भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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४५८ सूर्य-सिद्धान्त ग्रहण पूर्णिमा के अंत में और सूर्यग्रहण अमावस्या के अंत में लगते हैं। (देखो चित्र ६७) अब यह प्रश्न हो सकता है कि प्रत्येक पूर्णिमा और अमावस्या के अंत में चन्द्रग्रहण या सूर्यग्रहण क्यों नहीं लगता ? इसका कारण यह है कि चन्द्रमा का कक्षातल क्रान्तिवृत्त के कक्षातल से भिन्न है। इन दोनों का परम अंतर ५° के लगभग है जिसे चन्द्रमा का परमविक्षेप या परम शर कहते हैं (देखो मध्यमाधिकार पृ० ७४- ७५) । परंतु सूर्य और चन्द्रमा के बिम्बार्ध १६' के लगभग तथा पृथ्वी की छाया का व्यासार्ध अथवा भूभार्ध ४२' के लगभग होता है (देखो पहले का उदाहरण) इसलिए जब चन्द्रमा अपनी कक्षा में ऐसी जगह रहता है जो क्रान्तिवृत्त के पास हो और क्रान्तिवृत्त से जिसका अन्तर १६' + ४२' = ५८' के लगभग या इससे भी कम हो तभी ग्रहण हो सकता है । यह स्थिति उसी समय सम्भव है जब अमावस्या या पूर्णमासी के लगभग चन्द्रमा अपनी कक्षा और क्रान्तिवृत्ति के मिलन बिन्दुओं अर्थात् पातों के पास हो । परन्तु चन्द्रमा के पात एक दूसरे से सदैव १८०° के अंतर पर होते हैं इसलिए यह