सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
अ० ६६ ]
उत्तरतन्त्रम्
८११
एवं चिकित्सितस्थाने रुजोऽधानवतिः तथा । अच्चादिरखाविज्ञाने विशतिः विषहेतुका ॥२४॥ स्थावरे वेगाः स्युः दर्वाकरमण्डलिनां विषे । राजिलवैकरञ्जानां प्रत्येकं सप्त सप्त च ॥२५॥ मृषिकास्तु दशाऽष्टौ च सप्तवेगा अलर्कजाः । सप्तषष्टियतं चात्र कीटानां विषपायिनाम् ॥२६॥ सप्त चत्वारिशयुतं कल्पस्थाने शतद्वयम् । नव सन्ध्याश्रयाः प्रोक्ता वर्त्मजाश्च एकविंशतिः ॥२७॥ शुक्लभागे दशैकश्च चत्वारः कृष्णभागजाः । सर्वाश्रयाः सप्तदश दृष्टिजा द्वादशेव तु ॥२८॥ बाह्यजौ द्वौ नेत्ररोगौ इति षट्सप्ततिः स्मृता । कुक्कुणकः शिशोरेव, कर्णऽष्टाविंशतिर्गुणम् ॥२९॥ एकविंशद्वद्वाणगताः सप्रतिश्यायपञ्चकाः । एकादश शिरोरोगाः परं शालाक्यसंज्ञिते ॥३०॥ आतङ्कानां शतं प्रोक्तं षट्चत्वारिंशता युतम् । नव बालग्रहा योनिव्यापदो विंशतिः त्रियाः ॥३१॥ एवं कुमारतन्त्रेऽस्मिन् एकोनविंशद्वद्वाणमयाः । अष्टौ ज्वरा, अतीसारः षट्, चतुष्टयः प्रवाहिकाः ॥३२॥ चत्वारौ ग्रहणीदोषा, यद्वमेको गुल्मपञ्चकम् । हृद्द्वोगाः पञ्च, चत्वारः पाण्डुवाल्याः कामलाद्वयम् ॥३३॥ हलीमकः पानकी च रक्तपित्तं चतुर्विषम् । षट् प्रकारा मता मूर्च्छा विकाराः सप्त मद्यजाः ॥३४॥ दाहाः पञ्च, तृषः सप्त लृदयः पञ्च देहिनाम् । हिकाः क्षासाः तथा कासाः प्रत्येकं पञ्च पञ्च च ॥३५॥ स्वरभेदाः तथा षट् स्युः, विंशतिः कुमिजातयः । नवोदावर्त्तका दृष्टा विस्मृत्यः तिष्ठ एव च ॥३६॥ आनाही द्वौ आमविट्को तथाऽरोचकपञ्चकम् । मूत्राधाता द्वादश स्युः इति कायचिकित्सिते ॥३७॥ आमयानां शतं प्रोक्तं चत्वारिंशत् च सप्त च । देवता दैत्य-गन्धर्व-यक्ष-पितृ-अहि-रक्षसाम् ॥३८॥ पिशाचस्याऽभिषक्त्रेण गदाः च अष्टौ प्रकीर्तिताः । अपस्माराश्च चत्वारः उन्मादाः षड् उदीरिताः ॥३९॥ अष्टादश गदा भूतविद्यायां सूक्ष्मदक्षिभिः । एवं हि सौश्रुते तन्त्रे काशिराजेन कीर्तिताः ॥४०॥ रोगाणां तु सहस्रं यत् शतं विशतिरेव च ।
भिन्ना दोषाण्यो गुणाः ।
द्विषष्टिधा भवन्त्येते भूयिष्ठमिति निश्चयः ॥४१॥
जिस प्रकार सत्त्व, रज, तम गुण भिन्न हुए बासठ प्रकार के होते हैं, उसी प्रकार से तीनों दोष भी विभक्त होकर बासठ प्रकार के हो जाते हैं ।
वक्तव्य—“रजोभृष्टिष्ठो भावतः, रजो हि प्रवर्त्तकं सर्वभा- वानाम् पित्तं सत्त्वोत्कटम् लघुप्रकाशकत्वात् । कफः तमोबहुलः— गुरुप्रावरणकत्वात् ।” कफप्रकृति पुरुष में सत्त्व गुण की प्रधानता कफ में सत्त्व और तम दोनों गुण के रहने से है । यथा— “सत्त्वतमोबहुला आपः” ॥
त्रय एव पृथग् दोषा द्विगो नव समाधिजैः । त्रयोदशाधिकैकद्विसप्तमध्योत्पन्नोऽस्त्रिगः ॥१०॥ पञ्चागदेवं तु सह भवन्ति क्षयमागतैः । क्षीणमध्यधिकक्षीणक्षणवृद्धैस्तथाऽपरे ॥११॥ द्वादशेवं समाख्याताऽक्षयो दोषा द्विषष्टिधा ।
पृथग रूप में वात, पित्त, कफ, तीन दोषों में दो दोष स्वस्थ और एक बढ़ा रहे, इस प्रकार से तीन भेद बनते हैं । दो दोष के समान रूप में बढ़ने से और एक के स्वस्थ रहने से, तीन, तथा दो दोषों में एक दोष के अधिक बढ़ने से और तीसरे दोष के स्वस्थ रहने से छे भेद, इस प्रकार सप्त अधिक भेद से कुल नौ भेद होते हैं । तीनों दोषों के बढ़ने से तेरह भेद होते हैं, यथा—तीनों दोषों के मिलने पर एक दोष की अधिकता से तीन, तीनों दोषों के मिलने पर दो दोषों के बढ़ने से तीन, सप्त, मध्यम, उत्पन्न भेद से छे, तीनों की अधिकता से एक, इस प्रकार तेरह भेद हैं । जिस प्रकार दोषों की वृद्धि से ये पच्चीस भेद होते हैं, उसी प्रकार दोषों के क्षीण होने से भी पच्चीस भेद हो जाते हैं । क्षीण मध्य, अधिक क्षीण, क्षीण, भेद होते हैं, इस प्रकार से ये बासठ भेद हैं ।
१ (१) वायुवृद्धः पित्तकफौ समौ । पित्तं वृद्धं वायुकफौ समौ । कफो वृद्धो वायुपित्तै समौ ।—३,
(२) वायुपित्तै वृद्धे, कफः समः । वायुकफौ वृद्धौ पित्तं समम् । पित्तकफौ वृद्धौ वायुः समः । एक को अति वृद्धि है— वायोःपित्तै वृद्धे कफः समः । पित्ताद् वायुवृद्धः कफः समः । कफात् वायुवृद्धः पित्तं समम् । वायोः कफौ वृद्धः पित्तं समम् । पित्तात्कफौ वृद्धौ वायुः समः । कफात् पित्तं वृद्धं वायुः समः ॥७-८-९॥
(३) वायोः पित्तकफौ वृद्धौ । पित्तात्कफवायु । कफाद् वायुपित्तै । वातपित्ताम्यां कफौ वृद्धः वायुकफाम्यां पित्तं वृद्धम्, पित्तकफाम्यां वायुवृद्धः ॥—६
(४) वायुपित्तकफा वृद्धा वृद्धतरा वृद्धतमाः । इसी प्रकार वायु कफ पित्त । पित्त कफ वायु । पित्त वायु कफ । वायु पित्त कफ । कफ पित्त वायु ।—६
(५) वायुपित्तकफा वृद्धाः ।—१ इस प्रकार दोष की वृद्धि से पच्चीस ३+९+६+१+१ = २५ बनते हैं ।
वृद्ध शब्द के स्थान पर क्षीण शब्द प्रयोग कर देने से इसी प्रकार २५ बनते हैं ।
८१२
सुश्रुतसंहिता
[ अ० ६३ ]
वि० मन्तव्य—यह स्मरण रखिये कि दोषों के बढ़ने ही से रोग नहीं होते, अपितु घटने से भी रोग होते हैं। विदग्ध दोषों के ये ६२ भेद अर्थात् अवस्थाएँ हैं, और रोग का निदान करते समय दोषों की अंशांश कल्पना द्वारा इनका विवेचन किया जाता है। चिकित्सक इसका विचार करे कि कौन दोष वृद्ध है, कौन दोष क्षीण है, तथा कौन दोष सम है। रोगस्तु दोषवैषम्य—दोषों की विषमावस्था रोग है, और दोष-साम्यमरोगता—दोषों की समवस्था अरोगता (स्वास्थ्य) है। यह ६२ भेद तो केवल परस्पर मिले हुए तीन दोषों के हैं, परन्तु रस आदि धातुओं तथा मलों के साथ मिलाकर तो इनके भेद असंख्य हो जाते हैं, (देखिये श्लो० १२)।
द्वयुत्पन्नैकोत्पन्नैः षट् स्युर्हीनमध्याधिकैश्च षट्। समैश्चैको विकारास्ते सन्निपाताख्योदश ॥ संसर्गे नव षट् तेभ्य एक वृद्धया समैज्यः। पृथक् त्रयः स्युस्तैर्वृद्धैर्याषयः पंचविशतिः ॥ यथा वृद्धेस्तथा क्षीणदोषैः स्युः पंचविशतिः। वृद्धिक्षयकृतश्रान्यो विकल्प उपदेष्टव्ये ॥ वृद्धिरैकस्य समता चैकस्यैकस्य संक्षयः। ब्रह्मं वृद्धिः क्षयश्चैकस्यैकवृद्धिर्द्वयोः क्षयः ॥
चरक सू० अ० १७-४१-४४ ॥
मिश्रा धातुमलैर्दोषा यान्त्यसंख्येतान् पुनः ॥१२॥ तस्मात् प्रसङ्गं संयम्य दोषभेदविकल्पनैः। रोगं विदित्वोपचरेद्दसभेदैर्यथैरितैः ॥१३॥
(६) वातो वृद्धः पित्तं समं कफः क्षीणः। पित्तं वृद्धं वातः समः कफः क्षीणः। कफो वृद्धः वातः क्षीणः पित्तं समम्। कफो वृद्धः वातः समः पित्तं क्षीणम्। वातो वृद्धः कफः समः पित्तं क्षीणम्। पित्तं वृद्धं कफः समो वातः क्षीणः।—६
(७) वायुः क्षीणः पित्तकफौ वृद्धौ। पित्तं क्षीणं कफवायु वृद्धौ। कफः क्षीणो वायुपित्तौ वृद्धौ। वायुपित्तौ क्षीणौ कफौ वृद्धः। पित्तकफौ क्षीणौ वायुवृद्धः। कफवायु क्षीणौ पित्तं वृद्धम् ॥—६
८—वायु पित्त कफ सम १ +
इस प्रकार ६ + ६ + १ = १३, कुल २५ + २५ + १३ = ३३ भेद हुए।
† “समवातपित्तार्लेष्माणं प्रकृतितस्थानां समा भवत्यन्यन्यः ॥”
चरक वि० अ० ६।
भिषक् कर्ताऽथ करणं रक्षा दोषास्तु कारणम्।
कार्यमारोग्यमेवैकमनारोग्यमभतोऽन्यथा ॥१४॥
दोष रक्तादि धातु और मलों से मिलकर असंख्येय बन जाते हैं। इसलिये दोष भेद विकल्पना का नियमन करके रोग को जानकर कहे हुए रस भेदों से चिकित्सा करे। वैद्य कर्ता है, रस-करण (साधन) हैं, दोष कारण हैं, आरोग्य कार्य है, अनारोग्य-अकार्य है।
वि० मन्तव्य—चिकित्सा कर्म में—वैद्य “कर्ता”—चिकित्सा करनेवाला है। मधुर आदि रस करण अर्थात् चिकित्सा के उपकरण हैं। इनके द्वारा चिकित्सा की जाती है—दोषों का शमन किया जाता है। वात आदि दोष रोगों का कारण—हेतु है। और आरोग्य (स्वास्थ्य) कार्य—कर्तव्य कर्म है। वैद्य (कर्ता) रसों (उपकरणों) द्वारा दोषों (रोगकारणों) का शमन करता है, यही कार्य—कर्तव्य कर्म है ॥१४॥
अध्यायानां तु षट्पञ्चुषा प्रथिताथेपदक्रमम्।
एवंमेतदरोषेण तन्त्रमुत्तरमुद्दिमत ॥१५॥
छथासठ अध्यायों में अर्थ-पद क्रम से ज्ञान ऐश्वर्य से भरा यह सम्पूर्ण उत्तर तंत्र गूँथा हुआ है।
वि० मन्तव्य—इन ६६ अध्यायों द्वारा प्रथित है, अर्थ-पद-क्रम जिसमें ऐसा यह उत्तर तन्त्र पूर्ण रूप से बुद्धिमान्-बुद्धिमान्-महान् है ॥१५॥
स्पष्टगृढार्थविज्ञानमगाढमन्धचेतसाम्
यथाविधि यथाप्रश्नं भवतां परिकीर्तितम् ॥१६॥
स्पष्ट, गृढ अर्थ को बतानेवाला, मन्द बुद्धिवाले भी जिसको सरलता से जान सकते हैं, इसको विधि एवं प्रश्न के अनुसार आपको कह दिया है ॥१६॥
सहोत्तरं त्वेतदधीत्य सर्वं
ब्राह्मं विधानेन यथोदितेन।
न हीयतेऽर्थान्मनसोऽभ्युपेता-
देतद्रुचो ब्राह्ममतीव सत्यम् ॥१७॥
कही हुई विधि के अनुसार उत्तर तंत्र के साथ इस सम्पूर्ण ब्राह्म (ज्ञान) को पढ़कर, मन से ग्रहण किये हुए (मली प्रकार समझे हुए) विषयों से अलग नहीं होता, यह ब्राह्म वचन (ब्रह्म का वचन) पूर्ण सत्य है ॥१७॥
इति सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रे दोषभेदविकल्पो नाम
षट्पञ्चितीभोऽध्यायः ॥१६॥
इति सौश्रुते आयुर्वेदशास्त्रे उत्तरस्थानं समाप्तम्।
समासोऽयं ग्रन्थः।
A small, dark, rectangular emblem or seal is centered on a textured, reddish-brown background. The emblem features a central circular motif containing a lotus flower and a figure, surrounded by text in a circular border. The entire emblem is set against a background with a fine, woven texture and a mottled reddish-brown color.