सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
पृष्ठ 611, कुल 838 में से
संदर्भ में पढ़ें५८६ सूर्य-सिद्धान्त क्षितिजवृत्त के उत्तर विन्दु उ से ध्रुव ध ऊपर होता जाता है तैसे प फ या च अ अर्थात् आक्षदृक्कर्म बढ़ता है। जिस समय ग्रह यामोत्तर वृत्त पर होता है उस समय भी उसके समप्रोतवृत्त और ध्रुवप्रोतवृत्त एक में मिले रहते हैं क्योंकि यामोत्तरवृत्त उ और ध दोनों विन्दुओं पर होता है। इसलिए यह सिद्ध है कि किसी स्थान के यामोत्तर वृत्त पर भी ग्रह का आक्षदृक्कर्म शून्य रहता है। अब केवल यह जानना रह गया है कि आकाश के अन्य विन्दुओं पर ग्रह का आक्षदृक्कर्म क्या होता है। पहले यह देखना चाहिये कि यदि ग्रह क्षितिजवृत्त पर हो तो आक्षदृक्कर्म का परिमाण क्या होता है। यह तो स्पष्ट ही है कि यदि ग्रह क्षितिजवृत्त पर हो तो क्षितिजवृत्त ही इसका समप्रोतवृत्त भी होता है। चित्र १०७ से प्रकट है कि जब घ ग्रह पूर्व क्षितिज में लग्न होता है तब क्रान्तिवृत्त पर इसका स्थान य होता है। चित्र १०७ उ अ ल ध = पूर्व क्षितिज वृत्त उ = उत्तर विन्दु घ = उदय होते हुए ग्रह का स्थान ल = उदय लग्न क = कदम्ब य = क्रान्तिवृत्त पर घ ग्रह का स्थान च = घ के ध्रुवप्रोतवृत्त और क्रान्तिवृत्त का सम्पात विन्दु अ य छ = य का अहोरात्र वृत्त च ल = घ का आक्षदृक्कर्म