उत्तर गीता (आदि गौड़पादाचार्य दीपिका एवं सान्वय हिन्दी टीका)

उत्तर गीता (आदि गौड़पादाचार्य दीपिका एवं सान्वय हिन्दी टीका)
Uttara Gita with Gaudapadacharya Dipika and Hindi Commentary
आदि गौड़पादाचार्य / महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariSanskritpublished86 पृष्ठ
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५८ उत्तरगीतायां नितलं पादसंधिश्च सुतलं जङ्घमुच्यते ॥ २७ ॥ महातलं तु जानु स्या- दूरुदेशो रसातलम् । कटिस्तालतलं प्रोक्तं सप्त पातालसंज्ञया ॥ २८ ॥ पदः पादस्याधोदेशे अतललोकं विद्यात्; पादं तु वितलं लोकमिति विदुः योगिन इति शेषः; पादसंधि तु गुल्फ- स्थानं नितलं विद्यात्; जङ्घं सुतलमित्युच्यते; जानुदेशः महातलं स्यात्; ऊरुदेशः रसातलं विद्यात्; कटिदेशः तला- तलं प्रोक्तम्; एवं देहावयवाः सप्त पातालादिलोकसंज्ञया कल्पनीया इत्यर्थः ॥ किंच-- कालाग्निनरकं घोरं महापातालसंज्ञया । पातालं नाभ्यधोभागो भोगीन्द्रफणिमण्डलम् ॥ २९ ॥