स्वरोदय विज्ञान
Swarodaya Vigyan
श्री स्वामी जी महाराज (पीताम्बरा पीठाधीश्वर) द्वारा
स्रोत: स्वरोदय विज्ञानं - पीताम्बरा पीठाधीश्वर · पीताम्बरा पीठ (उद्गम)
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(स्वरोदय विज्ञान)
तत्त्वों को वश में करने का पहला साधन तो यह है कि मनुष्य अपने सब काम स्वर के अनुसार करें—जिससे स्वर उसके अधीन हो जावें।
दूसरा साधन यह है कि, प्रातःकाल या जिस समय मन संसारिक झंझटों से निश्चित हो, परन्तु प्रातःकाल का समय ही अच्छा होता है, उस समय आकाश में किसी स्थान पर दृष्टि जमावे। कुछ दिनों के पश्चात् उसको रंगबिरंग की आकृतियाँ इधर उधर आकाश में फिरती दिखाई देंगी और अभ्यास के बाद जो तत्त्व अभ्यासी का चल रहा है उसी का रंग आकाश में दिखाई देगा। नेत्र बन्द कर लेने से भी वही रंग दिखाई देगा।
तृतीय साधन यह है कि, जब इतना अभ्यास हो जावे और तत्त्वों को आप भलीभाँति पहचान सकें, तब रात्रि को तीन चार बजे सोकर उठें। सब प्रकार से निश्चित होकर आसन मारकर बैठ जाय और मालूम करें कि, इस समय कौन सा तत्त्व चल रहा है। जब यह मालूम हो जावे कि इस समय कौन सा तत्त्व चल रहा है तो इस प्रकार के साधन करें।
तत्त्व-साधन
यदि आकाश तत्त्व चल रहा है तो उस समय यह ध्यान करें, कि बहुत सा प्रकाश है—जिसका कोई रूप नहीं उस समय (है) का जप करें।
यदि अग्नि तत्त्व चल रहा हो, तो एक त्रिकोण आकृति का ध्यान करें—कि इसका रंग लाल है—जो शरीर में गर्मी रखती है, भोजन जिससे पचता है और यह देखा कि तुम इस स्वरूप को गर्मी को एकाएक बरदाश्त नहीं कर सकते। इस समय (रै) का जप करो।
यदि जल तत्त्व का वेग है तो अर्द्ध चन्द्रमा का ध्यान करो जो अति प्रज्वलति और अति निर्मल है। यह गर्मी और प्यास को दूर करता है। मानसिक योग के बल से गहरे पानी में गोता लगाओ। इस समय (वै) का जप करो।
यदि पृथ्वी तत्त्व चलता हो, तो, चतुष्कोण आकृति का ध्यान करो,
(स्वरोदय विज्ञान)
(३१)
जिसका रंग पीला है। इसमें से मीठी वास निकल रही है—जो कि सब प्रकार की बीमारियों को दूर कर सकती है। इस समय (लै) का जप करो।
यदि वायु तत्त्व चल रहा हो, तो गोल आकृति का ध्यान करो जिसका रंग हरा है—जो तूफान में से पक्षी के समान ऊँचा उठता दिखाई देगा। इस समय (यँ) तत्त्व का जप करो।
इन तत्वों के साधने से मनुष्य को बड़ी भारी शक्ति प्राप्त हो जाती है। इन्हीं के बाद मनुष्य योग और स्वरोदय का सम्बन्ध समझ सकते हैं, इसकी स्वाभाविकता पर विश्वास ला सकते हैं।
स्वरोदय शास्त्रियों ने और शिवजी ने लिखा है कि आकाश तत्त्व जिसके वश में है—वह त्रिकालज्ञ हो जाता है। वायु से अति वली हो जाता है। अग्नि से गर्मी बरदाश्त कर सकता है। जल तत्त्व से पानी का भय नहीं रहता। पानी बरसा सकता है। पृथ्वी तत्त्व से स्वास्थ्य को बनाये रख सकता है।
कुछ समय अभ्यास करने से तत्त्व सिद्ध हो जाते हैं और फिर हमेशा के लिए ये अपने वश में हो जाते हैं। इनसे बड़े-बड़े काम निकाले जाते हैं।
प्रति दिवस तत्वोदय ज्ञान-तालिका
| सू | च | म | बु | वृ | शु | श |
|---|---|---|---|---|---|---|
| पृथिवी | जल | अग्नि | पृथिवी | वायु | अग्नि | आकाश |
विशेष—मंगल के दिन तिथि तथा दिन दोनों से विपरीत स्वर अर्थात् चन्द्र पहिले पहल चले तो अशुभ हो, गर्मी अधिक हो।
(३२)
(स्वरोदय विज्ञान)
॥ श्री गणेशायनमः ॥
स्वरोदय
अथ स्वरोदय लिख्यते -
सतगुरु ने कृपा करी जाप बतायो जाप। निसवासर तासे लगै, छोड़ न छिन्ताई॥
सुर दाता सब बात कौ मालिक और न कोई। उदै अस्त लखिवै करै, अटल अमर यह होई॥
तब सुर को विचारन लगै। रोज पानी से गैल सीवन लगै। हमेसा अलोप रहे। चारि दिन डेरे स्वर के हैं। बुध, बृहस्पति, शुक्र और सोमवार ये चार दिन चन्द्र स्वर के हैं। इनके उदै में डेरी सुर चलत है। सब काहू को चारि वरन मैं। और कोहू बचै नहीं है। भली-बुरी सब ही पर बीति जाति है। काहू को खबर नाहि परति है।
ईश्वर मानस से कहत है। मनुष्य की देही सब औतारन से बड़ी है। सो कोई स्वास घटाई जानत है और साधत है। राजा होई कै स्वर की मरजाद बाँधत है। तौ सूरज का सात पुतेज होई। तब कोई कुछ माँगै चाहे तो ततीछन फल पावै। परजा सुखी सब देस में रोग जन-मन आवै। महा गौन होई और पृथ्वी पर सकल आनन्द रहै। संसार की उपज खिपज जाती जाइ। ऐसे राजा होई और जो साधंगी होई। तो दसौं दिसा के दरसन होई। सब देवतन का दरबार करै। और जे संसार में बीजक बातै हैं। वे सब जानै और बहुत काल जीवै। सब धर्म को जाने। जुगति को जाने, मुक्ति को देखै। ये लछिन योगी जीतै।
और भोगी साथै तो इतने फल पावै। प्रथम पुत्र लाभ होई, सम्पत्ति
(स्वरोदय विज्ञान)
(३३)
लाभ होई। राजा प्रजा सनमान करै और की नहरू जगार करै तो फतै होई और गरीब साधे तो गरीबी मिटि जाइ। तन से मन से धन से आनन्द से रहे। हमेश और सतगुरु मिले तो फल पावै और तीन देवता सुर के रखवारे है। ज करै। फौज लड़े तो जीतै। स्त्री से संगति करै, घोड़े हाथी पर सवारी करै, पोशाक करै, पूजा करै, भोजन करै, पराये घर जाई। इतने चर कारज उलाइते दाहिने सुर में कीजै।
शनीचर, रविवार, मंगल ये दिन दाहिने स्वर के हैं। इन के उदैं में डेरा स्वर चलै तो असुभ जानिये। कछू कारज न करै और जब लौ डैरो सुर चले तब लौ काहूँ सौ न बोले और दोनों सुर बराबर चलते होई और शनीचर का दिन होई। आकास तत्व होई और पहर भर चलै सनीचर में उदय में तो जीवन मुक्ति होई।
पाँच पहर में देवलोक होई और बचाय चाहे तो प्यास लगे तो पानी न देई। अन्न न दे। भूख लगै तौ दूध देई पीव को और कछू न देई। तो सुर फिर जाई। मरै नहीं काल हुमसि जाई। सुख पावै। और इतवार दिन होई, पृथ्वी तत्व होई चारि पहर एक सौ चलै। दाहिने सुर में तो बड़ो फल होई। मरै तो दोऊ जनम की खबर कहै कौनहू जोन में जनम लेई।
और सोमवार के दिना चन्द्र सूर सोलह पहर चलै रात दिन तो जानिये के बड़ी आनन्द हुई है। और कदाचित मरै तो ब्राह्मण होई तो जल दाग देई तौ नौ नाथ के हर बारे जाई। तीन आसमान को खबरें कहे। सब देवतन को दरबार करै।
जलतत्तु के गुण—मंगल के उदैं में अग्नि तत्तु बहे चारि पैहर। तो देही को कछू कष्ट उपजै। बचाये चाहे तो कछू उपाई करै। दोऊ सुरन में ठैंठा देई, मुख होकैं स्वाँस कढ़नन न दै। नाक होई न कढ़न देई, अन्न पानी कछू न देई। तौ कष्ट छूटै सुख पावै।
और बुध के उदय में पृथ्वी तत्त चलै चार पहर तौ जानियो कि मनसा पूर्ण होई है और बृहस्पति के उदय तो सरदी को नास होई। जन सुख पावै
(३४)
(स्वरोदय विज्ञान)
और सरदी गरमी देही में होई तो जतन करै। दोनों सुरन में ठैंठा दे के मुख होके वायु काढे और चतुर विला छन होई।
जोगी होई सुर साथे होई। अरोगी और बुधि जीते तो इतवार के दिन से अपने वार बनवावै दाहिने सुर में और एक अंगोछा में धरि लेई गिरन न देई जिमी में आर जानी कि आधी रात भई। तब धूनि लेई वारन की और सूहागी मिलावे तो सभा जीत होइ। बुधि पावै और झाड़े को दाहिने सुर में जाई और पेसाब को डेरे सुर में जाई।
इस्त्री गमन दाहिने सुर में करै तो पुत्र लाभ होई और स्त्री प्रसन्न होई। कन्या कबहु न होवै और सुर देख के कौन हूँ काम करै। तौ देवतन कौ विचारै तौ देवतन को दरबार करै तीसरी बरस नौ नाथ की दरबार करै और कछू मतो पावे और जे काल बस जाने है ते सब मोहे और सब अपने पास आवै। डराइ नहिं हितु करै और सुर को विचार हमेश करता रहै। तो प्रथम सकल सुख देखै। तुरत होई सो जानी जाय और जितने पृथ्वी पर हथियार है ते न लगे। काल को जीतै और कहीं को चलै तो दिसा विचार लेई। दाहिनी सुर होइ तौ दाहिने पैड़े तीन देके आगे चले। पूर्व उत्तर दिन राति फिरवे करै। मन चीजे कारज करै। कुछ सन्देह नहीं है।
और डेरी सुर होई तो डेरे पेड़ा चार आगे धरै। दक्षिण पछिम को तौ दिन रात फिरवै करै। अपनी कारज करै तौ मन मोहन फल पावै। और दोऊ सुर चलते हों सुषुमना तौ कछू कारज न करै। आर तत्त्व को भी विचार कहुँ न जाय घर बैठो रहै तो सुषुमना होई असुभ शुभ देखै। आर शनीश्चर के दिना डेरी सुर चलै तौ जानिये कि देश में उपद्रव होई है और तीन शनीश्चर डेरी सुर चलै तो जानियै कि जालिम आवै देसा उजारु होई। वजाय चाहे तो देस के कुता खवावै। देश की चीटीन को चुगावै। नगर की गैलें सिचावै झरावै और दीपन करावै ता देस में जालम न आवै, मुराकि जावै। राजा की फते होई। और शुक्रवार के उदैं में दाहिनी सुर चलै तीन शुक्रतो तीन महिला में काल आवै राजा को। और बचाये चाहैं तो उपाय करै।
(स्वरोदय विज्ञान)
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काल बचावे की विधि। दो शुक्र लौ विचारतु रहे। जो दो शुक्र दाहिनों सुर होई। दो पहर रहे तो जानिये कै अलप है। और तीन शुक्र दाहिनों सुर तीन पहर चले तो काल आवै। और तीन महिला में सुर गुरु के दिना और शुक्र के दिना दाहिनों चले दिन रात तौ जानिये कि काल आया। तौ उपाउ करै। दोऊ सुरन में टैठों लगावे। मुख होइ कै राह स्वासा कढन दे। सुर में टैठा मजबूत लगावे और ऊँची जगह में चढ़ै उतरै। अटाटी के कूचै काल जहां हुमसे तौ भरुडुना खेलै चौरै मैं और न हुमसे तौ अपनी मूत सरीर में एलै सोठि पीपर सुहागौ मिलाइ और मिरच की नास देइ तै। तुरन्त हुमस जाइ। फिर न आवै प्रानी जीवै और चलत फिरत सुर की खबरि राखै तौ हारै नहीं। सब बातै जीतै। लोक नाथ की खबर सब जानी परै।
मनसा पूरन करै। देवता की सी मरजांद धै। सकल सिद्धि का दाता होई। चतुर विवक्षण होई। और कौन हू रोग सो मान सदवो होई। तो दोऊ सुरन में टैठा मजबूत कै दो पहर रहे। ते दिन उदैं में दो पहर लगाये रहै, और अन्न पानी कछु न देई। दिन में भूख प्यास लगै तो दूध पीवे देई। अदरक (आदो) खैवे को दे और कछु न देइ। सात दिना रोगी को कर्शेटा लिवाबत रहै। सात दिन सुरकाज तन करै। तो रोगी सुख पावे। सब रोगन से छूटै। अलफमे न मरे और काहू को असीस दैवा चाहे मैं बाई तरफ तत्त्व चले। चारि पहर तौ जानियै कि रोग में परै। बचाये चाहे तो रोगी की घरी घरी कर्शेटा लिवाबत रहै। अन्न पानी कछु न देई। जब कुछ मागे तो गाई का दूध देई पीवे को तो अच्छा होई।
शुक्र के उदय में अग्नि तत्त्व चले चारि पहर तौ जानिये कि पुत्र लाभ होई। राजा सन्मान करै बड़ा आनन्द होई चन्द्र के दिना सुरज, सूरज के दिना चन्द्र। आठ दिना लो अदल बदल रहै तो अशुभ देखै। तौ जिमी छांड़ि देई अंत जाय रहै तो बचै तब सुर धरु वाघै। जब धर आवै तब मन में सुर फिरै।
फौज की लड़ाई की विधि
लड़ाई पै जब ठड़ा होई तब दिसा को विचार करै। दाहिनों सुर चलता
(३६)
(स्वरोदय विज्ञान)
होइ तौ पूर्व उत्तर की दिसा लीजै। और सिरदार अपना सुर देखै। जौ दाहिनी सुर होई तौ फतै होई और डेरो सुर होई तौ सरदार ठांडो हो जाई। और सब मानसन के सुर देखै जाको दाहिनी सुर होई। वासों हथियार लदवावै। दाहिने सुर के सिपाही बढ़ते जाइ। तौ सौ मानस हजार से लड़ै फतै पावै। और सरदार के हाथ खेत रहे और दाहिनी सुर नृप को होई तो प्राकृमह (पराक्रम) पूरी करै। तो पचास मानस हजार को मारे और फतै पवै। और डेरी सुर चलत होई तब लड़ाई करै और दखिन पश्चिम दिसा लीजे। और जब लड़ाई पै ठांडो होई तब सुर को देखै कि डेरी सुर है खेत पै ठांडो होई और मानसन को सुर देखै। चन्द्र होई तो दखिन पश्चिम मुख करि युद्ध करै तो जीतै फतै होई।
और देही में गरमी बढी होई तो आठ दिना नो डेरी सुर कर देई। दिन राति तो गरमी को नास होई और सुख पावे। और सरदी होई तौ आठ दिना लौ दाहिनी सुर करि देई तौ अमावस के दिना पडिया लगै दोनों की सधि में बोले आधी रात कौ। और बाकी नाम पै छिड़के। नाम गैल में लिखै और दूध से सीचै सकल दुःख तै छूटै।
और चार पहर दिन एतवार को काहू को दरसन न दे दिन रात अलख रहे। और बेरी को कष्ट देई तौ दाहिनी सुर दिन रात राखै। बैरी का नाम पथरा गै लिखे और लुटिया से घिसै सात बेर तो वैरी वस होई। अनदेखी देखै अनसुनी सुनै अन कही कहै। और रात को दोनों सुरन में ठैठा लगावै मजबूत कै। चार पहर रहन देई। उदैं में सूरज में खोलै चन्द्र को वार होई तो चन्द्र राखै। चार पहर और सूरज के दिन सूरज राखै पहर चारि। ऐसी विधि हमेशा करतु रहै। कछुक रोज लो करै तो जनत कौ तमासो देखै और कछू कहै सो तुरत फल पावै।
अब दाहिने सुर के लछिन सूनो। तीन दिन सूरज के है। शनीचर, रविवार, मंगल सुर दाहिना चलता होई। तब दिशा को विचार करै। पूरब उत्तर को मुख करै तब खात पै उठवे करै। सेज पैते ऊन लगै तौ सूर्य के
(स्वरोदय विज्ञान)
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उदय में विचार करें। दाहिनी सुर चलत होई। तो दाहिनी पांव जमीन पै धरे और तीन पाँव दाहिने आगे धरे और पृथ्वी को दंडवत करें। फिर सुर को विवेक करें। दाहिना सुर चलता होई तीन पेड़ में अपना कारज करें। चारि पहर रात्रि और चार पहर दिन सब सुख देखें। वैरी आता हुआ रुकें। अलफ से न मरें सब सूख देखें। कुमति को नास करें, सुमति उपजावे और कुछ करें तो उलाइतौ कारज करें सो सब फतह होइ। इतने कारज करें। ब्रह्मा, विष्णु, महेश बुध के उदय में उठि के खाट पै बैठे। सर को देखें। डरो सुर चलत होई तो डेरी पाँव जमीन पर धरे और चारि पग डेरी डग धरे। सूरति से आगे। फिर बैठे डेरा सुर चलता होई तो डेरो पांव दैके बैठे चले। तो चार पहर दिन और चारि पहर राति। सकल आनन्द में रहें और कुछ विचारें मन में सो पावें जो कुछ करें चाहे सो करें और अनभव कारज करें। उलाइतौ कारज न करे और हरि हमेश यही करता रहे विधी तो आनन्द देखें। सब सीतल देखें अरु डेरो सुर के दिना दाहिनी सुर चले तो अशुभ जानिये तो, काहू सो न बौले तब लौ दाहिनी चलै। जब डेरो सुर चले तब बोले तो असुभ न देखें और कुछ कारज करे तो फतै न होई। गड बैठि कै और मोरचा करे चन्द्र के राज।
नित्य उठने की विधि
चन्द्र के दिन ४-बुध, बृहस्पति, शुक्रवार, सोमवार। इन उदै उठन लागें तब सुर को विचार करिजौ। डेरो सुर चलत होई तो दिसा देखें। पश्चिम दक्षिण को मुख करके उठै अरु डेरो पाँव धरती में धरे। चार पैड़ आगै चले फिर बैठ जाई। फिर सुर को विचार करें। जो डेरे सुर चलत होइ तो अपनी कारज करें। मनमोहन फल पावै। जो दाहिनी सुर चलत होइ तौ अशुभ जानौ, कछु कारज न करे। जौ करें तो अफल होई।
अरु तीन दिन सूरज के हैं। शनीचर, इतवार, मंगल। इनके दिन के उदै में उठै तौ सुर को विचार करें। जौ दाहिनी सुर चलत होई तौ दिशा को विचार करें। पूर्व-उत्तर मुख करके उठै। दाहिनी सुर चलत होइ तौ दाहिनी
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(स्वरोदय विज्ञान)
पांव धरती पै धरें। तीन पैड़ आगे चले फिर बैठे। सुर की विचार करे, जौं दाहिनी सुर न चलत होई तो अपनी कारज को अनईतौ जानिये। कै कछु अचीती मार परंत है।
जब वा जगह छांड कै जात रहै, जब सुर मरजादा पर आवै, दिन पर दिन उठन लगे, तब मकान पर आवै तौ चीते कारज होइ जौं डेरै सुर चलत होइ तौ कारज न करै, करै तो फतैन होइ।
स्वर बदले की विधि
चन्द्र के दिन सूर्य अरु सूर्य के दिन चन्द्र, जो आठ दिना लौ अदल-बदल हो चले अरु ना फिरै तौं जौ जतन करे-सौठ, सुहागु, गौरखमुन्डी कौ नासु देइ तौ काल छै महीना को आरबल बडे अरु जो फिर आवै तौ फिर करै। अरु चार रात चार दिन डेरी सुर चले तो जाने मृत पहुची। रोग में परे तो रोगिया कौ जतन करै।
घरी-घरी करैटा लिवावत रहे। अरु रोगिआ की अन्न पानी छुटा देइ। अरु पियावै तौ दूध पियावै। रोगिआ नोको होइ।
अथ तत्व कौ विचार लिख्यते :-
जौन दिन तौन तत्व काहति है। सनीचर, मंगल, इतवार, बुधवार-आकाश अग्नि पृथ्वी-पृथ्वी। बृहस्पति, शुक्रवार सोमवार को तत्व पवन, अग्नि, जल जानिवौ। कांच की आरसी लीजे ऊपर दोनौ नासिका को पवन छाड़िजै। जौन तत्व बहुत होइ ताकौ वर्ण आरसी ऊपर उछरै। पृथ्वी पीत चौकोर नजर आवै। जल सेतु रूप गोल गोल नजर आवै। वायु हरौ रूप छिखुटा नजर आवै। आकास तत्व गोल गोल करन रूप नजर आवै। रोज उठवे की विधि संपुरन।
| वारशः तत्व स्थिति :- | बुध-पृथिवी | शुक्र-अग्नि |
|---|---|---|
| रवि - पृथिवी | गुरु-वायु | शनि-आकाश |
| सोम-जल | मंगल-अग्नि |
विज्ञान)
(स्वरोदय विज्ञान)
(३६)
र करै, कै कछु न पर चलत
इन्द्र-स्वरोदय
अथ चन्द्र-स्वरोदय लिख्यते -
गुप्तजातिगुप्ततरं सारं मप्रकाशिप्रकाशितम्।
इन्द्र स्वरोदय ज्ञानं ज्ञानिना मस्तके स्थितम्॥
अर्थ- गुपित विचार है प्रकास, बताइ वे कौ नहीं। प्रकासि वतु है यह सुरोदया की ज्ञानु है।
दुष्टैव दुर्जनं छुद्रतुः शान्ते गुरुतलपके।
हीन संते दुराचारेसु ज्ञाने न दीयते॥
दुष्ट, छुद्र, दुर्जन, क्रोधी, गुणहीन, आचारहीन ए लछिन होंहि ताहि न दीजै।
शान्ति सुझे सदाचारे गुरभक्तैकमानसे।
दृढ़ चिते कृतंगे च देवचैव सुरोदय॥
सात, सुथ्य, आचारी, गुरु भक्त, एकंत चित, दृढ़ विसवासी, करे कौ मानै ताहि सुरोदया दीजै।
सुर- हीन सिर-हीन देही, नाथ हीन गृह, शास्त्र-हीन वक्ता; ऐसे सकल सहस्रन कौ ज्ञान है। सुर ग्यान बिना नाभ के ठिकानै ताहां तै सकल नाडी उपजती है। अहोरात्रि के मध्य स्वासा २१६०० तिन की नाडी ७२०००। तिन विषै दस बोय है, दस अर्य है, दो दो तरीछी है। ऐसी नाडी २४ श्रोष्ठ है। तिन विषै तिन दस श्रोष्ठ है। तिन विषै तिन की ब्रह्म मारग की खबर है।
इक इडा है वाम नाडी चन्द्रमा की। दूसरी पिंगला है सूरज नाडी दाहिनी। तीसरी सुरसुती सुषमना है। अग्नि की नाडी छिन बारीं छिन दाहिनी।
बदल नासु करै। रे तो देइ।
काश जल इजै। गजर गजर की
(४०)
(स्वरोदय विज्ञान)
चन्द्र-कर्म
वस्त्र पहिरे, मित्रता कीजै, घोरे की थान नये घर कौ प्रवेश, गढ़ व्योपार, बीजु ववै, दूरयात्रा सुभ, मंगल कारज कीजै।
सूरज - कर्म
उतावली कामु, मोहिनी असनानु, भोजन, मैथुन, घोरे की असुवारी, नाउ चढै, नदी पहिरे, परवतु रुख चढै। जलुवायै फोरो। सोवै, भोजन करै। युद्ध कौ जाइ, दाहिनै सुर जातै गढ़पती होइ। मोरचा मारवे की बायें सुर जीतै।
पक्ष-विचार
सुकल पक्ष है चन्द्र कौ। कृष्ण पक्ष है सूरज कौ। जौ सूरज बहे कृष्ण पक्ष, दोइज, तीज लौ; तो सुफलदायक है। अरु चन्द्र बहे तो अशुभ। चिन्ता द्रव्यहानि।
अरु जो चंद्र पक्ष तीन दिन सूरज बहे तो चिन्ना, मित्र हानि होई। रवि, मंगल, गुरु, शनिवासरे सूरज नाडी पूर्व-उत्तर दिसा फलदायक है, कृष्ण पक्ष में विशेष कैं सोम, शुक्र, बुध वासर दक्षिण-पश्चिम दिशा फलदायक है।
संक्रान्त को भेदु
मेघ, मिथुन, सिंह, तुला, धनु, कुंभ ये छे संक्रातैं सूरज की हैं। इनमें सूरज बहे तो शुभ। इन संक्रयांत विषै चन्द्र वहे तो असुभ। हानि चिता। वृष, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर, मीन ये छे संक्रान्त दियै चन्द्र बहे तो सुभ है। सूरज बहे तो अशुभ है। अरु कर्क-मकर की संक्रान्तन विषै सूरज बहे तो महिना छैह की आरबल जानिजै।
रवि के दिन सूरज न बहे तो आयु को कलेसु होइ। सोमवार के उदै सूरज बहे तो चिता बढै। मंगल के उदै चन्द्रमा धन हानि करै। बुद्ध के उदै सूरज बहे तो गमन करावै अवस कैं। बृहस्पति को चन्द्र उदै विग्रह दिखावै, राज में कैं गढ़ में। शुक्रवार को सूरज बहे तो छैह महिना में राजा को कालु होइ। शनिचर को चन्द्र उदै; देश ऊजर करै। एक-एक पल बहे तो इने अपगुन जानिजै। जो संध्या सूरज के दिन चन्द्र, चन्द्र के दिन सूरज बहे आठ दिन लौ;
(स्वरोदय विज्ञान)
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आठ दिन में कालु अपनी जानिजै कै कछु अनर्थ को ढका लगे।
अथ युद्ध कीवे की विधि
दोई अनी जुरी होई तो कोउ पूछै। पूरन सुर होइ तौ प्रथम नाम लेइ सु जीतै। वैरी के दाहिने सुर जईयै शत्रु की फौज की तरह सुन्न सुर राख युद्ध कीजै। जो सूरज बहै तो पूरब—उत्तर दिसा लीजै तो पांच असवार सो जीत आवै। अरु चन्द्र होइ तौ दक्षिण—पश्चिम दिसा लीजै तो पांच असवार सो जीतै। अरु ओर दिसा होइ तो भैय देखै।
पृथ्वी तत्व में चारों दिसि गबन कीजै तो सुभ है। अग्नि तत्व में दछिन दिसा लीजै। जल तत्व में पछिम दिसा लीजै। वायु तत्व में उत्तर दिसा लीजै। दाहिनीं साम्हीं पाछै चलतु सूरज घर जानिये। बाम बैठी, ऊचौ, नीचौ चार घर चन्द्र जानियै।
चन्द्र होई तौ चन्द्र घर पुछै तौ कारज सिद्ध होई। सुरज सुर होइ सूरज घर पुछै तौ विलंब कहि फल सिद्ध होइ। सुज सुर में चंद्र घर चंद्र होइ तौ पुत्र होइ।
वायु तत्व में जनमु होई तौ जोगी होइ, कै तीरथ यात्रा दिस तरी होइ। अग्नि तत्व में होइ तो थोरे दिन जीवैं। रोगी होइ, आकाश में होत ही मरै। जल तत्व में जसी भोगी होइ। पृथ्वी तत्व में राजा के साहु होई। जौं कोउ पूछै कैं या कैं कह बालक हुहै तौ सूरज सुर बहै तौ पुत्र कहियै। चन्द्रमा बहै तो कन्या। वहै तौ अंगुर आठ।
आकाश तत्व के भेद
वरन कारी। स्वादहीन। सब तै निआरी। जात हीन मूर्तहीन। प्रमानहीन। मुक्ति कौ दाता है। आकाश में सब कारज निरफल है। पनुमेसुर को भजनु करै, जो निकसत स्वासा बीज परै, तौ थोरी आरवल तरवर की होई। स्वासा सरीर में होइ तो बड़ी आरवल होई। और जो पुरिष की सुरज सुर होई तो अस्त्री को पूछे तो अंतर विलवु जानियै। चन्द्र सुर होई सुज घर पूछे तौ
(४२)
(स्वरोदय विज्ञान)
विलबु कहिजै।
अथ वायु तत्व
मुखतै पूरे अछिरक है। सुरज सुर होई तो कारजु सिद्धि होई। जो सरीर पांच तत्व कौ है सो तेह तत्व में जानि अत है।
पृथ्वी तत्व - सुर में पीत वरन है। चौकोनी। मीठी स्वाद है। पूर्व दिसा वैस वरन। माझनासा बहै अंगुर १२।
जल तत्व - सफेद वरन। गोल मूरत। खारी स्वाद। पछिम दिसा ब्रह्मन वरन। अधोगति सुर वहै, अंगुर १६।
अग्नि तत्व - रक्त वर्ण। त्रिकोन मूरति। चिरपिरो स्वाद। दछिन दिसा। छत्रीवरन। ऊचौ सुर वहै, अंगुर ४८।
वायु तत्व - हरौ वरन। खाटौ स्वाद। लव मूरति। उत्तर दिसा। सुद्र वरन। टेढौ सूत्य जानिजै।
दौऊ बहै तौ दो बालक जानिजै। सुरन सुर होई तौ कन्या जानिजै। अग्नि में गर्भ पतन जानायै। आकास में मृतक जानीजै।
अथ संवत्सर को प्रश्न
चैत्र सुदी परवा के दिन उदय होइ ता समय पदम आसन बैठे, पछिम मुख करकै। उदय होइ सूरज कौ तब पृथ्वी तत्व बहै तो अन्न बहुत होई। पानी नीकौ होइ। मानिषु निरोग होइ। देश विदेस आनन्द बहुत होई। राजा प्रजा सुखी होई।
बरस दिना कौ आगुमनि सुजै जलु तत्व होई तो जलु बहुत होई। मनुष निरोगी होई। अनस्यारी यान उनाहरी बहुत होइ। उपद्रव होइ तेज बहुत। अग्नि बहुत लगै। जलु थोरी होई। लराई राजा प्रजा की होय। अन्न कौ रोगु लगै। जैसी अगिमु बरस कौ जाने अरु युद्ध बलवा अधिक होई। मरही बहुत होई।
अरु वायु तत्व उदौ होइ मुसौ बहुत लगै। बैहर चले। या टाड़ी आवै।
(स्वरोदय विज्ञान)
(४३)
मेघ थोरी बरसै। वायु की पीड़ा अधिक होई। सीतांग अग्नि थोरी जागा में उपद्रव होई।।
आकास तत्व होई तो मेघ बहुत बरसै। पानी की अधिकाई सों अन्न महागी होई। मरही लगी। उपद्रव होई। अन्न की सैन होई। जौं सुन्नसुर होई तौ जागा छूटै। राज छूटै। आयु ना रहे।
मेघ संक्रांति के दिन तत्व विचारे एही प्रकार के। जो सुभ तत्व बहै तो कछु शुभ होई के अत्यधिक निषिद्ध फल होई।
प्रश्न घाउ की जो कोउ पुछै कै वाकै घाउ लगौ है ताहां अग्नि तत्व होई तौ काँधे में कहिजे। वायु तत्व होई तौ पैर में कहिये। आकास तत्व होई तौ माथे में कहिये। जल तत्व होई तौ पांउ में कहिये। सुन्नसुर होई तौ अंग में बताइये।
कोऊ अपनी कारजु पूछै— जो पृथ्वी तत्व होई तौ लाभु होइ झेल सौ। जल तत्व होई तौ तनु लाभु होई। अग्नि तत्व होइ कै वायु तत्व होई तौ हानु होई। आकास निरफल है।
जल तत्व होई तो वेग आवे। पृथ्वी तत्व होई तो नीको जानिअै। लाभु कहिये।
उहाँ है ठिकानै। वायु तत्व होई तौ राह में बताइये। अग्नि तत्व होई तौ रोगी जानिये। रोगी को परसग पूछै तौ पुरन सुर होई तौ जीवै। सुन्न सुर हो पुछै तौ मीचु जानिये। तौ महादेव रक्षा करे तोलौ मरै।
पुछत सुन्न होई, पाछै पुरत होई, तौ जमु आवै। अनेक रोग होई तो लगि जीवै। एक दिना सुरजा वहै कै चन्द्र बहै एक रात बहै तौ तीन बरस में मरै। दो दिन दो रात एक सुर बहै तौ एक बरस जीवै। विसन पट्ट का अरु धरती युव हो न देखै तो छै महिना जीवै। छाया दरपन में सिर नहीं देखै, तो पंद्रह दिन जीवै। भीहै न देखै तौ नौ दिन जीवै। मात्र मंडल न देखै तो सात दिन जीवै। तारा न देखै तौ पाँच दिन जीवै। जीभ न देखै तौ एक दिन जीवै।
ये तत्व जानाति योगी ये पठति नित्यस्व।
(४४)
(स्वरोदय विज्ञान)
मुच्यते सर्व पापेभ्यो लभ्यते वाञ्छितं फलं।
जो याही पौने अभ्यास करे या को निति पाठन करै ताके सब पापु छुटै, मनि वाञ्छित फल पावै।
रविवार को पृथ्वी तत्व होइ उदै में बुद्धवार को प्रथवी तत्व होई। मंगल वा सुक्र को अग्नि तत्व होई सुरज के उदै बृहस्पत को वायु तत्व होई। सनीचर को आकास तत्व को उदै होई।
प्रथम आकास है पाछे वायु है ता पाछे अग्नि है, चौथो जल तत्व है पाँच पौ प्रथी तत्व है एक-एक घरी की मरजादा क्रम तै है। जाहिन जोत पगै तातै घरी-घरी तत्व लीजें छापा प्रमान हारी घरी की छाया पाँउ।
| ६४ | ४१ | २४ | १४ | १२ | ११ | १० | ६ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
| ८ | ७ | ६ | ५ | ४ | ३ | २ | १ |
| ८ | ६ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ |
| आकास | वायु | अग्नि | जल | प्रथी | तत्व | प्रभा | |
| १६ | न. | ||||||
| १७ | |||||||
| ३० | ६० | ९० | १२० | १४० |
अथ स्वासन की मरजादा
डोक नाड़ी पांच घरी प्रभात छुपतर संध्या चंद्रमा के उदै में आप छाया देखै निमषन लागै। छाया गरे में छिन मात्र देखै। मन थीर करकै ता पाछे ऊँची आप परेरै। आसा मिक्षित सुपेत काल पुरुष है तासीं छा प्रान की है ताके मुख में तीन लोक हैं कान न देखै तौ वरष १२ जीवै, २ हातन देखै तौ वरष दस जीवै, १० मुखन देखै तौ वरष १ जीवै।
(स्वरोदय विज्ञान)
(४५)
॥ श्री गणेशायनमः॥
अथ दीपक-ज्ञान-स्वरोदय
(ऋषीकेश कृत)
॥ श्री गणपति स्तुति ॥
दुरद वदन सुख सदन विराजत । ईस तनय गनईस सीस रजनीस जु छाजत । सिद्धि सिद्धि बुधि देत जाहि कछु विलम न लागै । जो सुमिहै चितलाइ भागि ता जन कौ जागै । रिषीकेस कलिमल दलन विथन विनासन अघहरन । जै गिरिजा नंदन परम गुर, काम धाम मंगल करन ।
अथ नूतक छंद
आदि धरौ ध्यान सुखद स्याम कौ । मोहि भरोसी जुहै उनिही के नाम कौ । प्राण सकल प्राणनि कौ जानियै । देवनि कौ देव सोइ मानियै । मैं कौ हरण हार है भगवंत सौ । आदि वही मध्य वही अंतसौ । वारन की तारन की बार उन । वेस्या अजामेर लियौ तारि उन । द्रौपती कौ चीर बढ़ायौ उनहीं ।
(४६)
(स्वरोदय विज्ञान)
धर्मसुतै जुद्ध जितायौ उन्हीं । राखि लियौ आगितै पैहेलाद कौ । टारि दियौ दैत्य की मर्जाद कौ । भगतनि के हेत देह धरी जू । मतमंद जु उनि सौ न करै नेहजू । जानत हो स्याम सवै चित की । लाज तुम ही कौ पतित भक्त की दास रिषीकेश तुम्हारौ जु है । तुम तौ बहुत काल नियारौ जु है । वेगि दया सिंध दया कीजिये । चाहत हो आई दरस दीजिये । देखौ न कोऊ और दुख हरन । या ते आई परौ तिहारे सरन । सरण आये की लाज कीजिये । ज्ञान ध्यान देव मोहि भक्ति दीजिये ।
सोरठा
ज्ञान दीप सुख रास, जीवनराम स्नेह सौ । जैसे कियौ प्रकास, सुनीयै सो सब कहत हौ ।
नवल छन्द
जमुना के तीर मित्र आगरी बसै । जेते नगर है आगरो सुन्दर लसै । जानो निवास दास रिषीकेश को वही । गुर के प्रसाद कछू ग्यान रीति मैं लही । जे मित्र है दयाल जे दया सवै करौ । दर्शन दिखाइ दुख विविध दास के हरौ ।
विज्ञान)
(स्वरोदय विज्ञान)
(४७)
तिनि में। महा सुजान जीवनराम जानिये। परमारथी सुबुधी सुधी सुबखानिये। तिनि येक धोस मोसो कहीये सुनाइकैं। भाषा में स्वरोदय सो मुझे दे बनाइकैं। जदपि में कहौ मित्र गुनी कौ कियौ। श्री कृष्ण की कृपा सै जथा मत सौ करि दियौ। जानौ नहीं मैं तो कछू छन्द रीति को। टारौ न वचन मैंने देवता की प्रतीति कौ। यह ज्ञान दीप गूँथ रचो हे बनाइकैं। जों में सुखद प्रकास, तिमिर दे नसाइकैं।
सोरठा
षट् प्रकास सुख कंद, कहौ मित्र षट् छन्द करि। कृपा करी ब्रज चंद, दीप प्रकासौ ज्ञान तब।
नाग स्वरूपिनी छन्द
सूनौ जु ज्ञान दीपकैं। सुबुधि के समीप कैं। प्रकास होत लोक मैं। रहै न चित्त सोक मैं।
अरिल्ल
अष्ट दस संत अष्ट सु संवत जानिये। चैत्र शुक्ल तिथि तीज वार ससि मानिये। (१८०८)
दोहा
अब सुनि ककुभा छन्द करि कहियत प्रथम प्रकास। यह नाडी स्वर भेद सब भाषे शिव सुखरास।
ककुभाछन्दः पार्वत्युवाच
(४८)
(स्वरोदय विज्ञान)
येक दिन सिवा कही यह सिव सौ मुनौ महेश्वर ज्ञानी। दीसतु नाहि और कोउ तुम सौ तिहु पर मध्य विहानी। जिनि जाने नर सब कछू जाने, कौन ज्ञान सो कहिये। सकल कार्ज की सिद्धि सु यामैं, बिनु प्रयासहि लहियै। तिथि नक्षत्र अरु बार महूरत, भद्रादिक अपजोगा। तिनि की तहाँ न कछु वस्याई, सवैं मैटि शुभ होगा। जो तुम प्रभु प्रसन्न हो मो पर, हो दयाल सो कहिये जाके किये सकल सुख सरसैं, दुःख न कबहू लहियै।
श्री सिव उवाच
तब सिव कही, सुनौ तुम गिरजा गुप्त ज्ञान यह जानौ। काहूँ सौ अवनौ नहि भाषौ, गुप्त अति मानौ। स्वर ही मैं चहु वेदहि जानौ, सास्त्र सकल स्वर माहीं। तिहू लोक पुनि है, स्वर ही मैं, यामैं संसय नाहीं। परमात्म जग मैं जो कहिये, ताको स्वर मैं वासा। दृष्टि अदृष्टि सकल स्वर ही मैं, सब ही स्वर परकासा। स्वामी बिन जैसे ग्रह जानौ, सिरविनु तनहि बखानौ। सास्त्र हीन जो वचन न सोहै, सुर बिन पंडित मानौ।
अथ सिष्य लक्षणं
सात, सुद्ध आखर, कृतज्ञी गुरु को भक्त जु होई। ताकौ स्वर को ज्ञान दीजिये, द्रढ़ मन चित है जोई। दुर्जन दुष्ट असात छुद्र मति, भक्ति न गुर की जाने। सुभ आचार सत्य सो हीनौ, देहु न तिनि स्वर ज्ञानै।
नाडी वर्णन
सहस्र चतुर्दस नाडी तन में, सुनीयै अचल कुमारी।
(स्वरोदय विज्ञान)
(४६)
बहु विस्तार रूप सब तिन के, जानत जे गुन धारी । यै चौबीस मुख्य ऐ तिन में, यह निश्चै जिय जानौ । दस नीचै दस ऊचै निकसी कमल नाभि ते मानों । दो-दो पुनि उत्तर अरु दक्षिण, जानौ सदा सुहाई । तिन में दस प्रधान अति मानौ, पार्वती मन भाई । तिन दस के अब नाम बखानौ, सुनौ प्रिया सुखदानी ।
इडा (१) पिगिला (२) सुषमना (३) गंधारी (४) मनमान बहुरि हस्तिचिक्का (५) और पूषा (६) पुनि जसस्वनी (७) जानौ । है अलबुषा (८) कूहू (९) संखिनी । (१०) ये दस नाडी बखानौ ।
जौ तुम ये नाडी दस जानी, पवनहु दस परधाना । तिन हुं के अब नामहि सुनियै, जेहि विधि कहत सुजाना ।
प्राण (१) (अपान) (२) उदान (३) समानह (४) मान (५) नाग (६) पहियानौ । कूरम (७) क्रकल (८) धनंजय (९) है पुनि, देवदत्त (१०) उरआनौ ।
सुनि गिरिजा पावन मति तेरी, ये दस पवन विचारौ । अब इनिके अरु सब नाडिनि केई, प्रभाव हिय धारौ । बाँमें भाग इडा तुम जानौ, नाडी पिगिल दक्षिण । मधि सुषमना नैहचै जानौ मानौ गुनी विचक्षण । बाम चक्षु गंधारी कहियै, हस्ति जिह्वा पुनि दायै । पूषा कर्न दाहिने लहीयै, पुनि जसस्विनी बायै । नाभि माहि थिति है अलबुषा, कूहू लिंग में जानौ । मूल स्थान संखिनी तिष्ठै, यह निश्चै मन मानौ ।
नाडी अस्थान
प्राण पवन सौ बसै हृदे में, गुदा अपान बखानौ । पुनि समान सो नाभि देस में, कंठ उदान सो मानौ । सर्व सरीर मान सो व्योमे, पंच पवन परवाना ।