सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
पृष्ठ 436, कुल 838 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रिप्रश्नाधिकार ४१३ यही सूर्यग्रहणाधिकार के ५-६ श्लोकों का अर्थ है, यहाँ त्रिज्या १ मानी गयी है । छेद = ( ज्या ३०° )² / दृग्गति = ( १/२ )² / दृग्गति = १ / (४ दृग्गति) लम्बन = ज्या विश्लेषांश* / छेद = ज्या विश्लेषांश / ( १ / ४ दृग्गति ) = ४ x दृग्गति x ज्या विश्लेषांश इससे लम्बन का जो परिमाण ज्ञात होगा वह घड़ियों में होगा । यह सूत्र पृष्ठ ४०६ के सूत्र ( ग ) से मिलता है जहाँ लि = ४ घड़ी = ग्रह का परम लम्बन, दृग्गति = त्रिभोन लग्न की उन्नतांश की ज्या = कोज्या त्रा और व = विश्लेषांश । शरलम्बन या नति के लिए केवल यह दिया हुआ है कि दृक्क्षेप को परम- लम्बन से गुणा करने पर नति आती है । यह रीति बहुत स्थूल है । लम्बन और नति की आवश्यकता सूर्य-ग्रहण की गणना करने में पड़ती थी । इसलिए हमारे ग्रन्थों में इसकी चर्चा सूर्यग्रहणाधिकार में की गयी है । परन्तु आजकल लम्बन से ग्रहों और ताराओं की दूरी का पता भी लगाया जाता है । यह बतलाया गया है कि क्षितिज लम्बन की ज्या = त्र / क । इसलिए यदि क्षितिज लम्बन की ज्या और भूकेन्द्र से द्रष्टा की दूरी त्र ज्ञात हो तो क सहज ही जाना जा सकता है । अब संक्षेप में यह बतलाया जायगा कि ग्रह का लम्बन कैसे नापा जाता है । किसी ग्रह का लंबन नापना—मान लो कि चित्र ८० में द, दा भूतल के ऐसे दो स्थान हैं जो एक ही देशान्तर रेखा पर हैं और जिनके अक्षांश भी शुद्धता- पूर्वक जान लिये गये हैं । जिस समय ग्रह च यामोत्तर वृत्त पर आता है उस समय द से उसका स्पष्ट नतांश ख द च अथवा न है और दा से उसका स्पष्ट नतांश खा दा च अथवा ना है । इन दोनों स्थानों के अक्षांशों का योग द भ दा ज्ञात है, इसलिए ∠ द च दा = ३६०° - ( ∠ च द भ + च दा भ + ∠ द भ दा ) = ३६०° - ( १८०° - न + १८०° - ना + ∠ द भ दा ) = न + ना - ∠ द भ दा
- ग्रह के भोगांश और त्रिभोन लग्न का अन्तर विश्लेषांश है ( देखो पृष्ठ ४०५)