भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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५८८ सूर्य-सिद्धान्त को प स्थान पर काटता है जो य से पच्छिम है इसलिये उत्तर शर में य के भोगांश में ग का आक्षदृक्कर्म घटाने से प का भोगांश आवेगा। पच्छिम कपाल में इसके विपरीत होता है अर्थात् दक्षिण शरवाले ग्रह का आक्षदृक्कर्म ग्रह के भोगांश में घटाना पड़ता है और उत्तर शर वाले ग्रह का आक्षदृक्कर्म ग्रह के भोगांश में जोड़ना पड़ता है। यह बात चित्र १०६ से ही स्पष्ट हो जाती है क्योंकि यदि वह चित्र पच्छिम कपाल का समझ लिया जाय तो ज विन्दु य से पच्छिम समझा जायगा और प विन्दु थ से पूरब समझा जायगा क्योंकि पच्छिम कपाल में किसी विन्दु से उसके नीचे का विन्दु पच्छिम होता है और ऊपर का विन्दु पूर्व होता है परन्तु पूर्व कपाल में किसी विन्दु से उसके नीचे का विन्दु पूर्व होता है और ऊपर का विन्दु पच्छिम होता है। इस प्रकार ६वें श्लोक में बतलायी गयी जोड़ने घटाने की क्रिया की उपपत्ति भी सिद्ध हो गयी। यह स्मरण रखना चाहिए कि ८वें श्लोक में बतलायी गयी रीति स्थूल है क्योंकि जिन कल्पनाओं से यह सिद्ध हुई है वह स्वयम् स्थूल है। आयन दृक्कर्म— चित्र १०६ से प्रकट है कि घ ग्रह का आयन दृक्कर्म च य है। अब देखना है कि सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार च य का मान जानने की क्या रीति है। त्रिभुज च य छ इतना छोटा है कि च य को छ य के समान समझ लेने से कोई हानि नहीं हो सकती। त्रिभुज छ य घ को सरल समकोण त्रिभुज समझ लेने से भी विशेष हानि नहीं है क्योंकि घ ग्रह का शर घ य बहुत छोटा होता है और कोण घ छ य समकोण है क्योंकि अ छ रा य विन्दु का अहोरात्रवृत्त है और ध छ घ ध का ध्रुवप्रोतवृत्त है। इसलिए समकोण त्रिभुज छ य घ में छ य / घ य = ज्या ∠ छ ध य / ज्या ∠ घ छ य = ज्या ∠ छ ध य / ज्या ९०° = ज्या ∠ छ ध य / त्रिज्या चूंकि ग्रह का शर बहुत छोटा होता है इसलिए कोण छ ध य या कोण ध घ क को कोण ध य क के समान समझ लेने में कोई हानि नहीं है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि छ य / घ य = ज्या ∠ ध य क / त्रिज्या ∴ छ य = (घ य × ज्या ∠ ध य क) / त्रिज्या परन्तु कोण ध य क य विन्दु का अयन वलन है क्योंकि यह य के ध्रुवप्रोत- वृत्त और कदम्बप्रोतवृत्त के बीच में है (देखो चित्र १०१) और य के ९० अंश के आगे के भोगांश की क्रान्ति के समान होता है (देखो पृष्ठ ४८०) इसलिए ज्या