सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
पृष्ठ 555, कुल 838 में से
संदर्भ में पढ़ें५३० सूर्य-सिद्धान्त $\because$ व का $+$ का पू $= ६२^\circ ४६^\prime$ ................................(१) इसी तरह, दूसरे सूत्र से, स्परे $\frac{१}{२}$ (व का $-$ का पू) $= \frac{ज्या ४५^\circ ५६^\prime\cdot ५}{ज्या ६६^\circ २३\cdot ५^\prime} \times स्परे १७^\circ ६^\prime\cdot ५$ $\because$ लरि स्परे $\frac{व का-का पू}{२} =$ लरि ज्या $४५^\circ ५६^\prime ५$ $+ लरि स्परे १७^\circ ६^\prime\cdot ५ - लरि ज्या ६६^\circ २३^\prime\cdot ५$ $=\bar{\varepsilon}\cdot ८५६५ + \bar{\varepsilon}\cdot ४८८६ - \bar{\varepsilon}\cdot \varepsilon६७१३$ $=\bar{\varepsilon}\cdot ३७४८$ $\because \frac{व का-का पू}{२} = १३^\circ २०^\prime$ $\because$ व का $-$ का पू $= २६^\circ ४०^\prime$ ................................(२) समीकरण (१) और (२) को जोड़ने से, २ व का $= ८६^\circ २६^\prime$ $\therefore$ व का $= ४४^\circ ४३^\prime$ और समीकरण (२) को समीकरण (१) से घटाने पर, २ का पू $= ३६^\circ ६^\prime$ $\therefore$ का पू $= १८^\circ ३^\prime$ $\cdot$ इस प्रकार यह सिद्ध हुआ कि ऊपर के दो सूत्रों की सहायता से यदि विषुव- काल ज्ञात हो तो किसी समय का उदय लग्न और अग्रा दोनों सिद्ध हो सकते हैं। इसलिए, अमावस्यान्त काल का सायन उदय लग्न $= ४४^\circ ४३^\prime$ और उदयन लग्न की उत्तर अग्रा $= १८^\circ ३^\prime$ पृष्ठ ५२४ में सायन लग्न ४३° ३१' और पृष्ठ ५२४ में उदय लग्न की अग्रा १७° ३६' आयी है जो नवीन रीति से प्राप्त अंकों से बहुत भिन्न हैं। इसका कारण यही है कि वहाँ उदय लग्न अनुपात के द्वारा जाना गया है जो स्थूल है। जब सायन लग्न ४४° ४३' है तब त्रिभोन लग्न $= ४४^\circ ४३^\prime - ६०^\circ$ $= ३६०^\circ + ४४^\circ ४३^\prime - ६०^\circ$ $\because$ अमान्तकालिक त्रिभोन लग्न $= ३१४^\circ ४३^\prime$ अमान्त काल का मध्यलग्न जानना—अमान्तकाल में जो विषुवकाल आया है उससे १५ घड़ी अथवा ६०° कम उसी समय के मध्यलग्न का विषुवकाल