सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूगोलाध्याय ७४६ रहता है। (७१) इसी प्रकार भारतवर्ष आदि देशों में क्रम से मध्याह्न, उदय, अर्धरात्रि और अस्तकाल होता है। विज्ञान-भाष्य—इन चार नगरों का परस्पर सम्बन्ध ३८--४० श्लोकों में बतलाया जा चुका है। यहाँ इनके समयों का सम्बन्ध बतलाया गया है। जब यमकोटि में मध्याह्न होता है तब लंका में जो उससे ९० अंश पच्छिम है सूर्योदय होता है, रोमक में जो लंका से ९० अंश पच्छिम है मध्य रात्रि होती है और सिद्ध पुरी में जो रोमक से ९० अंश पच्छिम है सूर्यास्त होता है। इसी प्रकार जब लंका में मध्याह्न होता है तब रोमक में सूर्योदय सिद्धपुरी में अर्द्ध रात्रि और यमकोटि में सूर्यास्त होता है। ध्रुवतारा और नक्षत्र चक्र का परस्पर अन्तर— ध्रुवोन्नतिर्भचक्रस्य नतिर्मेरुं प्रयास्यतः । निरक्षाभिमुखं यातुर्विपरीते नतोन्नते ॥७२॥ अनुवाद—ध्रुवों की ओर चलने से ध्रुवतारा का उन्नतांश और नक्षत्र चक्र का नतांश बढ़ता जाता है परन्तु विषुवत् रेखा की ओर चलने से इसका उलटा होता है अर्थात् ध्रुवतारा का नतांश तथा नक्षत्र चक्र का उन्नतांश बढ़ता है। विज्ञान-भाष्य—नक्षत्र चक्र विषुवन्मण्डल के पास है इसलिए विषुवत् रेखा पर नक्षत्र चक्र ठीक ऊपर देख पड़ता है और ध्रुव तारे क्षितिज पर देख पड़ते हैं। यहाँ से ध्रुवों की ओर चलने में ध्रुवों का उन्नतांश बढ़ता जाता है और विषुवन्मण्डल का उन्नतांश उतना ही घटता जाता अथवा नतांश बढ़ता जाता है। ध्रुवों पर ध्रुव तारे का उन्नतांश ९० और विषुवन्मण्डल का उन्नतांश शून्य अथवा नतांश ९० होता है क्योंकि ध्रुवों पर से विषुवन्मण्डल क्षितिज में हो जाता है। इसके विपरीत विषुवत् रेखा की ओर चलने में ध्रुव तारे का नतांश बढ़ता और नक्षत्र चक्र का उन्नतांश बढ़ता है। नक्षत्र चक्र की गति का कारण— भचक्रं ध्रुवयोर्बद्धम् आक्षिप्तं प्रवहार्निलैः । पर्यत्यजस्रं तद्बद्धा ग्रहकक्षा यथाक्रमम् ॥७३॥ अनुवाद—दोनों ध्रुव तारों से बँधा हुआ और प्रवाह वायु का धक्का खाता हुआ नक्षत्र-चक्र निरन्तर घूमा करता है। इसी से क्रमानुसार बँधी हुई ग्रहकक्षाएँ भी इसी के साथ घूमती हैं।