सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचन्द्रग्रहणाधिकार ४५७ क ख + ग घ = (त ध - प फ) × ४८०/६५०० परन्तु क ख + ग घ = क घ - छ ग = सूची - चंद्रकक्षा में भूछाया और त ध - प फ = सूर्य का स्पष्ट ब्यास - पृथ्वी का व्यास सूची - चंद्रकक्षा में भूछाया = (सूर्य का स्पष्ट व्यास - पृथ्वी का व्यास) × ४८०/६५०० ∴ चन्द्रकक्षा में भूछाया = सूची - (सूर्य का स्पष्ट व्यास - पृथ्वी का व्यास) × ४८०/६५०० यही ४, ५ श्लोकों का तात्पर्य है । ग्रहण कब सम्भव होता है— भानोर्भार्धे महोच्छाया तत्तुल्येऽर्कसमेऽथवा । शशाङ्कपाते ग्रहणं कियद्भागाधिकोनके ॥६॥ तुल्यौ राश्यादिभिः स्याता ममावास्यान्तकालिकौ । सूर्येन्दु पौर्णमास्यन्ते भार्धे भागादिभिस्समौ ॥७॥ अनुवाद—(६) सूर्य से ६ राशि के अंतर पर पृथ्वी की छाया होती है । यदि सूर्य से इतनी ही दूरी पर अथवा सूर्य के ही समान राशि अंश पर अथवा इनसे कुछ ही कम या अधिक दूरी पर चन्द्रमा का पात हो तो सूर्य और चन्द्रमा में ग्रहण लगता है । (७) सूर्य और चन्द्रमा के राशि अंश कला विकला इत्यादि अमावस्या के अन्त में समान होते हैं और पूर्णमासी के अंत में ठीक ६ राशि के अंतर पर होते हैं । विज्ञान भाष्य—चित्र ६३ से प्रकट है कि पृथ्वी की छाया का केन्द्र छ या न सूर्य और पृथ्वी के केन्द्रों को मिलाने वाली रेखा र प न पर सदैव रहता है इसलिए पृथ्वी की छाया सूर्य से सदैव १८०° या ६ राशि आगे रहती है । इसलिए जब चन्द्रमा सूर्य से १८०° के लगभग आगे रहता है तभी यह पृथ्वी के छाया में प्रवेश कर सकता है अन्यथा नहीं । परन्तु जब चन्द्रमा सूर्य से १८०° आगे रहता है तब पूर्णिमा का अंत होता है इसलिए पूर्णिमा के अंत काल के लगभग चंद्रग्रहण लग सकता है । इसी प्रकार जब चन्द्रमा सूर्य के सामने आकर उसको ढक लेता है तभी सूर्य ग्रहण लगता है परन्तु यह बात तभी संभव है जब सूर्य और चन्द्रमा के भोगांश प्रायः समान होते हैं अर्थात् जब अमावस्या होती है । इसलिए यह प्रकट है कि चन्द्र- २