भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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५७४ सूर्य-सिद्धान्त ग्रहण लगे तो इससे पहले और पीछे दोनों अमावसों को सूर्यग्रहण लग सकता है । इस चन्द्रग्रहण से १७७ दिन पीछे सूर्य दूसरे पात से २ अंश पीछे रहेगा । इसलिए इस समय भी चन्द्रग्रहण होगा । इस चन्द्रग्रहण के पहले की अमावस्या को सूर्य दूसरे पात से १३ अंश पहले रहने के कारण ग्रस्त होगा तथा पीछेवाली अमावस्या को सूर्य दूसरे पात से १७ अंश पीछे रहने के कारण उस समय भी ग्रस्त हो सकता है क्योंकि सूर्यग्रहण की महत्तम सीमा १८ अंश के लगभग है । इस प्रकार दोनों पातों पर तीन तीन ग्रहण के हिसाब से ६ ग्रहण हो गये । परन्तु ३४६ दिन में सूर्य फिर पहले पात पर पहुँच जावेगा इसलिए एक सूर्य ग्रहण ३४६ दिन के बाद और हो सकता है । इस प्रकार यदि वर्ष के आरम्भ में सूर्यग्रहण से आरम्भ करके पहले महीने में ३ ग्रहण लगें और वर्ष के मध्य में तीन और ग्रहण लगें तो वर्ष के अन्त में एक सूर्यग्रहण और लग सकता है । ऐसी दशा में एक ही सौर वर्ष के भीतर सात ग्रहण हो सकते हैं । परन्तु १२ चान्द्रमासों के एक वर्ष में अथवा मेष-संक्रान्ति से जिस सौर वर्ष का आरम्भ होता है उसमें यदि अधिकमास न पड़े तो ६ ही ग्रहण होंगे क्योंकि जब चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से वर्ष का आरम्भ माना जाय तो चैत्र शुक्ल १५ को पहला चन्द्रग्रहण होगा । इससे पहले का सूर्यग्रहण चैत्र की अमावस्या को पड़ेगा जो पिछले वर्ष में गिना जायगा । इस प्रकार यद्यपि ३६५ दिन के वर्ष में सात ग्रहण हो सकते है तथापि मेष संक्रान्ति से आरम्भ होने वाले सौर वर्ष में अथवा चैत्र शुक्ल से आरम्भ होने वाले चान्द्र वर्ष में अधिक से अधिक केवल ६ ही ग्रहण देख पड़ेंगे । इन ६ ग्रहणों में ४ ग्रहण सूर्य के और २ चन्द्रमा के होंगे । यदि वर्ष में अधिक से अधिक ७ ग्रहण माने जायँ तो ५ सूर्यग्रहण होंगे और २ चन्द्रग्रहण होंगे । ऊपर यह सिद्ध हो ही चुका है कि यदि किसी पात पर या उसके तीन अंश आगे-पीछे सर्वग्रास या कंकण सूर्यग्रहण हो तो इसके पहले या पीछे आने वाली पूर्ण- मासियों के दिन चन्द्रग्रहण नहीं हो सकते । इसलिए इस पात पर केवल एक सूर्य- ग्रहण होगा । दूसरे पात पर भी केवल एक सूर्यग्रहण हो सकता है । इसलिए वर्ष के भीतर कम से कम २ ग्रहण अवश्य पड़ेंगे और यह सूर्यग्रहण होंगे । इस पर लोग यह शङ्का करेंगे कि सूर्यग्रहण बहुत कम देख पड़ते हैं और चन्द्रग्रहण अधिक । इसका कारण यह है कि चन्द्रग्रहण भूतल के अधिकांश भाग से देख पड़ता है और सूर्यग्रहण अनेक बार पड़ते हुए भी भूतल के बहुत थोड़े भाग से देखा जा सकता है इसलिए एक ही स्थान से सूर्यग्रहणों की संख्या कम और चन्द्र- ग्रहणों की संख्या अधिक जान पड़ती है । परन्तु यदि सारे संसार के ग्रहणों की संख्या पर विचार किया जाय तो यही सिद्ध होता है कि सूर्यग्रहणों की संख्या चन्द्र- ग्रहणों की संख्या से कहीं अधिक होती है ।