भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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५२४ सूर्य-सिद्धान्त अमावस्यान्तकालिक सूर्य सायन मकर राशि में है जिसके लङ्का में उदयासु १६३१ हैं (देखो पृष्ठ ३१४) । इसलिये सायन मकर राशि १६३१ असुओं में किसी स्थान के यामोत्तरवृत्त का उल्लंघन करता है (देखो त्रि० श्लो० ४८ और पृ० ३३०) । अमावस्यान्तकाल में सूर्य का पच्छिम नत १ घड़ी ३२.८ पल = ६२.८ पल = ५५७ असु । जब १६३१ असुओं में मकर राशि का ३० अंश या १८०० कला यामोत्तर वृत्त को उल्लंघन करता है तब ५५७ असुओं में ५५७ x १८०० / १६३१ कला = ५१६ कला = ८°३६' करेगा । इसलिये सूर्य से मध्य लग्न ८°३६' पूर्व है जिसे सूर्य के भोगांश में जोड़ने पर मध्य लग्न का ज्ञान होगा। परन्तु इतना जोड़ने पर कुंभराशि मध्य लग्न में हो जाती है इसलिए उत्तम यह है कि पहिले देखा जाय कि मकर राशि कितने समय में उल्लंघन करती है और जितना समय शेष रह जाय उतने में कुम्भ राशि कितना चलती है। अमावस्यान्तकालिक सायन सूर्य ६ रा २३° १४' है इसलिये मकर का ६°४६' भोग्यांश है जो ४०६' के समान है। १८०० : ४०६ : : १६३१ : मकर के भोग्यासु ∴ मकर के भोग्यासु = ४०६ x १६३१ / १८०० = ४३५.५ असु परन्तु नतकाल ५५७ असु है इसलिये कुम्भ के गतासु = १२१.५ असु । कुम्भ के लंका के उदयासु १७६४ हैं, इसलिये १७६४ : १२१.५ : : १८०० : कुम्भ के गतांश ∴ कुम्भ के गतांश = १२१.५ x १८०० / १७६४ = १२२ कला = २° २' ∴ अमावस्यान्त काल में कुम्भ राशि का २° २' मध्यलग्न है । अर्थात् मध्यलग्न का सायन भोगांश = १० रा २° २' उदयज्या = लग्नज्या x परम क्रान्तिज्या / लम्बज्या = ज्या ४३°३१' x ज्या २३° २७' / ज्या (६० - २५°२०'०") = .६८८६ x .३६७६ / .६०३८ = ३०३२ ∴ उदय लग्न की अग्रा = १७°३६'