भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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पृष्ठ 577

५५२ सूर्य-सिद्धान्त मोक्ष काल के विक्षेप की दिशा भी इसी नियम के अनुसार निश्चय करनी चाहिये । यदि चन्द्रशर की दिशा दक्षिण हो तो चन्द्रग्रहण में चन्द्रमा का मोक्ष चन्द्र बिम्ब के उत्तरार्ध में होता है जैसा कि उपर्युक्त चित्र में चन्द्रमा को ची स्थिति में दिखलाया गया है । परन्तु सूर्यग्रहण में सूर्य का मोक्ष सूर्यबिम्ब के दक्षिणार्ध में होता है । इसी प्रकार यदि चन्द्रशर की दिशा उत्तर हो तो चन्द्रमा का मोक्ष चन्द्रबिम्ब के दक्षिणार्ध में और सूर्य का मोक्ष सूर्य बिम्ब के उत्तरार्ध में होता है । मध्य ग्रहण काल में भी विक्षेप की दिशा इसी नियम से निश्चय की जा सकती है । उसी चित्र से यह प्रकट है कि जब चन्द्र शर दक्षिण होता है तब चन्द्र ग्रहण के मध्य काल में भू छाया का केन्द्र चन्द्र-बिम्ब से उत्तर होता है परन्तु सूर्य ग्रहण के मध्य काल में चन्द्रमा सूर्य-बिम्ब के केन्द्र से दक्षिण होता है । इसी प्रकार जब चंद्र शर उत्तर होता है तब चंद्र ग्रहण के मध्य काल में भू छाया का केन्द्र बिम्ब से दक्षिण होता है और सूर्य ग्रहण के मध्य काल में चंद्रमा सूर्य बिम्ब के केन्द्र से उत्तर होता है । श्लोक ६—चन्द्रमा के मध्यग्रहणकाल में यदि चन्द्रशर और स्फुट वलन की दिशा एक हो तो वलनाग्र विन्दु उत्तर-दक्षिण रेखा से पूर्व बनाना चाहिये परन्तु यदि इनकी दिशाओं में भिन्नता हो अर्थात् स्फुटवलन उत्तर और चन्द्रशर दक्षिण हो अथवा स्फुटवलन दक्षिण और चन्द्रशर उत्तर हो तो वलनाग्र विन्दु उत्तर दक्षिण रेखा से पच्छिम होना चाहिये । परन्तु यह स्मरण रखना चाहिये कि यदि चन्द्रशर दक्षिणं हो तो उत्तर बिन्दु के पूर्व या पच्छिम की ओर वलनाग्र विन्दु बनाया जाय और यदि चन्द्रशर उत्तर हो तो दक्षिण-विन्दु से पूर्व या पच्छिम की ओर वलनाग्र- विन्दु बनाया जाय । परन्तु सूर्य-ग्रहण के मध्यकाल का परिखेल खींचने के लिए ऊपर जो कुछ चन्द्रग्रहण के सम्बन्ध में कहा गया है उसके विपरीत होना चाहिये । अर्थात् यदि चन्द्रशर और स्फुटवलन की दिशा एक हो तो वलनाग्र विन्दु उत्तर-दक्षिण रेखा से पच्छिम की ओर और यदि इनकी दिशाओं में भिन्नता हो तो वलनाग्र विन्दु उत्तर- दक्खिन रेखा से पूर्व की ओर होना चाहिये । साथ ही साथ यह भी ध्यान रहे कि यदि चन्द्रशर दक्खिन हो तो दक्खिन-विन्दु से पूर्व या पच्छिम की ओर वलनाग्र विन्दु बनाया जाय और यदि चन्द्रशर उत्तर हो तो उत्तर विन्दु से पूर्व या पच्छिम वलनाग्र विन्दु बनाया जाय । चित्र १०२ से इसका ठीक ठीक ज्ञान सहज ही हो सकता है । चन्द्रग्रहण के सम्बन्ध में जो भूछाया है वही सूर्यग्रहण के सम्बन्ध में सूर्य बिम्ब समझ लेने से यही चित्र चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण दोनों के लिए काम दे सकता है ।