सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तम अध्याय ग्रहयुत्यधिकार श्लोक—१ ग्रहों का युद्ध, समागम और अस्त । श्लोक २ और ३ का पूर्वार्ध— समागम हो चुका है या होने वाला है ? श्लोक ३ का उत्तरार्ध, ४, ५, ६—कब और कहाँ समागम होगा। श्लोक ७-१०—दृक्कर्म की रीति । श्लोक ११—दृक्कर्म की आवश्यकता कहाँ-कहाँ होती है। श्लोक १२—दृक्कर्म संस्कृत ग्रहों के समागम के समय उनका परस्पर अन्तर क्या होता है । श्लोक १३-१४—पांच ताराग्रहों के बिम्बों के मध्यम मान तथा स्पष्ट मान जानने के नियम । श्लोक १५-१७—युतिकाल में ग्रहों की दिशा जानकर बेध करने की रीति । श्लोक १८ के उत्तरार्ध से श्लोक २२ तक—अनेक प्रकार के युद्धों की परिभाषा । श्लोक २३—शुभाशुभ फल जानने के लिये युद्धों की कल्पना । इस अध्याय में यह जानने की रीति बतलायी गयी है कि ग्रह एक दूसरे के बहुत निकट कब और कहां देख पड़ते हैं और इनका शुभाशुभ फल क्या होता है । ग्रहों का युद्ध, समागम और अस्त ताराग्रहाणामन्योन्यं स्यातां युद्धसमागमौ । समागमः शशाङ्केन सूर्येणास्तमयस्सह ॥१॥ अनुवाद (१)—भौम, बुध, गुरु, शुक्र और शनि पांच ताराग्रहों का आपस में युद्ध और समागम होता है। जब तारा ग्रह चन्द्रमा के साथ हो जाता है तब चन्द्रमा के साथ उसका समागम होता है और जब ग्रह सूर्य के साथ हो जाता है तब कहा जाता है कि वह ग्रह अस्त हो गया । यह जानना कि समागम हो चुका है या होनेवाला है— शीघ्रे मन्दाधिकेऽतीतः संयोगो' भविताऽन्यथा । तयोः प्राग्गायिनोरेवं वक्रिणोस्तु विपर्ययात् ॥२॥ प्राग्गायिन्यधिकेऽतीतः वक्रिण्यैष्यत्समागमः । अनुवाद (२)—इष्ट काल में जिस ग्रह की गति मन्द हो उस के भोगांश से यदि शीघ्र गति वाले ग्रह का भोगांश अधिक हो और दोनों ग्रह मार्गी हों अर्थात् पूर्व