भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 474, कुल 838 में से

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चन्द्रग्रहणाधिकार ४४६ स्फुट व्यास = मध्यम व्यास ✕ स्फुट गति / मध्यम गति चन्द्रकक्षा में सूर्य का स्फुट व्यास = सूर्य का स्फुट व्यास ✕ सूर्य का महायुगोय भगण / चन्द्रमा का महायुगीय भगण अथवा = सूर्य का स्फुट व्यास ✕ चन्द्रकक्षा / सूर्य की कक्षा यहां यह शंका उत्पन्न हो सकती है कि क्या सूर्य का योजनात्मक आकार भी घटता बढ़ता है क्योंकि ऊपर बतलाया गया है कि सूर्य का स्फुट (स्पष्ट) व्यास उसकी स्फुट गति पर अवलंबित है जो सदा घटती बढ़ती रहती है। परन्तु बात यह नहीं है। सूर्य का योजनात्मक आकार स्फुट गति के अनुसार कदापि घटता बढ़ता नहीं है, हां कलात्मक या कोणात्मक आकार अवश्य बदलता है जिसकी मीमांसा स्पष्टाधिकार पृष्ठ ८४-८६ में अच्छी तरह की गयी है। यहां मध्यम व्यास और स्फुट व्यास का परिमाण यद्यपि योजनों में बतलाया गया है तथापि इसे कोणात्मक ही समझना चाहिए क्योंकि इस जानने की जो रीति भास्कराचार्य जी१ ने लिखी है उससे यह अर्थ निकलता है। भास्कराचार्य जी कहते हैं कि जिस दिन सूर्य की स्पष्ट या स्फुट गति मध्यम गति के समान हो उस दिन उदयकाल में ३४३८ इकाइयों के समान दो लकड़ियां लेकर इनके दो सिरों को मिलाकर२ मूल स्थानों में आंख रखकर सूर्य के बिंब को इस प्रकार बेधो कि इन लकड़ियों के आगेवाले सिरे बिम्ब के उत्तर और दखिन वाले किनारों को स्पर्श करें। इसी दशा में लकड़ियों के सिरों को इस प्रकार कस दो कि आगेवाले सिरों की दूरी में कोई भेद न पड़े। अब इन सिरों की दूरी को उसी इकाई से नापो जिससे लकड़ियों की लम्बाई नापी गयी है। यह अन्तर जितनी इकाइयों के समान होगा उतनी ही कला सूर्य के बिम्ब का व्यास होगा। भास्कराचार्य जी के अनुसार यह व्यास ३२′३१″३३‴ होता है। यदि इसको ३२′३०″ या ३२′·५ माना जाय और सूर्य की कक्षा३ का मान ४३,३१,५०० योजन लिया जाय तो सूर्य- बिम्ब का योजनात्मक मान इस प्रकार प्राप्त होगा :— १. गणिताध्याय पृष्ठ १७१-१७२ २. आजकल यह काम परकार (dividers) की नोकों से किया जा सकता है। आंख उस विन्दु पर होनी चाहिए जहां कम्पास की दोनों भुजाएं मिलती हों। ३. भूगोलाध्याय श्लोक ८६ ।

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