भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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भूगोलाध्याय ७३५ पर रहता है इसलिए उत्तरध्रुव के निवासियों देवताओं को और दक्षिण ध्रुव के निवासियों असुरों को क्षितिज पर देख पड़ता है। परन्तु सूर्य की गति उत्तर होने के कारण वह देवताओं को उदय होता हुआ और असुरों को अस्त होता हुआ देख पड़ता है। अर्थात् इस दिन से देवताओं के दिन का और असुरों की रात का आरम्भ होता है। सूर्य के इस स्थान को अर्थात् वसंत-सम्पात- बिन्दु को मेष का आदि स्थान कहा गया है। इसके बाद सूर्य उत्तर की ओर प्रतिदिन बढ़ता है। जब यह वसंत-सम्पात बिन्दु से ६० अंश पर पहुँचता है तब इसका उत्तर की ओर का बढ़ना रुक जाता है। इसी दिन देवताओं को यह सबसे ऊँचा उठा हुआ देख पड़ता है। यह ऊँचाई सूर्य की परम क्रान्ति के समान होती है। इसलिये इसी दिन देवताओं का मध्याह्न होता है और असुरों की मध्यरात्रि होती है। वसंत-सम्पात-बिन्दु से ६० अंश तक मेष, वृष, मिथुन तीन राशियाँ होती हैं। जब सूर्य कर्कराशि के आरम्भ से लेकर कर्क, सिंह और कन्या राशियों को पार करके तुला के आदि में पहुँचता है तब यह फिर विषुवन्मण्डल पर आता है। इस समय देवताओं को यह अस्त होता हुआ देख पड़ता है। इसलिये इस समय से देवताओं की रात और असुरों के दिन का आरम्भ होता है। सूर्य का यह स्थान शरद-सम्पात बिन्दु कहलाता है और इस दिन को भी विषुव दिन कहते हैं। इसके बाद जब तक सूर्य तुला, वृश्चिक और धनु राशियों में रहता है तब तक असुरों का पूर्वाह्न और देवताओं की पूर्वरात्रि होती है। जब सूर्य मकर राशि में पहुँचता है तब देवताओं की मध्यरात्रि और असुरों का मध्याह्न होता है। जब सूर्य मकर, कुम्भ और मीन राशियों में होता है तब असुरों का अपराह्न होता है। इस प्रकार सूर्य का एक फेरा जितने समय में पूरा होता है उतने समय में देवताओं या असुरों का एक अहोरात्र होता है। परन्तु देवताओं का जो दिन है वही असुरों की रात और देवताओं की जो रात है वह असुरों का दिन । इस वर्णन से यह स्पष्ट है कि मेष, वृष आदि राशियों का आरम्भ वसंत- सम्पात से माना गया है न कि निरयण मेष से जो आजकल वसंत-सम्पात से २३ अंश से भी कुछ आगे है और जो वसंत-सम्पात से सदैव आगे होता जा रहा है। इसी अन्तर को अयनांश कहते हैं। १४०० वर्ष से कुछ अधिक हुए जब वसंत-सम्पात और निरयण मेष साथ-साथ थे इसलिए इस समय मेष का स्थान वही था जिसे आजकल निरयण मेष कहते हैं परन्तु यह दशा अब नहीं है। इस कारण आजकल ज्योतिषियों में दो भेद हो गये हैं, सायन-वादी और निरयण-वादी । जिन्हें सायन- वादी कहा जाता है वे वसंत-सम्पात को ही मेष का आदिस्थान मानते हैं। परन्तु निरयण-वादी लोग निरयण मेष को राशियों का आरम्भ स्थान मानते हैं।