सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५६६ सूर्य-सिद्धान्त मान क्या होता है । परन्तु किसी पिण्ड का कोणात्मक या कलात्मक मान उसकी दूरी पर अवलंबित होता है (देखो स्पष्टाधिकार पृष्ठ ८५) और पृथिवी से ग्रह की दूरी एक सी नहीं रहती, घटा-बढ़ा करती है इसलिए पहले यह जानना आवश्यक है कि ग्रहबिम्ब का मध्यम कोणात्मक मान क्या है । यहाँ चन्द्रमा की कक्षा में ग्रहबिम्ब का जो परिमाण योजनों में समझा गया था वही दिया गया है । साथ ही साथ अगले श्लोकों में यह भी बतलाया गया है कि अभीष्ट काल में ग्रहबिम्ब का जो स्पष्टमान योजनों में आवे उसको १५ से भाग देने पर उसका स्पष्ट कलात्मक मान आ जाता है । चन्द्रग्रहणाधिकार के पृष्ठ ४५२ पर यह बतलाया गया है कि चन्द्रकक्षा का १५ योजन १ कला के समान कैसे होता है । इसलिए यह स्पष्ट है कि चन्द्रकक्षा के बिम्बमानों को १५ से भाग देने पर इसका परिमाण कला में क्यों आ जाता है । इस प्रकार चन्द्रकक्षा में ग्रहों के बिम्बों का कलात्मक मान नीचे लिखे अनुसार हुआ :— मंगल का बिम्ब = ३० योजन = ३० ÷ १५ = २ कला शनि ,, = ३७।। योजन = ३७।। ÷ १५ = २।। कला बुध ,, = ४५ योजन = ४५ ÷ १५ = ३ कला गुरु ,, = ५२।। योजन = ५२।। ÷ १५ = ३।। कला शुक्र ,, = ६० योजन = ६० ÷ १५ = ४ कला इनसे यह सिद्ध होता है कि हमारे आचार्य मंगल के बिम्ब को सबसे छोटा समझते थे । इससे बड़ा शनि का बिम्ब समझा था, इत्यादि । परन्तु स्पष्टाधिकार के ६६ पृष्ठ की सारणी से प्रकट होता है कि यदि सब ग्रह द्रष्टा से उतनी दूर हों जितनी दूर सूर्य पृथ्वी से है तो बुध के बिम्ब का व्यास सबसे छोटा अर्थात् ६.६८ विकला है । मंगल का इससे बड़ा अर्थात् ६.३६ विकला है । इसके बाद शुक्र, शनि और गुरु के बिम्बों के व्यास क्रमानुसार १६.८०, १६६.५ और १६४.७२ विकला हैं। इस प्रकार यह सिद्ध है कि हमारे आचार्यों ने स्थूल यन्त्रों के द्वारा बिम्बों के जो परिमाण निकाले थे वे अत्यन्त अशुद्ध हैं जैसा कि म० म० सुधाकर द्विवेदी जी भी ने लिखा १ है । १. सूक्ष्म दूरदशक यन्त्राविना बुध शुक्रयोरपि शशिवत् सितवृद्धि हानित्वं शृङ्गोन्नतिश्चोपलभ्यते । आचार्य समये तादृश यन्त्राणामभावाद् दृष्ट्या शृङ्गोन्नतिः सितासित बिम्बमितिश्च नोपलब्धाऽतोऽनुमानेन रवेरासन्नेत्वादित्यादि कल्पना न समीची- नेति सर्वं स्फुटम् । ब्रह्मस्फुट सिद्धान्त ग्रहयुत्यधिकार श्लोक ३-४ की टीका ।