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स्वरोदय विज्ञान

स्वरोदय विज्ञान

Swarodaya Vigyan

श्री स्वामी जी महाराज (पीताम्बरा पीठाधीश्वर) द्वारा

स्रोत: स्वरोदय विज्ञानं - पीताम्बरा पीठाधीश्वर · पीताम्बरा पीठ (उद्गम)

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(स्वरोदय विज्ञान)

तत्त्वों को वश में करने का पहला साधन तो यह है कि मनुष्य अपने सब काम स्वर के अनुसार करें—जिससे स्वर उसके अधीन हो जावें।

दूसरा साधन यह है कि, प्रातःकाल या जिस समय मन संसारिक झंझटों से निश्चित हो, परन्तु प्रातःकाल का समय ही अच्छा होता है, उस समय आकाश में किसी स्थान पर दृष्टि जमावे। कुछ दिनों के पश्चात् उसको रंगबिरंग की आकृतियाँ इधर उधर आकाश में फिरती दिखाई देंगी और अभ्यास के बाद जो तत्त्व अभ्यासी का चल रहा है उसी का रंग आकाश में दिखाई देगा। नेत्र बन्द कर लेने से भी वही रंग दिखाई देगा।

तृतीय साधन यह है कि, जब इतना अभ्यास हो जावे और तत्त्वों को आप भलीभाँति पहचान सकें, तब रात्रि को तीन चार बजे सोकर उठें। सब प्रकार से निश्चित होकर आसन मारकर बैठ जाय और मालूम करें कि, इस समय कौन सा तत्त्व चल रहा है। जब यह मालूम हो जावे कि इस समय कौन सा तत्त्व चल रहा है तो इस प्रकार के साधन करें।

तत्त्व-साधन

यदि आकाश तत्त्व चल रहा है तो उस समय यह ध्यान करें, कि बहुत सा प्रकाश है—जिसका कोई रूप नहीं उस समय (है) का जप करें।

यदि अग्नि तत्त्व चल रहा हो, तो एक त्रिकोण आकृति का ध्यान करें—कि इसका रंग लाल है—जो शरीर में गर्मी रखती है, भोजन जिससे पचता है और यह देखा कि तुम इस स्वरूप को गर्मी को एकाएक बरदाश्त नहीं कर सकते। इस समय (रै) का जप करो।

यदि जल तत्त्व का वेग है तो अर्द्ध चन्द्रमा का ध्यान करो जो अति प्रज्वलति और अति निर्मल है। यह गर्मी और प्यास को दूर करता है। मानसिक योग के बल से गहरे पानी में गोता लगाओ। इस समय (वै) का जप करो।

यदि पृथ्वी तत्त्व चलता हो, तो, चतुष्कोण आकृति का ध्यान करो,

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