सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचन्द्रग्रहणाधिकार ४५१ जि अनुपात से इनके कोणात्मक बिम्बों का परिवर्तन होता है। (देखो स्पष्टाधिकार पृष्ठ ८८) । चन्द्रकक्षा में सूर्य का स्पष्ट व्यास जानने के दो नियम बतलाये गये हैं जो वास्तव में एक ही नियम के दो रूप हैं। चित्र ६५ में यदि र रा सूर्य की कक्षा, और च चा चन्द्रमा की कक्षा के खंड मान लिये जायें, भ पृथ्वी का केन्द्र हो और यदि र रा सूर्य बिम्ब के समान मान लिया जाय तो चन्द्रकक्षा में यह बिम्ब च चा के समान होगा। यह स्पष्ट ही है कि च चा भ च चन्द्रकक्षा का व्यासार्ध —— = —— = ——————————— र रा भ र सूर्यकक्षा का व्यासार्ध चन्द्रकक्षा = —————— स सूर्यकक्षा क्योंकि दो वृत्तों की परिधियों में वही अनुपात होता है जो उनके व्यासार्धों में होता है। इसलिए र रा × चन्द्रकक्षा च चा = —————————— सूर्यकक्षा सूर्य का स्पष्ट व्यास × चन्द्रकक्षा = ———————————————— सूर्य की कक्षा इस प्रकार चन्द्रकक्षा में सूर्य के स्पष्ट व्यास के जानने का दूसरा नियम सिद्ध हो गया। अब यह बतलाना कठिन नहीं है कि पहला इसका रूपान्तर किस प्रकार है। यह पहले ही बतलाया जा चुका है कि हमारे आचार्यों का मत है कि प्रत्येक ग्रह की दैनिक योजनात्मक गति समान होती है। इसलिए यह सिद्ध है कि प्रत्येक ग्रह एक महायुग या कल्प में जितने योजन चलता है वह सब ग्रहों के लिए एक सा है। ग्रह एक महायुग में जितने योजन चलता है उसको यदि ग्रह के महायुगीय भगण से भाग दे दिया जाय तो ग्रह की कक्षा का मान योजनों में निकल आवेगा, इसको यों भी लिखा जा सकता है :— ग्रह की महायुगीय गति (योजनों में) —————————————— = ग्रह की कक्षा (योजनों में) ग्रह का महायुगीय भगण यदि ग्रह की महायुगीय योजनात्मक गति को म मान लिया जाय और सूर्य के महायुगीय भगण को र तथा चन्द्रमा के महायुगीय भगण को च मान लिया जाय तो उपर्युक्त नियम के अनुसार