भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 551, कुल 838 में से

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५२६ सूर्य-सिद्धान्त उदयासु कैसे जाने जाते हैं। वहाँ अयन भाग के उदयासु १००५ बतलाये गये हैं। इसको इस प्रकार भी कह सकते हैं कि प्रयाग में जिस समय निरयन मेष का आदि विन्दु क्षितिज वृत्त पर आता है उस समय विषुवकाल १००५ असु के समान होता है। इसी प्रकार जिस समय प्रयाग में निरयन वृष का आदि विन्दु पूर्व क्षितिज पर आता है उस समय विषुवकाल २४७० असु के समान होता है। इससे प्रकट है कि यदि जानना हो कि किसी स्थान में किस समय विषुवकाल क्या होता है तो पहले तो उस समय का उदयलग्न जानना चाहिये फिर उदय लग्न का विषुवांश और चरांश जानकर दोनों का अन्तर निकालना चाहिये। यही अन्तर उस समय का विषुवकाल होता है। इसी प्रकार यदि किसी समय का विषुवकाल ज्ञात हो तो उस समय का उदय लग्न भी जाना जा सकता है। परन्तु ऊपर की विलोम रीति से यह काम उतना सुगम नहीं है। इसलिये विषुवकाल से उदय लग्न और उदय लग्न से विषुव काल सीधे ही जानने की रीतियाँ यहाँ लिखी जाती हैं:— उदयकाल की अग्रा—नवीन रीति से : चित्र ६१ से स्पष्ट है कि गोलीय त्रिभुज का व पू में, ज्या पू का ज्या व का ------------------- = -------------------- ज्या ∠ का व पू ज्या ∠ व पू का यहाँ पू का उदय लग्न का की अग्रा है, ∠ का व पू परम क्रान्ति है, व का उदय लग्न का सायन भोगांश है और ∠ व पू का = १८०° - ∠ व पू द = १८०° - इष्ट स्थान का लंबांश ∵ ज्या ∠ व पू का = ज्या (१८०° - लंबांश) = ज्या लंबांश = कोटिज्या अक्षांश परम क्रान्ति ज्या × ज्या सायन भोगांश ∴ ज्या पू का = ------------------------------------ अक्षांश कोटिज्या यह भी उदयकालिक अग्रा जानने का एक सूत्र है जो पृष्ठ २६७ के सूत्र और पृष्ठ २७२ के सूत्र (३) के मेल से भी प्राप्त हो सकता है। इसी सूत्र से सूर्य की उदयकालिक अग्रा इस प्रकार जानी जा सकती है। माघी अमावस्या के सूर्योदय के सूर्य का सायन भोगांश = ८^{रा} २२°५६' = २६२°५६' काशी का अक्षांश = २५°२०'

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