भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

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५६२ सूर्य-सिद्धान्त इसलिए ग्रहण के मध्यकाल में पृथ्वी की छाया के केन्द्र का 'पश्चिम नतकाल ४ घड़ी २५ पल अथवा २६५ पल या १५६० असु हुआ । यही मध्यग्रहणकालिक चन्द्रमा का भी नतकाल हुआ क्योंकि इस समय भूछाया और चन्द्रमा के केन्द्रों के भोगांश समान होते हैं। इसलिए मध्यग्रहणकालिक चन्द्रमा का नतकाल = १५६० असु = १५६०' = २६°३०' चन्द्रमा की मध्यग्रहणकालिक चर ज्या = स्परे २५°२०' स्परे १४°१६'·५ = ·४७३४ x ·२५४४ = ·१२०४ ∵ मध्यग्रहणकालिक चरांश = ६°५५' पृष्ठ २६२ के समीकरण (ग) के अनुसार, मध्यकाल के चन्द्रमा की नतांश कोटिज्या = (कोज्या २६°३०' - ज्या ६°५५') x कोज्या २५°२०' x कोज्या १४°१६'·५ = (·८६४६ - ·१२०४) x ·६०३८ x ·६६६१ = ·७७४५ x ·६०३८ x ·६६६१ = ·६७८४ ∴ मध्यग्रहणकालिक नतांश = ४७°१७' पृष्ठ २७६ के अनुसार, ज्या अग्रा = ज्या १४°१६'·५ / ज्या ४७°१७' x कोज्या २५°२०' + कोस्परे ४७°१७' x स्परे २५°२०' = ·२४६५ / ·७३४७ x ·६०३८ + ·६२३३ x ·४७३४ = ·३७१२ + ·४३७१ = ·८०८३ ∴ अग्रा = ५३°५६' ∴ पश्चिम विन्दु से चन्द्रमा का मध्यग्रहणकालीन दिगंश = ५३°५६' दक्षिण ∵ चित्र १०१ के अनुसार, स्परे (ख उ ग) = अग्रा कोटिज्या x नतांश स्पर्शरेखा = कोज्या ५३°५६' स्परे ४७°१७' = ·५८८७ x १·०८३१ = ·६३७६