भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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त्रिप्रश्नाधिकार ४२३ $\because$ कं = $\frac{पृथ्वी की त्रिज्या}{क्षितिज लम्बन की ज्या}$ क्षितिज लम्बन की ज्या को कलाओं और विकलाओं में प्रकट करने से सुविधा होती है इसलिए पृथ्वी की त्रिज्या को भी कलाओं और विकलाओं में लिखना चाहिए। यह बतलाया गया है कि त्रिज्या $\times$ २ $\times$ ३.१४१५९ = परिधि = ३६०° $\therefore$ त्रिज्या = $\frac{३६०°}{२\times३.१४१५६}$ = ५७°.२९५७७९५ = ३४३७'.७४६७७ = २०६२६४''.८०६२ = २०६२६५'' सूर्य का मध्यम क्षितिज लम्बन = ८''.८० $\therefore$ सूर्य की मध्यम दूरी = $\frac{२०६२६५}{८.८}$ = २३४३६ पृथ्वी की त्रिज्याओं में यह दूरी पृथ्वी की त्रिज्याओं में है जिसका विषुवद्वृत्तीय मान ३९६३.३ मील है । इसलिए सूर्य की दूरी = २३४३६ $\times$ ३९६३.३ मील = ९२८९५७८६ मील । चंद्रमा का मध्यम क्षितिज लम्बन = ५७'१''.८ = ३४२२'' $\therefore$ चंद्रमा की मध्यम दूरी = $\frac{२०६२६५}{३४२२}$ = ६०.३ पृथ्वी की त्रिज्याओं में = ६०.३ $\times$ ३९६३.३ = २३८६८७ मील सूर्य और चन्द्रमा के विस्तार—यदि किसी आकाशीय पिंड का कोणात्मक अर्द्धव्यास वेध से जान लिया जाय और उसका लम्बन भी ज्ञात हो तो उसका विस्तार भी जाना जा सकता है क्योंकि कोणात्मक अर्द्धव्यास की ज्या = $\frac{पिंड की त्रिज्या}{पिंड की दूरी}$ लम्बन की ज्या = $\frac{पृथ्वी की त्रिज्या}{पिंड की दूरी}$ $\therefore$ $\frac{पिण्ड की त्रिज्या}{पृथ्वी की त्रिज्या}$ = $\frac{पिण्ड की कोणात्मक अर्द्धव्यास की ज्या}{पिण्ड की लंबन की ज्या}$