भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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परिलेखाधिकार ५७५ दस दिन ऊपर १८ वर्ष के ग्रहण-चक्र या ग्रहण-युग में प्रायः ७१ ग्रहण पड़ते हैं जिनमें ४१ सूर्यग्रहण होते हैं और २६ चन्द्रग्रहण । इन दोनों का अनुपात वही है जो सूर्य और चन्द्रग्रहणों की परम सीमा का अनुपात है । एक स्थान से सर्वग्रास अथवा कंकण सूर्यग्रहण बहुत कम देख पड़ता है यद्यपि एक ग्रहण-चक्र में सारे संसार के सर्वग्रास और कंकण सूर्यग्रहणों की संख्या २८ के लगभग होती है । हैली नामक पाश्चात्य ज्योतिषी के मतानुसार २० मार्च ११४० ईस्वी से २२ अप्रैल १७१५ ई० तक लंदन में कोई सर्वग्रास सूर्यग्रहण नहीं देख पड़ा । परन्तु सर्वग्रास सूर्यग्रहण बड़े महत्व की घटना होती है और किसी स्थान पर साढ़े सात मिनट अथवा १६ पल से अधिक नहीं रहता । इतने थोड़े समय के लिए भी आजकल के पाश्चात्य ज्योतिषी लाखों रुपया खर्च करके दूर-दूर के जङ्गल, पहाड़, समुद्र, अथवा टापुओं में जहाँ से देखने में अधिक सुविधा होने की संभावना होती है जाते हैं । इस कारण के बेधों से सिद्ध होता है कि सूर्य ठोस पिंड नहीं है । इसके चारों ओर आग की लपकें देख पड़ती हैं जिनकी परीक्षाओं से सिद्ध होता है कि इनमें हाइड्रोजन इत्यादि वायवीय पदार्थ भी हैं । परन्तु इस चर्चा का ग्रहण से विशेष सम्बन्ध नहीं है इसलिए यहाँ इस पर और कुछ न लिख कर अध्याय समाप्त किया जाता है । इस प्रकार परिलेखाधिकार का विज्ञान भाष्य समाप्त हुआ ।