सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७५० सूर्य-सिद्धान्त विज्ञान-भाष्य—सूर्य, चन्द्र, ग्रह, तारे सभी पूर्व क्षितिज पर उदय होकर ऊपर उठते हैं, पच्छिम की ओर घूमते हुए अस्त हो जाते हैं और २४ घंटे में फिर पूर्व क्षितिज पर आकर उदय होते हैं। इसका कारण प्राचीन काल में यह समझा जाता था कि सारा आकाश-चक्र दोनों आकाशीय ध्रुवों में बँधा हुआ प्रवह वायु के द्वारा घूम रहा है और ग्रहों की कक्षाएँ भी उसी आकाश-चक्र में बँधी हुई पूरब से पच्छिम को घूम रही हैं। इस मत के समर्थक भारतवर्ष के कुछ पण्डित अब भी देखे जाते हैं और वाद विवाद करने के लिये तैयार रहते हैं। परन्तु अब अकाट्य प्रमाणों से सिद्ध हो गया है कि आकाश-चक्र की इस गति का कारण प्रवह वायु नहीं है वरन् स्वयम् पृथ्वी की गति है। एक गति से पृथ्वी अपने अक्ष पर २४ घंटे में एक बार पच्छिम से पूरब को घूम जाती है, इस दैनिक गति को पृथ्वो का अक्ष-भ्रमण कहते हैं। इसी से आकाश के सभी पिंड पूरब से पच्छिम को घूमते हुए जान पड़ते हैं। इसी से दिन रात की उत्पत्ति होती है। दूसरी गति से पृथ्वी एक वर्ष में सूर्य की परिक्रमा कर लेती है जिससे ऋतुओं की उत्पत्ति होती है और आकाश में सूर्य पच्छिम से पूरब को चलता हुआ एक वर्ष में पृथ्वी की परिक्रमा करता हुआ देख पड़ता है। इस गति को पृथ्वी की वार्षिक गति कहते हैं। यह दोनों गतियाँ पृथ्वी में एकसाथ होती हैं जैसे ऊपर फेंकी हुई गेंद अपने अक्ष पर नाचती भी जाती है और अपने स्थान को बदलती भी जाती है अथवा लड़कों के खेलने की फिरकी नाचती हुई अपने स्थान को भी बदलती जाती है। हमारे प्राचीन धर्म ग्रन्थों में पृथ्वी को अचला माना गया है इसलिए पृथ्वी की गति की बात सनातन धर्म के कुछ पण्डितों को मान्य नहीं है परन्तु वाद विवाद में वे वही तर्क उपस्थित करते हैं जिसे आचार्य वराहमिहिर, ब्रह्मगुप्त आदि पेश करते थे। इसलिये पहले यह विचार किया जायगा कि वे तर्क कहाँ तक गणित शास्त्र के अनुकूल हैं। इसके बाद अनेक गणित और भौतिक विज्ञान के प्रमाणों से सिद्ध किया जायगा कि पृथ्वी में दैनिक और वार्षिक दो गतियाँ हैं और इन्हीं के कारण नक्षत्र- चक्र दिन में एक बार पूरब से पच्छिम को घूमता हुआ देख पड़ता है और ऋतु आदि का परिवर्तन होता है तथा ग्रहों की चाल विचित्र प्रकार की देख पड़ती है। आचार्य वराहमिहिर और ब्रह्मगुप्त ने पृथ्वी की गति का खण्डन जिन युक्तियों से किया था वे यह१ हैं। यहाँ यह बतला देना आवश्यक जान पड़ता है कि हमारे यहाँ के आचार्य आर्यभट अपने आर्यभटीय ग्रंथ में पृथ्वी का चलना मानते हैं और इसका १. भ्रमति भ्रमस्थितेव क्षितिरित्यपरेत्वदन्ति नोडुगणः । यद्येवं श्येनाद्यान खात्पुनः स्वनिलयमुपेयुः ॥६॥