघुतम मान ६° है। इसका अर्थ यह हुआ कि यदि छ प १२° ३६' से अधिक हो तो चन्द्र ग्रहण असम्भव है और ६° से कम हो तो ग्रहण अवश्य पड़ेगा परन्तु यदि छ प ६° से अधिक और १२° ३६' से कम हो तो ग्रहण सम्भव हो सकता है, जिसका निश्चय पूर्णिमान्तकालिक सूर्य और चन्द्रमा के लंबन तथा इनके स्पष्ट बिम्बार्ध से करना चाहिए । यह पहले ही बतला दिया गया है कि छ प भूछाया के केन्द्र से पात की दूरी है परन्तु भूछाया का केन्द्र सूर्य के केन्द्र से १८०° आगे रहता है और चन्द्रमा के दोनों पातों का अन्तर भी १८०° होता है इसलिए यदि पूर्णिमान्तकालिक सूर्य से चन्द्रमा के किसी पात का अन्तर १२° ३६' से अधिक हो तो ग्रहण असम्भव है, ६° से कम
४६४ सूर्य-सिद्धान्त हो तो ग्रहण अवश्य पड़ेगा और इन दोनों के बीच में हो तो सम्भव है ग्रहण लगे । इसलिए चन्द्रग्रहण की महत्तम सीमा १२°३६′ और लघुत्तम सीमा ६° होती है । सूर्यग्रहण की महत्तम और लघुत्तम सीमा — जिस तरह चित्र ६३ से सिद्ध होता है कि जब चन्द्रमा पृथ्वी की छाया स ह में आ जाता है तब चन्द्र-ग्रहण पड़ता है उसी तरह उसी चित्र से यह भी सिद्ध होता है कि जब चन्द्रमा अमावस्या के अंत में पृथ्वी की छाया बनानेवाली स्पर्श-रेखाओं के सा, हा बिन्दुओं के बीच में आ जाता है तब पृथ्वी पर कहीं न कहीं सूर्य-ग्रहण अवश्य देख पड़ेगा क्योंकि ऐसी स्थिति में चन्द्रमा की छाया पृथ्वी के किसी न किसी स्थान पर अवश्य पड़ेगी । जिस प्रकार स ह के व्यासार्ध के परिमाण से चन्द्र-ग्रहण की सीमा जानी जा सकती है उसी प्रकार सा हा के व्यासार्ध के परिमाण से सूर्य-ग्रहण की सीमा जानी जा सकती है । ∠ सा प छा = ∠ प न पा + < प सा पा = < रि प र + < प सा पा = सूर्य की त्रिज्या - सूर्य का लंबन + चन्द्रमा का लंबन ∵ < सा प छा का मध्यम मान = १६′ १″ - ८″.५ + ५७′ ११″ = ७३′ ३″.५ = ७३′.०५८ सूर्य-ग्रहण के संबंध में भी सूत्र छ प = म छरे ई कोस्परे ५, काम दे सकता है । यहां म = ∠ सा प छा + चन्द्रमा का व्यासार्ध = ७३′.०५८ + १५′.५८३ = ८८′.६४ ∵ छ प = ८८′.६४ / (कोज्या ५° ३४′ स्परे ५° ६′) ∵ लरि छ प = लरि ८८′.६४ - लरि कोज्या ५° ३४′ - लरि स्परे ५° ६′ = १.६४७६ - ६.६६७६ - ८.६५४६ = २.६६५१ ∵ छ प = ६८८′.६ = १६° २८′.६ यह सूर्य-ग्रहण की मध्यम सीमा है । इसी प्रकार यह जाना जा सकता है कि सूर्य- ग्रहण के संबंध में छ प का महत्तम मान १८°.५ और लघुत्तम मान १५°.३ है । अर्थात् यदि अमावस्या के अंत में सूर्य से चंद्रमा के किसी पात का अंतर १५°.३ से कम हो तो समझना चाहिए कि सूर्य-ग्रहण अवश्य पड़ेगा और यदि यह अंतर १८°.५ से अधिक है तो सूर्य-ग्रहण सम्भव नहीं है । परन्तु यदि यह अंतर इन दोनों के बीच