भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 541, कुल 838 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 541

५१६ सूर्य-सिद्धान्त इसको ७ से भाग देने पर शेष ६ बचता है। कलियुग का आरम्भ गुरुवार की मध्यरात्रि में हुआ था इसलिये जिस समय का अहर्गण ऊपर आया है वह बुधवार की मध्यरात्रि का है। परन्तु १६८२ वि० की स्पष्ट माघी अमावस्या गुरुवार को थी इसीलिये उपर्युक्त अहर्गण पूर्णिमान्त गणना से माघ की चतुर्दशी और अमान्त गणना से पौष की चतुर्दशी की मध्यरात्रि का है । इस अमावस्या का अन्त गुरुवार के मध्यान्ह के लगभग हुआ है। इसलिये चतुर्दशी और अमावस्या दोनों की मध्य- रात्रिकाल के चन्द्र, सूर्य इत्यादि को स्पष्ट करना चाहिए । जिस प्रकार पृष्ठ ४८५ में इन ग्रहों की स्थिति जानी गयी है उसी प्रकार यहाँ भी करने से माघ कृष्ण १४ की अर्द्ध रात्रि काल में मध्यम स्थिति यह आती है (यदि पूरे भगण न लिखे जायँ)— सूर्य = ८ राशि २६ अंश ३३'१४४ कला चन्द्रमा = ८ ” २५ ” ४६'६५३ ” चन्द्रोच्च = ० ” २६ ” ६'११६ ” राहु = २ ” २३ ” ३०'३८६ ” यहाँ चन्द्रोच्च की स्थिति में ३ राशि जोड़ना और राहु की स्थिति को ६ राशि से घटाना चाहिए (देखो पृष्ठ ४८६) । इसलिये १६८२ वि० के माघ कृष्ण १४ बुधवार की मध्यरात्रि काल में उज्जैन में सूर्य का मध्यम स्थान = ८रा २६° ३३'.१४४ चन्द्रमा का ” = ८ २५ ४६'.६५३ चन्द्रोच्च का ” = ३ २६ ६'.११६ राहु का ” = ३ ६ २६°'६११ सूर्य का मन्दकेन्द्र = सूर्य का मन्दोच्च—सूर्य का मध्यम स्थान = २ रा १७°१७'.५२—८रा २६°३३'.१४ = ५ रा १७°४४'.३८ = १ पाद + २ रा १७°४४'.३८ ∴ दूसरे पाद का गम्य भाग = १२°१५'.६२=७३५'.३२ सूर्य की स्फुट मन्द-परिधि = ८४०'- २०' x भुजज्या ७३५'.६ / ३४३८ = ८४०'- २०' x ७३० / ३४३८ = ८४०'- ४'= ८३६'