भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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पृष्ठ 550

सूर्यग्रहणाधिकार ५२५ मध्य लग्न का सायन भोगांश = १० रा २° २' = ३०२°२' ∴ मध्य लग्न की क्रान्ति ज्या = ज्या ३०२°२' X ज्या २३°२७' = - ज्या ५७°५८' X ज्या २३°२७' = - '८४७७ X '३९७६ = - '३३७३ ∴ दक्षिण क्रान्ति = १९°४३' काशी का उत्तर अक्षांश = २५° २०' ∴ मध्य लग्न का नतांश = ४५° ३' पृष्ठ ४१३ के प्रथम समीकरण के अनुसार, त्रिभोन लग्न की नतांश ज्या = कोज्या १७°३६' X ज्या ४५°३' = '९५२६ X ७०७७ अथवा दृक्क्षेप = '६७४४ ∴ त्रिभोन लग्न का नतांश = ४२°२४' दृग्गति = त्रिभोन लग्न की उन्नतज्या = ज्या (६०° - ४२°२४') = ज्या ४७°३६' = ज्या '७३८५ यहाँ ज्या और कोटिज्या की दशमलव सारणी के अनुसार जिसमें त्रिज्या १ मानी गयी है दृग्गति की गणना की गयी है । यदि यह सारणी न हो तो पृष्ठ ४१३ में जो रीति बतलायी गई है उसी से काम लेना चाहिये । दि लघु रिक्त सारिणी से काम लिया जाय तो और भी सुविधा होगी । त्रिभोन लग्न का नतांश जानने की भी सारणी बनायी जा सकती है जिससे सुगमतापूर्वक काम लिया जा सकता है । पृष्ठ ३२८ में तथा और स्थानों में बतलाया गया है कि किसी राशि के प्रत्येक अंश समान काल में उदय नहीं होते इसलिये यदि अनुपात से काम लिया जायगा तो राशि के उदय-विन्दु का ज्ञान स्थूल रहेगा । ऐसी दशा में ऊपर बतलायी गयी रीति से जो त्रिभोन लग्न आवेगा उसमें भी स्थूलता रहेगी क्योंकि क्रान्तिवृत्त के उदय-विन्दु से ६० अंश घटाने पर त्रिभोन लग्न आता है । इसलिये आवश्यक है कि सूर्यग्रहण की गणना के लिये क्रान्तिवृत्त के उदय-विन्दु अथवा उदय लग्न का ज्ञान शुद्धतापूर्वक किया जाय । इसी विचार से नीचे की रीति लिखी जाती है । विषुवकाल—जिस क्षण वसन्त-सम्पात-विन्दु या सायन मेष किसी स्थान के पूर्वक्षितिज पर आता है उस क्षण से किसी इष्ट काल तक के समय को विषुवकाल कहते हैं । पृष्ठ ३१८ - १६ में बतलाया गया है कि प्रयाग में अयन भाग के