भारतकोश
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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६४१

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६४१ प्रशस्तपादभाष्यम् द्रवत्वं स्यन्दनकर्मकारणम् । त्रिद्रव्यवृत्ति । तत्तु द्विविधम् - जिस गुण से स्यन्दन (अर्थात् फैलने की) क्रिया उत्पन्न हो, वही 'द्रवत्व' है । यह १. सांसिद्धिक (स्वाभाविक) और २. नैमित्तिक न्यायकन्दली हि नो गुरुत्वम् । एतेनैतत् प्रत्युक्तं यदुक्तमपरैः- "अवयविगुरुत्वकार्यस्य न्नतिविशेष- स्यानुपलम्भादवयविनि गुरुत्वाभावः" इति, अवयविनः पतनाभावप्रसङ्गात् । अथावयवानां गुरुत्वादेव तस्य पतनम् ? तदावयवानामपि स्वावयवगुरुत्वात् पतनमिति सर्वत्र कार्ये तदुच्छेदः । अथ व्यधिकरणेभ्यः स्वावयवगुरुत्वेभ्योऽवयवानां पतनासम्भवात् तेषु गुरुत्वं कल्प्यते, तदा अवयविन्यपि कल्पनीयम्, न्यायस्य समानत्वात् । यत् पुनरवयविगुरुत्वस्य कार्यातिरेको न गृह्यते, तदवयवावयविगुरुत्वभेदस्याल्पान्तरत्वात् । यथा महति द्रव्ये उन्मीयमाने तत्पतितसूक्ष्मद्रव्यान्तरगुरुत्वकार्याग्रहणम् । क्योंकि अवयवों के गुरुत्व से जितनी अवनति होती है, उन अवयवों से बने अवयवी के द्वारा उससे अधिक अवनति नहीं देखी जाती है, अतः अवयवों में ही गुरुत्व है, अवयवी में नहीं । गुरुत्व के उक्त लक्षण से उनके उक्त मत का भी खण्डन हो जाता है (क्योंकि उस लक्षण में गुरुत्व को अवयवी में रहना मान लिया गया है); क्योंकि अवयवी में गुरुत्व यदि न मानें तो अवयवी का पतन न हो सकेगा । यदि अवयवों के गुरुत्व से ही अवयवी का पतन मानें, तो फिर उन अवयवों का पतन भी उनके अवयवों से ही होगा । उनमें भी गुरुत्व का मानना व्यर्थ होगा । फलतः किसी भी कार्य द्रव्य में गुरुत्व का मानना सम्भव न होगा । यदि यह कहें कि एक अधिकरण में रहनेवाले गुरुत्व से उससे भिन्न द्रव्य में पतन का होना सम्भव नहीं है, अतः अवयवों में गुरुत्व मानते हैं (क्योंकि अवयवों से उसके अवयव भिन्न हैं), तो फिर इसी युक्ति से अवयवी में भी गुरुत्व का मानना अनिवार्य है; क्योंकि अवयवों के अवयव भी तो अपने अवयवी से भिन्न हैं, अतः अवयवों में रहनेवाला गुरुत्व अवयवों से भिन्न अवयवी में पतन का उत्पादन कैसे कर सकता है ? यह जो आक्षेप किया गया है कि अवयवों के गुरुत्व कार्य अवनति-विशेष से अवयवी के कार्य अवनतिविशेष में कोई अन्तर उपलब्ध नहीं होता (अतः अवयवों में ही गुरुत्व है अवयवी में नहीं), इस आक्षेप के उत्तर में कहना है कि अवयवी के गुरुत्व से अवयवों के गुरुत्व में अत्यन्त अल्प अन्तर है, अतः दोनों से होनेवाले कार्यों का अन्तर गृहीत नहीं हो पाता । जैसे किसी भारी द्रव्य को दूसरी बार तौलने पर उससे कुछ कणों के झड़ जाने के बाद भी उसके गुरुत्व के कार्य अवनतियों में कोई अन्तर उपलब्ध नहीं होता है ।

६४२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे द्रवत्व- प्रशस्तपादभाष्यम् सांसिद्धिकम्, नैमित्तिकं च । सांसिद्धिकमपां विशेषगुणः । नैमित्तिकं पृथिवीतेजसोः सामान्यगुणः । सांसिद्धिकस्य गुरुत्ववन्नित्यानित्यत्व- निष्पत्तयः । सङ्घातदर्शनात् सांसिद्धिकमयुक्तमिति चेत्, न, दिव्येन तेजसा संयुक्तानामाप्यानां परमाणूनां परस्परं संयोगो द्रव्यारम्भकः सङ्घा- भेद से दो प्रकार का है । इनमें सांसिद्धिक द्रवत्व जल का विशेषगुण है और नैमित्तिक द्रवत्व पृथिवी और तेज का सामान्यगुण है । द्रवत्व के नित्यत्व और अनित्यत्व का निर्णय गुरुत्व की तरह समझना चाहिए । (प्र.) (जल में भी) सङ्घात अर्थात् काठिन्य देखा जाता है, अतः यह कहना अयुक्त है कि जल का द्रवत्व सांसिद्धिक है । न्यायकन्दली संयोगप्रयत्नसंस्कारविरोधि । गुरुत्वस्य संयोगेन प्रयत्नेन वेगाख्येन च संस्कारेण सह विरोधो विद्यते, तैः प्रतिबद्धस्य स्वकार्याकरणात् । तथा च दोलारूढस्य संयोगेन प्रतिबन्धादपतनम्, प्रयत्नेन प्रतिबन्धादपतनं च शरीरस्य, वेगेन प्रतिबन्धादपतनं बहिः- क्षिप्तस्य शरशलाकादेः । अस्य चाबादिपरमाणुरूपादिवन्नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयः । यथाप्यपरमाणुरूपादयो नित्या- स्तथा पार्थिवाप्यपरमाणुष्वपि गुरुत्वम् । यथा चाबादिकार्यद्रव्ये कारणगुणपूर्वकप्रक्रमेण रूपादयो जायन्ते, आश्रयविनाशाच्च विनश्यन्ति, तथा गुरुत्वमपि । 'संयोगप्रयत्नसंस्कारविरोधी' । गुरुत्व का विरोध (अर्थात् अपने आश्रय के अधःपतन रूप कार्य में अक्षमता) संयोग, प्रयत्न और वेगाख्य संस्कार इन तीन गुणों से होता है; क्योंकि इनमें से किसी के साथ भी सम्बन्ध रहने पर गुरुत्व से पतन की उत्पत्ति नहीं होती है । संयोग से प्रतिरुद्ध होने के कारण ही पालकी पर चढ़े हुए मनुष्य का पतन नहीं होता है । प्रयत्नरूप प्रतिबन्धक से ही शरीर का पतन नहीं होता है । केवल वेग के ही कारण बाहर फेंका हुआ तीर (कुछ देर तक) रुका रहता है । 'अस्य चाबादिपरमाणुरूपादिवन्नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयः' अर्थात् जिस प्रकार जलीय परमाणुओं के रूपादि नित्य होते हैं, उसी प्रकार पार्थिव परमाणु और जलीय परमाणु का गुरुत्व भी नित्य है । जैसे कार्यरूप जल में कारणगुणक्रम से रूपादि की उत्पत्ति होती है एवं आश्रय के विनाश से उनका विनाश होता है, उसी प्रकार कार्यरूप पार्थिव द्रव्य और जलीय द्रव्य इन दोनों के गुरुत्व भी कारणगुणक्रम से ही उत्पन्न होते हैं और आश्रय के विनाश से ही विनष्ट होते हैं ।

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६४३

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६४३ न्यायकन्दली द्रवत्वं स्यन्दनकर्मकारणम् । यत् स्यन्दनकर्मकारणं तद् द्रवत्वमित्यर्थः । त्रिद्रव्यवृत्ति पृथिव्युदकज्वलनवृत्तीत्यर्थः । तत्तु द्विविधमिति । गुरुत्वमेकविधं द्रवत्वं तु द्विविधमिति तुशब्दार्थः । नैमित्तिकं सांसिद्धिकं च । निमित्तं च वह्निसंयोगः, तस्येदं कार्यमिति नैमित्तिकम् । सांसिद्धिकं च स्वभावसिद्धम्, वह्निसंयोगानपेक्षमिति यावत् । सांसिद्धिकमपां विशेषगुणः, अन्यत्राभावात् । नैमित्तिकं पृथिवीतेजसोः सामान्यगुणः, साधारणत्वात् । सांसिद्धिकस्य द्रवत्वस्य गुरुत्ववन्नित्या- नित्यत्वनिष्पत्तयः । यथा नित्यद्रव्यसमवेतं गुरुत्वं नित्यम्, अनित्यद्रव्यसमवेतं च कार्यकारणगुणपूर्वकमाश्रयविनाशाद् विनश्यतीति तथा सांसिद्धिकं द्रवत्वमपि । अत्र चोदयति-संघातदर्शनात् सांसिद्धिकद्रवत्वमयुक्तमिति चेद् आप्यस्य हिमकरकादेर्द्रव्यस्य संघातदर्शनात् काठिन्यदर्शनादपां स्वभावसिद्धं द्रवत्व- 'द्रवत्वं स्यन्दनकर्मकारणम्' अर्थात् प्रसरण क्रिया का जो कारण वही 'द्रवत्व' है । 'त्रिद्रव्यवृत्ति' अर्थात् पृथिवी, जल और तेज इन तीन द्रव्यों में द्रवत्व रहता है । 'तत्तु द्विविधम्' इस वाक्य में प्रयुक्त 'तु' शब्द से यह सूचित किया गया है कि गुरुत्व तो एक ही प्रकार का है; किन्तु द्रवत्व दो प्रकार का है । 'नैमित्तिकं सांसिद्धिकञ्च' इस वाक्य में प्रयुक्त 'नैमित्तिक' शब्द 'निमित्तस्येदं कार्यं नैमित्तिकम्' इस व्युत्पत्ति से निष्पन्न है एवं इस 'निमित्त' शब्द का अर्थ है वह्नि का संयोग । (फलतः वह्नि प्रभृति तैजस द्रव्य के संयोग रूप निमित्त से उत्पन्न द्रवत्व ही नैमित्तिक द्रवत्व है) स्वाभाविक द्रवत्व को सांसिद्धिक द्रवत्व कहते हैं । फलतः वह्नि प्रभृति तैजस पदार्थों के संयोग के बिना ही जो द्रवत्व उत्पन्न हो उसे सांसिद्धिक द्रवत्व कहते हैं । 'सांसिद्धिकोऽयं विशेषगुणः' सांसिद्धिक द्रवत्व जल का विशेष गुण है; क्योंकि वह अन्य द्रव्यों में नहीं है । 'नैमित्तिकं पृथिवीतेजसोः सामान्यगुणः' नैमित्तिक द्रवत्व पृथिवी और तेज का सामान्य ही गुण है; क्योंकि वह दो द्रव्यों में समानरूप से रहता है । 'सांसिद्धिकस्य' अर्थात् सांसिद्धिक द्रवत्व का 'गुरुत्ववन्नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयः' अर्थात् जिस प्रकार नित्य द्रव्य में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाला गुरुत्व नित्य ही होता है और अनित्य द्रव्य में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाला गुरुत्व कारणगुणक्रम से उत्पन्न होनेवाला कार्य होता है एवं आश्रय के विनाश से विनाश को प्राप्त होता है, उसी प्रकार द्रवत्व में भी समझना चाहिए । (अर्थात् नित्य द्रव्य में रहनेवाला द्रवत्व भी नित्य है एवं कार्य द्रव्य में रहनेवाले द्रवत्व की उत्पत्ति कारणगुणक्रम से होती है एवं विनाश आश्रय के विनाश से होता है) । 'संघातदर्शनात् सांसिद्धिकद्रवत्वमयुक्तम्' इस सन्दर्भ के द्वारा आक्षेप किया गया है कि हिम, करका प्रभृति जलीय द्रव्यों में 'संघात' अर्थात् काठिन्य देखा जाता है, अतः जल में रहनेवाले द्रवत्व को स्वाभाविक मानना ठीक नहीं है । 'दिव्येन' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा उक्त आक्षेप का समाधान करते हैं । सभी जलों में स्वाभाविक द्रवत्व की

६४४ न्यायकन्दलीसंवल्लितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे द्रवत्व- प्रशस्तपादभाष्यम् तास्यः, तेन परमाणुद्रवत्वप्रतिबन्धात् कार्ये हिमकरकादौ द्रवत्यानुत्पत्तिः । नैमित्तिकं च पृथिवीतेजसोरग्निसंयोगजम् । कथम् ? सर्पिर्जतुमधूच्छिष्टादीनां कारणेषु परमाणुष्वग्निसंयोगाद् वेगापेक्षात् कर्मोत्पत्तौ तज्जेभ्यो विभागेभ्यो द्रव्यारम्भकसंयोगविनाशात् कार्यद्रव्य- निवृत्तावग्निसंयोगादौष्ण्यापेक्षात् स्वतन्त्रेषु परमाणुषु द्रवत्वमुत्पद्यते, (उ.) यह बात नहीं है; क्योंकि दिव्यतेज के साथ संयुक्त परमाणुओं में द्रव्य का उत्पादक संयोग ही सङ्घात रूप होता है (अर्थात् उक्त परमाणुओं का ही संयोग कठिन होता है)। इसी से जल का स्वाभाविक द्रवत्व प्रतिरुद्ध हो जाता है, जिससे जल से उत्पन्न होनेवाले पाला और बरफ में सांसिद्धिक द्रवत्व की उत्पत्ति नहीं हो पाती । अग्नि के संयोग से पृथिवी और तेज (इन दोनों ही) में नैमित्तिक द्रवत्व की उत्पत्ति होती है । (प्र.) किस प्रकार ? (इनमें नैमित्तिक द्रवत्व की उत्पत्ति होती है ?) (उ.) घृत, लाह, मोम (मधूच्छिष्ट) प्रभृति द्रव्यों के उत्पादक परमाणुओं में वेग की सहायता से अग्निसंयोग के द्वारा क्रिया की उत्पत्ति होती है । उस क्रिया से परमाणुओं में विभाग उत्पन्न होते हैं । इस विभाग से उक्त परमाणुओं में रहनेवाले (द्व्यणुक के) उत्पादक संयोग का विनाश होता है । इस (संयोगविनाश) से घृतादि कार्य द्रव्यों के नाश हो जाने के बाद उष्णता की सहायता से अग्निसंयोग के द्वारा स्वतन्त्र (परस्परासम्बद्ध) परमाणुओं में द्रवत्व की उत्पत्ति होती है । न्यायकन्दली मित्युक्तम् । समाधत्ते—दिव्येनेति । सर्वत्रोदके स्वभावसिद्धस्य द्रवत्वस्योप- लम्भादपां स्वभावसिद्धमेव द्रवत्वं तावन्निश्चितम् । यत्र तु हिमकरकादौ कार्ये द्रवत्वानुत्पत्तिस्तत्र दिव्येन तेजसा सम्बद्धानामाप्यपरमाणूनां परस्परसंयोगो उपलब्धि होती है, इससे समझते हैं कि जल का द्रवत्व स्वाभाविक ही है । हिमकरकादि जलीय द्रव्यों में द्रवत्व की जो उत्पत्ति नहीं होती है, उसका हेतु यह है कि दिव्य तेज के साथ उन द्रव्यों के उत्पादक परमाणु सम्बद्ध रहते हैं, अतः उन परमाणुओं के द्रव्योत्पादक संयोग संघातात्मक होते हैं, जिससे हिमकरकादि के सांसिद्धिक द्रवत्व प्रतिरुद्ध हो जाते हैं । (प्र.) 'तेज के संयोग से सांसिद्धिक द्रवत्व का प्रतिरोध होता है' यह किस प्रमाण से समझते हैं ? (उ.) अनुमान के द्वारा समझते हैं; क्योंकि हिमकरकादि से भिन्न

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६४५

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६४५ प्रशस्तपादभाष्यम् ततस्तेषु भोगिनामदृष्टापेक्षादात्माणुसंयोगात् कर्मोत्पत्तौ तज्जेभ्यः संयोगेभ्यो द्व्यणुकादिप्रक्रमेण कार्यद्रव्यमुत्पद्यते, तस्मिंश्च रूपायुत्पत्तिसमकालं कारण- गुणप्रक्रमेण द्रवत्वमुत्पद्यत इति । स्नेहोऽपां विशेषगुणः । संग्रहम्मृजादिहेतुः । अस्यापि गुरुत्ववन्नित्यानित्यत्व- निष्पत्तयः । इसके बाद भोग करनेवाले जीवों के अदृष्ट की सहायता से आत्मा और मन के संयोग से (उन स्वतन्त्र परमाणुओं में) क्रिया की उत्पत्ति होती है । इस क्रिया से (द्रवत्व से युक्त परमाणुओं में द्रव्योत्पादक) संयोग की उत्पत्ति होती है । इस संयोग से द्व्यणुकादि क्रम से कार्यद्रव्य की उत्पत्ति होती है । इस कार्यद्रव्य में जिस समय रूपादि गुणों की उत्पत्ति होती है, उसी समय द्रवत्व की भी उत्पत्ति होती है । केवल जल में ही रहनेवाला विशेषगुण 'स्नेह' है । वह संग्रह सत्तू प्रभृति चूर्ण द्रव्यों को गोले का आकार बनाने का एवं मर्दन प्रभृति क्रिया का हेतु है । उसके नित्यत्व और अनित्यत्व की व्यवस्था गुरुत्व की तरह जाननी चाहिए । न्यायकन्दली द्रव्यारम्भकः सङ्घाताख्यः, तेन हिमकरकारम्भकाणां परमाणूनां द्रवत्वप्रतिबन्धात् । तेजः- संयोगेन परमाणूनां द्रवत्वं प्रतिबद्धमित्यन्यत्राप्यद्रव्यस्य लवणस्य वह्निसंयोगेन द्रवत्वप्रति- बन्धदर्शनादनुमितम् । लवणस्याप्यत्वमपि हिमकरकादियत् कालान्तरेण द्रवीभावदर्शना- दवगतम् । विलयनं तु हिमकरकादेर्भौमाग्निसंयोगाद् यद् विलयनं कठिनद्रव्यस्य, तद् वह्निसंयोगादवगतम्, यथा सुवर्णादीनाम् । हिमकरकादिविलयनमपि विलयनमेव । तस्मादिहापि दृष्टसामर्थ्यो वह्निसंयोग एव निमित्तमाश्रीयते । लवणरूप द्रव्य में वह्नि के संयोग से (सांसिद्धिक) द्रवत्व का प्रतिरोध देखा जाता है, अतः लवणरूप दृष्टान्त से तेज के संयोग में सांसिद्धिक द्रवत्व के प्रतिरोध की जनकता का अनुमान करते हैं । हिमकरकादि की तरह कुछ समय के बाद लवण को पिघलते देखा जाता है, अतः समझते हैं कि लवण भी जलीय द्रव्य है । वह्नि संयोग से कठिन द्रव्य का पिघलना सुवर्णादि द्रव्यों में प्रत्यक्ष देखा जाता है । हिम- करकादि का पिघलना भी कठिन द्रव्य का पिघलना ही है, अतः समझते हैं कि वह वह्नि के संयोग से ही पिघलता है । तस्मात् पिघलने की कारणता जिसमें प्रत्यक्ष के द्वारा निश्चित है, उसी वह्निसंयोग में हिमकरकादि के पिघलने की भी कारणता स्वीकार कर लेते हैं ।

६४६ न्यायन्दलीसहितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे संस्कार- प्रशस्तपादभाष्यम् संस्कारस्त्रिविधः- वेगो भावना स्थितिस्थापकश्च । तत्र वेगो मूर्त्तिमत्सु पञ्चसु द्रव्येषु निमित्तविशेषापेक्षात् १. वेग, २. भावना और ३. स्थितिस्थापक भेद से संस्कार तीन प्रकार का है । इनमें वेग मूर्त्तद्रव्यों में ही विशेष प्रकार के निमित्तकारणों की सहायता से क्रिया के द्वारा उत्पन्न होता है । वह (वेग) किसी न्यायकन्दली सांसिद्धिकं द्रवत्वं व्याख्याय नैमित्तिकं व्याचष्टे-नैमित्तिकं पृथिवीतेजसोरग्नि- संयोगजमिति । कथमित्यज्ञेन पृष्टः समुपपादयति-सर्पिरित्यादिना । सर्पिर्जतुमधूच्छिष्टानां पार्थिवानां कारणेषु परमाणुष्वग्निसंयोगात् क्रियोत्पत्तौ सत्यां कर्मजेभ्यो विभागेभ्यः सर्पिराद्यारम्भकसंयोगविनाशात् सर्पिरादिद्रव्यनिवृत्तौ सत्यां स्वतन्त्रेषु परमाणुषु वह्नि- संयोगाद् द्रवत्वमुत्पद्यते । तदनन्तरमुत्पन्नद्रवत्वेषु परमाणुषु भोगिनामदृष्टापेक्षादात्म- परमाणुसंयोगात् क्रियोत्पत्तौ सत्यां कर्मजेभ्यः परमाणुनां परस्परसंयोगेभ्यो द्व्यणुकादि- प्रक्रमेण कार्यद्रव्ये जाते रूपाद्युत्पत्तिकाल एव कारणद्रवत्वेभ्यो द्रवत्वमुत्पद्यते । हिमकरकादिविलयनेऽप्येवमेव न्यायः । स्नेहोऽपां विशेषगुणः संग्रहमृजादिहेतुः । । संग्रहः परस्परमयुक्तानां सांसिद्धिक द्रवत्व की व्याख्या करने के बाद 'नैमित्तिकं पृथिवीतेजसोरग्नि- संयोगजम्' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा अब क्रमप्राप्त नैमित्तिक द्रवत्व की व्याख्या करते हैं । 'कथम्' अर्थात् नैमित्तिक द्रवत्व की उत्पत्ति किस प्रकार होती है, किसी अज्ञ के द्वारा यह पूछे जाने पर 'सर्पिः' इत्यादि से उस प्रश्न का उत्तर देते हैं । घृत, लाह एवं मोम प्रभृति (नैमित्तिक द्रवत्व वाले पार्थिव अवयवी द्रव्यों के) कारणीभूत परमाणुओं में अग्नि के संयोग से क्रिया उत्पन्न होती है, क्रियाओं से परमाणुओं में विभाग उत्पन्न होते हैं । कर्मजनित इन विभागों से परमाणुओं में रहनेवाले (द्व्यणुकों के) उत्पादक पूर्वसंयोगों का नाश होता है । इन संयोगों के विनाश से घृतादि अवयवी द्रव्यों का परमाणुपर्यन्त विनाश हो जाता है । इस प्रकार उन परमाणुओं के स्वतन्त्र हो जाने पर इन स्वतन्त्र परमाणुओं में वह्नि के संयोग से द्रवत्व की उत्पत्ति होती है । भोगजनक अदृष्ट की सहायता से आत्मा और परमाणु के संयोग से (द्रवत्वयुक्त) परमाणुओं में क्रिया की उत्पत्ति होती है । फिर परमाणुओं के कर्मजनित इन संयोगों से द्व्यणुकादि क्रम से कार्य द्रव्यों की उत्पत्ति होती है, फिर आगे के क्षण में रूपादि गुणों की उत्पत्ति होती है, उसी क्षण में समवायिकारणों में रहनेवाले द्रवत्वों से कार्यद्रव्यों में द्रवत्व की उत्पत्ति होती है । हिमकरकादि में द्रवत्वविलय के प्रसङ्ग में भी इसी रीति का अनुसरण करना चाहिए । 'स्नेहोऽपां विशेषगुणः संग्रहमृजादिहेतुः' । 'संग्रह' उस विशेष प्रकार के संयोग का नाम है, जिससे परस्पर असंयुक्त सत्तू प्रभृति द्रव्यों का गोला बन जाता है ।

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ६४७

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ६४७ प्रशस्तपादभाष्यम् कर्मणो जायते नियतदिक्क्रियाप्रबन्धहेतुः स्पर्शवद्द्रव्यसंयोगविशेषविरोधी क्वचित् कारणगुणपूर्वक्रमेणोत्पद्यते । भावनासंज्ञकस्त्वात्मगुणो दृष्टश्रुतानुभूतेष्वर्थेषु स्मृतिप्रत्य- भिज्ञानहेतुर्भवति ज्ञानमददुःखादिविरोधी । पट्वभ्यासादरप्रत्ययजः । नियमित देश में ही क्रियासमूह का कारण है । स्पर्श से युक्त द्रव्यों का विशेष प्रकार का संयोग उसका विनाशक है । कहीं वह अपने आश्रय के समवायिकारण में रहनेवाले वेग से भी उत्पन्न होता है । पहले देखे हुए, सुने हुए एवं अनुमान के द्वारा ज्ञात अर्थों की स्मृति और प्रत्यभिज्ञा का कारणीभूत संस्कार ही 'भावना' है । ज्ञान, मद एवं दुःखादि से उसका नाश होता है । पटु, अभ्यास, आदर और न्यायकन्दली सक्त्यादीनां पिण्डीभावप्राप्तिहेतुः संयोगविशेषः । मृजा कायस्योद्वर्तनादिकृता शुद्धिः । आदिशब्दान्मृदुत्वं च, तेषां हेतुः । स्नेहस्यापि गुरुत्ववन्नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयः । गुरुत्वं च परमाणुषु नित्यम्, कार्ये च कारणगुणपूर्वकमाश्रयविनाशाद् विनाशि, तथा स्नेहोऽपीति । संस्कारस्त्रिविधो वेगो भावना स्थितिस्थापकश्चेति । तत्र वेगो मूर्ति- मत्सु पञ्चद्रव्येषु निमित्तविशेषापेक्षात् कर्मणो जायते । पञ्चसु द्रव्येषु पृथिव्य- प्तेजोवायुमनस्सु कर्म वेगं करोति नान्यत्र, स्वयमभावात् । नोदनाभिघातादि- 'मृजा' शब्द से शरीर की वह शुद्धि अभिप्रेत है, जो शरीर में (उबटन प्रभृति के) मर्दन से प्राप्त होती है । आदि शब्द से मृदुत्वादि को समझना चाहिए । 'स्नेह' इन सबों का कारण है । 'स्नेहस्यापि गुरुत्ववन्नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयः' अर्थात् गुरुत्व जिस प्रकार परमाणुओं में नित्य है, उसी प्रकार स्नेह भी परमाणुओं में नित्य है । जिस प्रकार कार्यद्रव्य में 'गुरुत्व' कारणगुणक्रम से उत्पन्न होता है एवं आश्रय के विनाश से विनाश को प्राप्त होता है, उसी प्रकार कार्यद्रव्य में स्नेह भी कारणगुणक्रम से उत्पन्न होता है एवं आश्रय के विनाश से विनाश को प्राप्त होता है । "संस्कारस्त्रिविधो वेगो भावना स्थितिस्थापकश्चेति, तत्र वेगो मूर्त्तिमत्सु पञ्चद्रव्येषु निमित्तविशेषापेक्षात् कर्मणो जायते" । पाँच द्रव्यों में अर्थात् पृथिवी, जल तेज, वायु और मन इन पाँच द्रव्यों में क्रिया से वेग की उत्पत्ति होती है, और किसी वस्तु में नहीं, क्योंकि इन पाँच द्रव्यों को छोड़- कर क्रिया स्वयं अन्यत्र कहीं नहीं है । क्रिया को वेग के उत्पादन में नोदन या अभिघात प्रभृति कारणों का साहाय्य आवश्यक है, वह स्वतन्त्र होकर केवल अपन ही बल से वेग का उत्पादन नहीं कर सकती; क्योंकि मन्दगति-

६४८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे संस्कार- प्रशस्तपादभाष्यम् पटुप्रत्ययापेक्षादात्ममनसोः संयोगादाश्चर्येऽर्थे पटुः संस्कारातिशयो जायते । यथा दाक्षिणात्यस्योष्ट्रदर्शनादिति । विद्याशिल्पव्यायामादिष्वभ्यस्यमानेषु तस्मिन्ने- वार्थे पूर्वपूर्वसंस्कारमपेक्षमाणादुत्तरोत्तरस्मात् प्रत्ययादात्ममनसोः संयोगात् संस्कारातिशयो जायते । ज्ञान से इसकी उत्पत्ति होती है । पटु (अनुपेक्षात्मक) ज्ञान एवं आत्मा और मन के संयोग से अद्भुत विषयों में 'पटु' नाम के विशेष प्रकार के संस्कार की उत्पत्ति होती है । जैसे कि दक्षिण देश के रहनेवाले को ऊँट के देखने से (ऊँट का पटु संस्कार होता है) । विद्या, शिल्प एवं व्यायाम प्रभृति वस्तुओं का बार-बार अभ्यास करते रहने से उन्हीं विषयों के पूर्व-पूर्व संस्कारों से उत्पन्न प्रतीतियों (स्मृतियों) के कारण आत्मा और मन के संयोग से एक विशेष प्रकार के संस्कार की उत्पत्ति होती है । न्यायकन्दली निमित्तविशेषापेक्षं न केवलम्, मन्दगतौ वेगाभावात् । नियतदिक्क्रियाप्रबन्धहेतुः । यदिगाभिमुख्येन क्रियया वेगो जन्यते तद्दिगभिमुखतयैव क्रियासन्तानस्य हेतुरित्यर्थः । स्पर्शवदिति । विशिष्टेन स्पर्शवद्द्रव्यसंयोगेनात्यन्तनिबिडावयववृत्तिना वेगो विनाश्यते, यः स्वयं विशिष्टः । मन्दस्तु वेगः स्पर्शवद्द्रव्यसंयोगमात्रेण विनश्यति, यथातिदूरं गतस्येषोस्तत्तमितवायुप्रतिबद्धस्य । क्वचिदिति । बाहुल्येन तावद्वेगः कर्मजः, क्वचिद् वेगवदवयवारब्धे जलावयविनि कारणवेगेभ्योऽपि जायते । भावनेत्यादि । भावनासंज्ञकस्तु संस्कार आत्मगुणः । दृष्टश्रुतानुभूते- रूप क्रिया के रहने पर भी वेग की उत्पत्ति नहीं होती है । 'नियतदिक्क्रिया- प्रबन्धहेतुः' वेग नियत दिशा में ही क्रियासमूह का उत्पादक है । अर्थात् जिस दिशा की तरफ क्रिया से वेग उत्पन्न होता है, उसी दिशा की तरफ क्रियासमूह को वेग उत्पन्न करता है । 'स्पर्शवदिति' स्पर्श से युक्त द्रव्य के विशेष प्रकार के एवं निविड़ अवयव के द्रव्य में रहनेवाले संयोग से तीव्र वेग का विनाश होता है । मन्द वेग का विनाश तो स्पर्श से युक्त किसी भी द्रव्य के संयोग से हो जाता है, जैसा कि अन्यत्र दूर गये हुए बाण के वेग का विनाश मन्द गति के वायु से भी हो जाता है । 'क्वचिदिति' अर्थात् अधिकांश वेगों की उत्पत्ति तो क्रिया से ही होती है; किन्तु कुछ वेगों की उत्पत्ति आश्रयीभूत द्रव्य के अवयवों में रहनेवाले वेग से भी होती है, जैसे कि जल में कारणगुणक्रम से भी वेग की उत्पत्ति होती है । 'भावनेत्यादि' अर्थात् भावना नाम का जो संस्कार वह आत्मा का गुण है । 'दृष्टानुभूतेषु' इस वाक्य के द्वारा इस संस्कार से उत्पन्न होनेवाले कार्यों को दिखलाया

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६४१ न्यायकन्दली ष्यिति दृष्टश्रुतानुभूतेष्वर्थेषु स्मृतेः प्रत्यभिज्ञानस्य च हेतुरिति तस्य कार्यकथनम् । दृष्टश्रुतानुभूतेष्विति विपर्ययावगतोऽप्यर्थो बोद्धव्यः, तत्रापि स्मृतिदर्शनात् । ज्ञानेति । प्रतिपक्षज्ञानेन संस्कारो विनाश्यते । द्यूतादिव्यसनापन्नस्य पूर्वाधीतविस्मरणात्। मदेनापि संस्कारस्य विनाशः, सुरामत्तस्य पूर्वस्मृतिलोपात् । मरणादिदुःखादपि संस्कारो विनश्यति, जन्मान्तरानुभूतस्मरणाभावात् । आदिशब्देन सुखादिपरिग्रहः, भोगासक्तस्य कुपितस्य वा पूर्ववृत्तस्मृत्यभावात् । पट्वभ्यासेति । पटुप्रत्ययादभ्यासप्रत्ययादादरप्रत्ययाच्च संस्कारो जायते । पटुप्रत्ययापेक्षादात्ममनसोः संयोगविशेषादाश्चर्येऽर्थे पटुः संस्कारो जायते । यथेति । उष्ट्रो दाक्षिणात्यस्यात्यन्ताननुभूतकारतयाश्चर्यभूतोऽर्थः । तद्दर्शनात् तस्य पटुः संस्कारो जायते, कालान्तरेऽप्युष्ट्रानुभवस्मृतिजननात् । अभ्यास- प्रत्ययजं संस्कारं दर्शयति - विद्याशिल्पेत्यादि । विद्या शास्त्रागमादिका, शिल्पं पत्रभङ्गादिक्रिया, व्यायाम आयुधादिश्रमः, तेष्वभ्यस्यमानेषु तस्मिन्नेवार्थे गया है कि इससे प्रत्यक्ष एवं अनुमान के द्वारा ज्ञात अर्थ की स्मृति और प्रत्यभिज्ञान नाम का विशेष ज्ञान उत्पन्न होता है । 'दृष्टानुभूतेषु' इस पद से (केवल प्रत्यक्षप्रमा और अनुमानप्रमा के द्वारा ज्ञात अर्थ ही नहीं, किन्तु) विपर्यय के द्वारा ज्ञात अर्थों का भी ग्रहण करना चाहिए; क्योंकि उनके विषयों की भी स्मृति होती हैं । 'ज्ञानेति' विरोधी ज्ञान से संस्कार का विनाश होता है; क्योंकि जूआ प्रभृति (द्यूतादि) व्यसनों में लगे हुए व्यक्ति को पहले के अधीत विषयों का विस्मरण हो जाता है । मद से भी संस्कार का विनाश होता है; क्योंकि सुरापान से मत्त व्यक्ति की पूर्वस्मृति का लोप देखा जाता है । मरणादि दुःखों से भी संस्कार का नाश होता है; क्योंकि दूसरे जन्म की बातों का स्मरण नहीं होता । ('ज्ञानमददुःखादि' पद में प्रयुक्त) 'आदि' पद से सुखादि का ग्रहण करना चाहिए; क्योंकि भोग में आसक्त पुरुषों को या अत्यन्त क्रुद्ध पुरुषों को पहले की बातों की विस्मृति हो जाती है । 'पट्वभ्यासेति' पटुप्रत्यय से, अभ्यासप्रत्यय से एवं आदर- प्रत्यय से संस्कार की उत्पत्ति होती है। 'पटुप्रत्ययादात्ममनसोः संयोगविशेषादाश्चर्येऽर्थे पटुः संस्कारो जायते यथेति' । (दक्षिण देश में ऊँट नहीं होता, अतः) दाक्षिणात्यों को ऊँट का कभी अनुभव रहता, अतः कभी देखने पर अत्यन्त आश्चर्य होता है, जिससे ऊँट को एक बार देखने पर भी उसे ऊँटविषयक 'पटुसंस्कार' ही उत्पन्न होता है । अतः बहुत दिनों के बाद भी ऊँट की उन्हें स्मृति होती है । विद्याशिल्पेत्यादि' इस सन्दर्भ के द्वारा अभ्यासप्रत्यय से उत्पन्न संस्कार का निरूपण किया गया है । इस सन्दर्भ के 'विद्या' शब्द से शास्त्र एवं आगम प्रभृति अभिप्रेत हैं । 'शिल्प' शब्द से 'पत्रभङ्गादि' क्रियाओं को समझना चाहिए । 'व्यायाम' शब्द से अस्त्रशस्त्रादि चलाने का श्रम लेना चाहिए । इन सबों का अभ्यास करने पर 'तस्मिन्नेवार्थे' अर्थात् पहले अनुभूत उसी अर्थ में (संस्कार की उत्पत्ति होती है) । 'पूर्वपूर्वत्यादि' यतः वह संस्कार बहुत दिनों

६५० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे संस्कार- न्यायकन्दली पूर्वगृहीते । पूर्वैरित्यादि । यतः सुचिरमनुवर्तते, स्फुटतरं च स्मरणं करोति । न ह्याद्यानुभव एव संस्कारविशेषमाधत्ते, प्रथमं तदर्थस्मरणाभावात् । नायुत्तर एव हेतुः, पूर्वाभ्यास- वैयर्थ्यात् । तस्मात् पूर्वसंस्कारापेक्षोत्तरोत्तरानुभवाहिताधिकाधिकसंस्कारोत्पत्तिक्रमेणोपान्त्य- संस्कारापेक्षादन्त्यानुभवात् तदुत्पत्तिः । इदं त्विह निरूप्यते । विद्यायामभ्यस्यमानायां किं तदर्थो वाक्येन प्रतिपाद्यते ? किं वा स्फोटेन ? कुतः संशयः ? विप्रतिपत्तेः । एके वदन्ति स्फोटादर्थं प्रतिपादयतीति । अपरे त्याहुर्वाक्यं प्रत्यायकमिति । अतो युक्तः संशयः । किं तावत्प्राप्तम् ? स्फोटोऽर्थप्रत्यायक इति । यदि हि वर्णानतिरिक्तं पदम्, पदानतिरिक्तं च वाक्यम्, तदार्थप्रत्यय एव न स्यादिति । तथा हि न वर्णाः प्रत्येकमर्थविषयां धियमाविर्भावयन्ति, शेषवर्णवैयर्थ्यात् । समुदायश्च तेषां न सम्भवति, अन्त्यवर्णग्रहणसमये पूर्वेषामसम्भवात् । नित्यत्वाद् वर्णानामस्ति समुदाय इति चेत् ? तथापि न तेषां प्रतीतिरनुवर्तते, अप्रतीयमानानां च प्रत्यायकत्वे सर्वदार्थप्रतीतिप्रसङ्गः । न हि प्रतीत्य अप्रतीयमानानां सर्वथा अप्रतीयमानानां च कश्चिद् विशेषः । पूर्वावगता वर्णाः स्मृत्यारूढाः प्रतीतिहेतव तक रहता है एवं अत्यन्त स्पष्ट स्मृति का उत्पादन करता है। पहले बार के ही अनुभव से विशिष्ट संस्कार की उत्पत्ति नहीं होती; क्योंकि उस संस्कार से स्मृति की उत्पत्ति नहीं होती है । केवल आगे के अनुभव ही संस्कार के उत्पादक नहीं हैं; क्योंकि (ऐसा मानने पर) पहले के सभी अभ्यास व्यर्थ हो जायेंग । 'तस्मात्' पूर्व संस्कार से युक्त आत्मा में आगे के अनुभवों से संस्कारों की उत्पत्ति की धारा चलती है, इस प्रकार उपान्त्य (अर्थात् अन्तिम संस्कार से अव्यवहितपूर्व वृत्ति) संस्कार की सहायता से अन्तिम अनुभव के द्वारा विशिष्ट संस्कार की उत्पत्ति होती है । इस प्रसङ्ग में इस विषय का विचार उठाता हूँ कि शास्त्र या आगमरूप कथित विद्या के अभ्यास से जो उनके अर्थों का प्रतिपादन होता है, वह वाक्य से उत्पन्न होता है ? या स्फोट से उत्पन्न होता है ? (प्र) यह संशय ही उपस्थित क्यों हुआ ? (उ.) परस्पर विरोधी मतों के कारण संशय उपस्थित होता है । किसी सम्प्रदाय के लोग कहते हैं कि स्फोट से अर्थ की प्रतीति होती है । दूसरे सम्प्रदाय के लोग कहते हैं कि वाक्य से ही अर्थ का बोध होता है । तो फिर इस प्रसङ्ग में क्या होना उचित है ? (प्र.) स्फोट से ही अर्थ की प्रतीति उचित है; क्योंकि पदों का समूह ही वाक्य है; एवं वर्णों का समूह ही पद है, इस वस्तुस्थिति के अनुसार वाक्य के अर्थबोध का होना सम्भव नहीं है । (विशदार्थ यह है कि वाक्य के ) हर एक वर्ण अर्थविषयक बोध के उत्पादक नहीं हैं; क्योंकि ऐसा मानने पर उनमें से किसी एक ही वर्ण से अर्थ- विषयक बोध का सम्पादन हो जाएगा, फिर अवशिष्ट वर्णों का प्रयोग व्यर्थ हो जाएगा । वर्णों का एक समुदाय होना सम्भव ही नहीं है; क्योंकि अन्तिम वर्ण के

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६५१

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६५१ न्यायकन्दली इति चेत् ? यदि हि स्मृतिरपि क्रमभाविनी ? तदा नास्ति वर्णसाहित्यम्, तृतीयवर्ण- ग्रहणकाले प्रथमवर्णस्मृतिविलोपात्, युगपदुत्पादस्तु स्मृतीनामनाशङ्कनीय एव, ज्ञानयौग- पद्यप्रतिषेधात् । अथ प्रथममाद्यवर्णज्ञानम्, तदनु संस्कारः, तदनु तृतीयवर्णज्ञानम्, तेन प्राक्तनेन संस्का- रेणान्यो विशिष्टः संस्कारो जन्यत इत्यनेन क्रमेणान्ते निखिलवर्णविषयः संस्कारो जातो निखिलवर्णविषयामेकामेव स्मृतिं युगपत् करोतीत्याश्रीयते, तदा क्रमो हीयते । क्रमो हि पौर्वाप- र्यम्, तच्च देशनिबन्धनं कालनिबन्धनं वा स्यात्, उभयमपि तद्वर्णेषु नावकाशं लभते, तेषां सर्व- प्रत्यक्ष के समय पूर्व के सभी वर्णों का रहना सम्भव नहीं है । (प्र.) वर्ण तो नित्य हैं, अतः सभी समयों में उनकी सत्ता सम्भावित है सुतरां वर्णों का समुदाय असम्भव नहीं है । (उ.) फिर भी किसी एक समय में सभी वर्णों का ग्रहण सम्भव नहीं है । वर्ण गृहीत होकर ही अर्थप्रत्यय के कारण हैं । यदि वर्ण स्वरूपतः अर्थप्रत्यय के कारण हों, तो फिर उनसे सर्वदा अर्थ की प्रतीति होनी चाहिए; क्योंकि एक बार ज्ञात वर्ण के अज्ञान में और वर्णों के सर्वथा अज्ञान में कोई अन्तर नहीं है । अतः इस प्रकार भी वर्णसमूह से सर्वप्रत्यय का उपपादन नहीं किया जा सकता । (प्र.) पद या वाक्य के जितने वर्ण पहले ज्ञात हैं, वे सभी पुनः स्मृतिपथ में आकर अर्थबोध का उत्पादन करते हैं । (उ.) (इस प्रसङ्ग में पूछना है कि पद या वाक्य के प्रत्येक वर्ण की अलग-अलग स्मृति होती है ? या सभी वर्णों का एक ही स्मरण होता है ?) इनमें यदि यह प्रथमपक्ष मानें कि पद या वाक्य के प्रत्येक वर्ण की स्मृति क्रमशः होती है, तो फिर स्मृति में भी वर्णों का एकत्र होना सम्भव नहीं है; क्योंकि तीसरे वर्ण की स्मृति के समय प्रथम वर्ण की स्मृति अवश्य ही विनष्ट हो जाएगी । प्रत्येक वर्णविषयक सभी स्मृतियों का एक ही समय उत्पन्न होना तो सम्भव ही नहीं है; क्योंकि एक समय अनेक ज्ञानों की उत्पत्ति नहीं हो सकती । यदि इस प्रकार की कल्पना करें कि (प्र.) पहले प्रथम वर्ण का ज्ञान होता है, उसके बाद उस वर्णविषयक संस्कार की उत्पत्ति होती है, उसके बाद तृतीय वर्ण का ज्ञान, इसके बाद उसी क्रम से पहले-पहले के संस्कारों से अन्तिम वर्णविषयक विशेष प्रकार के संस्कार की उत्पत्ति होती है । अन्त में सभी वर्णों के इस एक ही संस्कार से एक ही समय सभी वर्णविषयक एक ही स्मृति की उत्पत्ति होती है । (उ.) तो फिर वर्णों में क्रम ही नहीं रह जाएगा; क्योंकि पूर्वापरीभाव (एक के बाद दूसरा) को ही क्रम कहते हैं । यह क्रम दो प्रकारों से सम्भव है- (१) देशमूलक और (२) कालमूलक । वर्णों में इन दोनों में से एक भी प्रकार के क्रम की सम्भावना नहीं है; क्योंकि वर्ण व्यापक हैं, इसलिए दैशिक पूर्वापरीभाव- रूप क्रम सम्भव नहीं है । वर्ण नित्य (अविनाशी) हैं, इसीलिए कालिक पूर्वापरीभाव की सम्भावना भी नहीं है । अतः वर्णों में क्रम की उपपत्ति का एक ही मार्ग बच

६५२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे स्फोट- न्यायकन्दली गतत्यान्नित्यत्वाच्च । बुद्धिक्रमनिबन्धनस्तु वर्णानां क्रमो भवेत्, स चैकस्यां स्मृतिबुद्धौ परिवर्तमानानां प्रत्यस्तमित इत्यक्रमाणांमेव प्रतिपादकत्वम् । अतश्च सरो रसो वनं नवं नदी दीनेत्यादिष्वर्थभेदप्रत्ययो न स्यात्, वर्णानामभेदात्, क्रमस्य प्रतीत्यनङ्गत्याच्च । अस्ति चायं प्रतीतिभेदः सवर्णेष्वनुपपद्यमानः ? तर्हातिरिक्तं निमित्तान्तरमाक्षिपतीति स्फोटसिद्धिः । ननु स्फोटोऽपि नानभिव्यक्तोऽर्थं प्रतिपादयति, सर्वदार्थोपलब्धिप्रसङ्गात् । अभि- व्यक्तिश्च न तस्य वर्णैभ्यः सम्भवति, उक्तेन न्यायेन तेषामेकैकतः समुदितानां वासा- मर्थ्यात्, तस्मात् स्फोटादपि दुर्लभा अर्थप्रतीतिः । अत्र वदन्ति । प्रयत्नभेदानुपातिनो वायवीया ध्वनयः प्रत्येकमेव तद्वर्णा- त्मकतया स्फोटमस्फुटमभिव्यञ्जयन्तः पूर्वं विषयसंस्कारसाचिव्यलाभादन्ते स्फोटमाभासयन्ते । तथा चान्ते प्रत्यस्तमितनिखिलवर्णविभागोल्लेखक्रमम- जाता है कि बुद्धिक्रम के अनुसार वर्णों का क्रम मानें; किन्तु सभी वर्णों का एक ही संस्कार मान लेने से वह मार्ग भी अवरुद्ध हो जाता है । अतः इस पक्ष में यह आपत्ति आ खड़ी होती है कि 'बिना क्रम के ही वर्णों से अर्थ का बोध होता है' । जिससे 'सर' शब्द से और 'रस' शब्द से, एवं 'वन' शब्द से और 'नव' शब्द से अथवा 'नदी' शब्द से और 'दीन' शब्द से समानविषयक बोधों की आपत्ति होगी; क्योंकि दोनों शब्दों के वर्ण समान ही हैं, क्रम को बोध का करण मान नहीं सकते; किन्तु उन दोनों शब्दों के समुदायों में से प्रत्येक पद के द्वारा विभिन्न बोध ही होता है । अतः समान वर्ण के उक्त पदों से विभिन्न प्रकार की उक्त प्रतीति की उपपत्ति स्फोट के बिना नहीं हो सकती, अतः 'स्फोट' का मानना आवश्यक है । (प्र.) स्फोट भी तो ज्ञात होकर ही अर्थविषयक बोध का उत्पादन कर सकता है, यदि ऐसा न मानें, स्वरूपतः ही स्फोट को अर्थबोध का कारण मानें तो सर्वदा अर्थविषयक बोध की आपत्ति होगी । (अब यह देखना है कि स्फोट की अभिव्यक्ति किससे होती है ?) वर्णों से स्फोट की अभिव्यक्ति सम्भव नहीं है; क्योंकि पद या वाक्य के प्रत्येक वर्ण से यदि स्फोट की अभिव्यक्ति मानेंगे, तो अवशिष्ट वर्ण ही व्यर्थ हो जायेंगे । यदि वर्णसमुदाय से स्फोट की अभिव्यक्ति मानें, तो सो भी सम्भव नहीं है; क्योंकि सभी वर्णों में दैशिक या कालिक साहित्य सम्भव ही नहीं है । तस्मात् स्फोट से भी अर्थ का बोध सम्भव नहीं है । इस आक्षेप के प्रसङ्ग में स्फोट से अर्थबोध माननेवालों का कहना है कि स्फोट पहले से ही रहते हैं; किन्तु अनभिव्यक्त रहते हैं; किन्तु तत्तद्वर्णों के उच्चारण के उक्त प्रयत्न से निष्पन्न (कौष्ठ्य) वायु की ध्वनियाँ उक्त अनभिव्यक्त स्फोट को ही पहले तत्तद्वर्ण स्वरूप से अस्फुट रूप में अभिव्यक्त करती हुई पश्चात् अर्थविषयक संस्कार की सहायता से अतिस्फुट रूप से भी अभिव्यक्त करती हैं । यही कारण है कि अन्त में वर्णों के अलग-अलग स्वरूप नहीं रह जाते एवं वर्णों का अलग-अलग उल्लेख भी नहीं रह जाता, इन सबों से अलग

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६५३

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६५३ न्यायकन्दली नवयवमेकं विस्पष्टमर्थतत्त्वमनुभूयते । यदि हि वर्णा एव पदम् ? न तदेकबुद्धि- निर्ग्राह्यमिति अनालम्बना बुद्धिः पर्यवस्यति । 'शब्दादर्थं प्रतिपद्यामहे' इति च व्यपदेशो न घटते । तस्माद् वर्णव्यतिरिक्तः कोऽपि सम्भवत्येको यस्मादर्थः स्फुटीभवतीति । एवं प्राप्तेऽभिधीयते । गुणरत्नाभरणः कायस्थकुलतिलकः पाण्डुदासइत्यादिषु पदेषूच्चार्यमाणेषु क्रमभाविनो वर्णाः परं प्रतीयन्ते न त्वन्ते वर्णव्यतिरिक्तस्य कस्यचिदर्थस्य संवेदनमस्ति । यदि हि तस्य पूर्वं वर्णात्मकतया संविदितस्यान्ते स्वरूपसंवेदनम्, पूर्वज्ञानस्य मिथ्यात्वमवसीयते रजतज्ञानस्येव शुक्तिकासंवित्तौ । न चैवं प्रतिपत्तिरस्ति 'नायं वर्णः, किन्तु स्फोटः' इति । या चेयमेकार्थावमर्शिनी बुद्धिः, सापि नार्थान्तरमवभासयति किन्तु वन- एक सम्पूर्ण और अत्यन्त स्पष्ट अर्थतत्त्व का बोध होता है । यदि वर्णों का समुदाय ही पद हो (वर्णों का कोई एक स्फोट न हो) तो फिर पद में एकत्व की प्रतीति न हो सकेगी, अतः 'एकं पदम्' इत्यादि बुद्धियाँ निर्विषयक हो जायेंगी । एवं 'शब्दाद् अर्थं प्रतिपद्यामहे' (एक अखण्ड शब्द से अर्थ को हम समझते हैं) यह व्यवहार न हो सकेगा (किन्तु 'बहुत से शब्दों से हम अर्थ को समझते हैं' इस प्रकार का व्यवहार होगा) । अतः वर्णों से भिन्न कोई एक वस्तु है, जिससे अर्थ 'प्रस्फुटित' होता है (उसी की अन्वर्थसंज्ञा 'स्फोट' है ) । इन सब युक्तियों से स्फोट की सत्ता की सम्भावना उपस्थित होने पर सिद्धान्तियों का कहना है कि 'गुणरत्नाभरणः कायस्थकुलतिलकः पाण्डुदासः' (अर्थात् पाण्डुदास कायस्थ कुल के तिलकरूप हैं एवं गुणरूपी रत्न ही उनके भूषण हैं) इन सब वाक्यों के उच्चारण करने पर क्रमशः उत्पन्न होनेवाले वर्णों की ही प्रतीति होती है; किन्तु उच्चारण के अन्त में इन वर्णों से भिन्न किसी (स्फोट रूप) अर्थ का भान नहीं होता है । यदि ऐसा कहें कि (प्र.) प्रथमतः वर्ण का जो भान होता है, वह वस्तुतः स्फोट का ही वर्णरूप से भान होता है और अन्त में स्फोट का स्फोटत्वरूप से भान होता है । (उ.) तो फिर जैसे कि शुक्तिका में रजत ज्ञान को मिथ्या मानना पड़ता है, वैसे ही स्फोट में वर्णविषयक प्रथम ज्ञान को मिथ्या ही मानना पड़ेगा । (किन्तु आगे) यह बाधज्ञान भी नहीं होता कि 'ज्ञात होनेवाला यह वर्ण नहीं है, किन्तु स्फोट है' । वर्णों के समुदाय में जो एकत्व की प्रतीति होती है, उस प्रतीति का भी विषय उन वर्णों के समुदाय से भिन्न कुछ भी नहीं है, जैसे कि 'यह वन है' इस प्रतीति का विषय वृक्षसमुदाय से भिन्न स्वतन्त्र वन नाम की कोई वस्तु नहीं है । 'शब्दादर्थं प्रतिपद्यामहे' यह पञ्चमी एकवचन से युक्त वाक्य का प्रयोग भी उन वर्णों के समुदाय को ही एक वस्तु मानकर किया जाता है । प्रत्यक्ष के द्वारा जिसका सर्वथा ज्ञान होना ही असम्भव है, उस (स्फोट) का अन्य प्रमाणों के द्वारा निरूपण सम्भव नहीं है; क्योंकि उसके ज्ञान का कोई दूसरा उपाय

६५४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे स्फोट- न्यायकन्दली प्रत्ययवद् वर्णसमुदायमात्रमवलम्बते । 'शब्दादर्थं प्रतिपद्यामहे' इति वर्णसमुदायमेवोरी- कृत्य लोकः प्रयुङ्क्ते । न च प्रत्यक्षेणाप्रतीयमानः प्रमाणान्तरतः शक्यो निरूपयितुम्, उपायाभावात् । अर्थप्रतीत्यन्यथानुपपत्तिस्तदुपाय इति चेत् ? किमप्रतीयमानः स्फोटोऽर्थाधिगमे हेतुः समर्थितो भवद्भिः ? प्रतीयमानो वा ? अप्रतीयमानस्य हेतुत्वे सर्वदार्थप्रतीतिप्रसङ्गः । प्रतीतिश्च तस्य नास्तीत्युक्तम्, अर्थप्रत्ययो वर्णानामेव तद्भावभावितामनुगच्छति, तेनैषामेव वरं व्युत्पत्त्यनुसारेणार्थप्रतिपादने कश्चिदुपाय आश्रीयताम्, न पुनरप्रतीयमानस्य गगन- कुसुमस्येव कल्पना युक्ता । न चेदं वाच्यं वर्णानां प्रतिपादकत्वे क्रमभेदे कर्तृभेदे व्यवधाने च प्रतीतिप्रसङ्ग इति । न हि ते विपरीतक्रमाः कर्तृभेदानुपातिनो देशकालव्यवहितास्त- दर्थधियः कारणम्, कार्योन्नेया हि शक्तयो भावानाम्, यथा तेभ्यः कार्यं दृश्यते, तथैव तेषां शक्तयः कल्प्यन्ते । यथोपद्दिशन्ति सन्तः - यावन्तो यादृशा ये च यदर्थप्रतिपादने । वर्णाः प्रज्ञातसामर्थ्यास्ते तथैवावबोधकाः ॥ इति । ही नहीं है । अर्थ की प्रतीति से वर्णों में ही उसके अन्वय और व्यतिरेक का आक्षेप होता है, अतः वर्णों से ही अर्थ की प्रतिपत्ति के लिए कोई उपाय ढूँढ़ निकालना ही युक्त है । यह अनुचित है कि इसके लिए आकाश-कुसुम की तरह सर्वथा अप्रतीत होनेवाले किसी (स्फोट रूप) अर्थ की कल्पना की जाय । (वर्णों से ही अर्थ का बोध मानने के पक्ष में) इन दोषों का उद्भावन करना अयुक्त है कि (प्र.) (वर्णों से ही यदि अर्थ की प्रतीति हो तो) (१) विभिन्न क्रम से पठित शब्दों से अर्थात् रस सर, वन नव, नदी दीन प्रभृति शब्दयुगलों से समान अर्थविषयक बोध की आपत्ति होगी; क्योंकि दोनों में समान ही वर्ण हैं । (२) एवं विभिन्न कर्त्ताओं से उच्चरित विभिन्न वर्णों से (अर्थात् देवदत्त से उच्चरित 'घ' और यज्ञदत्त से उच्चरित 'ट' शब्द से घटविषयक) बोध की आपत्ति होगी । एवं (३) व्यवहित वर्णों से (अर्थात् 'घ' के उच्चारण के बाद ककारादि वर्णों का उच्चारण और उसके बाद उच्चरित 'ट' वर्ण से) घटविषयक बोध की आपत्ति होगी । (उ.) ये आपत्तियाँ इसलिए नहीं हैं कि उक्त विभिन्न क्रमों से पठित या विभिन्न कर्त्ताओं से पठित या व्यवहित होकर पठित वर्णों को समान अर्थविषयक बोध का कारण ही नहीं मानते; क्योंकि किस प्रकार की वस्तुओं में किसकी कारणता है ? यह केवल कार्य से ही अनुमान किया जा सकता है । जिन वस्तुओं से जिन प्रकार के कार्यों की उत्पत्ति देखी जाती है, उन वस्तुओं को ही उन कार्यों का कारण माना जाता है । जैसा कि विद्वानों का उपदेश है कि "जितने एवं जिन वर्णों के जिस प्रकार के विन्यास में जिन अर्थों के बोध का सामर्थ्य (कार्य से) निश्चित है,

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६५५

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६५५ न्यायकन्दली सर्वगतत्वान्नित्यत्वाच्च वर्णानां क्रमभावः । अत एव नदीदीनेत्यादिष्वर्थभेदः, क्रमभेदात् । वर्णेषु क्रमो नास्ति स कथमेषामङ्गं स्यादिति चेत्, न, तेषामुत्पत्तिभाजा- मव्याप्यवृत्तीनां देशकालकृतस्य पौर्वापर्यस्य सम्भवात् । यच्चेदमूक्तम्- प्रत्येकशः समुदितानां च न सामर्थ्यमिति, तदपि न परस्य मतमालोचितम् । यद्यपि वर्णा अनवस्थायिनस्त- थापि तद्विषयाः क्रमभाविनः संस्काराः सम्भूय पदार्थधियमातन्वते । यद्वा पूर्ववर्ण- वे ही वर्ण उसी विन्यास-क्रम से उस अर्थ के बोधक हैं।" अत एव इसी क्रमभेद के कारण नदी शब्द से और दीन शब्द से विभिन्न विषयक बोध होते हैं । (प्र.) वर्ण नित्य और व्यापक हैं, अतः उनका क्रम ही सम्भव नहीं है, फिर शब्दों का क्रम शब्दबोध का अङ्ग कैसे होगा ? (उ.) 1 नहीं, ऐसी बात नहीं है; क्योंकि वर्ण उत्पत्तिशील हैं और अव्याप्यवृत्ति हैं (अर्थात् अपने आश्रयीभूत आकाश में कहीं किसी प्रदेश में रहते हैं और किसी प्रदेश में नहीं) अतः उनमें कालिक और दैशिक दोनों ही प्रकार के क्रम हो सकते हैं । यह जो कहा गया था कि (प्र.) पद या वाक्यघटक प्रत्येक वर्ण में अर्थबोध की हेतुता मानने से अवशिष्ट वर्णों का प्रयोग व्यर्थ हो जाएगा एवं वर्णों के समुदाय में अर्थबोध की जनकता सम्भव नहीं है; क्योंकि सभी वर्णों की कहीं एकत्र स्थिति ही सम्भव नहीं है फिर उनका समुदाय ही कैसा ? इस प्रकार वर्ण न प्रत्येकशः ही अर्थबोध के कारण हो सकते हैं, न समूहापन्न होकर ही (अतः स्फोट ही अर्थबोध

  1. यहाँ मुद्रित न्यायकन्दली पुस्तक का पाठ कुछ अशुद्ध और व्यस्त मालूम पड़ता है । 'एवं प्राप्तेऽभिधीयते' इत्यादि वाक्यों से स्फोट का खण्डन और 'वाक्य से ही अर्थबोध की उत्पत्ति का सिद्धान्त' उपपादित हुआ है, जिसका उपसंहार 'यावन्तो यादृशाः' इत्यादि श्लोकवार्त्तिक के श्लोक को उद्धृत कर किया गया है । इसके बाद 'सर्वगतत्वान्नित्यत्वाच्च वर्णानां क्रमभावः' ऐसी पङ्क्ति है । यहीं कुछ त्रुटि मालूम होती है; क्योंकि वर्णों का सर्वगतत्व उनके क्रमभाव का बाधक है, जिसका अनुपद ही 'क्रमो हि पौर्वापर्यम्' इत्यादि से उपपादन किया गया है । तदनुसार वर्णों का असर्वगतत्व और अनित्यत्व ये ही वर्णों के क्रमभाव के ज्ञापक होंगे । अतः उक्त पङ्क्ति को यदि सिद्धान्तपक्षीय मानें तो 'सर्वगतत्वात्' इत्यादि पाठ के स्थान पर उसके विरुद्ध 'अनित्यत्वादसर्वगतत्वाच्च वर्णानां क्रमभावः' ऐसा पाठ मानना पड़ेगा । दूसरा उपाय वह है कि उक्त पङ्क्ति को सिद्धान्तपक्षीय न मानकर पूर्वपक्षीय ही मान लें और उस वाक्य के 'क्रमभावः' इस पद को 'क्रमाभावः' में परिवर्तित कर दें । तदनुसार "सर्वगतत्वान्नित्यत्वाच्च वर्णानां क्रमाभावः अत एव" इतने अंश को 'वर्णेषु क्रमो नास्ति' इस पूर्वपक्षवाक्य के पहले पाठ करें एवं 'यावन्तो यादृशा ये च' इस श्लोक के नीचे सिद्धान्त पक्ष का 'नदीदीनेत्यादिष्वर्थभेदः क्रमात्' इतना ही रक्खें । इनमें द्वितीय पक्ष के अनुसार ही मैंने अनुवाद किया है ।

६५६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे संस्कार- प्रशस्तपादभाष्यम् प्रयत्नेन मनश्चक्षुषि स्थापयित्वाऽपूर्वमर्थं दिदृक्षमाणस्य विद्युतस्- प्रयत्न के द्वारा मन को चक्षु में सम्बद्ध कर विशेष प्रकार की वस्तु को देखने न्यायकन्दली संस्कारस्मरणयोरन्यतरसापेक्षोऽन्त्यो वर्णः प्रत्यायकः, यथा चानेकसंस्काराः सम्भूय स्मरणं जनयन्ति तथोपपादितं द्वित्वे । अथ मन्यसे वर्णविषयात् संस्कारादर्थप्रतीतिरयुक्ता, संस्कारा हि यद्विषयोपलम्भसम्भावितजन्मानस्तद्विषयानेव स्मृतिमाधातुमीशते न कार्यान्तरम् । यथाह मण्डनः स्फोटसिद्धौ- संस्काराः खलु यद्वस्तुरूपप्रख्याविभाविताः । फलं तत्रैव जनयन्त्यतोऽर्थे धीर्न कल्प्यते ॥ इति । तदप्यसमीचीनम् । यतः पदार्थप्रतीत्यनुगुणतया प्रत्येकमनुभवैराधीय- माना वर्णविषयाः संस्काराः स्मृतिहेतुसंस्कारविलक्षणशक्तय एवाधीयन्ते, के कारण हैं, वर्ण नहीं) । (उ.) यह कहना भी वर्ण को ही अर्थबोध का कारण माननेवाले प्रतिपक्षी के मत की आलोचना किये बिना ही मालूम होता है । यह ठीक है कि वर्ण चिरस्थायी नहीं हैं (क्षणिक हैं), फिर क्रमशः उत्पन्न उनके सभी संस्कार मिलकर पदार्थविषयक बोध को उत्पन्न करेंगे । अथवा ऐसा भी कह सकते हैं कि पहले-पहले वर्ण के संस्कार अथवा पहले-पहले वर्ण की स्मृति इन दोनों में से किसी एक के साहाय्य से केवल अन्तिम वर्ण से भी अर्थ का बोध मान सकते हैं । अनेक संस्कार मिलकर एक ही स्मरण का जिस रीति से सम्पादन करते हैं, वह रीति द्वित्वनिरूपण के प्रसङ्ग में लिख आये हैं । यदि यह कहना चाहते हों कि (प्र.) जिस विषयक अनुभव से जिस संस्कार की उत्पत्ति होगी, वह संस्कार उसी विषयक स्मृति को उत्पन्न कर सकता है, जिससे एक विषयक संस्कार से अपर विषयक स्मृतिरूप भी दूसरा कार्य नहीं हो सकता । अतः वर्णविषयक संस्कार से अर्थविषयक बोधरूप दूसरे कार्य की उत्पत्ति कैसे होगी ? (क्योंकि वर्णविषयक संस्कार से तो वर्णविषयक स्मृतिरूप कार्य ही उत्पन्न हो सकता है) । जैसा कि आचार्य मण्डन ने अपने 'स्फोटसिद्धि' नामक ग्रन्थ में कहा है कि 'संस्कार जिन विषयों की 'प्रख्या' अर्थात् अनुभव से उत्पन्न होंगे, उन्हीं विषयों में वे स्मृति को उत्पन्न कर सकते हैं, अतः वर्णविषयक संस्कारों से अर्थविषयक 'धी' अर्थात् बोध उत्पन्न नहीं हो सकता । (उ.) किन्तु यह कहना भी ठीक नहीं है; क्योंकि (अन्यत्र स्मृति और संस्कार के कार्यकारणभाव में समानविषयत्व का नियम यद्यपि ठीक है; तथापि) पदों में या वाक्यों में प्रयुक्त होनेवाले वर्णों के हर एक अनुभव से आत्मा में जिस संस्कार का आधान होता है, वह संस्कार स्मृति के कारणीभूत संस्कारों से कुछ विलक्षण प्रकार का होता है, जिस संस्कार में पद के अर्थविषयक अनुभव कराने की शक्ति होती है, उस संस्कार के कार्य

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६५७

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६५७ प्रशस्तपादभाष्यम् म्पातदर्शनयदादरप्रत्ययः, तमपेक्षमाणादात्ममनसोः संयोगात् संस्कारातिशयो जायते । यथा देवह्रदे रजतसौवर्णपद्मदर्शनादिति । की इच्छावाले पुरुष को विद्युत् सम्पात के देखने की तरह (उक्त विशेष वस्तु में) आदरबुद्धि उत्पन्न होती है। इस आदरबुद्धि एवं आत्मा और मन के संयोग, इन दोनों से विशेष प्रकार का संस्कार उत्पन्न होता है । जैसे देवताओं के सरोवर में चाँदी और सोने के कमलफूल देखने से (विशेष प्रकार का संस्कार उत्पन्न होता है) । न्यायकन्दली तथाभूतानामेव तेषां कार्येणाधिगमात् । सन्तु वा भावनारूपाः संस्कारास्तथापि तेषामर्थ- प्रतिपादनसामर्थ्यमुपपद्यते, तद्भावभावित्वात् । यो हि स्फोटं कल्पयति, तेन स्फोटस्यार्थ- प्रतिपादनशक्तिरपि कल्पनीयेति कल्पनागौरवम् । उभयसिद्धस्य संस्कारस्य सामर्थ्यमात्र- कल्पनायां लाघवमस्तीत्येतदेव कल्पयितुमुचितम् । यथोक्तं न्यायवादिभिः - यद्यपि स्मृतिहेतुत्वं संस्कारस्य व्यवस्थितम् । कार्यान्तरेऽपि सामर्थ्यं न तस्य प्रतिहन्यते ॥ इति । तदेवं वर्णेभ्य एव संस्कारद्वारेणार्थप्रत्ययसम्भवादयुक्ता स्फोटकल्पनेति । से ऐसा ही निश्चय करना पड़ता है । मान लिया कि वह भावनाख्य संस्कार है (जिससे सामान्य नियम के अनुसार समानविषयक स्मृति ही हो सकती है), तथापि पदार्थबोध के साथ उसके अन्वय (और व्यतिरेक) से इस संस्कार में अर्थ का प्रतिपादन करने की शक्ति की कल्पना अयुक्त नहीं कही जा सकती । जो कोई स्फोट नाम की अतिरिक्त वस्तु की कल्पना करते हैं, उन्हें उस वस्तु की कल्पना और स्फोट नाम की उस वस्तु में अर्थबोध के सामर्थ्य की कल्पना, ये दो कल्पनायें करनी पड़ती हैं । स्फोट न माननेवाले को वर्णविषयक संस्कार में अर्थविषयक बोध के सामर्थ्यरूप धर्म की कल्पना करनी पड़ती है; क्योंकि वर्णविषयक संस्काररूप धर्मी को तो दोनों पक्षों को मानना ही है । अतः लाघव की दृष्टि से भी वर्णों से ही अर्थविषयक बोध का मानना उचित है । जैसा कि न्यायवादियों ने (भट्टकुमारिल ने) कहा है कि "यद्यपि यह निर्णीत है कि संस्कार स्मृति का कारण है, फिर भी उसमें दूसरे कार्य की शक्ति का निराकरण नहीं किया जा सकता" । तस्मात् वर्णों से ही उनके संस्काररूप व्यापार के द्वारा अर्थबोध हो सकता है, अतः स्फोट की कल्पना अयुक्त है ।

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६५७ प्रशस्तपादभाष्यम् म्पातदर्शनवदादरप्रत्ययः, तमपेक्षमाणादात्ममनसोः संयोगात् संस्कारातिशयो जायते । यथा देवह्रदे राजतसौवर्णपद्मदर्शनादिति । की इच्छावाले पुरुष को विद्युत् सम्पात के देखने की तरह (उक्त विशेष वस्तु में) आदरबुद्धि उत्पन्न होती है। इस आदरबुद्धि एवं आत्मा और मन के संयोग, इन दोनों से विशेष प्रकार का संस्कार उत्पन्न होता है । जैसे देवताओं के सरोवर में चाँदी और सोने के कमलफूल देखने से (विशेष प्रकार का संस्कार उत्पन्न होता है) । न्यायकन्दली तथाभूतानामेव तेषां कार्येणाधिगमात् । सन्तु वा भावनारूपाः संस्कारास्तथापि तेषामर्थ- प्रतिपादनसामर्थ्यमुपपद्यते, तद्भावभावित्वात् । यो हि स्फोटं कल्पयति, तेन स्फोटस्यार्थ- प्रतिपादनशक्तिरपि कल्पनीयेति कल्पनागौरवम् । उभयसिद्धस्य संस्कारस्य सामर्थ्यमात्र- कल्पनायां लाघवमस्तीत्येतदेव कल्पयितुमुचितम् । यथोक्तं न्यायवादिभिः - यद्यपि स्मृतिहेतुत्वं संस्कारस्य व्यवस्थितम् । कार्यान्तरेऽपि सामर्थ्यं न तस्य प्रतिहन्यते ॥ इति । तदेवं वर्णेष्व एव संस्कारद्वारेणार्थप्रत्ययसम्भवादयुक्ता स्फोटकल्पनेति । से ऐसा ही निश्चय करना पड़ता है । मान लिया कि वह भावनारूप संस्कार है (जिससे सामान्य नियम के अनुसार समानविषयक स्मृति ही हो सकती है), तथापि पदार्थबोध के साथ उसके अन्वय (और व्यतिरेक) से इस संस्कार में अर्थ का प्रतिपादन करने की शक्ति की कल्पना अयुक्त नहीं कही जा सकती । जो कोई स्फोट नाम की अतिरिक्त वस्तु की कल्पना करते हैं, उन्हें उस वस्तु की कल्पना और स्फोट नाम की उस वस्तु में अर्थबोध के सामर्थ्य की कल्पना, ये दो कल्पनायें करनी पड़ती हैं । स्फोट न माननेवाले को वर्णविषयक संस्कार में अर्थविषयक बोध के सामर्थ्यरूप धर्म की कल्पना करनी पड़ती है; क्योंकि वर्णविषयक संस्काररूप धर्मी को तो दोनों पक्षों को मानना ही है । अतः लाघव की दृष्टि से भी वर्णों से ही अर्थविषयक बोध का मानना उचित है । जैसा कि न्यायवादियों ने (भट्टकुमारिल ने) कहा है कि "यद्यपि यह निर्णीत है कि संस्कार स्मृति का कारण है, फिर भी उसमें दूसरे कार्य की शक्ति का निराकरण नहीं किया जा सकता" । तस्मात् वर्णों से ही उनके संस्काररूप व्यापार के द्वारा अर्थबोध हो सकता है, अतः स्फोट की कल्पना अयुक्त है ।

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६५९

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६५९ प्रशस्तपादभाष्यम् भुग्नसंवर्तितेषु स्थितिस्यापकस्य कार्यं संलक्ष्यते । नित्यानित्यत्व- निष्पत्तयोऽस्यापि गुरुत्ववत् । कार्यरूप धनुष, शाखा, शृङ्ग, दाँत, अस्थि, सूत्र एवं वस्त्र प्रभृति वस्तुओं को सीधा होने पर लक्षित होता है । गुरुत्व के सदृश ही इसके नित्यत्व और अनित्यत्व के प्रसङ्ग में भी जानना चाहिए । न्यायकन्दली माख्यातुं तुशब्दः । ये घना निविडा अवयवसंनिवेशविशिष्टेषु स्पर्शवत्सु द्रव्येषु वर्तमानः स्थितिस्यापकः स्वाश्रयमन्यथाकृतमवनमितं यथावत् स्थापयति पूर्ववदृजुं करोति । ये प्रत्यक्षतोऽनुपलम्भात् स्थितिस्यापकस्याभावमिच्छन्ति तान् प्रति तस्य कार्येण सद्भावं दर्शयन्नाह-स्थावरजङ्गमविकारेष्विति । भुग्नाः कुब्जीकृताः संवर्तिताः पूर्वावस्थां प्रापिताः, भुग्नाश्च ते संवर्तिताश्चेति भुग्नसंवर्तिताः, तेषु स्थितिस्यापकस्य कार्यं लक्ष्यते । किमुक्तं स्यात् ? धनुःशाखादिष्ववनमितविमुक्तेषु यत् पूर्वावस्थाप्राप्तिहेतोराद्यस्य कर्मण एकार्थसमवेतमसमवायिकारणं स स्थितिस्यापकः संस्कारः, अन्यस्यासम्भवात् । अन्ये तु भुग्नसंवर्तितेष्विति सूत्रवस्त्रादिष्विति अस्यैव विशेषणमिति मन्यमाना भुग्नानि संस्कार स्पर्श से युक्त द्रव्यों का गुण है, आश्रयों के (अस्पर्शवत्त्व और स्पर्शवत्त्व) इन दोनों अन्तर के द्वारा दोनों संस्कारों में अन्तर दिखलाने के लिए प्रकृत सन्दर्भ में 'तु' शब्द का प्रयोग किया गया है । अवयवों के 'घन' अर्थात् कठिन संनिवेशयुक्त स्पर्शवाले द्रव्य में विद्यमान 'स्थितिस्यापक' संस्कार 'अन्यथाकृत' अर्थात् नमाये हुए अपने आश्रयभूत द्रव्य को 'यथावत्स्थापन' अर्थात् पहले की तरह सीधा कर देता है । जो समुदाय प्रत्यक्ष न होने के कारण 'स्थितिस्यापक' संस्कार को मानना ही नहीं चाहते, उन्हें कार्यहेतुक अनुमान के द्वारा स्थितिस्यापक संस्कार की सत्ता को समझाने के लिए ही 'स्थावरजङ्गमविकारेषु' इत्यादि सन्दर्भ लिखा गया है । 'भुग्न' शब्द का अर्थ है टेढ़ा किया हुआ (तिर्यक्कृत) और 'संवर्तित' शब्द का अर्थ है पहली अवस्था को प्राप्त । प्रकृत सन्दर्भ का 'भुग्न- संवर्तितेषु' पद 'भुग्नाश्च ते संवर्तिताश्च भुग्नसंवर्तिताः, तेषु' इस प्रकार के समास से निष्पन्न है । इस शब्द के द्वारा स्थितिस्यापक संस्कार से उत्पन्न कार्य दिखलाये गये हैं । इससे फलितार्थ क्या निकला ? यही कि धनुष या वृक्ष की डाल प्रभृति जब अवनमित होकर फिर जिन क्रियाओं के द्वारा पहली अवस्था को प्राप्त होते हैं, उन क्रियाओं में से पहली क्रिया का असमवायिकारण एवं उस क्रिया के साथ (उसके आश्रयरूप) एक अर्थ में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाला संस्कार ही 'स्थितिस्यापक संस्कार' है; क्योंकि अवनमित शाखादि की पुनः पूर्वावस्था की प्राप्ति का कोई दूसरा कारण नहीं हो सकता । कुछ अन्य लोग इस सन्दर्भ के 'भुग्नसंवर्तितेषु' इस पद को इसी सन्दर्भ के 'सूत्रवस्त्रादिषु' का विशेषण

६६० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे धर्म- प्रशस्तपादभाष्यम् धर्मः पुरुषगुणः । कर्तुः प्रियहितमोक्षहेतुः, अतीन्द्रियोऽन्त्यसुखसंविज्ञान- विरोधी पुरुषान्तःकरणसंयोगविशुद्धाभिसन्धिजः, वर्णाश्रमिणां प्रतिनियत- साधननिमित्तः । तस्य तु साधनानि श्रुतिस्मृतिविहितानि वर्णाश्रमिणां सामान्य- विशेषभावेनावस्थितानि द्रव्यगुणकर्माणि । धर्म पुरुष (जीवात्मा) का गुण है । वह अपने उत्पादक जीव के प्रिय, हित और मोक्ष का कारण है एवं अतीन्द्रिय है । अन्तिम सुख और तत्त्वज्ञान इन दोनों से इसका नाश होता है । पुरुष और अन्तःकरण (मन) के संयोग और संकल्प इन दोनों से इसकी उत्पत्ति होती है । वर्णों और आश्रमियों के लिए विहित कर्म (भी) उसके साधन हैं । वेद एवं धर्मशास्त्रादि ग्रन्थों में वर्णों और आश्रमियों के साधारण धर्मों और विशेष धर्मों के साधन के लिए कहे गये द्रव्य, गुण और कर्म भी इसके कारण हैं । न्यायकन्दली यानि सूत्रादीनि संवर्तितानि तेष्विति व्याचक्षते । तस्य नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयो गुरुत्ववत् । यथा गुरुत्वं परमाणुषु नित्यं कार्येष्वनित्यं कारणगुणपूर्वकं च, तथा स्थितिस्थापकोऽ- पीत्यर्थः । धर्मः पुरुषेति । यो धर्मः, स पुरुषस्य गुणो न कर्मसामर्थ्यमित्यर्थः । कर्तुः प्रियहितमोक्षहेतुः । प्रियं सुखम्, हितं सुखसाधनम्, मोक्षो नवानामात्म- विशेषगुणानामत्यन्तोच्छेदस्तेषां हेतुः । कर्तुः प्रियादीनामेव यो हेतुः स धर्म मानते हैं, (तदनुसार इस वाक्य का ऐसा अर्थ करते हैं) कि संवर्तित जो सूत्रादि, उनमें रहनेवाला संस्कार ही 'स्थितिस्थापक कार' है । 'तस्य नित्यानित्यत्व- निष्पत्तयो गुरुत्ववत्' अर्थात् जैसे कि परमाणुओं में रहनेवाला गुरुत्व नित्य है एवं कार्यद्रव्यों में रहनेवाला गुरुत्व अनित्य है, उसी प्रकार 'स्थितिस्थापक संस्कार' को भी समझना चाहिए । (अर्थात् परमाणुओं में रहनेवाला स्थितिस्थापक संस्कार नित्य है एवं कार्यद्रव्यों में रहनेवाला अनित्य) । 'धर्मः पुरुषेति' । अर्थात् धर्म (नाम का) जो गुण है, वह 'पुरुष' का अर्थात् जीव का ही गुण है, (ज्योतिष्टोमादि) क्रियाओं का शक्तिरूप नहीं है 'कर्तुः प्रियहितमोक्षहेतुः' (इस वाक्य में प्रयुक्त) प्रिय शब्द का अर्थ है सुख, 'हित' शब्द सुख के साधनों को समझने के लिए लिखा गया है एवं 'मोक्ष' शब्द जीव के बुद्धि प्रभृति नौ विशेष गुणों का अत्यन्त विनाशरूप अर्थ का बोधक है । इन सबों का हेतु (ही 'धर्म' है ) । 'कर्तुः