सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूर्यग्रहणाधिकार ५३१ होगा क्योंकि विषुवद्वृत्त का जो बिंदु यामोत्तर-वृत्त पर होता है वही मध्य लग्न का विषुवकाल और विषुवद्वृत्त का जो विन्दु पूर्व क्षितिज पर होता है वही उदय लग्न का विषुवकाल होता है। परन्तु विषुवद्वृत्त के इन दोनों विन्दुओं का अन्तर १५ घड़ी या ६०° के समान होता है । चित्र ६३ में यदि व पू को ३४°१६,′ व का को ४४°४३′ तथा यामोत्तर वृत्त और विषुवद् वृत्त के सामान्य विन्दु को च मान लिया जाय तो च व म गोलीय त्रिभुज के व म का मान सहज ही जाना जा सकता है क्योंकि च व = च पू - व पू = ६०° - ३४°१६′ = ५५°४१′ ∠ च व म = २३°२७′ और ∠ व च म = ६०° । क्योंकि यह विषुवद्वृत्त और यामोत्तरवृत्त के बीच का कोण है, इसलिए नेपियर के पहले नियम के अनुसार ( देखो पृष्ठ १२५ ), कोज्या २३°२७′ = स्परे ५५°४१′ × को स्परे व म = स्परे ५५°४१′ / स्परे व म ∴ स्परे व म = स्परे ५५°४१′ / कोज्या २३°२७′ ∵ लरि स्परे व म = लरि स्परे ५५°४१′ - लरि कोज्या २३°२७′ = १०.१६५८ - ९.९६२५ = १०.२०३३ ∴ व म = ५७°५७′ ∴ सायन मध्यलग्न = ३६०° - ५७°५७′ = ३०२°३′ यह ५२४ पृष्ठ में आये हुए सायन मध्यलग्न से केवल १′ बड़ा है। इसका यह अर्थ हुआ कि सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार जो मध्यलग्न आया है वह बिलकुल ठीक है। इसका कारण यह है कि मध्यलग्न और सूर्य बहुत पास हैं यदि मध्यलग्न से सूर्य दूर होता तो इसमें भी अन्तर पड़ता । त्रिभोनलग्न का नतांश जानना- मध्य लग्न का नतांश सूर्य-सिद्धान्त की रीति से ४५°३′ आया है ( देखो पृष्ठ ५२५ ) । यह रीति बिलकुल शुद्ध है। इससे त्रिभोन लग्न की नतांशज्या या दृक्क्षेप जानने की जो विधि पृष्ठ ४१३ में बतलायी गयी है उसके अनुसार त्रिभोन लग्न का नतांश ४२°१८′ होता है यदि उदय लग्न की अग्रा नवीन रीति से १८°३′ मानी जाय । परन्तु यह बहुत स्थूल है। इसलिये गोलीय त्रिभुज म ख वि (चित्र ६३)