वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
३०८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संख्या- न्यायकन्दली ज्ञानात्मकत्वमेव ग्राह्यत्वम्, सुषुप्तावस्थायां ज्ञानात्मभूतस्य ज्ञानसन्तानवदनुवर्तमानस्यापि ग्रहणाभावात् । अवभासमानत्वमेव तस्य ग्राह्यत्वमिति चेत् ? कोऽयमाकारस्यावभासः ? ज्ञानप्रतिबद्धहानादिव्यवहारयोग्यतापत्तिश्चेत् ? बाह्यस्यापि सैव योग्यता । तथा हि-नीलं पीतमेतदिति संवादिना बाह्यमेवोपाददते जहत्युपेक्षन्ते वा, नान्तरमाकारमित्यसिद्धो ग्राह्यलक्षणायोगः, कथमम्यस्योत्पत्यान्यस्य व्यवहारयोग्यतेति चेत् ? तस्य स्वरूप- कारणसामग्रीनियमेन तद्विषयव्यवहारानुगुणस्वभावस्योत्पादनादिति यत्किञ्चिदेतत् । एतेन वेद्यत्वमपि प्रत्युक्तम् । भेदेऽपि ज्ञानस्वभावकारणसामग्रीनियमादेव तस्योपपत्तेः, सन्दिग्धविपक्षव्यावृत्तिकत्वात् । यदपि जडस्य प्रकाशायोग इति, तदपि प्रकाशनात्मकत्वाभिप्रायेण । सिद्धसाधनं संसर्गाभिप्रायेण निरुपपत्तिकम् । न हि जडस्य प्रकाशसंसर्गेण न भवितव्यमित्यस्ति राजाज्ञा, यथा होता । ज्ञान रूपत्व भी ग्राह्यत्व नहीं है; क्योंकि सुषुप्ति अवस्था में ज्ञानरूप ज्ञान समूह की तरह बराबर रहनेवाले विषयरूप ज्ञान की भी उपलब्धि नहीं होती है । यदि अवभासमानत्व को ही ग्राह्यत्व कहें तो फिर यह पूछना है कि आकारों का यह अवभासमानत्व क्या वस्तु है ? यदि वह ज्ञान के साथ नियमित रूप से सम्बद्ध ग्रहण करने की योग्यता या त्याग करने की योग्यता ही है तो फिर बाह्य वस्तुओं में (अर्थात् वस्तुओं को बाह्य मान लेने पर) भी उक्त दोनों प्रकार की योग्यतायें हैं ही; क्योंकि "यह नील है, यह पीत है" इत्यादि यथार्थ ज्ञानों से युक्त पुरुष उन ज्ञानों से बाह्य वस्तुओं को ही लेता है, छोड़ता है या उपेक्षा कर देता है, किसी आन्तर वस्तु से नहीं । तस्मात् 'ग्राह्यलक्षण' का अयोगरूप आपका हेतु ही सिद्ध नहीं है । (प्र.) एक (ज्ञान) की उत्पत्ति से दूसरे (उस ज्ञान के विषय बाह्य वस्तु) में व्यवहार की योग्यता कैसे होती है ? (उ.) इसमें कोई बात नहीं है; क्योंकि अपनी सामग्री रूप नियमित कारणों से जो ज्ञान उत्पन्न होता है, वह उसके विषय में व्यवहार योग्यता सम्पादन की क्षमता रूप स्वभाव को लेकर ही उत्पन्न होता है । इसी से ज्ञान और विषय के अभेद का साधक वेद्यत्व हेतु भी खण्डित हो गया; क्योंकि ज्ञान और विषय को भिन्न मान लेने पर भी ज्ञान का स्वभाव और सामग्री का नियम इन दोनों से ही (घटज्ञान से ही घट समझा जाय) इस नियम की उपपत्ति हो जाएगी । उक्त वेद्यत्व हेतु में विपक्ष की व्यावृत्ति भी सन्दिग्ध है । एवं प्रकाश का 'योग' (सम्बन्ध) असम्भव है, इस कथन से (योग शब्द के द्वारा) यदि जड़ और प्रकाश का अभेद (सम्बन्ध) आपको अभीष्ट है, तो फिर यह सिद्धसाधन है । यदि इससे जड़ में प्रकाश के सम्बन्ध का असम्भव कहना अभिप्रेत है, तो फिर इस प्रसङ्ग में यह कहना है कि यह युक्ति से शून्य है, एवं
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३०९
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३०९ न्यायकदली छिदिक्रिया छेद्येन सम्बध्यते भिद्यते च, तथा ज्ञानक्रियापि ज्ञेयेन सह संभन्त्स्यते भेत्स्यते च । सहोपलम्भनियमस्यापि विपक्षाद् व्यावृत्तिः सन्दिग्धा, ज्ञानस्य स्वपरसंवेद्यतामात्रेणैव नीलतद्धियोर्युगपद्ग्रहणनियमस्योपपत्तेः । बाह्याभावाज्ज्ञानं परस्य संवेदकं न भवतीति चेत् ? बाह्याभावसिद्धौ हेतोर्विपक्षाद् व्यावृत्तिसिद्धिः, तत्सिद्धौ चास्य विपक्षाभावं प्रति हेतुत्वमित्यन्योन्यापेक्षित्यम् ? तदेवास्तु किमनेन ? असिद्धश्च सहोपलम्भनियमो नीलमेतदिति बहिर्मुखतयार्थेऽनुभूयमाने तदानीमेवान्तरस्य तदनुभवस्यानुभवात्। ज्ञानस्य स्वसंवेदनतासिद्धौ सहोपलम्भनियमसिद्धिरिति चेत् ? स्वसंवेदनसिद्धौ किं प्रमाणम् ? यत्प्रकाशं तत्स्वप्रकाशे परानपेक्षं यथा प्रदीप इति चेत् ? प्रदीपस्य तद्देशवर्त्तितमोपनयने व्यापारः, स चानेन स्वयमेव कृत इति तदर्थं प्रदीपान्तरं नापेक्षते, वैयर्थ्यात् । स्वप्रतिपत्तौ तु चक्षुरादि- कमपेक्षत एवेति साध्यविकलता दृष्टान्तस्य । अथ प्रकाशकत्वं ज्ञानत्वमभिप्रेतम् ? तस्मात् परानपेक्षा, तदानीमसाधारणो हेतुः । किसी राजा की आज्ञा भी नहीं है कि जड़ और प्रकाश में सम्बन्ध न हो, जैसे कि छेदन क्रिया छेद्य वस्तु से भिन्न होती हुई भी उसके साथ सम्बद्ध होती है, उसी प्रकार ज्ञानरूप क्रिया भी ज्ञेय वस्तु से भिन्न होने पर भी उसके साथ सम्बद्ध होगी । एवं कथित 'सहोपलम्भ नियम' रूप हेतु में भी विपक्ष की व्यावृत्ति सन्दिग्ध ही है; क्योंकि ज्ञान को 'स्व' एवं 'स्व' से भिन्न (अपना विषय) दोनों का प्रकाशक मान लेने से ही उक्त 'सहोपलम्भ' नियम की उपपत्ति हो जाएगी । (प्र.) बाह्य वस्तु की तो सत्ता ही नहीं है, फिर ज्ञान दूसरे का ज्ञापक कैसे होगा ? (उ.) यह कहना तो स्पष्ट ही अन्योन्याश्रय से दूषित है; क्योंकि बाह्य वस्तु की सत्ता के उठ जाने पर सहोपलम्भ रूप हेतु में विपक्षव्यावृत्ति का निश्चय होगा और विपक्षव्यावृत्ति के सिद्ध हो जाने पर सहोपलम्भ नियम रूप हेतु के विपक्ष (बाह्य वस्तु) के अभाव की सिद्धि होगी । (प्र.) उक्त हेतु में विपक्ष की व्यावृत्ति के न रहने से ही क्या ? (उ.) वस्तुतः सहोपलम्भ नियम रूप हेतु ही असिद्ध है; क्योंकि नील और नीलविषयक ज्ञान इन दोनों का अनुभव एक समय में नहीं होता । नील की बहिर्मुख प्रतीति हो जाने के अव्यवहित उत्तर क्षण में नील ज्ञान की अन्तर्मुखतया उपलब्धि होती है । (प्र.) ज्ञान को स्वतः प्रकाश मान लेने से ही सहोपलम्भ नियम की सिद्धि होगी । (उ.) ज्ञान को स्वसंवेदन (स्वतः प्रकाश) मानने में ही क्या युक्ति है ? (प्र.) जो प्रकाश रूप होता है वह अपने प्रकाश के लिए दूसरे की अपेक्षा नहीं रखता, जैसे कि प्रदीप । (उ.) प्रत्यक्ष के उत्पादन में प्रदीप का इतना ही उपयोग है कि वह विषयदेश के अन्धकार को हटाता है । प्रदीप अपने प्रत्यक्ष के लिए भी अन्धकार को हटाने का काम स्वयं कर लेता है, अतः प्रदीप के प्रत्यक्ष में दूसरे प्रदीप की आवश्यकता नहीं होती है; किन्तु चक्षुरादि
३१० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संख्या- न्यायकन्दली यच्चोक्तं यस्याव्यक्तः प्रकाशस्तत्स्वयमव्यक्तं यथा पिहितं वस्त्विति, तत्र पिहितस्या- व्यक्ता अप्रकाशः, तन्न, स्वयमव्यक्तत्वात्; किन्त्वभावादेवेति व्याप्यसिद्धिः । यच्च प्रत्य- यत्वादिति तदप्यसारं दृष्टान्तासिद्धेः । स्वप्नादिप्रत्यया अपि समारोपितबाह्यालम्बना न स्वात्ममात्रपर्यवसायिनः, जाग्रदवस्थोपयुक्तानामेवार्थानां संस्कारवशेन तथा प्रतिभासनात्, अन्यथा दृष्टश्रुतानुभूतेष्वर्थेषु तदुत्पत्तिनियमायोगात् । किञ्च, यदि बाह्यं नास्ति किमिदानीं नियताकारं प्रतीयते नीलमेतदिति । विज्ञानाकारोऽयमिति चेत्, न, ज्ञानाद्वहिर्भूतस्य संवेद- नात् । ज्ञानाकारत्वे त्वहं नीलमिति प्रतीतिः स्यान्न त्विदं नीलमिति । ज्ञानानां प्रत्येकमाकार- भेदात् कस्यचिदहमिति प्रतीतिः कस्यचिदिदं नीलमिति चेत् ? नीलाद्याकारवदहमित्या- को अपेक्षा तो रहती ही है । अतः प्रदीपरूप दृष्टान्त में स्वतः प्रकाशकत्व का ज्ञापक परानपेक्षत्व रूप हेतु नहीं है । यदि ज्ञानत्व को ही प्रकाशकत्व रूप मानें तो फिर 'स्वतः प्रकाशत्व' का साधक परानपेक्षत्व हेतु उस समय असाधारण नाम का हेत्वाभास होगा । यह जो आपने कहा कि- "ढँकी हुई चीज की तरह जिसका प्रकाश अव्यक्त रहता है वह स्वयं भी अव्यक्त ही रहता है ।" इस प्रसङ्ग में कहना है कि आवृत्त वस्तु का अप्रकाश ही उसकी अव्यक्तता है, जो वस्तुतः उस वस्तु के प्रकाश का अभाव मात्र है । उस वस्तु के प्रकाशक की अव्यक्तता उस वस्तु की अव्यक्तता नहीं है । अतः ज्ञान के स्वतः प्रकाशत्व की साधक उक्त व्यतिरेक व्याप्ति भी सिद्ध नहीं है । (बाह्य वस्तुओं की असत्ता के साधक या ज्ञान में विषय शून्यत्व या निरालम्बनत्व का साधक) प्रत्यक्त्व (ज्ञानत्व) हेतु में भी कुछ बल नहीं है; क्योंकि इस हेतु का (स्वप्नज्ञान रूप ) दृष्टान्त ही असिद्ध है । स्वप्नज्ञान भी बाह्य- विषयक है ही । वहाँ वे केवल अपने स्वरूप में नहीं हैं । जाग्रत् अवस्था के ज्ञान में भासित होने योग्य विषयों का ही संस्कारवश स्वप्नज्ञान में भान होता है । अगर यह बात न हो तो स्वप्नज्ञान में नियमतः उसी विषय का भान कैसे हो, जो वस्तु पहले से ही श्रुत या दृष्ट हो । दूसरी बात यह है कि अगर बाह्य वस्तु नहीं है तो फिर 'यह नील है' इत्यादि प्रतीतियों में नियमित रूप से किसका भान होता है ? (प्र.) प्रतीतियों में भासित होनेवाले आकार विज्ञान के हैं ? (उ) ऐसा नहीं हो सकता; क्योंकि उक्त प्रतीतियाँ ज्ञान से भिन्न अर्थविषयक ही होती हैं । अगर उक्त प्रतीतियों में भासित होने वाले आकार भी विज्ञान के ही हों तो फिर उन प्रतीतियों का अभिलाप 'यह नील है' इस प्रकार का न होकर 'मै नील हूँ' इत्यादि आकार का होगा । (प्र.) ज्ञानों के प्रत्येक आकार भिन्न-भिन्न हैं । इनमें से किसी आकार की प्रतीति 'अहम्' के साथ होती है एवं किसी आकार की प्रतीति 'इदम्' के साथ । (उ.) ऐसी बात नहीं है; क्योंकि नीलादि आकारों की तरह 'अहम्' आकार नियमित
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३११
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३११ न्यायकन्दली कारस्य व्यवस्थितत्वाभावात् । तथा च यदेकेनाहमिति प्रतीयते तदपरेण त्वमिति प्रतीयते, स्वयं स्वस्य संवेदनेऽहमिति प्रतिभास इति चेत् ? किं वै परस्यापि संवेदनमस्ति ? स्वरूपस्यापि भ्रान्त्या भेदप्रतीतिरिति चेत् ? प्रत्यक्षेण प्रतीतो भेदो वास्तवो न कस्मात् ? भ्रान्तं प्रत्यक्षमिति चेत् ? यथोक्तम्- परिच्छेदान्तरं योऽयं भागो बहिरवस्थितः । ज्ञानस्याभेदिनो भेदप्रतिभासो ह्युपप्लवः ॥ इति । कुत एतत् ? अनुमानेनाभेदसाधनादिति चेत् ? प्रत्यक्षस्य भ्रान्तत्वेनाबाधित- विषयत्वादनुमानस्यात्मलाभः, लब्धात्मके चानुमाने प्रत्यक्षस्य भ्रान्तत्वमित्यन्योन्या- पेक्षितादोषः । अस्तु वा भेदो विप्लवो नियतदेशाधिकरणप्रतीतिः , कुतः ? न हि तत्रायमारोपयितव्यो नान्यत्रेत्यस्ति नियमहेतुः । वासनानियमात् तदारोप- नियमः स्यादिति चेत्, न, तस्या अपि तद्देशनियमकारणाभावात् । सति ह्यर्थसद्भावे यद्देशोऽर्थस्तद्देशानुभवस्तद्देशा च तत्पूर्विका वासना, बाह्याभावे नहीं है । जिसको एक आकार की प्रतीति 'अहम्' रूप से होती है, उसी आकार की प्रतीति किसी दूसरे को 'त्वम्' रूप से या 'इदम्' रूप से होती है । (प्र.) (यह नियम है कि) स्वयं की प्रतीति अपने को 'अहम्' आकार से होती है । (उ.) 'स्वयं' से भिन्न का भी तो संवेदन होता है । (प्र.) वह संवेदन भी वस्तुतः 'स्वरूप का ही है; किन्तु भ्रान्तिवश उसमें भेद की प्रतीति होती है । (उ.) प्रत्यक्ष के द्वारा ज्ञात होनेवाला यह भेद वास्तविक ही क्यों नहीं है । (प्र.) चूँकि प्रत्यक्ष भ्रान्त है । जैसा कहा है कि जो अंश ज्ञान से भिन्न एवं बाह्य मालूम होता है, वह भी ज्ञान से अभिन्न ही है, उसमें ज्ञान-भेद की प्रतीति भ्रान्ति है । (उ.) यह क्यों ? (प्र.) चूँकि अनुमान से ज्ञान और अर्थ का अभेद सिद्ध है । (उ.) उक्त कथन असङ्गत है; क्योंकि यह अन्योन्याश्रय से दूषित है । कथित अभेद का साधक अनुमान इसलिए प्रमाण है कि भेद का साधक प्रत्यक्ष भ्रान्त है । प्रत्यक्ष इसलिये भ्रान्त है कि अभेद का साधक अनुमान प्रमाण है । अगर यह मान भी लें कि उक्त भेद की प्रतीति भ्रान्ति है, फिर भी नियमित देशरूप अधिकरण की प्रतीति कैसे उपपन्न होगी ? क्योंकि इसका नियामक कोई नहीं है कि अमुक आकार के विज्ञान का आरोप अमुक आकार के विज्ञान में ही हो, विज्ञान के दूसरे आकारों में नहीं ? (प्र.) वासना के नियम से आरोप का नियम होगा ? (उ.) वासना में भी तद्देशविषयकत्व का कोई नियामक नहीं है । बाह्य वस्तुएँ जब रहती हैं, तब जो अर्थ जिस देश में रहता है उस अर्थविशिष्ट उस देश का अनुभव होता है एवं उस देशविषयक इस अनुभव से ही उस देशविषयक 'वासना' (संस्कार) की उत्पत्ति होती है । अगर बाह्य अर्थ ही न रहेंगे तो फिर वासना में भी यह विशेष किससे उपपन्न होगा ? बिना विशेष कारण के विशेष
३१२ न्यायकन्दलीसंवेलितप्रशस्तपादभाष्यम् । गुण संख्या- न्यायकन्दली तु तस्याः किंकृतो देशनियमः ? न च कारणविशेषमन्तरेण कार्यविशेषो घटते, बाह्यार्थो नास्ति । तेन वासनानामेव वैचित्र्यं वैचित्र्यस्यार्थवत्तत्कारणानां वैचित्र्यादित्यानादिरिति चेत् ? वासनावैचित्र्यं यदि बोधाकारादनन्यत् कस्तासां परस्परतो विशेषः ? अथान्यदर्थे कः प्रद्वेषः ? येन सर्वलोकप्रतीतिरपहूयते । केन चायमाकारो बहिरारोप्यते ? ज्ञानेन चेत् ? किं तस्य स्वात्मन्याकारसंवित्तिरेव बहिरारोपस्तदन्यो वा ? आद्ये कल्पे सैव तस्य सम्यक्प्रतीतिः, सैव च मिथ्येत्यापतितम्, ज्ञानगतत्वेनाकारग्रहणस्य सत्यत्वात्, बाह्यतासंवितेश्चायथार्थत्वात् । अन्यत्वे तु तयोर्न क्रमेण भावः, तत्कारणस्य ज्ञानस्य क्षणिकत्वात् । न चैकस्य युगपत्सत्यत्वेन मिथ्यात्वेन च प्रतीतिसम्भवः । न च क्रमयौगपद्याभ्यामन्यः प्रकारोऽस्ति, यत्र वर्तमानं ज्ञानं स्वात्मन्याकारं गृह्णीयाद्बहिश्च तमारोपयति । अपि च यदि ज्ञानाकारो नीलादिरर्थो यस्यैवायमाकारः स एव तं प्रतीयात्, न पुरुषान्तरं प्रतीयात् । प्रतीयते चायं बहुभिरेकः, सर्वेषां तदाभिमुख्येन कार्य की उत्पत्ति नहीं हो सकती । (प्र.) चूँकि बाह्य वस्तुओं की सत्ता नहीं है, अतः वासना में ही वैचित्र्य की कल्पना करते हैं । प्रयोजन से युक्त (उस पहली वासना में स्थित) कारणों का वैचित्र्य ही उक्त वासना के वैचित्र्य का कारण है । (उ.) वासनाओं के ये वैचित्र्य भी अगर केवल विज्ञान रूप ही हैं तो फिर उनमें परस्पर भेद क्या है ? अगर ये वैचित्र्य विज्ञान से भिन्न हैं तो फिर नीलादि वस्तुओं को ही विज्ञान से भिन्न मानने में आपको क्यों द्वेष है ? जिससे कि सर्वजनीन प्रतीतियों का आप अपलाप करते हैं । (एवं) विज्ञान के आकारों का यह आरोप कौन करता है ? अगर ज्ञान ही ? अगर आकार से अभिन्न विज्ञान में ही आकार का भान होता है और वही आरोप कहलाता है, तो फिर इस पक्ष में एक ही ज्ञान को सत्य और मिथ्या दोनों ही कहने की आपत्ति होगी; क्योंकि ज्ञान ही आकार के ग्रहण रूप होने से सत्य है एवं उसमें बाह्यत्व का आरोप होने से मिथ्या है । अगर आकार विज्ञान और आकाराधायक विज्ञान दोनों को भिन्न मानें तो फिर उक्त कारणविज्ञान और कार्यविज्ञान दोनों की क्रमशः सत्ता नहीं रहेगी; क्योंकि कारणविज्ञान क्षणिक है । (अगर दोनों विज्ञानों को एक मानें तो फिर) एक ही विज्ञान एक ही समय सत्य और मिथ्या दोनों नहीं हो सकता । क्रम और यौगपद्य को छोड़कर कोई तीसरा प्रकार नहीं है कि जिस रूप में विद्यमान आकार अपने से अभिन्न आकार का भी ग्रहण करे और अपने आकार को बाहर आरोपित भी करे । और भी बात है । अगर ये नीलादि वस्तुएँ विज्ञान के ही आकार हों तो फिर जिस पुरुष के विज्ञान के ये आकार होंगे केवल उसी पुरुष से गृहीत हो सकेंगे, दूसरे पुरुषों से नहीं; किन्तु एक ही वस्तु अनेक पुरुषों से गृहीत होती है; क्योंकि एक
प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ३१३
प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ३१३ न्यायकन्दली युगपत्प्रवृत्तेः, यस्त्वया दृष्टः स मयापीति प्रतिसन्धानात् । तस्मादर्थोऽयं न ज्ञानाकारः । ये तु ज्ञानाकारमप्यपह्नुवाना अलीका एव नीलादयः प्रतिभासन्त इत्याहुः, तेषां कारणनियमादुत्पत्तिनियमोऽर्थक्रियानियमश्च न प्राप्नोति, अर्थाभावेन किञ्चित् कस्यचित् कारणम्, सर्वं वा सर्वस्य, नार्थक्रियासंवादो न वा विसंवादो विशेषाभावात् । यथोक्तं गुरुभिः - आशामोदकतृप्ता ये ये चोपार्जितमोदकाः । रसवीर्यविपाकादि तेषां तुल्यं प्रसज्यते ॥ इति । वासनाविशेषात् तद्विशेषसिद्धिरिति चेत् ? सा यदि बाह्यार्थक्रियाविशेषहेतुः ? संज्ञाभेदमात्रम्, अर्थो वासनेति । अथ ज्ञानात्मिका ? अर्थाभावे तस्या विशेषो निर्निबन्धनो बोधमात्रस्योपादानस्य सर्वत्राविशेषात्, बोधाकारस्य व्यतिरिक्तस्य च विशेषस्याभ्युपगमेऽर्थसद्भावमभ्युपगमप्रसङ्गादित्युक्तम् । न चास्मिन् पक्षे नीलादि- प्रत्ययस्य कादाचित्कत्वं स्यात्, तज्जननसमर्थक्षणसन्तानस्य सर्वदाऽनुवृत्तेः, अननुवृत्तौ वा कालान्तरेऽपि तदुत्पत्त्यनुपपत्तिः, स्वव्यतिरिक्तस्यापेक्षणी- ही वस्तु की ओर एक ही समय अनेक व्यक्ति प्रवृत्त दीख पड़ते हैं । एवं इस प्रकार की प्रतीति भी होती है कि 'जिसको मैंने देखा था उसी को तुमने भी देखा है', अतः नीलादि (कोई भी) बाह्य वस्तु ज्ञानरूप नहीं हैं । जो कोई (माध्यमिक) विज्ञान के इस आकार का भी अपलाप करते हुए 'अलीक' (शून्य) वस्तु को ही नीलादिबुद्धि का विषय मानते हैं, उनके मत से कारण के नियम से (कपालादि कारण समूह से घट की ही उत्पत्ति हो पटादि की नहीं) कार्य के (इस) नियम की उपपत्ति नहीं होगी । एवं अर्थ-क्रिया (प्रवृत्ति) का नियम भी अनुपपन्न हो जाएगा; क्योंकि अर्थक्रिया की सत्ता ही नहीं है । अतः यही कहना पड़ेगा कि किसी का कोई कारण नहीं है या सभी वस्तुएँ सभी वस्तुओं की कारण हैं । एवं अर्थक्रिया की सफलता भी नहीं होगी, विफलता भी नहीं होगी; क्योंकि दोनों में कोई अन्तर नहीं है । जैसा कि गुरुओं ने कहा है कि (अगर शून्यता ही तत्त्व हो तो) मन के लड्डू खाने से तृप्त पुरुष के एवं यथार्थ मोदक का उपार्जन कर उसे खानेवाले पुरुष के रस, वीर्य और विपाकादि सभी समान ही होने चाहिए । (प्र.) वासना के विशेष से दोनों में जो विशेष है, उससे उन दोनों पुरुषों के रस-वीर्यादि के अन्तर की उपपत्ति होगी । (उ.) वासना अगर प्रयोजन विशेष के सम्पादन में समर्थ है ? तो फिर नाम का ही अन्तर रह जाता है कि हम उसे अर्थ कहते हैं और आप वासना कहते हैं । अगर वह भी ज्ञान स्वरूप ही है तो अर्थों के न रहने के कारण उसमें वैशिष्ट्य असम्भव है; क्योंकि बोधरूप कारण सभी जगह समान है । पहले कहा जा चुका है कि बोधाकार से भिन्न किसी विशेष को प्रयोजक मानना वस्तुतः बाह्य वस्तुओं
३१४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे परिमाण- प्रशस्तपादभाष्यम् परिमाणं मानव्यवहारकारणम् । तच्चतुर्विधम्-अणु, महत्, दीर्घम्, ह्रस्वं चेति । तत्र महत् द्विविधम्-नित्यमनित्यं च । नित्य- मान (तौल और नाप) के व्यवहार का असाधारण कारण ही 'परि- माण' है । वह अणु, महत्, दीर्घ और ह्रस्व भेद से चार प्रकार का है । न्यायकन्दली यस्याभावात् । कारणपरिपाकस्य कादाचित्कत्वात् तत्कार्यस्य कादाचित्कत्वमिति चेत् ? कारणस्य परिपाकः कार्यः, कार्यजननं प्रत्याभिमुख्यम्, सोऽपि स्वसंवेदनमात्राधीनो न कादाचित्को भवितुमर्हति । अस्ति चायं कादाचित्कः प्रत्यक्षप्रतिभासः, स एव प्रतीतिविषयं देशकालकारणस्वभावानियतं बाह्यं वस्तु व्यवस्थापयंस्तदभावसाधनं बाधत इति कालात्ययापदिष्टत्वमपि हेतूनामित्युपरम्यते । समधिगता संख्या । सम्प्रति परिमाणनिरूपणार्थमाह- परिमाणं मानव्यवहारकारणमिति । मानव्यवहा- रोऽणु महत् दीर्घ ह्रस्वमित्यादिज्ञानं शब्दश्च, तस्य कारणं परिमाणमित्यनेन प्रत्यक्ष- सिद्धस्यापि परिमाणस्य विप्रतिपन्नं प्रति कार्येण सत्तां दर्शयति । यथा तावज्ज्ञानस्य ज्ञेयप्रसाधकत्वं तथोक्तम् । को ही मानना है । एवं इस पक्ष में नीलादि प्रतीतियों का कादाचित्कत्व (कभी होना कभी न होना) की उपपत्ति भी ठीक नहीं बैठती है; क्योंकि नीलादि विज्ञान के प्रयोजक क्षणसन्तान की सत्ता तो बराबर है ही । अगर सदा उसकी अनुवृत्ति नहीं रहती है तो फिर आगे नीलादि की प्रतीतियाँ नहीं होंगी । (प्र.) (यद्यपि) कार्य को अपने से भिन्न किसी की अपेक्षा नहीं है, फिर भी कारण का परिपाक कदाचित् ही होता है, अतः कार्य भी कभी होता है कभी नहीं । (उ.) कार्य के प्रति उन्मुख होना ही कारणों का परिपाक है, वह भी स्वसंवेदन रूप विज्ञान से भिन्न कुछ भी नहीं है, अतः उसका भी कादाचित्कत्व उचित नहीं है; किन्तु कार्यों का कादाचित्कत्व प्रत्यक्ष से सिद्ध है । यह प्रत्यक्ष ज्ञान देश, काल और स्वभाव से नियत अपने बाह्य विषय का स्थापन करते हुए उसके अभाव के साधक को भी बाधित करता है । इस प्रकार बाह्य अर्थ की सत्ता का लोप करनेवाले ये सभी हेतु कालात्यापदिष्ट हैं । (इस प्रकार) संख्या को अच्छी तरह समझा । 'परिमाणं मानव्यवहारकारणम्' इत्यादि से अब परिमाण का निरूपण करते हैं । अणु, महत्, दीर्घ, ह्रस्व इन सबों के ज्ञान एवं इन सबों के प्रतिपादक शब्दों के प्रयोग ये दोनों ही प्रकृत 'मानव्यवहार' शब्द से अभिप्रेत हैं । प्रत्यक्ष के द्वारा सिद्ध परिमाण को जो नहीं मानना चाहते, उन्हें (परिमाण के उक्त व्यवहार रूप) कार्य-लिङ्गक अनुमान की सूचना 'तस्य परिमाणम्' इत्यादि से देते हैं । जिस प्रकार ज्ञान अपने ज्ञेय अर्थ का साधक है, उसे (संख्याप्रकरण में) दिखला चुके हैं ।
प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ३१५
प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ३१५ न्यायकन्दली शब्दस्य तु कथम् ? न ह्यसावर्थात्मा, अन्नाग्न्यसिशब्दोच्चारणे मुखस्य पूरणदाह- पाटनप्रसङ्गात् । नाप्यर्थजः, कौष्ठ्यवायुकण्ठाद्यभिघातजन्यत्वात्, अतदात्मनोऽतदुत्पन्नस्य प्रतिपादकत्वं चातिप्रसङ्गात् । तद्युक्तम्, यदि कण्ठाद्यभिघातमात्रज एव शब्दो न वक्तुर्विवक्षामपि प्रतिपादयेत् तदुत्पत्त्यभावात् । तथा च वक्तुर्विवक्षामपि न सूचयेयुः शब्दा इति प्रमत्तगीतं स्यात् । पारम्पर्येण विवक्षापूर्वकत्वाच्छब्दस्य विवक्षाप्रतिपादकत्वमिति चेत्? एवमर्थानुभवप्रतिपादकत्वमपि, विवक्षाया अर्थानुभवपूर्वकत्वात् । असत्यप्यर्थानुभवे विप्रलम्भकस्य तदर्थविवक्षाप्रतीतिरिति चेत् ? असत्यामपि तदर्थविवक्षायां भ्रान्तस्य तदर्थविषयं वाक्यमुपलब्धम् । यदाहुराचार्याः - 'भ्रान्तस्यान्यविवक्षायामन्यद् वाक्यं हि दृश्यते' । इति । नान्यविवक्षातोऽन्याभिधानसम्भवः, अन्वयव्यतिरेकाभ्यां यद् यस्य कारणमव- गतं तस्य तद्व्यभिचारे विश्वस्याकस्मिकत्वप्रसङ्गात्, अतो भ्रान्तस्याप्रतीयमानाऽपि (प्र.) किन्तु 'शब्द' अपने बोध्य अर्थ का साधक किस तरह से है ? शब्द स्वयं अर्थ स्वरूप नहीं है, अगर ऐसी बात हो तो अन्न शब्द के उच्चारण से ही पेट भर जाय, 'अग्नि' शब्द के उच्चारण से मुँह जल जाय एवं असि (तलवार) शब्द के उच्चारण से मुँह कट जाय । अर्थ से शब्द की उत्पत्ति भी नहीं होती है; क्योंकि कोष्ठसम्बन्धी वायु के कण्ठादि देशों के साथ अभिघात से शब्द की उत्पत्ति होती है । शब्द से भिन्न होने पर भी एवं शब्द का कारण न होने पर भी अगर शब्द से अर्थ का प्रतिपादन माना जाय तो अतिप्रसङ्ग होगा । (उ.) किन्तु यह ठीक नहीं है; क्योंकि अगर शब्द की उत्पत्ति कण्ठादि के अभिघात से ही हो (विवक्षा वक्ता के अर्थ प्रतिपादन की इच्छा से नहीं), तो फिर शब्द विवक्षा का भी ज्ञापक नहीं होगा; क्योंकि विवक्षा से उसकी उत्पत्ति नहीं होती है । अगर विवक्षा की सूचना भी शब्दों से नहीं होगी तो फिर शब्दों का प्रयोग केवल पागल का प्रलाप ही होगा । (प्र.) (विवक्षा साक्षात् शब्द की उत्पादक न होने पर भी) परम्परा से शब्द की उत्पादक है, अतः शब्द विवक्षा का ज्ञापक है । (उ.) इस प्रकार तो शब्द अर्थानुभव का भी सूचक है ही; क्योंकि विवक्षा अर्थानुभव से ही उत्पन्न होती है । (प्र.) अर्थ का अनुभव न रहने पर भी वञ्चक पुरुष में अर्थ की विवक्षा देखी जाती है । (उ.) विवक्षा के न रहने पर भी भ्रान्त व्यक्ति के द्वारा उस अर्थ के बोधक शब्द का प्रयोग भी तो देखा जाता है । जैसा कि आचार्यों ने कहा है कि 'भ्रान्त पुरुष कहना कुछ चाहता है, किन्तु कहता कुछ और ही है' । (प्र.) एक की विवक्षा से दूसरा पुरुष शब्द का प्रयोग नहीं कर सकता; क्योंकि अन्वय और व्यतिरेक से जिसमें कारणता निश्चित है, उसके रहते हुए भी अगर कार्य की उत्पत्ति कभी न भी हो तो फिर संसार की सभी रचनाएँ अनियमित हो जाएँगी ।
३१६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे परिमाण- न्यायकन्दली तदर्थविवक्षा सहसोपजाता गच्छत्तृणसंस्पर्शज्ञानवदस्पष्टरूपा कार्येण कल्पनीयेति चेत् ? विप्रलम्भकस्यापि विवक्षाविशेषेण तदर्थानुभवः कल्प्यताम्, असंविदितेऽर्थे तद्विषयस्य विवक्षाविशेषस्यायोगात् । तदानीं विप्रलम्भकस्य तदर्थानुभवो नास्तीति चेत् ? मा स्म भूत्, स्मरणं तावद्विद्यते, विप्रलम्भको हि पूर्वानुभूतमेवार्थमन्यथाभूतमन्यथा च कथयति । तत्रास्य तदर्थविवक्षा स्मरणकारणिका भवन्ती पारम्पर्येण तदनुभवकारणिकेति नास्ति व्यभिचारः, मिथ्यानुभवपूर्विकाया अपि विवक्षायाः पारम्पर्येण सत्यानुभवपूर्वकत्वात् । अनुभवश्वार्थाव्यभिचारीति शब्दार्थसिद्धिः । अन्यथा वाक्यश्रुतौ श्रोतुरर्थप्रतीत्यभावाद् विवक्षामात्रप्रतीतेश्चापुरुषार्थत्वाच्छब्दो व्यवहार उच्छियेत, वादिप्रतिवादिनोर्जयपराजय- व्यवस्थानुपपत्तिः, विवक्षामात्रं प्रत्युभयोरपि भूतार्थवादित्वात् । यच्चोक्तं द्रव्याद्व्यतिरिक्तं परिमाणम्, द्रव्याग्रहे तद्बुद्ध्यभावादिति, तदसिद्धम् । दूराद् द्रव्यग्रहणेऽपि तत्परिमाणविशेषास्याग्रहणात् । अत एव महानयंपुरियं भ्रान्त्या दृश्यते । अतः (भ्रान्त पुरुष के शब्दप्रयोगरूप) कार्य से ही यह अनुमान करते हैं कि (शब्दप्रयोग से पहले) भ्रान्त पुरुष को भी अज्ञात अर्थविषयक अस्फुट विवक्षा सहसा उत्पन्न होती है । जैसे कि राह चलते आदमी को तृण के स्पर्श का हठात् अस्पष्ट प्रतिभास होता है । (उ.) तो फिर उस प्रतारक के विशेष प्रकार की विवक्षा से उसके उस अर्थविषयक अनुभव की कल्पना कीजिए; क्योंकि अज्ञात अर्थ की विवक्षा कभी भी नहीं उत्पन्न होती । (प्र.) उस समय ठगनेवाले पुरुष को उस विषय का अनुभव तो नहीं है । (उ.) अनुभव न रहे, स्मरण तो रह सकता है । पहले समझी हुई वस्तु को ही प्रतारक दूसरों से कहता है । इस प्रकार प्रकृत में भी चूँकि अर्थविषयक विवक्षा स्मरण का कारण है, अतः परम्परा से वह अनुभव का भी कारण होती है । सुतराम् (शब्द और विवक्षा के कार्यकारणभाव में) व्यभिचार नहीं है । अतः मिथ्या अनुभव से उत्पन्न होनेवाली विवक्षा का सत्यानुभव भी परम्परा से कारण है । तस्मात् विवक्षा एवं यथार्थानुभव इन दोनों के कार्यकारणभाव में भी व्यभिचार नहीं है । अगर ऐसी बात न होती तो वाक्य के सुनने से सुननेवाले को अर्थ की प्रतीति न होकर विवक्षा की ही प्रतीति होती; किन्तु यह वाक्य का प्रयोग करनेवाले को अभीष्ट नहीं है, अतः शब्द से होनेवाले व्यवहार का ही उच्छेद हो जाएगा । वादी एवं प्रतिवादी में हार-जीत की व्यवस्था भी उठ जाएगी; क्योंकि विवक्षा के प्रसङ्ग में तो दोनों बराबर ही कहते हैं । यह जो आपने कहा कि (प्र.) द्रव्य और उसके परिमाण दोनों अभिन्न हैं; क्योंकि द्रव्यज्ञान के बिना उसके परिमाण का ज्ञान नहीं होता है, (उ.) सो ठीक नहीं है;
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ३१७
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ३१७ न्यायकन्दली एवं व्यवस्थिते परिमाणे तस्य भेदं कथयति-तच्चतुर्विधमिति । येन रूपेण चातुर्विध्यं तद्दर्शयति--अणु महत् दीर्घं ह्रस्वं चेति । चतुरस्रादिकं त्ववयवानां संस्थानविशेषो न परिमाणान्तरम् । दीर्घत्वादयोऽपि तथा भवन्तु ? न, अवयवसंस्थानानुपलम्भेऽपि दूराद् दीर्घादिप्रत्ययस्य दर्शनात् । अपि च भोः ! द्व्यणुकपरिमाणं तावदणु, महत्परिमाणोत्पत्तौ कारणाभावात् । तस्माच्च परमाणुपरिमाणमपकृष्टम्, कार्यपरिमाणात् कारणपरिमाणस्य हीनत्वदर्शनात् । ततश्च परमाणोः परिमाणं द्व्यणुकपरिमाणाद्भिन्नम् । एवं घटादीनां परिमाणादन्यदेव प्रकर्षपर्यन्तप्राप्तमाकाशादिपरिमाणम्, तथा दीर्घ ह्रस्वं चेति परिमाणमष्टविधमेव, कुतश्चातुर्विध्यमित्याह-तत्रेति । तेषु चतुर्षु परिमाणेषु मध्ये महद् द्विविधं नित्यमनित्यं चेति । केषु नित्यमित्याह-नित्यमाकाशाकालदिगात्मसु । तच्च परममहत्त्वमित्युच्यते । क्योंकि दूर से द्रव्य का ज्ञान होने पर भी विशेष प्रकार के परिमाण का ज्ञान नहीं होता है, अतः भूल से बड़ी चीज भी छोटी प्रतीत होती है । इस प्रकार परिमाण की सत्ता सिद्ध हो जाने पर 'तच्चतुर्विधम्' इत्यादि से उसके भेद कहे गये हैं । जिन भेदों से परिमाण के चार भेद हैं, यह 'अणु महद्दीर्घ ह्रस्वञ्चेति' .इस पङ्क्ति से कहा गया है । चौकोर आदि आश्रय द्रव्यों के अवयवों के विशेष प्रकार के विन्यास ही हैं, कोई स्वतन्त्र परिमाण नहीं । (उ.) फिर दीर्घत्वादि भी अवयवों के विशेषविन्यास ही हों, स्वतन्त्र परिमाण नहीं । (उ.) संस्थान की अर्थात् अवयवों के विशेष विन्यास की प्रतीति दूर से नहीं होती है; किन्तु दीर्घत्वादि की प्रतीति दूर से भी होती है । (प्र.) द्व्यणुक 'अणु' परिमाण वाला है; क्योंकि वह महत्परिमाण का कारण नहीं है । एवं परमाणु का परिमाण (अणु होते हुए भी) द्व्यणुक के परिमाण से न्यून है; क्योंकि कार्य के परिमाण से कारण का परिमाण न्यून ही देखा जाता है । अतः परमाणु के परिमाण और द्व्यणुक के परिमाण (दोनों ही अणु होते हुए भी) भिन्न प्रकार के हैं । एवं घटादि के महत्परिमाण एवं महत्परिमाण के अन्तिम अवधि आकाशादि का महत्परिमाण दोनों ही (महत्त्वत्वेन समान होने पर भी) भिन्न प्रकार के हैं । इसी प्रकार दीर्घ और ह्रस्व में भी समझना चाहिए । अतः परिमाण का आठ भेद होना ही उचित है, चार भेद नहीं¹ । इसी प्रश्न का उत्तर 'तत्र' इत्यादि
- मुद्रित न्यायकन्दली पुस्तक में 'षड्विधमेव' ऐसा पाठ है, किन्तु वह असङ्गत मालूम होता है; क्योंकि जैसे द्व्यणुक और परमाणु के अणुत्व में अन्तर है, वैसे ही दोनों के ह्रस्वत्व में भी अन्तर है । एवं जैसे कि घट और आकाशादि के महत्परिमाण में अन्तर है, वैसे ही दोनों की दीर्घता में भी । फलतः ह्रस्वत्व एवं अणुत्व के दो-दो भेद एवं महत्त्व और दीर्घत्व के दो-दो भेद सब मिलाकर आठ भेद की ही आपत्ति ठीक बैठती है और यह बात
३१८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे परिमाण- प्रशस्तपादभाष्यम् माकाशकालदिगात्मसु परममहत्त्वम् । अनित्यं त्र्यणुकादावेव । तथा चाण्यपि द्विविधम्-नित्यमनित्यं च । नित्यं परमाणुमनस्सु तत् पारि- इनमें महत् (परिमाण) नित्य और अनित्य भेद से दो प्रकार का है । नित्य महत्परिमाण आकाश, काल, दिक् और आत्मा इन चार द्रव्यों में है; क्योंकि वे परममहत्त्व रूप हैं। इसी तरह अणु भी नित्य और अनित्य भेद से दो प्रकार का है । इन दोनों में से नित्य अणु (परिमाण) परमाणुओं और मनों में है । न्यायकन्दली अनित्यं महत्परिमाणं त्र्यणुकादावेव नाकाशादित्यर्थः । यथा महद् द्विविधं तथाण्वपि द्विविधं नित्यमनित्यं च । उभयत्रापि चकारः प्रकारान्तरव्यवच्छेदार्थः । नित्यमणुपरिमाणं परमाणुमनःसु, उत्पत्तिविनाशकारणाभावात् । पारिमाण्डल्यमिति सर्वापकृष्टं परिमाणम् । अनित्यमणुपरिमाणं द्व्यणुक एव नान्यत्रेत्यर्थः । एतेनैतदुक्तं भवति, अणुपरिमाणप्रभेद एव परमाणुपरिमाणं महत्परिमाणप्रभेदश्च परममहत्परिमाणम्, अन्यथा परमशब्देन विशेषणा- योगात् । यत् खलु परिमाणं रूपसहायं स्वाश्रयं प्रत्यक्षयति तत्र महदिति व्यपदेशः, यच्च से देते हैं । 'तत्र' अर्थात् उन चारों प्रकारों के परिमाणों में 'महत्' नित्य और अनित्य भेद से दो प्रकार का है । किन द्रव्यों में वह नित्य है ? इस आकाङ्क्षा की पूर्ति 'नित्यमाकाशकालदिगात्मसु' इस वाक्य से की गयी है । आकाशादि द्रव्यों में रहनेवाले 'महत्त्व' को ही 'परममहत्त्व' कहते हैं । अनित्य महत्परिमाण त्र्यसरेणु प्रभृति द्रव्यों में ही है, आकाशादि द्रव्यों में नहीं । जिस प्रकार महत्त्व नित्य और अनित्य भेद से दो प्रकार का है, उसी प्रकार 'अणु' भी दो प्रकार का हैं । दोनों वाक्यों के 'च' शब्द परिमाण की और प्रकार की सम्भावनाओं को हटाने के लिए हैं । परमाणुओं और मनों में केवल नित्य अणुपरिमाण ही रहता है; क्योंकि उनके परिमाणों का कोई विनाशक नहीं है । सब से छोटे परिमाण को पारिमाण्डल्य कहते हैं । अनित्य अणुपरिमाण केवल द्व्यणुकों में ही है, और कहीं नहीं । इससे यह अर्थ निकला कि परमाणुओं का परिमाण भी अणुपरिमाण का ही एक भेद है । एवं आकाशादि का परममहत्परिमाण भी महत्परिमाण का ही एक भेद है । अगर आकाशादि का परिमाण महत् न हो तो फिर उसमें 'परम' विशेषण ही व्यर्थ हो जाएगा । रूप के साहाय्य से जो परिमाण अपने आश्रय के प्रत्यक्ष का कारण होता है, उसे महत्परिमाण कहते हैं । जिससे यह
न्यायकन्दली के 'दीर्घं ह्रस्वञ्चेति' इस वाक्य से भी स्पष्ट होती है अतः मैंने 'षड्विधमेव' के स्थान पर 'अष्टविधमेव' ऐसा ही पाठ रखना उचित समझा ।
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३१९
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३१९ प्रशस्तपादभाष्यम् माण्डल्यम् । अनित्यं द्वयणुक एव । कुवल्यामलकबिल्वादिषु महत्त्वपि तत्प्रकर्षभावाभावमपेक्ष्य भाक्तोऽणुत्वव्यवहारः । दीर्घत्वह्रस्वत्वे यही अणुपरिमाण पारिमाण्डल्य कहलाता है । अनित्य (अणुपरिमाण) केवल द्वयणुक रूप द्रव्य में ही है । कुवलय, आमला और बेल प्रभृति के महत्परिमाणों में अणुत्व का जो व्यवहार होता है, वह महत्परिमाणों के न्यूनाधिकभाव के कारण गौण है । जिन आश्रयों के महत् (परिमाण) और अणु (परिमाण) उत्पत्ति- न्यायकन्दली नो प्रत्यक्षयति तत्राण्विति व्यवहारः । न चैवं सति त्र्यणुकस्याप्यणुत्वप्रसक्तिः ? तस्यापि प्रत्यक्षत्वात्, त्र्यणुकमस्मदादिप्रत्यक्षं बहुभिः समवायिकारणैरारब्धत्वात्, घटवत् । यस्य च प्रत्यक्षस्य द्रव्यस्यावयवा न प्रत्यक्षास्तदेव त्र्यणुकम् । आकाशपरिमाणस्य तु प्रत्यक्षहेतुत्वाभावेऽपि महत्त्वमेव, तदाश्रयस्य द्व्यणुकव्याप्तितोऽधिकव्यापित्वात्, घटादिपरिमाणवत् । अनित्यमणुपरिमाणं द्वयणुक एवेत्ययुक्तम्, कुवल्यामलकबिल्वादिषु परस्परा- पेक्षयाणुव्यवहारदर्शनादत आह-कुवल्यामलकबिल्वादिष्विति । बिल्वे यः प्रकर्षभावो महत्परिमाणातिशययोगित्वं तस्यामलकेऽभावमपेक्ष्याणुव्यवहारो भाक्तः । उभाभ्यां भज्यत इति भक्तिः सादृश्यम्, तस्यायमिति भाक्तः, सादृश्यमात्रनिबन्धनो गौण इत्यर्थः । एवमामलकपरिमाणातिशयाभावं काम नहीं होता है, उस परिमाण को 'अणु' कहते हैं । इसी से त्र्यसरेणु के परिमाण में अणुत्व की आपत्ति नहीं होती है; क्योंकि उसका प्रत्यक्ष होता है । त्र्यणुक की उत्पत्ति घटादि की तरह अनेक अवयवों से होती है, अतः वह हम लोगों के प्रत्यक्ष का भी विषय है । प्रत्यक्ष दीखने वाले जिस द्रव्य के अवयवों का प्रत्यक्ष न हो उसे 'त्र्यणुक' कहते हैं । घटादि के परिमाणों की तरह आकाशादि के परिमाण की व्याप्ति द्वयणुक के परिमाण की व्याप्ति से अधिक है, अतः आकाशादि के परिमाण भी महत् ही हैं । (प्र.) यह कहना ठीक नहीं कि 'अनित्य अणुपरिमाण' केवल द्वयणुक में ही हैं; क्योंकि कुवलय, आँवला और बेल इन सबों में 'आपेक्षिक अणुत्व' का व्यवहार देखा जाता है । इसी प्रश्न का उत्तर 'कुवल्यामलकबिल्वादिषु' इत्यादि पङ्क्ति से देते हैं । बेल में जो प्रकर्षभाव अर्थात् विलक्षण महत्परिमाण का सम्बन्ध है वह आँवले में नहीं है, इसी से आँवले में 'अणुत्व' का भाक्त व्यवहार होता है । अभिप्राय यह है कि 'उभाभ्यां भज्यत इति भक्तिः' इस व्युत्पत्ति के अनुसार केवल सादृश्य से होनेवाले व्यवहार को 'भाक्त' कहते हैं । इसी प्रकार आँवले में जिस उत्कृष्ट महत्परिमाण का सम्बन्ध है, उस प्रकार के महत्परिमाण का सम्बन्ध कुवलय में नहीं है । इसी से कुवलय
३२० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे परिमाण- प्रशस्तपादभाष्यम् चोत्पाद्ये महदणुत्वैकार्थसमवेते। समिदिक्षुवंशादिष्वञ्जसा दीर्घेष्वपि तत्प्रकर्षाभावाभावमपेक्ष्य भाक्तो ह्रस्वत्वव्यवहारः । अनित्यं चतुर्विध- शील हैं, उन आश्रयों में ह्रस्वत्व और दीर्घत्व भी समवाय सम्बन्ध से उत्पत्तिशील ही हैं । लकड़ी, ईख, बाँस प्रभृति दीर्घ वस्तुओं में भी उनके उत्कर्ष और अपकर्ष से ह्रस्वत्व का गौण व्यवहार होता है। चारों प्रकार के अनित्य परिमाण न्यायकन्दली कुवलयेऽपेक्ष्याणुव्यवहारः । यत्र हि मुख्यमणुत्वं द्वयणुके तत्र महत्परिमाणस्याभावो दृष्टः । आमलकेऽपि यादृशं बिल्वे महत्परिमाणं तादृशं नास्तीत्येतावता साधर्म्येणोपचारप्रवृत्तिः । दीर्घत्वह्रस्वत्वयोर्विशेषं दर्शयति-दीर्घत्वह्रस्वत्वे इति । महच्चाणुत्वं च महदणुत्वे, उत्पाद्ये च ते महदणुत्वे चेत्युत्पाद्यमहदणुत्वे, ताभ्यामेकस्मिन्नर्थे समवेते ह्रस्वत्वदीर्घत्वे । यत्रोत्पाद्यं महत्त्वं त्र्यणुकादौ तत्रोत्पाद्यं दीर्घत्वम्, यत्र चोत्पाद्यमणुत्वं द्वयणुके तत्रोत्पाद्यं ह्रस्वत्वमि- त्यर्थः । तत्र परमाणोः परिमण्डलत्वाद्ध्रस्वत्वाभावो व्यापकत्वाच्चाकाशस्य दीर्घत्वाभाव में अणुत्व का व्यवहार होता है । जहाँ अणुत्व का मुख्य व्यवहार होता है, जैसे कि द्वयणुक में, वहाँ महत्परिमाण के अभाव की भी प्रतीति होती है । आँवले में भी अणुत्व के गौण व्यवहार की प्रवृत्ति केवल इतने ही सादृश्य से होती है कि बिल्व में जिस प्रकार का उत्कृष्ट महत्परिमाण है, वह आँवले में नहीं है । 'दीर्घत्वह्रस्वत्वे' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा दीर्घत्व एवं ह्रस्वत्व रूप दोनों परिमाणों का अन्तर दिखलाते हैं । 'महच्चाणुत्वञ्च महदणुत्वे' कथित इस व्युत्पत्ति के द्वारा 'दीर्घत्वह्रस्वत्वे' इत्यादि वाक्य का यह अर्थ है कि जिन द्रव्यों में उत्पत्तिशील महत्त्व एवं उत्पत्तिशील अणुत्व रहते हैं, उन्हीं में उत्पत्तिशील दीर्घत्व एवं उत्पत्तिशील ह्रस्वत्व भी समवाय सम्बन्ध से रहते हैं । अर्थात् त्र्यणुकादि द्रव्यों में चूँकि उत्पत्तिशील महत्त्व ही है, अतः वहाँ दीर्घत्व भी उत्पत्तिशील ही है । एवं द्वयणुक में चूँकि उत्पत्तिशील अणुत्व है तो फिर वहाँ ह्रस्वत्व भी उत्पत्तिशील ही है । इस प्रसङ्ग में कोई कहते हैं कि (अणुपरिमाण के आश्रय) परमाणुरूप 'परिमण्डल' सभी से अल्पपरिमाण के होने के कारण ह्रस्वत्व परिमाण का आश्रय नहीं है ।
- द्वयणुक में अणुत्व का मुख्य व्यवहार होता है, वहाँ महत्त्व नहीं है । कुवल्यादि द्रव्यों में एक विशेष प्रकार का उत्कृष्ट महत्त्व न रहने के कारण महत्त्व के रहते हुए भी अणुत्व का गौण व्यवहार होता है । गौण व्यवहार वस्तु की सत्ता का साधक नहीं है, अतः कुवल्यादि द्रव्यों में अणुत्व नहीं है । तस्मात् यह कहना ठीक है कि अनित्य अणुपरिमाण केवल द्वयणुक में ही है ।
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३२१
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३२१ न्यायकन्दली इत्येके । अन्ये तु परमाणुपरममहद्व्यवहारवत् परममहत्परमदीर्घव्यवहारस्यापि लोके दर्शनात् परमाणुषु परमह्रस्वत्वं परमदीर्घत्वं चाकाशे इत्याहुः । दीर्घपरिमाणाधिकरण- माकाशं महत्परिमाणाश्रयत्वात् स्तम्भादिवत् । एवं ह्रस्वपरिमाणाश्रयः परमाणुः, अणुपरि- माणाश्रयत्वात्, द्व्यणुकवत् । यदि ह्रस्वत्वमुत्पाद्येनाणुत्वेनैकार्थसमवेतं कथमन्यत्र ह्रस्वत्वव्यवहारः ? तत्राह- समिदिषुवंशादिष्विति । समिच्चेषुश्च वंशश्च समिदिषुवंशाः । एतेष्वञ्जसा परमार्थतो दीर्घेष्वपि वंशे यः परिमाणप्रकर्षभावो दीर्घातिशययोगित्वं तस्याभावमिक्षावपेक्ष्य प्रतीय भाक्तो गौणो व्यवहारः, एवमिक्षोः प्रकर्षभावस्तस्याभावं समिध्य- पेक्ष्य ह्रस्वव्यवहारः । यत् खलु परमार्थतो ह्रस्वं द्व्यणुकं तत्र दैर्ध्याभावः, एवं आकाशादि में भी परममहत्परिमाण के रहने से उनमें दीर्घत्व परिमाण नहीं है । कोई कहते हैं कि (जैसा कि आकाशादि में परममहत्त्व का एवं (परमाणु में) परम अणुत्व का व्यवहार लोकसिद्ध है, वैसे ही (दोनों में क्रमशः) परमदीर्घत्व एवं परमह्रस्वत्व का भी व्यवहार लोकसिद्ध है, अतः आकाशादि में परमदीर्घत्व भी है एवं परमाणु में परमह्रस्वत्व भी है । (इस प्रसङ्ग में अनुमानों का प्रयोग इस प्रकार है कि) (१) जिस प्रकार स्तम्भ महत्परिमाण का आश्रय होने से दीर्घत्व परिमाण का भी आश्रय है, वैसे ही आकाशादि भी परमदीर्घत्व परिमाण के आश्रय हैं । (२) एवं जिस प्रकार द्व्यणुक में अणुपरिमाण के रहने से उसमें ह्रस्वपरिमाण भी रहता है, वैसे ही परमाणु में भी ह्रस्वपरिमाण है; क्योंकि वह भी अणुपरिमाणवाला है । (प्र.) जहाँ समवाय सम्बन्ध से उत्पत्तिशील अणुत्व रहता है वहीं अगर उत्पत्तिशील ह्रस्वत्व भी समवाय सम्बन्ध से रहता है, तो फिर अन्यत्र (महत्परिमाण के आश्रय) बाँस प्रभृति में, ह्रस्वत्व का व्यवहार कैसे होता है ? (उ.) इसी प्रश्न का समाधान 'समिदादिषु' इत्यादि से देते हैं । समिध् (इन्धन), ईख और बाँस इन सबों में 'अञ्जसा' अर्थात् वस्तुतः दीर्घत्व के रहने पर भी बाँस के परिमाण का जो 'प्रकर्षभाव' अर्थात् विशेष प्रकार के दीर्घपरिमाण का सम्बन्ध है, उस प्रकार के दीर्घपरिमाण का सम्बन्ध ईख में नहीं है । इसी कारण ईख में ह्रस्वत्व का 'भाक्त' अर्थात् गौण व्यवहार होता है । इसी तरह ईख में जो परिमाण का प्रकर्ष है वह समिध् में नहीं है । इसी से समिध् में भी ह्रस्वत्व का गौण व्यवहार होता है । जो द्रव्य वास्तव में ह्रस्व है, जैसे कि द्व्यणुक उसमें दीर्घत्व अवश्य ही नहीं है । ईख में भी बाँस में रहनेवाला परिमाण का प्रकर्ष नहीं है, अतः उसमें भी अणुत्व का भाक्त व्यवहार ही होता है । (प्र.) इनमें ह्रस्वत्व के व्यवहारों को भी मुख्य ही क्यों नहीं मानते ? (उ.) चूँकि उनमें ही
३२२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे परिमाण- प्रशस्तपादभाष्यम् मपि संख्यापरिमाणप्रचययोनि । तत्रेश्वरबुद्धिमपेक्ष्योत्पन्ना परमाणुद्व्यणुकेषु बहुत्वसंख्या, तैरारब्धे कार्यद्रव्ये त्र्यणुकादिलक्षणे रूपायु- १. परिमाण २. संख्या और ३. प्रचय (इन तीनों में से किसी) से उत्पन्न होते हैं । (परमाणुओं से उत्पन्न होनेवाले) तीन परमाणु द्व्यणुकों में से प्रत्येक में रहनेवाली तीन एकत्व संख्या एवं उक्त तीन एकत्वविषयक ईश्वर की अपेक्षाबुद्धि इन दोनों से तीनों परमाणु द्व्यणुकों में बहुत्व संख्या की उत्पत्ति होती है। इन तीन परमाणु द्व्यणुकों से उत्पन्न होनेवाले त्र्यसरेणु न्यायकन्दली इक्षावपि वंशस्य यादृशं दैर्घ्यं तादृशं नास्तीत्युपचारः । नन्वेतेषु वास्तव एव ह्रस्वत्वव्यवहारः किं नेष्यते? नेष्यते, तेष्वेव परापेक्षया दीर्घव्यवहारदर्शनात् । न चैकस्य दीर्घत्वं ह्रस्वत्वं चोभयमपि वास्तवं युक्तम्, विरोधात् । अथ कस्माद् दीर्घव्यवहार एव गौणो न भवति ? न, तस्योत्पत्तिकारणासम्भवात् । सर्वत्रैव भाक्तो ह्रस्वव्यवहारो भवतु? नैवम्, मुख्यभावे गौणस्यासम्भवात् । अथेदानीमुत्पत्यास्य परिमाणस्य कारणनिरूपणार्थमाह- अनित्यं चतुर्विध- मपीति । अनित्यं चतुर्विधमपि दीर्घं ह्रस्वं महत् अणु चेति चतुर्विधं परिमाणम्, संख्यापरिमाणप्रचययोनि संख्यापरिमाणप्रचयकारणकम् । संख्याया- परस्पर सापेक्ष दीर्घत्व का भी व्यवहार होता है । ह्रस्वत्व और दीर्घत्व दोनों परस्पर विरुद्ध दो धर्म हैं, अतः एक आश्रय में उन दोनों धर्मों की वास्तविक सत्ता मानी जा सकती है । (प्र.) तो फिर दीर्घत्व का ही व्यवहार गौण क्यों नहीं है ? (उ.) उनमें भाक्त दीर्घत्व के व्यवहार को गौण मानने का कारण नहीं है, अतः वहाँ दीर्घत्व व्यवहार को गौण नहीं मानते । (प्र.) सभी जगहों में ह्रस्वत्व व्यवहार को गौण ही क्यों नहीं मान लेते ? (उ.) जहाँ जिसका मुख्य व्यवहार सम्भव होता है, वहाँ उस व्यवहार को गौण नहीं माना जा सकता । अब उत्पत्तिशील परिमाण के कारणों का निरूपण करने के लिए 'अनित्यं चतुर्विधमपि' इत्यादि पङ्क्ति लिखते हैं । 'अनित्यं चतुर्विधमपि' अर्थात् अनित्य दीर्घ, ह्रस्व, अणु एवं महत् ये चारों प्रकार के परिमाण 'संख्यापरिमाणप्रचय- योनि' अर्थात् ये चारों प्रकार के परिमाण संख्या, परिमाण एवं प्रचय इन तीनों में से ही किसी से उत्पन्न होते हैं । संख्यादि तीनों कारणों में से (क्रमप्राप्त) संख्या में परिमाण की कारणता 'तत्र' इत्यादि से दिखलाते हैं । 'परमाणुभ्यामारब्धं द्व्यणुकम्' इस व्युत्पत्ति के अनुसार दो द्व्यणुकों से उत्पन्न होने के कारण 'द्व्यणुक' ही यहाँ 'परमाणुद्व्यणुक' शब्द का अर्थ है । 'तेषु त्रिषु' अर्थात्
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३२३
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३२३ न्यायकन्दली स्तावत्कारणत्वमाह-तत्रेति । परमाणुभ्यामारब्धं द्वयणुकं परमाणुद्वयणुकमित्युच्यते । तेषुच त्रिष्वेकैकगुणालम्बनमीश्वरबुद्धिमपेक्ष्योत्पन्ना या त्रित्वसंख्या सा त्रिभिर्द्वयणुकैरारब्धकार्यद्रव्ये त्र्यणुकलक्षणे रूपाद्युत्पत्तिसमकालमेव महत्त्वं दीर्घत्वं च करोति । तत्रेतिपदं महत्परिमाण- कारणनिवारणार्थम्, त्र्यणुकादीत्यादिपदं चतुरणुकादिपरिग्रहार्थम् । कथं पुनरेष निश्चयः, त्र्यणुकादिपरिमाणस्य द्वयणुकगता बहुत्वसंख्यैवासमवायिकारणमिति ? अन्यस्यासम्भ- वात् । न तावद् द्वयणुकवृत्तयो रूपरसगन्धस्पर्शैकत्वैकपृथक्त्वगुरुत्वद्रवत्वस्नेहास्तस्या- समवायिकारणम्, तेषां कारणवृत्तीनां कार्ये गुणानारभमाणानां समानजातीयगुणान्तरारम्भ एव सामर्थ्यदर्शनात् । द्वयणुकाणुपरिमाणानां चारम्भकत्वे त्र्यणुकस्याप्युत्पन्नस्य स्यान्न महत्त्वम्, परिमाणात् समानजातीयस्यैव परिमाणस्योत्पत्त्यवगमात् । अस्ति चात्र महत्त्वम्, भूयोऽवयवारब्धत्वाद् घटादिवत् । न चासमवायिकारणं विना कार्यमुत्पद्यते, दृष्टञ्चान्यत्रावयवसंख्याबाहुल्यात् समानपरिमाणारब्धयोः कार्ययोरेकत्र महत्या- उक्त तीनों परमाणु द्वयणुकों में से प्रत्येक में एक गुणविषयक (एकत्व संख्या- विषयक) 'यह एक है' इस आकार के ईश्वरीय ज्ञान (रूप अपेक्षा बुद्धि) से जो त्रित्व संख्या उत्पन्न होती है, वही तीन द्वयणुकों से उत्पन्न त्र्यसरेणु रूप द्रव्य में रूपादि गुणों की उत्पत्ति के समय ही महत्त्व और दीर्घत्व परिमाण को उत्पन्न करती है । ('तत्रेश्वरबुद्धि' इत्यादि वाक्य में प्रयुक्त) 'तत्र' पद यह समझाने के लिए है कि त्र्यसरेणु में रहनेवाले महत्त्व की कारणता महत्परिमाण में नहीं है । (त्र्यणुकादि पद में प्रयुक्त) 'आदि' पद 'चतुरणुक' का संग्राहक है । (प्र.) यह निर्णय कैसे करते हैं कि त्र्यणुकादिगत परिमाणों का द्वयणुकों में रहनेवाली बहुत्व संख्या ही कारण है ? (उ.) चूँकि दूसरी किसी वस्तु में उक्त परिमाण की कारणता सम्भव नहीं है । समवायिकारणों में रहनेवाले रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, एकत्व, एकपृथक्त्व, गुरुत्व, द्रवत्व और स्नेह ये सभी गुण अपने आश्रयरूप समवायि- कारणों से उत्पन्न द्रव्य में रहनेवाले कथित रूपादि गुणों में से कोई भी त्र्यसरेणु में रहनेवाले परिमाणों के असमवायिकारण नहीं हो सकते । द्वयणुकों के अणुपरिमाण भी त्र्यणुकादि के परिमाणों के कारण नहीं हो सकते; क्योंकि ऐसा मानने पर त्र्यणुक का परिमाण भी 'अणु' ही होगा, 'महत्' नहीं; क्योंकि यह नियम है कि परिमाण अपने समानजातीय दूसरे परिमाण को ही उत्पन्न कर सकता है, विभिन्न जातीय परिमाणों को नहीं । त्र्यणुकादि द्रव्यों में महत्परिमाण ही है; क्योंकि (महत्परिमाणवाले) घटादि की तरह वे भी बहुत से अवयवों से उत्पन्न होते हैं । असमवायिकारण के बिना (समवेत) कार्यों की उत्पत्ति नहीं होती है, और स्थानों में भी समानपरिमाण के विभिन्न न्यूनाधिक संख्या के अवयवों से उत्पन्न द्रव्यों
३२४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [गुणे परिमाण- प्रशस्तपादभाष्यम् त्पत्तिसमकालं महत्त्वं दीर्घत्वं च करोति । द्विबहुभिर्महद्भिश्चा- रब्धे कार्यद्रव्ये कारणमहत्त्वान्येव महत्त्वमारभन्ते न बहुत्वम् । समान- रूप द्रव्य में जिस समय रूपादि गुणों की उत्पत्ति होती है, उसी समय उक्त बहुत्व संख्या से उक्त द्रव्य में महत्त्व एवं दीर्घत्व परिमाणों की भी उत्पत्ति होती है । महत्परिमाणवाले दो या उससे अधिक अवयवों से उत्पन्न द्रव्य में कारणों (अवयवों) के महत्त्व ही महत्परिमाण को उत्पन्न करते हैं, न्यायकन्दली तिशयः । तेनात्र संख्याया एव कारणत्वं कल्प्यते । द्व्यणुकसंयोगाभ्यां त्र्यणुके महत्त्वोत्पत्तिः स्यात्, यदि भूयसामवयवानां संयोगः कारणमित्युच्यते, प्राप्ता- प्राप्तविवेकादवयवानां भूयस्त्वमेव कारणं समर्थितं स्यात्, ईश्वरबुद्धयपेक्षस्य त्रित्वस्य स्थितिहेत्वदृष्टक्षयादिनाशो न तु कदाचिदाश्रयविनाशादपि विनाशः, ईश्वरबुद्धेर्नित्यत्वात् । सम्प्रति महत्त्वान्महत्त्वोत्पत्तिमाह-द्विबहुभिर्महद्भिरिति । द्वौ च बहवश्च तैरारब्धे कार्यद्रव्ये कारणमहत्त्वान्येव महत्त्वमारभन्ते, यत्र द्वाभ्यां महद्भ्यामप्रचिताभ्यामारभ्यते द्रव्यं तत्रावयवमहत्त्वाभ्यामेव महत्त्वस्योत्पादो बहुत्वसंख्याप्रचययोरभावात् । यत्र च बहुभिर्महद्भिरवयवैः कार्यमारभ्यते तत्रावयवमहत्त्वेभ्योऽवयविनि महत्त्वस्योत्पादो न बहुत्वसंख्यायाः, समान- में परिमाण का न्यूनाधिकभाव देखा जाता है, अतः कल्पना करते हैं कि (त्र्यणुकादि द्रव्यों के परिमाण का) संख्या ही (असमवायि) कारण है । अगर बहुत से अवयवों के संयोग को ही उन महत्त्वों का कारण मानें तो फिर विचार कर देखने से समवायिकारणों के बहुत्व में ही उक्त महत्त्वों की कारणता का समर्थन होता है । ईश्वर की अपेक्षाबुद्धि से उत्पन्न होनेवाले त्रित्व का विनाश उसके संस्थापक अदृष्ट के नाश से ही होता है, आश्रय के विनाश से उसका विनाश कभी नहीं होता; क्योंकि ईश्वर नित्य है । 'द्विबहुभिर्महद्भिः' इत्यादि से महत्परिमाण से महत्परिमाण की उत्पत्ति कहते हैं । 'द्वौ च बहवश्च द्विबहवः, तैः द्विबहुभिः' इस व्युत्पत्ति के अनुसार उक्त वाक्य का यह अर्थ है कि दो या उनसे अधिक महान् अवयवों से आरब्ध द्रव्य के महत्त्व की उत्पत्ति समवायिकारणों के महत्त्व से ही होती है । अभिप्राय यह है कि जिस द्रव्य की उत्पत्ति प्रचय से शून्य दो महान् अवयवों से होती है, उस द्रव्य के महत्त्व का (असमवायि) कारण उन दोनों अवयवों के दोनों महत्त्व ही हैं; क्योंकि महत्त्व के उक्त कारणों में से बहुत्व संख्या और प्रचय ये दोनों ही वहाँ नहीं हैं । जहाँ बहुत से महान् अवयवों से कार्यद्रव्य की उत्पत्ति होती है, उसमें अवयवों के महत्त्व से ही
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३२५ प्रशस्तपादभाष्यम् संख्यैश्चारब्धेऽतिशयदर्शनात् । प्रचयश्च तूलपिण्डयोर्वर्तमानः पिण्डारम्भकावयवप्रशिथिलसंयोगानपेक्षमाण इतरेतरपिण्डावयव- बहुत्व संख्या नहीं; क्योंकि समान संख्या के (अथ च न्यूनाधिक परिमाण- वाले) अवयवों से उत्पन्न द्रव्यों में न्यूनाधिक परिमाण की उपलब्धि होती है । रूई के दो खण्डों से उत्पन्न एक अवयवी रूप रूई का महत्त्व, इन अवयवी के उत्पादक रूई के खण्डों में रहनेवाले 'प्रचय' से ही उत्पन्न होता है, न्यायकन्दली संख्यैः स्थूलैः सूक्ष्मैश्चारब्धयोर्द्रव्ययोः स्थूलारब्धे महत्त्वातिशयदर्शनात् । संख्यायाः कारणत्वे हि कार्यविशेषो न स्यात्, तस्या अविशेषात् । यत्र तु समानपरिमाणैरवयवैरारब्धयोरवयवसंख्याबाहुल्यादेकत्र परिमाणातिशयो दृश्यते तत्रावयव- संख्यापि कारणमेष्टव्या, अन्यथा कार्यविशेषायोगः । यत्र समानसंख्यैः समानपरिमाणैश्च कार्यमारब्धम्, तत्र महत्तोत्पत्तावुभयोरपि कारणत्वम्, प्रत्येकमुभयोरपि सामर्थ्यदर्शनात्, तत्रान्यतरविशेषादर्शनादित्येके । अपरे तु परिमाणस्यैव कारणतामाहुः, समानजातीयात् कार्योत्पत्तिसम्भवे विजातीयकारणकल्पनानवकाशात् । प्रचयमाह-प्रचयश्चेति । प्रचय इति द्रव्यारम्भकः प्रशिथिलः संयोगविशेषः । स तु द्वितूलकद्रव्यारम्भकयोस्तूलपिण्डयोर्वर्तमानः महत्त्व की उत्पत्ति होती है, अवयवों की बहुत्व संख्या से नहीं; क्योंकि समान संख्या के स्थूल और सूक्ष्म अवयवों से आरब्ध दो द्रव्यों के दोनों महत्त्वों में अन्तर देखा जाता है । अगर अवयवों में रहनेवाली संख्याओं को ही महत्त्व का कारण मानें तो उक्त अन्तर की उपपत्ति नहीं होगी; क्योंकि वह तो दोनों द्रव्यों के अवयवों में समान ही है । जहाँ समान परिमाण के अथ च विभिन्न संख्या के अवयवों से उत्पन्न दो द्रव्यों के दोनों महत्त्वों में अन्तर देखा जाता है, वहाँ (महान् अवयवों से उत्पन्न द्रव्य में रहनेवाले महत्परिमाण के प्रति भी) अवयवों में रहनेवाली संख्या ही कारण है, अन्यथा उक्त महत्परिमाणों में अन्तर की उपपत्ति नहीं होगी । किसी सम्प्रदाय का कहना है कि समान संख्या के एवं समान परिमाणों के अवयवों से जिस द्रव्य की उत्पत्ति होती है, उस द्रव्य के महत्परिमाण का अवयवों की संख्या और उनके महत् परिमाण दोनों ही कारण हैं; क्योंकि संख्या एवं परिमाण दोनों में ही परिमाण की कारणता निश्चित है । उक्त स्थल में दोनों में से किसी एक को ही कारण मानने की कोई विशेष युक्ति नहीं है । इसी प्रसङ्ग में किसी दूसरे सम्प्रदाय का कहना है कि अवयवों का महत्त्व ही प्रकृत महत्परिमाण का कारण है, अवयवों की संख्या नहीं; क्योंकि जहाँ समानजातीय कारण से ही कार्य की सम्भावना हो वहाँ विभिन्न जातीय वस्तु में उसकी कारणता की कल्पना व्यर्थ है ।
३२६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे परिमाण- न्यायकन्दली प्रत्येकं पिण्डयोरारम्भकान् प्रशिथिलानवयवसंयोगानपेक्षमाण इतरेतरपिण्डयोरवयवानां परस्परसंयोगानपेक्षमाणो वा द्वितूलके महत्त्वमारभते । यत्र पिण्डयोः संयोगः स्वयं प्रशिथिलस्तयोरारम्भकाश्चावयवसंयोगा अपि प्रशिथिलास्तत्र पिण्डाभ्यामारब्धे द्रव्ये निबिडा- वयवसंयोगारब्धपिण्डद्वयनिबिडसंयोगजनितद्रव्यापेक्षया महत्त्वातिशयदर्शनात्, पिण्डयोः प्रशि- थिलः संयोगः पिण्डारम्भकप्रशिथिलसंयोगापेक्षो महत्त्वस्य कारणम् । यत्र तु पिण्डयोः संयोगः प्रशिथिल इतरेतरपिण्डावयवानामितरेतरावयवैः संयोगा अपि प्रशिथिलाः, पिण्डयोरारम्भकाश्च न प्रशिथिलाः, तत्र पिण्डाभ्यामारब्धे द्रव्येऽत्यन्तनिबिडपरस्परा- वयवसंयोगपिण्डद्वयारब्धद्रव्यापेक्षया महत्त्वातिशयदर्शनात् पिण्डयोः प्रशिथिलः संयोग इतरेतरपिण्डावयवसंयोगापेक्षो महत्त्वस्य कारणमिति विवेकः । 'प्रचयश्च' इत्यादि से प्रचय (का स्वरूप) कहते हैं । द्रव्य के उत्पादक (असमवायिकारण) विशेष प्रकार के संयोग को ही 'प्रचय' कहते हैं । रूई के दो खण्डों से रूई के जिस एक अवयवी की उत्पत्ति होती है, उस अवयवीरूप (द्वितूलक पिण्ड) में महत्परिमाण की उत्पत्ति इस द्रव्य के उत्पादक दोनों अवयवों में रहनेवाले प्रचय से होती है । (१) कोई कहते हैं कि इस प्रकार अवयवों के प्रचय से अवयवी के महत्परिमाण के उत्पादन में उन उत्पादक अवयवों के अवयवों में रहनेवाले प्रशिथिल संयोगरूप प्रचय के भी साहाय्य की आवश्यकता होती है । (२) (कोई कहते हैं कि) इसकी आवश्यकता नहीं होती है, अवयवों के अवयवों में रहनेवाले साधारण संयोग के रहने से ही काम चल जाएगा । (इनमें प्रथम पक्ष का स्वारस्य यह है कि ) जिस अवयवी के उत्पादक दोनों अवयवों का संयोग प्रशिथिलात्मक है, एवं अवयवों के उत्पादक अवयवों का संयोग भी प्रशिथिलात्मक ही है, इन दोनों मूलावयवों से उत्पन्न अवयवीरूप द्रव्य में जो महत्त्व है एवं जिन अवयवों का निर्माण निबिड संयोग वाले दो अवयवों से हुआ है, उन अवयवों के निबिड संयोग से उत्पन्न द्रव्य में जो महत्त्व है, उन दोनों महत्त्वों में अन्तर देखा जाता है, अतः अवयवों के प्रशिथिल संयोग के द्वारा महत्त्व के उत्पादन में उसके अवयवावयवों के परस्पर प्रशिथिल संयोग की भी अपेक्षा होती है । एवं जहाँ दोनों अवयवों का (अनारम्भक) संयोग प्रशिथिलात्मक है एवं अवयवावयवों के परस्पर संयोग भी प्रशिथिलात्मक ही हैं; किन्तु दोनों अवयवों का आरम्भक संयोग प्रशिथिलात्मक नहीं है, इन दोनों से आरब्ध अवयवी का महत्त्व उस द्रव्य के महत्त्व से अधिक देखा जाता है । जिसके अवयवों का संयोग एवं अवयवावयवों के परस्पर संयोग सभी 'घन' (निबिड) हैं । इन अवयवों से जिस द्रव्य की उत्पत्ति होती है, उस द्रव्य में रहनेवाले महत्त्व का उत्पादन अवयवों का प्रशिथिल संयोग अवयवावयवों के परस्पर निबिड संयोग के साहाय्य से ही करता है ।
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३२५
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३२५ प्रशस्तपादभाष्यम् संख्यैश्चारब्धेऽतिशयदर्शनात् । प्रचयश्च तूलपिण्डयोर्वर्तमानः पिण्डारम्भकावयवप्रशिथिलसंयोगानपेक्षमाण इतरेतरपिण्डावयव- बहुत्व संख्या नहीं; क्योंकि समान संख्या के (अथ च न्यूनाधिक परिमाण- वाले) अवयवों से उत्पन्न द्रव्यों में न्यूनाधिक परिमाण की उपलब्धि होती है । रूई के दो खण्डों से उत्पन्न एक अवयवी रूप रूई का महत्त्व, इन अवयवी के उत्पादक रूई के खण्डों में रहनेवाले 'प्रचय' से ही उत्पन्न होता है, न्यायकन्दली संख्यैः स्थूलैः सूक्ष्मैश्चारब्धयोर्द्रव्ययोः स्थूलारब्धे महत्त्वातिशयदर्शनात् । संख्यायाः कारणत्वे हि कार्यविशेषो न स्यात्, तस्या अविशेषात् । यत्र तु समानपरिमाणैरवयवैरारब्धयोरवयवसंख्याबाहुल्यादेकत्र परिमाणातिशयो दृश्यते तत्रावयव- संख्यापि कारणमेष्टव्या, अन्यथा कार्यविशेषायोगः । यत्र समानसंख्यैः समानपरिमाणैश्च कार्यमारब्धम्, तत्र मह्त्वोत्पत्तावुभयोरपि कारणत्वम्, प्रत्येकमुभयोरपि सामर्थ्यदर्शनात्, तत्रान्यतरविशेषादर्शनादित्येके । अपरे तु परिमाणस्यैव कारणतामाहुः, समानजातीयात् कार्योत्पत्तिसम्भवे विजातीयकारणकल्पनानवकाशात् । प्रचयमाह-प्रचयश्चेति । प्रचय इति द्रव्यारम्भकः प्रशिथिलः संयोगविशेषः । स तु द्वितूलकदव्यारम्भकयोस्तूलपिण्डयोर्वर्तमानः महत्त्व की उत्पत्ति होती है, अवयवों की बहुत्व संख्या से नहीं; क्योंकि समान संख्या के स्थूल और सूक्ष्म अवयवों से आरब्ध दो द्रव्यों के दोनों महत्त्वों में अन्तर देखा जाता है । अगर अवयवों में रहनेवाली संख्याओं को ही महत्त्व का कारण मानें तो उक्त अन्तर की उपपत्ति नहीं होगी; क्योंकि वह तो दोनों द्रव्यों के अवयवों में समान ही है । जहाँ समान परिमाण के अथ च विभिन्न संख्या के अवयवों से उत्पन्न दो द्रव्यों के दोनों महत्त्वों में अन्तर देखा जाता है, वहाँ (महान् अवयवों से उत्पन्न द्रव्य में रहनेवाले महत्परिमाण के प्रति भी) अवयवों में रहनेवाली संख्या ही कारण है, अन्यथा उक्त महत्परिमाणों में अन्तर की उपपत्ति नहीं होगी । किसी सम्प्रदाय का कहना है कि समान संख्या के एवं समान परिमाणों के अवयवों से जिस द्रव्य की उत्पत्ति होती है, उस द्रव्य के महत्परिमाण का अवयवों की संख्या और उनके महत् परिमाण दोनों ही कारण हैं; क्योंकि संख्या एवं परिमाण दोनों में ही परिमाण की कारणता निश्चित है । उक्त स्थल में दोनों में से किसी एक को ही कारण मानने की कोई विशेष युक्ति नहीं है । इसी प्रसङ्ग में किसी दूसरे सम्प्रदाय का कहना है कि अवयवों का महत्त्व ही प्रकृत महत्परिमाण का कारण है, अवयवों की संख्या नहीं; क्योंकि जहाँ समानजातीय कारण से ही कार्य की सम्भावना हो वहाँ विभिन्न जातीय वस्तु में उसकी कारणता की कल्पना व्यर्थ है ।