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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

चन्द्रग्रहणाधिकार ४५१ जि अनुपात से इनके कोणात्मक बिम्बों का परिवर्तन होता है। (देखो स्पष्टाधिकार पृष्ठ ८८) । चन्द्रकक्षा में सूर्य का स्पष्ट व्यास जानने के दो नियम बतलाये गये हैं जो वास्तव में एक ही नियम के दो रूप हैं। चित्र ६५ में यदि र रा सूर्य की कक्षा, और च चा चन्द्रमा की कक्षा के खंड मान लिये जायें, भ पृथ्वी का केन्द्र हो और यदि र रा सूर्य बिम्ब के समान मान लिया जाय तो चन्द्रकक्षा में यह बिम्ब च चा के समान होगा। यह स्पष्ट ही है कि च चा भ च चन्द्रकक्षा का व्यासार्ध —— = —— = ——————————— र रा भ र सूर्यकक्षा का व्यासार्ध चन्द्रकक्षा = —————— स सूर्यकक्षा क्योंकि दो वृत्तों की परिधियों में वही अनुपात होता है जो उनके व्यासार्धों में होता है। इसलिए र रा × चन्द्रकक्षा च चा = —————————— सूर्यकक्षा सूर्य का स्पष्ट व्यास × चन्द्रकक्षा = ———————————————— सूर्य की कक्षा इस प्रकार चन्द्रकक्षा में सूर्य के स्पष्ट व्यास के जानने का दूसरा नियम सिद्ध हो गया। अब यह बतलाना कठिन नहीं है कि पहला इसका रूपान्तर किस प्रकार है। यह पहले ही बतलाया जा चुका है कि हमारे आचार्यों का मत है कि प्रत्येक ग्रह की दैनिक योजनात्मक गति समान होती है। इसलिए यह सिद्ध है कि प्रत्येक ग्रह एक महायुग या कल्प में जितने योजन चलता है वह सब ग्रहों के लिए एक सा है। ग्रह एक महायुग में जितने योजन चलता है उसको यदि ग्रह के महायुगीय भगण से भाग दे दिया जाय तो ग्रह की कक्षा का मान योजनों में निकल आवेगा, इसको यों भी लिखा जा सकता है :— ग्रह की महायुगीय गति (योजनों में) —————————————— = ग्रह की कक्षा (योजनों में) ग्रह का महायुगीय भगण यदि ग्रह की महायुगीय योजनात्मक गति को म मान लिया जाय और सूर्य के महायुगीय भगण को र तथा चन्द्रमा के महायुगीय भगण को च मान लिया जाय तो उपर्युक्त नियम के अनुसार

४५२ सूर्य-सिद्धान्त $\frac{म}{र} =$ सूर्य की कक्षा और $\frac{म}{च} =$ चन्द्रकक्षा यदि दूसरे समीकरण के प्रत्येक पक्ष को पहले समीकरण के समपक्ष (corres- ponding sides) से भाग दे दिया जाय तो $\frac{म}{च} \div \frac{म}{र} = \frac{चन्द्रकक्षा}{सूर्य की कक्षा}$ अथवा $\frac{र}{च} = \frac{चन्द्रकक्षा}{सूर्य की कक्षा}$ इस प्रकार सूर्य के स्फुट व्यास का पहला नियम भी सिद्ध हो गया । यहाँ यह बतला देना आवश्यक है कि सूर्य का स्फुट व्यास तथा सूर्य की कक्षा का विस्तार यथार्थ में उतना नहीं है जितना हमारे सिद्धान्त ग्रन्थों में बतलाया गया है । अनेक बेधों से यह सिद्ध हो गया कि सूर्य का लम्बन ९ कला से अधिक नहीं होता इसलिए पृथ्वी से इसकी दूरी लम्बन के सूत्र के अनुसार (देखो त्रिप्रश्नाधिकार पृष्ठ ३८४) ९ करोड़ २६ लाख मील है और इसके पिंड का व्यासार्ध ४, ३२, ८६० मील है (देखो पृष्ठ ६६) । यदि योजन का परिमाण ५ मील के समान समझा जाय (देखो पृष्ठ ५४) तो सूर्य का व्यासार्ध = $\frac{४३२८६०}{५} =$ ८६५७८ योजन, और सूर्य की मध्यम दूरी = $\frac{९,२६,००,०००}{५} =$ १,८५,२०,००० योजन यह परिमाण हमारे सिद्धान्त के परिमाणों से कितना भिन्न है यह नीचे की तालिका से स्पष्ट हो जायगा जहां सब परिमाण योजनों में दिये जाते हैं :-

सूर्यसिद्धान्तसिद्धान्त शिरोमणिR. S. Ball's Spherical Astronomy
सूर्य बिंब का व्यास६५००६५२२
सूर्य की मध्यम दूरी६८८३७८६८८३७७
चन्द्र बिंब का व्यास४८०४८०
चन्द्रमा की मध्यम दूरी५१५६६५१५६६

चन्द्रग्रहणाधिकार ४५३ तीसरे श्लोक के उत्तरार्द्ध में यह भी बतलाया गया है कि चन्द्रमा की कक्षा में सूर्य बिम्ब का जो व्यास योजनों में हो उसको १५ से भाग देने पर इसका परिमाण कलाओं में आ जायगा। इसका कारण यह है कि चन्द्रकक्षा का विस्तार ३२४००० योजन माना गया है जो ३६० अंश या २१६०० कला के समान भी है इसलिए जब २१६०० कला = ३२४००० योजना तब १ कला = ३२४००० / २१६०० = १५ योजन जिसका अर्थ यह हुआ कि चन्द्रकक्षा का १५ योजन एक कला के समान होता है । चन्द्रकक्ष में भूछाया के व्यास का परिमाण— शशाङ्ककक्ष्यागुणितो भाजितो वाऽर्ककक्ष्यया । विष्कम्भश्चन्द्रकक्ष्यायां तिथ्याप्तो मानलिप्तिकाः ॥४॥ स्फुटेन्दुभुक्तिभूव्यासगुणिता मध्ययोद्धृता । लब्धं सूची महीव्यासस्फुटार्कश्रवणान्तरम् ॥५॥ मध्येन्दुव्यासगुणितं मध्यार्कव्यासभाजितम् । विशोध्य लब्धं सूच्यास्तु तमो लिप्ताश्च पूर्ववत् ॥६॥ अनुवाद—(४) चन्द्रमा की स्पष्ट गति को पृथ्वी के व्यास से गुणा करके गुणनफल को चन्द्रमा की मध्य गति से भाग देने पर जो लब्धि आती है उसे सूची कहते हैं। सूर्य के स्फुट व्यास से पृथ्वी के व्यास को घटाकर (५) शेष को चंद्रमा के मध्यम व्यास से गुणा करके और गुणनफल को सूर्य के मध्यम व्यास से भाग दे दो । लब्धि को सूची से घटा देने पर जो शेष आवेगा वह चन्द्रकक्षा में पृथ्वी की छाया का व्यास योजनों में आ जायगा । इसको पहले की तरह १५ से भाग दे देने पर भूछाया का व्यास कलाओं में ज्ञात हो जायगा । विज्ञान भाष्य—यहाँ चन्द्रमा और सूर्य की स्पष्ट गतियों को चा और रा अक्षरों से सूचित किया जायगा । यदि चन्द्रमा और सूर्य के महायुगीन भगणों को महायुगीन सावन दिनों से भाग दे दिया जाय और लब्धि की कलाएं बनायी जायें तो चन्द्रमा और सूर्य की मध्यम दैनिक गतियाँ क्रमानुसार ७६०' ०५६ और ५६' ०१३६२ होती हैं। पृथ्वी का व्यास १६०० योजन माना गया है (देखो मध्यमा- धिकार श्लोक ५६) । इन मानों के आधार पर उपर्युक्त दो श्लोकों को संक्षेप में इस प्रकार लिखा जा सकता है— सूची = १६०० x चा / ७६०·५६ सूर्य का स्फुट व्यास = ६५०० x रा / ५६·१३६२ (देखो श्लोक २) ।

४५४ सूर्य-सिद्धान्त चन्द्रकक्षा में भूछाया का योजनात्मक व्यास = १६०० चा / ७६०·५६ - ( ६५०० रा / ५६·१३६२ - १६०० ) × ४८० / ६५०० यदि इसको १५ से भाग दे दिया जाय तो चन्द्रकक्षा में भूछाया का कालात्मक व्यास = १०६ २/३ × चा / ७६०·५६ - ३२ × रा / ५६·१३६२ + ७·८८ जिस समय चन्द्रमा और सूर्य की स्पष्ट गतियां इनकी मध्यम गतियों के समान होंगी उस समय चा / ७६०·५६ और रा / ५६·१३६२ एक के समान होंगे । ऐसी दशा में भूछाया का कलात्मक व्यास १०६·६७ - ३२ + ७·८८ = ८२·५५ चित्र ६३ की सहायता से आरंभ में यह बतलाया जा चुका है कि भूभार्ध अर्थात् चन्द्रकक्षा में पृथिवी की छाया का अर्धव्यास ४१' ५७" होता है जिससे पृथिवी की छाया का व्यास ८४' के लगभग आता है । इसलिए यह स्पष्ट है कि सूर्य-सिद्धान्त के नियम से पृथिवी की छाया का व्यास जितना आता है वह नवीन रीति से निकाले हुए व्यास के प्रायः समान ही होता है यद्यपि उसके उपकरण स्थूल और अशुद्ध हैं । भारतीय रीति से भूछाया के व्यास का जो परिमाण आता है वह तीन पदों १०६·६७, ३२ और ७·८८ के योग वियोग से सिद्ध होता है ।

चन्द्रग्रहणाधिकार ४५५ इसी तरह नवीन रीति से भूभाद्धं का परिमाण भी तीन पदों ५८' १'', १६'१३'' और ६'' के योग वियोग से व्यक्त किया जा सकता है (देखो ४३८ पृष्ठ का उदाहरण) । इन तीन पदों के दूने क्रम से ११६' २'', ३२' २६'' और १८'' है । इनमें ३२'२६'' भारतीय नियम के दूसरे पद से बिल्कुल मिलता है, पहला पद यहाँ ११६' और वहाँ १०७ कला है और तीसरा पद यहाँ १८'' और वहाँ ८' के लगभग है इसलिए पहले और तीसरे पदों का योग ११६' के लगभग हो जाता है । इससे प्रकट है कि हमारे सिद्धान्त से भूभार्ध का जो रूप सिद्ध होता है वह नवीन रूप से केवल इस बात में भिन्न है कि सूर्य का आकार और उसकी दूरी हमारे यहाँ बहुत कम मानी गयी है । उपपत्ति : कल्पना करो कि भ पृथ्वी का केन्द्र, प फ पृथ्वी का व्यास, र सूर्य का केन्द्र, त ध सूर्य का व्यास, च मध्यम चन्द्रमा का केन्द्र, चा स्पष्ट चन्द्रमा का केन्द्र, त प खा और ध फ गा पृथ्वी और सूर्य की सामान्य स्पर्शरेखाएं, तथा थ प का और द फ धा रेखाएं र भ के समानान्तर हैं। यह स्पष्ट है कि खा गा स्पष्ट चन्द्रमा के तल में पृथ्वी की छाया का व्यास है जो भूकेन्द्र से देखने पर मध्यम चन्द्रमा की कक्षा में ख ग के समान होगा। यदि भ का और भ धा बढ़ाये जायें तो मध्यम चन्द्रमा की कक्षा में क, घ विन्दुओं पर मिलेंगे। चित्र ६६ से स्पष्ट है कि भूछाया का व्यास खा गा = का धा - (का खा + गा घा) = प फ - (का खा + गा घा) समजातीय त्रिभुज प का खा और प थ त में, प का / प थ = का खा / त थ इसी तरह फ गा / फ ध = गा घा / द ध परन्तु प का = फ गा और प थ = फ ध ∵ का खा / त थ = गा घा / द ध = (का खा + गा घा) / (त थ + द ध) = (का खा + गा घा) / (त ध - थ द) ∵ प का / प थ = (का खा + गा घा) / (त ध - प फ) ... ... ...(१) समजातीय त्रिभुज का भ धा और क भ घ में भ चा / भ च = का धा / क घ

४५६ सूर्य-सिद्धान्त परन्तु भ चा और भ च पृथ्वी से स्पष्ट और मध्यम चन्द्रमा की दूरियां हैं और यह बताया गया है कि कोणीय वेग कर्ण के वर्ग के प्रतिलोम के अनुसार बदलता है (देखो स्पष्टाधिकार पृष्ठ ८८) इसलिए स्थूल रूप से यह माना जा सकता है कि कोणीय वेग कर्ण के भी प्रतिलोम के अनुसार बदलता है जैसा कि सूर्य-सिद्धान्त के नियम से प्रकट होता है । इसलिए भ चा / भ च = चंद्रमा की मध्यम गति / चंद्रमा की स्पष्ट गति = म / स ∵ म / स = का घा / क घ = प फ / क घ ∴ क घ = प फ × स / म = भू व्यास × स्पष्टगति / मध्यम गति इसी क घ का नाम श्लोक ४ में सूची रखा गया है । समजातीय त्रिभुज भ का खा और भ क ख इत्यादि से सिद्ध हो सकता है कि भ चा / भ च = का खा / क ख = गा घा / ग घ = का खा + गा घा / क ख + ग घ ...(२) समीकरण (१) और (२) में प का और भ चा समान हैं इसलिए प ध × का खा + गा घा / त ध - प फ = भ च × का खा + गा घ / क ख + ग घ या प थ / भ च = त ध - प फ / क ख + ग घ परन्तु प थ या भ र पृथ्वी से सूर्य की मध्यम दूरी और भ च पृथ्वी से चन्द्रमा की मध्यम दूरी है जिनका अनुपात = ४३३१५०० / ३२४००० = १३·३७ क्योंकि सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार ४३३१५०० योजन सूर्य की कक्षा और ३२४००० योजन चन्द्रमा की कक्षा के विस्तार हैं, तथा ६५०० / ४८० = १३·५४, सूर्य और चन्द्रमा के मध्यम व्यासों का अनुपात है जो १३·३७ के प्रायः समान है। इसलिए यह मान लेने में कोई हर्ज नहीं कि प थ / भ च = ६५०० / ४८० = सूर्य का मध्यम व्यास / चन्द्रमा का मध्यम व्यास ∴ ६५०० / ४८० = तध - प फ / क ख + ग घ

चन्द्रग्रहणाधिकार ४५७ क ख + ग घ = (त ध - प फ) × ४८०/६५०० परन्तु क ख + ग घ = क घ - छ ग = सूची - चंद्रकक्षा में भूछाया और त ध - प फ = सूर्य का स्पष्ट ब्यास - पृथ्वी का व्यास सूची - चंद्रकक्षा में भूछाया = (सूर्य का स्पष्ट व्यास - पृथ्वी का व्यास) × ४८०/६५०० ∴ चन्द्रकक्षा में भूछाया = सूची - (सूर्य का स्पष्ट व्यास - पृथ्वी का व्यास) × ४८०/६५०० यही ४, ५ श्लोकों का तात्पर्य है । ग्रहण कब सम्भव होता है— भानोर्भार्धे महोच्छाया तत्तुल्येऽर्कसमेऽथवा । शशाङ्कपाते ग्रहणं कियद्भागाधिकोनके ॥६॥ तुल्यौ राश्यादिभिः स्याता ममावास्यान्तकालिकौ । सूर्येन्दु पौर्णमास्यन्ते भार्धे भागादिभिस्समौ ॥७॥ अनुवाद—(६) सूर्य से ६ राशि के अंतर पर पृथ्वी की छाया होती है । यदि सूर्य से इतनी ही दूरी पर अथवा सूर्य के ही समान राशि अंश पर अथवा इनसे कुछ ही कम या अधिक दूरी पर चन्द्रमा का पात हो तो सूर्य और चन्द्रमा में ग्रहण लगता है । (७) सूर्य और चन्द्रमा के राशि अंश कला विकला इत्यादि अमावस्या के अन्त में समान होते हैं और पूर्णमासी के अंत में ठीक ६ राशि के अंतर पर होते हैं । विज्ञान भाष्य—चित्र ६३ से प्रकट है कि पृथ्वी की छाया का केन्द्र छ या न सूर्य और पृथ्वी के केन्द्रों को मिलाने वाली रेखा र प न पर सदैव रहता है इसलिए पृथ्वी की छाया सूर्य से सदैव १८०° या ६ राशि आगे रहती है । इसलिए जब चन्द्रमा सूर्य से १८०° के लगभग आगे रहता है तभी यह पृथ्वी के छाया में प्रवेश कर सकता है अन्यथा नहीं । परन्तु जब चन्द्रमा सूर्य से १८०° आगे रहता है तब पूर्णिमा का अंत होता है इसलिए पूर्णिमा के अंत काल के लगभग चंद्रग्रहण लग सकता है । इसी प्रकार जब चन्द्रमा सूर्य के सामने आकर उसको ढक लेता है तभी सूर्य ग्रहण लगता है परन्तु यह बात तभी संभव है जब सूर्य और चन्द्रमा के भोगांश प्रायः समान होते हैं अर्थात् जब अमावस्या होती है । इसलिए यह प्रकट है कि चन्द्र- २

४५८ सूर्य-सिद्धान्त ग्रहण पूर्णिमा के अंत में और सूर्यग्रहण अमावस्या के अंत में लगते हैं। (देखो चित्र ६७) अब यह प्रश्न हो सकता है कि प्रत्येक पूर्णिमा और अमावस्या के अंत में चन्द्रग्रहण या सूर्यग्रहण क्यों नहीं लगता ? इसका कारण यह है कि चन्द्रमा का कक्षातल क्रान्तिवृत्त के कक्षातल से भिन्न है। इन दोनों का परम अंतर ५° के लगभग है जिसे चन्द्रमा का परमविक्षेप या परम शर कहते हैं (देखो मध्यमाधिकार पृ० ७४- ७५) । परंतु सूर्य और चन्द्रमा के बिम्बार्ध १६' के लगभग तथा पृथ्वी की छाया का व्यासार्ध अथवा भूभार्ध ४२' के लगभग होता है (देखो पहले का उदाहरण) इसलिए जब चन्द्रमा अपनी कक्षा में ऐसी जगह रहता है जो क्रान्तिवृत्त के पास हो और क्रान्तिवृत्त से जिसका अन्तर १६' + ४२' = ५८' के लगभग या इससे भी कम हो तभी ग्रहण हो सकता है । यह स्थिति उसी समय सम्भव है जब अमावस्या या पूर्णमासी के लगभग चन्द्रमा अपनी कक्षा और क्रान्तिवृत्ति के मिलन बिन्दुओं अर्थात् पातों के पास हो । परन्तु चन्द्रमा के पात एक दूसरे से सदैव १८०° के अंतर पर होते हैं इसलिए यह

चन्द्रग्रहणाधिकार ४५६ प्रकट है कि जब अमावस्या या पूर्णमासी के समय सूर्य के भोगांश के समान ही या इसके लगभग राहु या केतु किसी का भोगांश हो तभी ग्रहण लग सकता है अन्यथा नहीं । यह बात चित्र ६८ से अच्छी तरह स्पष्ट हो जायगी :- चित्र ६८ पूर्णिमान्त काल में :- छा = पृथ्वी की छाया का केन्द्र च = चन्द्रमा का केन्द्र च छा या श = चन्द्रमा का शर (विक्षेप) म = भूछाया और चन्द्रमा के व्यासार्धों का योग प = चंद्रमा का पात च क या चा = चन्द्रमा की प्रति घड़ी भोगांश गति क ख या शा = " " " शर की गति छ छा या रा = भूछाया अथवा सूर्य की प्रतिघड़ी भोगांश गति

४६० सूर्य-सिद्धान्त

क च रेखा पर क का, छ छा के समान काट लो और का से क ख के समान और समानान्तर का खा खींचो, च खा को मिलाकर खा की ओर क्रान्तिवृत्त के व बिन्दु तक खींचो । यही च खा व चन्द्रमा का आपेक्षिक मार्ग होगा, यदि यह मान लिया जाय कि भूछाया छ बिन्दु पर स्थिर है । यदि छ से च ब पर छ फ लम्ब डाला जाय तो यही चन्द्रमा और भूछाया के केन्द्रों की निकटतम दूरी होगी । यदि छ को केन्द्र मानकर म के समान त्रिज्या से वृत्त खींचा जाय जो च ब को दो बिन्दुओं स, सा पर काटे तो यही दो बिन्दु आपेक्षिक मार्ग पर चन्द्रमा के स्पर्श और मोक्षकाल के स्थान होंगे । यदि इन पर बिन्दुओं से च क के समानान्तर रेखाएँ खींची जायँ तो ये चन्द्रमा के यथार्थ मार्ग के जिन बिन्दुओं पर पहुँचेंगी वही स्पर्श और मोक्षकाल के यथार्थ स्थान होंगे । यदि क च ख कोण को इ और का च खा कोण को ई मान लिया जाय तो स्परे इ = $\frac{क ख}{क च} = \frac{शा}{चा}$ स्परे ई = $\frac{का खा}{का च} = \frac{क ख}{का च} = \frac{शा}{क च - क का} = \frac{शा}{चा - रा}$ कोण च छ फ और छ च फ का योग समकोण के समान है क्योंकि च ब पर छ फलम्ब खींचा गया है परन्तु छ च फ और फ च क कोणों का योग भी समकोण के समान है क्योंकि चछ छप पर लम्ब है और च क, छ प के समानान्तर है । इसलिए कोण च छ फ = कोण फ च क = ई, $\because$ छ फ = च छ कोज्या ई = श कोज्या ई यदि श कोज्या ई का मान भूछाया और चंद्रमा के व्यासार्धों के योग से अधिक होगा तो ग्रहण नहीं लगेगा । परन्तु यदि श कोज्या ई, म से छोटा होगा तो ग्रहण अवश्य लगेगा । यदि यह जानना हो कि खंड ग्रहण लगेगा या सर्वग्रास तो दोनों का अंतर निकालना चाहिये । यदि म — श कोज्या ई का मान चन्द्रमा के व्यास से छोटा. हो तो समझना चाहिये कि खंड ग्रहण लगेगा और यदि इसका मान चन्द्रमा के व्यास से बड़ा हो तो सर्वग्रास ग्रहण लगेगा क्योंकि चित्र ६६ से प्रकट है कि म — श कोज्या ई = चन्द्रमा का ग्रसित भाग । इसलिए यदि ग्रसित भाग चन्द्रमा के व्यास से कम होगा तो स्पष्ट है कि सर्वग्रास ग्रहण नहीं लग सकता । परन्तु यदि ग्रसित भाग चन्द्रमा के व्यास के अधिक है जो सर्वग्रास ग्रहण अवश्य लगेगा ।

चन्द्रग्रहणाधिकार ४६१ चित्र ६६ चित्र ६६ चन्द्रमा और भूछाया का उस समय का चित्र है जब कि चन्द्रमा भूछाया से निकटतम अन्तर पर रहता है अर्थात् जब चन्द्रमा चित्र ६८ के फ बिन्दु पर रहता है और भूछाया छ पर । यह स्पष्ट है कि छ झ भूछाया का व्यासार्धं और च ज चन्द्रमा का व्यासार्धं है । चन्द्रमा का ग्रसित भाग ज झ के समान है । अब देखना है कि ज झ का परिमाण क्या है ? ज झ = छ झ - छ ज = छ झ - (च छ - च ज) = छ झ + च ज - च छ = म - श कोज्या ई यदि म - श कोज्या ई शून्य के समान हो अर्थात् यदि म = श कोज्या ई तो ग्रहण नहीं लगेगा क्योंकि चन्द्रमा भूछाया को स्पर्श करता हुआ निकल जायगा । ऐसी दशा में भूछाया के केन्द्र से पात का अन्तर छ प का परिमाण यों निकलेगा - यह प्रकट है कि कोण च प छ = इ, ∵ स्परे इ = च छ / छ प ∴ छ प = च छ / स्परे इ = श / स्परे इ परन्तु ऊपर मान लिया गया है कि म = श कोज्या ई

४६२ सूर्य-सिद्धान्त $\because$ श = $\frac{म}{कोज्या ई}$ $\therefore$ छ प = $\frac{म}{कोज्या ई \times स्परे इ}$ = म छेरे ई कोस्परे इ इस प्रकार यह सिद्ध हुआ कि जब पात से भूछाया का अंतर म छेरे ई कोस्परे इ के समान या अधिक होगा तब ग्रहण नहीं लगेगा और कम होगा तो ग्रहण अवश्य लगेगा। परन्तु ऊपर माना गया है कि स्परे इ = $\frac{शा}{चा} =$ $\frac{चन्द्रमा के शर की गति}{चन्द्रमा के भोगांश की गति}$ स्परे ई = $\frac{शा}{चा-रा} =$ $\frac{चन्द्रमा के शर की गति}{सूर्य और चन्द्रमा की गतियों का अंतर}$ और म = भूछाया और चन्द्रमा के व्यासार्धों का योग इसलिए यह तीनों गुणक चन्द्रमा और सूर्य की गतियों पर निर्भर हैं जो अस्थिर हैं इसलिए छ प का मान भी अस्थिर है। यहाँ इ क्रान्तिवृत्त और चन्द्रकक्षा के बीच का कोण है इसलिए वह ज्ञात है परन्तु ई अज्ञात है इसलिए पहले ई को ही जानना चाहिए। ऊपर के सम्बन्ध से स्पष्ट है कि $\frac{स्परे ई}{स्परे इ} = \frac{शा}{चा-रा} \div \frac{शा}{चा} = \frac{चा}{चा-रा}$ $\because$ स्परे ई = $\frac{चा}{चा-रा} \times स्परे इ$ $\because$ इ, चा और रा के मध्यम मान क्रमशः ५°६′, ७६०′३५″ और ५९′८″ है। इसलिए $\frac{चा}{चा-रा} = \frac{७६०′३५″}{७६०′२५″-५९′८″} = \frac{७६०′३५″}{७०१′२७″} = १\cdot०८०८४$ $\therefore$ स्परे ई = $१\cdot ०८०८४ \times स्परे ५^\circ ६^\prime$ = $१\cdot ०८०८४ \times \cdot ०६०१$ = $\cdot ०६७४$ $\therefore$ ई = $५^\circ ३४^\prime$ $\therefore$ छ प = म छेरे ई को स्परे इ = $\frac{म}{कोज्या ई स्परे इ}$

चन्द्रग्रहणाधिकार ४६३ म = ———————————————— कोज्या ५° ३४' स्परे ५° ६' परन्तु म == भूछाया और चन्द्रमा के व्यासार्धों का योग ∵ म का मध्यम मान = भूछाया का मध्यम व्यासार्ध + चन्द्रमा का मध्यम व्यासार्ध भूछाया का मध्यम व्यासार्ध = चन्द्रमा का मध्यम लंबन + सूर्य का मध्यम लंबन

  • सूर्य का मध्यम व्यासार्ध = ५७' ११" + ८"·५ - १६' ४" = ४१' १८"·५ इसका १/६० और बढ़ाने पर भूछाया का मध्यम व्यासार्ध = ४१' १८"·५ + ४१"·६ = ४२' ८" = ४२'·१३५ और चन्द्रमा का मध्यम व्यासार्ध = १५' ३५" = १५'·५८३ ∴ म = ४२'·१३५ + १५'·५८३ = ५७'·७२ ५७'·७२ ∴ छ प = ————————————— कोज्या ५° ३४' स्परे ५° ६' ∴ लरि (छ प) = लरि ५७'·७२ - लरि कोज्या ५° ३४' - लरि स्परे ५° ६' = १·७६१४ - ६·६६७६ - ८·६५४६ = २·८०८६ ∴ छ प = ६४४' = १०° ४४' यह चन्द्रग्रहण की मध्यम सीमा है। इसी प्रकार यह जाना जा सकता है कि छ प का महत्तम मान १२° ३६' और लघुतम मान ६° है। इसका अर्थ यह हुआ कि यदि छ प १२° ३६' से अधिक हो तो चन्द्र ग्रहण असम्भव है और ६° से कम हो तो ग्रहण अवश्य पड़ेगा परन्तु यदि छ प ६° से अधिक और १२° ३६' से कम हो तो ग्रहण सम्भव हो सकता है, जिसका निश्चय पूर्णिमान्तकालिक सूर्य और चन्द्रमा के लंबन तथा इनके स्पष्ट बिम्बार्ध से करना चाहिए । यह पहले ही बतला दिया गया है कि छ प भूछाया के केन्द्र से पात की दूरी है परन्तु भूछाया का केन्द्र सूर्य के केन्द्र से १८०° आगे रहता है और चन्द्रमा के दोनों पातों का अन्तर भी १८०° होता है इसलिए यदि पूर्णिमान्तकालिक सूर्य से चन्द्रमा के किसी पात का अन्तर १२° ३६' से अधिक हो तो ग्रहण असम्भव है, ६° से कम

४६४ सूर्य-सिद्धान्त हो तो ग्रहण अवश्य पड़ेगा और इन दोनों के बीच में हो तो सम्भव है ग्रहण लगे । इसलिए चन्द्रग्रहण की महत्तम सीमा १२°३६′ और लघुत्तम सीमा ६° होती है । सूर्यग्रहण की महत्तम और लघुत्तम सीमा — जिस तरह चित्र ६३ से सिद्ध होता है कि जब चन्द्रमा पृथ्वी की छाया स ह में आ जाता है तब चन्द्र-ग्रहण पड़ता है उसी तरह उसी चित्र से यह भी सिद्ध होता है कि जब चन्द्रमा अमावस्या के अंत में पृथ्वी की छाया बनानेवाली स्पर्श-रेखाओं के सा, हा बिन्दुओं के बीच में आ जाता है तब पृथ्वी पर कहीं न कहीं सूर्य-ग्रहण अवश्य देख पड़ेगा क्योंकि ऐसी स्थिति में चन्द्रमा की छाया पृथ्वी के किसी न किसी स्थान पर अवश्य पड़ेगी । जिस प्रकार स ह के व्यासार्ध के परिमाण से चन्द्र-ग्रहण की सीमा जानी जा सकती है उसी प्रकार सा हा के व्यासार्ध के परिमाण से सूर्य-ग्रहण की सीमा जानी जा सकती है । ∠ सा प छा = ∠ प न पा + < प सा पा = < रि प र + < प सा पा = सूर्य की त्रिज्या - सूर्य का लंबन + चन्द्रमा का लंबन ∵ < सा प छा का मध्यम मान = १६′ १″ - ८″.५ + ५७′ ११″ = ७३′ ३″.५ = ७३′.०५८ सूर्य-ग्रहण के संबंध में भी सूत्र छ प = म छरे ई कोस्परे ५, काम दे सकता है । यहां म = ∠ सा प छा + चन्द्रमा का व्यासार्ध = ७३′.०५८ + १५′.५८३ = ८८′.६४ ∵ छ प = ८८′.६४ / (कोज्या ५° ३४′ स्परे ५° ६′) ∵ लरि छ प = लरि ८८′.६४ - लरि कोज्या ५° ३४′ - लरि स्परे ५° ६′ = १.६४७६ - ६.६६७६ - ८.६५४६ = २.६६५१ ∵ छ प = ६८८′.६ = १६° २८′.६ यह सूर्य-ग्रहण की मध्यम सीमा है । इसी प्रकार यह जाना जा सकता है कि सूर्य- ग्रहण के संबंध में छ प का महत्तम मान १८°.५ और लघुत्तम मान १५°.३ है । अर्थात् यदि अमावस्या के अंत में सूर्य से चंद्रमा के किसी पात का अंतर १५°.३ से कम हो तो समझना चाहिए कि सूर्य-ग्रहण अवश्य पड़ेगा और यदि यह अंतर १८°.५ से अधिक है तो सूर्य-ग्रहण सम्भव नहीं है । परन्तु यदि यह अंतर इन दोनों के बीच

चन्द्रग्रहणाधिकार ४६५ में हो अर्थात् १५°.३ से अधिक और १८°.५ से कम हो तो सम्भव है कि ग्रहण लगे जिसका निश्चय अमावस्या के अंतकाल के सूर्य, चंद्रमा के लंबन और उनकी स्पष्ट गतियों के द्वारा करना चाहिये । चन्द्र-ग्रहण उन सब स्थानों में देख पड़ता है जहां ग्रसित चंद्रमा का उदय हो चुकता है । परन्तु सूर्य-ग्रहण का देखना उन सब स्थानों से सम्भव नहीं जहाँ सूर्य का उदय हुआ रहता है क्योंकि चन्द्रमा के लंबन तथा इसकी छाया के बहुत पतली होने के कारण यह थोड़े ही स्थानों से देखा जा सकता है जिसका निश्चय करना सहज नहीं है । पर्वान्त काल में सूर्य, चन्द्रमा और पात को स्पष्ट करने की रीति— गतैष्यपर्वनाडीनां स्वफलेनोन् संयुतौ । समलिप्तौ भवेतां तौ पातस्तात्कालिकोऽन्यथा ॥८॥ अनुवाद--(८) जिस समय के सूर्य और चन्द्रमा स्पष्ट किये गये हों उस समय से पर्वान्त काल अर्थात् पूर्णमासी या अमावस्या के अंत काल का जो अंतर हो उतने समय की सूर्य और चन्द्रमा की स्पष्ट गतियां जानकर उनको सूर्य और चंद्रमा के स्पष्ट भोगांशों से क्रमशः घटाने या जोड़ने से जो आवें उन्हीं को पर्वान्तकालिक स्पष्ट सूर्य और स्पष्ट चन्द्रमा समझना चाहिये । यदि उपर्युक्त समय पर्वान्त काल से पीछे हो तो घटाना चाहिये और पहले हो तो जोड़ना चाहिये । परन्तु पात का स्पष्ट स्थान जानने के लिए इसकी विलोम क्रिया करनी चाहिये अर्थात् यदि उपर्युक्त समय पर्वान्त काल से पीछे हो तो उतने समय की पात की गति बढ़ानी चाहिये और पहले हो तो घटानी चाहिये क्योंकि पात की गति उलटी होती है । विज्ञान भाष्य—जैसे मध्यमाधिकार ६७वें श्लोक में यह बतलाया गया है कि किसी समय का मध्यम ग्रह दिया हुआ हो तो किसी अन्य समय का मध्यम ग्रह कैसे जानना चाहिये उसी प्रकार यहाँ बतलाया जाता है कि किसी समय के सूर्य चन्द्रमा और राहु के स्पष्ट भोगांश ज्ञात हों तो पर्वान्त काल के सूर्य और चन्द्रमा और राहु के स्पष्ट भोगांश कैसे जानने चाहिए। इसकी आवश्यकता इसलिए पड़ती है कि ग्रहण की गणना करने के लिए पूर्णमासी और अमावस्या के अन्तकालों के सूर्य, चन्द्रमा और राहु के स्पष्ट स्थानों तथा उनकी गतियों से ही काम लिया जाता है जैसा कि ऊपर की बतलायी गयी रीतियों से स्वयम् प्रकट होता है । ग्रहण का कारण— छादको भास्करस्येन्दुरधस्ताद् घनवद् भवेत् । भूच्छायां प्राङ्मुखश्चन्द्रो विशत्यस्य भवेदसौ ॥६॥

४६६ सूर्य-सिद्धान्त अनुवाद—(६) सूर्य से नीचे रहने के कारण चन्द्रमा उसको बादल की तरह ढक लेता है । पूर्व की ओर भ्रमण करता हुआ चन्द्रमा भू-छाया में प्रवेश कर जाता है इसलिए चन्द्रमा को भू-छाया ढक लेती है। इसलिये सूर्य-ग्रहण में चंद्रमा का छादक होती है। विज्ञान भाष्य—यह बात पहले ही बतलायी जा चुकी है इसलिए यहाँ दुहराने की आवश्यकता नहीं है । ग्रास का परिमाण— तात्कालिकेन्दुविक्षेपं छाद्यच्छादकमानयोः । योगाधार्त्तिरोज्झ्य यच्छेषं तमश्छन्नं तदुच्यते ॥१०॥ अनुवाद—(१०) पर्वान्तकालिक चन्द्रमा के विक्षेप अथवा शर को छाद्य ओर छादक के व्यासाधों के योग से घटा दो, जितना शेष रहे वही ग्रास का परिमाण होगा। विज्ञान भाष्य—यह चित्र ६६ की व्याख्या से स्पष्ट है। यह चित्र सूर्य और चन्द्रमा दोनों के लिए समान लागू है। चंद्र-ग्रहण में छ छादक ओर च छाद्य है और सूर्य-ग्रहण में यदि छ सूर्य बिम्ब मान लिया जाय तो छ छाद्य ओर च छादक हो जायगा । सर्वग्रास ग्रहण और खंड ग्रहण की अवस्था-- ग्राह्यमानाधिके तस्मिन्सकलं न्यूनमन्यथा । योगाधार्दधिके न स्याद्विक्षेपे ग्रास संभवः ॥११॥ अनुवाद—(११) यदि छाद्य के बिम्बमान से ग्रास का परिमाण अधिक हो तो सम्पूर्ण ग्रहण अर्थात् सर्वग्रास ग्रहण ओर कम हो तो खंड ग्रहण लगता है। परन्तु यदि चन्द्रमा का विक्षेप छाद्य ओर छादक के व्यासाधों के योग से अधिक हो तो ग्रहण नहीं हो सकता । विज्ञान भाष्य—यह भी चित्र ६६ की व्याख्या में समझा दिया गया है। वहाँ जो कुछ चन्द्रमा के विषय में कहा गया है वही सूर्य के सम्बन्ध में भी लागू हो सकता है । स्थित्यर्थ और विमर्दार्ध जानने की रीति ग्राह्यग्राहकसंयोगवियोगौ दलितौ पृथक् । विक्षेपवर्गहीनाभ्यां तद्वर्गाभ्यामुभे पदे ॥१२॥ षष्ठ्या संगुण्य सूर्येन्द्वोः भुक्त्यन्तरविभाजिते । स्यातां स्थितिविमर्दार्धे नाडिकादिफले तयोः ॥१३॥

चन्द्रग्रहणाधिकार ४६७

चित्र १००

४६८ सूर्य-सिद्धान्त अनुवाद-(१२) छाद्य और छादक के बिम्बों को जोड़कर और घटाकर प्रत्येक का आधा करके अलग-अलग रखो ; प्रत्येक के वर्ग से चंद्रमा के विक्षेप के वर्ग को घटाकर शेष का वर्गमूल निकालो । (१३) प्रत्येक के वर्गमूल को ६० से गुणा करके गुणनफल को सूर्य और चन्द्रमा की स्पष्ट गतियों के अन्तर से भाग दे दो । भाग देने से जो लब्धि आवेगी वह स्थित्यर्ध और विमर्दार्ध होंगे । विज्ञान भाष्य - ग्रहण जितने समय तक रहता है उसके आधे समय को स्थित्यर्ध और सर्वग्रास ग्रहण जितने समय तक रहता है उसके आधे को विमर्दार्ध कहते हैं । अथवा स्पर्श काल से ग्रहण के मध्यकाल तक के समय को स्थित्यर्ध और सम्मीलन काल से मध्यकाल तक के समय को विमर्दार्ध कहते हैं । स्थित्यर्ध का दूना करने से जो आता है वह कुल ग्रहण काल है और विमर्दार्ध का दूना कर देने से जो आता है वह सर्वग्रास ग्रहण का समय है । चित्र १०० में छ प क्रान्तिवृत्त, च प चंद्र कक्षा, प चन्द्रमा का पात, छ भूछाया का केन्द्र, च स्पर्श काल के समय चन्द्रमा का केन्द्र, चा सम्मीलन-काल के समय चन्द्रमा का केन्द्र, चि उन्मीलन के समय चन्द्रमा का केन्द्र, ची मोक्षकाल के समय चन्द्रमा का केन्द्र और फ ग्रहण के मध्यकाल के समय चन्द्रमा का केन्द्र है। यहाँ सुविधा के लिए भूछाया को स्थिर मान लिया गया है इसलिए चन्द्रमा की गति अपनी कक्षा में सापेक्ष है जैसा कि चित्र ६८ में च ब रेखा से दिखलाया गया है । इसलिए यह सिद्ध है कि चन्द्रमा जिस गति से च रेखा पर जाता हुआ दिखलाया गया है वह चन्द्रमा और सूर्य की स्पष्ट गतियों का अन्तर है। यदि यह मान लिया जाय कि छ प च एक समतल त्रिभुज (plane triangle) है तो कोई हर्ज न होगा। ऐसी दशा में जब कि च फ छ कोण समकोण हो और छ फ पर्वान्तकालिक चन्द्रमा का शर हो तब च फ=√च छ² - छ फ २ = √ (चंद्रबिम्ब + भूभाबिम्ब)² - (चंद्रशर)² २ यदि चन्द्रमा और सूर्य की स्पष्ट दैनिक गतियों का अंतर चा---रा हो तो जितनी देर में चन्द्रमा इसी गति से च फ मार्ग चलेगा वह इस प्रकार ज्ञात होगा- जब चन्द्रमा चा-रा भाग ६० घड़ियों में चलता है तब च फ भाग ६० × च फ ⎯⎯⎯⎯⎯⎯ घड़ियों में चलेगा । चा-रा यदि च फ की जगह इसका ऊपर बतलायी गयी रीति से जाना हुआ मान रखा जाय तो स्थित्यर्ध काल यह होगा-

चन्द्रग्रहणाधिकार ४६६ ६० / (चा - रा) × √[ ( (चन्द्रबिम्ब + भूभाबिम्ब) / २ )² - (चन्द्रशर)² ] यदि (चन्द्रबिम्ब + भूभाबिम्ब) / २ को मानैक्यखंड लिखा जाय और इस सूत्र को सरल किया जाय तो यह रूप होगा— स्थित्यर्ध = (६० घड़ी × √( (मानैक्यखंड + शर) (मानैक्यखंड - शर) )) / (चन्द्र और सूर्य की स्पष्ट दैनिक गतियों का अन्तर) इसी प्रकार चा फ = √( चा छ² - छ फ² ) = √[ ( (भूभाबिम्ब - चन्द्रबिम्ब) / २ )² - (चन्द्रशर)² ] इसलिए विमर्दार्ध काल = ६० / (चा - रा) × √[ ( (भूभाबिम्ब - चन्द्रबिम्ब) / २ )² - (चन्द्रशर)² ] यदि (भूभाबिम्ब - चन्द्रबिम्ब) / २ को मानान्तरखंड लिखा जाय और इस सूत्र को सरल किया जाय तो विमर्दार्ध = (६० घड़ी × √( (मानान्तर खंड + शर) (मानान्तर खंड - शर) )) / (चंद्र और सूर्य की स्पष्ट दैनिक गतियों का अन्तर) इनके सरल करने पर जो समय आवेगा वह घड़ियों में होगा। परन्तु यह स्थूल होगा क्योंकि इसकी गणना में सूर्य और चन्द्रमा की स्पष्ट दैनिक गतियों का अन्तर तथा पर्वान्तकालीन चन्द्रशर लिये गये हैं जो स्पर्श या सम्मीलनकाल की स्पष्ट गतियों और शर से बहुत भिन्न होंगे। इसलिए आवश्यक यह है कि पर्वान्तकाल के कुछ पहले और पीछे की प्रत्येक घड़ी या घंटे की स्पष्ट गतियों का अन्तर और चन्द्र- शर निकाल कर गणना की जाय। यदि ऊपर के नियम से ही स्थित्यर्ध और विमर्दार्ध काल जाना जावें तो चाहिए कि पर्वान्त काल से इतना पहले के सूर्य, चन्द्रमा, राहु और चन्द्र शर के स्पष्ट स्थान निकाल कर इनसे फिर स्थित्यर्ध काल और निमर्दार्ध काल जाना जावे। ये पहले की अपेक्षा अधिक शुद्ध होंगे। इसी प्रकार कई बार स्थित्यर्ध काल और विमर्दार्ध काल निकाले जायें तो अंत में ऐसा फल मिलेगा जो फिर भिन्न न हो सकेगा। यही शुद्ध स्थित्यर्धकाल और विमर्दार्ध काल होंगे ऐसी क्रिया को असकृत्कर्म कहते हैं। इसी की रीति अगले दो श्लोकों में बतलायी गयी है।

४७० सूर्य-सिद्धान्त असकृत्कर्म से स्थित्यर्थ और विमर्दार्ध काल जानना— स्थित्यर्थनाडिकाभ्यस्ता गतयष्षष्टिभाजिताः । लिप्तादि प्रग्रहे शोध्यं मोक्षे देयं पुनः पुनः ॥१४॥ तद्विक्षेपैः स्थितिदलं विमर्दार्धं तथाऽसकृत् । संसाध्यमन्यथा पाते तल्लिप्तादिफलं स्वकम् ॥१५॥ अनुवाद—(१४) सूर्य, चन्द्रमा और पात की दैनिक गतियों को स्थित्यर्थ काल से (जो घड़ियों में होता है) गुणा करके साठ से भाग देने पर यह ज्ञात होता है कि सूर्य-चन्द्रमा और पात स्थित्यर्थ काल में कितना चलते हैं। इन परिमाणों को क्रमशः पर्वान्तकालीन सूर्य और चन्द्रमा के भोगांशों से घटा देने पर सूर्य और चन्द्रमा के स्पर्शकालीन भोगांश आ जाते हैं और जोड़ देने पर इनके मोक्षकालीन भोगांश आ जाते हैं। (१५) परन्तु स्पर्शकालीन पात का भोगांश जानने के लिए स्थित्यर्थ काल में पात जितना चलता है उसको पर्वान्तकालीन पात के भोगांश में जोड़ना चाहिए और मोक्षकालीन पात का भोगांश जानने के लिए उसको पर्वान्तकालीन पात के भोगांश से घटाना चाहिए क्योंकि पात की गति उलटी होती है। इस प्रकार स्पर्श- कालीन सूर्य चन्द्रमा और पात के भोगांश से चन्द्रमा का शर और सूर्य चन्द्रमा की स्पष्ट गतियों को जान कर स्थित्यर्थ और विमर्दार्ध काल फिर निकाले । इसी प्रकार कई बार के असकृत् कर्म से स्पर्श और मोक्ष काल का ज्ञान सूक्ष्मतापूर्वक हो सकता है। इसी प्रकार सम्मीलन और उन्मीलन काल की शुद्धता भी जाननी चाहिए । विज्ञान भाष्य—इसकी उपपत्ति पिछले पृष्ठ में बतलायी जा चुकी है इसलिए अधिक लिखने की आवश्यकता नहीं है । स्पर्श और मोक्षकाल तथा सम्मीलन और उन्मीलन जानने की रीति— स्फुटतिथ्यवसाने तु मध्यग्रहणमादिशेत् । स्थित्यर्थनाडिकाहीने ग्रासो मोक्षस्तुसंयुते ॥१६॥ तद्वदेव विमर्दार्थं नाडिकाहोन संयुते । निमीलनोन्मीलनाख्ये भवेतां सकल ग्रहे ॥१७॥ अनुवाद—(१६) स्पष्ट तिथि के अंत में अर्थात् पूर्णिमा और अमावस्या के अन्त में ग्रहण का मध्यकाल होता है। इस समय से स्थित्यर्थकाल घटा देने पर स्पर्शकाल का समय आता है और जोड़ देने पर मोक्षकाल का समय आता है। (१७) इसी प्रकार ग्रहण के मध्यकाल में विमर्दार्थ काल घटा देने पर सर्वग्रास ग्रहण के आरम्भ काल अर्थात् सम्मीलन काल का पता लग जाता है और जोड़ देने पर उन्मीलन काल अर्थात् सर्वग्रास ग्रहण के अंतकाल का पता लग जाता है ।