भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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पृष्ठ 776

भूगोलाध्याय ७५१ समर्थन इस उदाहरण १ से करते हैं कि जैसे चलती हुई नाव पर बैठे हुए मनुष्य को नाव स्थिर और किनारे के पेड़, घर आदि उलटी दिशा में चलते हुई दिखाई पड़ते हैं इसी तरह नक्षत्र-चक्र अचल होने पर भी घूमनेवाली पृथ्वी पर के रहने मनुष्यों को पच्छिम की तरफ घूमता हुआ देख पड़ता है परन्तु परम्परा विरुद्ध समझ कर किसी ने नहीं माना और वराहमिहिर आदि ने ये तर्क उपस्थित किये थे । आचार्य वराहमिहिर का एक तर्क यह है कि यदि पृथिवी ही पूरब की ओर घूमती है तो जो पक्षी अपने घोंसले छोड़ कर आकाश में उड़ जाते हैं वे फिर घोंसले तक क्यों पहुँच जाते हैं क्योंकि पृथिवी के घूमने के कारण पृथिवी में लगा हुआ घोंसला तो बहुत दूर पूरब में हो जाता और पक्षी आकाश में रह जाने से बहुत पीछे रह जाता । दूसरा तर्क उन्होंने यह किया कि यदि पृथिवी पूरब की ओर घूमती तो पताका झण्डा आदि सर्वदा पच्छिम की ओर उड़ते देख पड़ते क्योंकि यह साधारण अनुभव की बात है कि यदि कोई मनुष्य रूमाल हाथ में लटका कर दौड़े तो उसके वेग के कारण रूमाल पीछे की ओर उड़ने लगता है। और यदि यह कहा जाय कि पृथिवी बहुत मंद गति से घूमती है इसलिये पताका आदि पच्छिम को उड़ते हुए नहीं देख पड़ते तो इतनी मन्द चाल से पृथिवी दिन भर में एक चक्कर कैसे कर लेती है । चिड़ियों के अपने घोंसले तक पहुँच जाने का कारण यह है कि जब चिड़िया आकाश में उड़ जाती है तब भी भूभ्रमण का जो वेग उस घोंसले में रहता है वह उतना ही आकाश में भी बना रहता है, इसलिए जिस वेग से घोंसला पूर्व की ओर घूमता जाता है उसी वेग से चिड़िया भी घूमती जाती है, हाँ उसको जान नहीं पड़ता । साथ ही साथ वह अपनी गति भी उत्पन्न कर सकती है जिससे वह घोंसले से दूर जहाँ चाहे जाती है। जैसे रेलगाड़ी पर चढ़ा हुआ आदमी उस वेग का अनुभव नहीं करता जिससे गाड़ी स्वयम् चल रही है, पर उसमें वह वेग वर्तमान रहता अन्यच्च भवेद्भू मेरह्ना भ्रमरंहसा ध्वजादीनाम् । नित्यं पश्चात् प्रेरणमथाल्पगा स्यात्कथं भ्रमति ॥७॥ पंच सिद्धान्तिका अध्याय १३ प्राणेनैति कलां भूर्यदि तर्हि क तो ब्रजेत कमध्वानम् । आवर्त्तनमुर्ध्याश्चेन्न पतन्ति समुच्छ्रयाः कस्मात् ॥१७॥ ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त, तन्त्र परीक्षाध्याय १. अनुलोम गतिर्नौस्थः पश्यत्यचलं विलोमगं यद्वत् । अचलानिभानि तद्वत्सम पश्चिमगानि लङ्कायाम् ॥६॥ आर्यभटीय, गोलपाद