भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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भूगोलाध्याय ७४७ दक्षिण या उत्तर हो सकती है । इनके बाहर के स्थानों में मध्याह्न छाया अपने-अपने विभाग के मेरु की ओर रहती है । विज्ञान-भाष्य — उत्तरायण का अन्त सायन कर्क संक्रान्ति काल में होता है जिस समय सूर्य की उत्तर क्रान्ति परम के समान होती है जो सूर्य-सिद्धान्त के मत से २४ (चित्र नं० १२८) अंश है । इसलिये इस दिन २४ उत्तर अक्षांश पर सूर्य मध्याह्न काल में ठीक ऊपर होता है और मध्याह्नकालिक छाया शून्य होती है। इसी प्रकार दक्षिणायन के अन्त में सूर्य की दक्षिण क्रान्ति २४° होती है । इसलिये इस दिन २४ दक्षिण अक्षांश पर सूर्य ठीक ऊपर होता है परन्तु भूपृष्ठ का २४ अंश सारी भूपरिधि का १५वां भाग है । आजकल यह २३ अंश २७ कला के लगभग है । इसलिये २३°२७′ उत्तर अक्षांश के देशों पर सायन कर्क संक्रान्ति के दिन मध्याह्न काल में सूर्य ठीक ऊपर होता है और इतने ही दक्षिण अक्षांश पर सायन मकर संक्रान्ति के दिन मध्याह्न काल में सूर्य ठीक ऊपर होता है, २३°२७′ उत्तर अक्षांश रेखा को इसलिये कर्क रेखा और २३°२७′ दक्षिण अक्षांश रेखा को मकर रेखा कहते हैं। इन दोनों अक्षांशों के बीच के भूभाग को उष्ण कटिबन्ध कहते हैं क्योंकि यहाँ सूर्य के बारहों महीने ऊपर रहने से बड़ी गरमी पड़ती है। इसी भूभाग में प्रत्येक स्थान के मध्याह्न काल की छाया उत्तर या दक्षिण हो सकती है क्योंकि यहाँ के किसी स्थान का अक्षांश सूर्य की परम क्रान्ति से कम