भारतकोश
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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

७०६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [कर्मनिरूपण- प्रशस्तपादभाष्यम् दृष्टौ, तथा द्वारप्रदेशे प्रविशति निष्क्रामतीति च । यदा तु प्रतिसीराद्य- पनीतं भवति, तदा न प्रवेशनप्रत्ययो नापि निष्क्रमणप्रत्ययः; किन्तु गमनप्रत्यय एव भवति । तथा नालिकायां वंशपत्रादौ पतति बहूनां द्रष्टॄणां युगपद् भ्रमणपतनप्रवेशनप्रत्यया दृष्टा इति जातिसङ्कर- हुए एक ही व्यक्ति में (विरुद्ध दिशाओं में खड़े हुए दो व्यक्तियों को) क्रमशः 'यह प्रवेश करता है' एवं 'यह निकलता है' इन दोनों प्रकार की प्रतीतियाँ होती हैं, (जब जाते हुए व्यक्ति के बीच की) प्रतिसीरा (पर्दा) उठा दी जाती है, तब उन्हीं दोनों व्यक्तियों को न निष्क्रमण की प्रतीति होती है और न प्रवेशन की प्रतीति, केवल गमन की ही प्रतीति होती है । इसी प्रकार बहती हुई नाली में जब बाँस प्रभृति के पत्ते गिरते हैं, तब उन पत्तों में एक ही समय बहुत से देखनेवालों में से किसी को भ्रमण की प्रतीति होती है और किसी को प्रवेशन की प्रतीति होती है। अतः निष्क्रमणत्वादि जातियों के मानने पर जातिसङ्कर दोष होगा । उत्क्षेपणादि क्रियाओं में इस प्रकार का साङ्कर्य नहीं देखा जाता । अतः उत्क्षेपणादि क्रियाओं में अनुवृत्ति की प्रतीति और व्यावृत्ति की प्रतीति उत्क्षेपणात्वादि जातियों के भेद से होती है; किन्तु निष्क्रमणादि क्रियाओं में उक्त दोनों प्रतीतियाँ कार्यों की विभिन्नता न्यायकन्दली यत्र प्रविशति तत्र स्थितस्य प्रविशतीति प्रत्ययः । यदि जातिकृताविमौ प्रत्ययौ दृष्टौ तदैकस्यां व्यक्तौ परस्परविरुद्धनिष्क्रमणत्वप्रवेशनत्वजातिद्वयसमावेशो दूषणं स्यात् । तथा द्वारप्रदेशे प्रविशति निष्क्रामतीति यथैकस्मिन्नेव बहुप्रकोष्ठके गृहे प्रकोष्ठात् प्रकोष्ठान्तरं गच्छति पुरुषे पूर्व्वापरप्रकोष्ठस्थितयोर्द्रष्ट्रोर्द्वारप्रदेशे निर्गच्छति प्रविशतीति प्रत्ययौ भवतः। यदा तु प्रतिसीराद्य- पनीतं मध्यस्थितं जवनिकापनीतं भवति तदा न प्रवेशनप्रत्ययो नापि निष्क्रमणप्रत्ययः, उसी पुरुष में 'प्रविशति' यह प्रतीति होती है । यदि निष्क्रमण और प्रवेशन क्रियाओं की प्रतीतियाँ निष्क्रमणत्वादि जातिमूलक हों, तो फिर एक ही व्यक्ति में परस्पर विरुद्ध निष्क्रमणत्व और प्रवेशनत्वादि जातियों के समावेशरूप साङ्कर्य दोष की आपत्ति होगी । 'तथा द्वारदेशे प्रविशति निष्क्रामतीति' उक्त भाष्य सन्दर्भ का यह अभिप्राय है कि जैसे बहुत-सी कोठरियों वाले भवन में यदि एक पुरुष एक कोठरी में जाता है, तो जिस कोठरी से वह जाता है उस कोठरी में रहनेवाले दूसरे पुरुष को उस जानेवाले पुरुष में 'यह निकलता है' इस प्रकार की प्रतीति होती है और जिस कोठरी में वह जाता है, उस कोठरी में रहनेवाले दूसरे पुरुष को उसी पुरुष में 'यह आता है' इस प्रकार की प्रतीति होती है । 'यदा तु प्रतिसीराद्यपनीतम्' अर्थात् जब बीच का पर्दा (या दीवाल जिससे कोठरियाँ बनती हैं) हटा दिया जाता है, उस समय उसी पुरुष में न 'निकलने' की और न 'आने' की प्रतीति होती है, केवल 'चलने' की ही प्रतीति होती है । अतः वह 'गमन' रूप क्रिया ही है, उसी में उपाधि भेद से

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ७०७

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ७०७ प्रशस्तपादभाष्यम् प्रसङ्गः । न चैवमुत्क्षेपणादिषु प्रत्ययसङ्करो दृष्टः । तस्मादुत्क्षेप- णादीनामेव जातिभेदात् प्रत्ययानुवृत्तिव्यावृत्ती, निष्क्रमणादीनां तु कार्यभेदादिति। कथं युगपत् प्रत्ययभेद इति चेत्? अथ मतं यथा जातिसङ्करो नास्ति, एवमनेककर्मसमावेशोऽपि नास्तीत्येकस्मिन् कर्मणि युगपद् द्रष्टॄणां भ्रमणपतनप्रवेशनप्रत्ययाः कथं भवन्तीति ? अत्र ब्रूमः - न, अवयवावयविनोर्दिग्विदिष्टसंयोगविभागानां भेदात् । यो से होती हैं । (प्र.) एक ही समय (एक ही क्रिया में) उक्त विभिन्न प्रतीतियाँ कैसे होती हैं ? (विशदार्थ यह है कि) जिस प्रकार (उत्क्षेपणात्यादि जातियों के मानने में) जातिसङ्कररूप दोष सम्भव नहीं है, (उसी प्रकार) एक ही समय एक ही वस्तु में (निष्क्रमण, प्रवेशनादि) अनेक कर्मों का रहना भी सम्भव नहीं है, फिर एक ही समय एक ही द्रव्य में अनेक देखनेवाले को (भी) भ्रमण, पतन और प्रवेशन विषयक प्रतीतियाँ कैसे हो सकती हैं ? (उ.) इस प्रश्न के समाधान में हम लोगों का कहना है कि नहीं (अर्थात् उक्त प्रतीतियाँ असम्भव नहीं हैं); क्योंकि एक ही वस्तु में एक ही समय भ्रमणादि की उक्त प्रतीतियाँ नाली में गिरे पत्ते प्रभृति अवयवी और उनके अवयवों की विभिन्न दिशाओं में उत्पन्न हुए संयोग-विभागादि कार्यों की विभिन्नता से होती हैं । देखनेवालों में से जो व्यक्ति पार्श्व से क्रमशः प्रदेश के अवयवों के दिक्प्रदेशों के साथ संयोगों और विभागों को न्यायकन्दली किन्तु गमनप्रत्यय एव भवति । तस्माद् गमनमेव, तत्रोपाधिकृतश्च प्रत्ययभेद इत्यभि- प्रायः । उदाहरणान्तरमाह-तथा नालिकायामिति । नालिकेति गर्त्तस्या- भिधानम् । स्वपक्षे विशेषमाह-न चैवमिति । उपसंहरति-तस्मादिति । एकदेकस्मिन् द्रव्ये तावदेकमेव कर्म भवति, तत्र कथं युगपदनेककर्मप्रत्यय 'निष्क्रमण' प्रत्यय और 'प्रवेशन' प्रत्यय प्रभृति विभिन्न प्रत्यय होते हैं । 'तथा नालिकायाम्' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा इसी प्रसङ्ग में दूसरा दृष्टान्त दिखलाया गया है । 'नालिका' गड्ढे को कहते हैं । 'न चैवम्' इत्यादि से पूर्वपक्ष की अपेक्षा अपने सिद्धान्तपक्ष में अन्तर दिखलाते हैं । 'तस्मात्' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा इस प्रसङ्ग का उपसंहार करते हैं । 'कथम्' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा यह आक्षेप करते हैं कि यदि एक समय एक द्रव्य में एक ही क्रिया हो सकती है, तो फिर एक ही समय अनेक कर्मों की प्रतीति कैसे होगी ? 'अथ मतम्'

७०८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [कर्मनिरूपण- प्रशस्तपादभाष्यम् हि द्रष्टा अवयवानां पार्श्वतः पर्यायेण दिक्प्रदेशैः संयोगविभागान् पश्यति तस्य भ्रमणप्रत्ययो भवति, यो ह्यवयविन ऊर्ध्वप्रदेशैर्विभागमधःसंयोगं चावेक्षते तस्य पतनप्रत्ययो भवति । यः पुनर्नालिकान्तर्देशे संयोगं बहिर्देशे च विभागं पश्यति, तस्य प्रवेशनप्रत्ययो भवतीति सिद्धः कार्यभेदान्निष्क्रमणादीनां प्रत्ययभेद इति । भवत्त्क्षेपणादीनां जातिभेदात् प्रत्ययभेदः, निष्क्रमणादीनां तु कार्य- भेदादिति । देखता है, उसे उनमें भ्रमण की प्रतीति होती है । जो पुरुष अवयवी का ऊपर के देशों के साथ विभाग और नीचे के प्रदेश के साथ संयोग इन दोनों को देखता है, उसे उनमें पतन क्रिया की प्रतीति होती है । जो पुरुष उस अवयवी का नाली के भीतर के प्रदेश के साथ संयोग एवं ऊपर के देश के साथ विभाग को देखता है, उसे उसी अवयवी में प्रवेशन की प्रतीति होती है । इस प्रकार कार्यों के भेद से विभिन्न प्रकार की अनुवृत्ति की प्रतीतियाँ और व्यावृत्ति की प्रतीतियाँ होती हैं । अतः उत्क्षेपणादि क्रियाओं में उत्क्षेपणत्वादि जातियों की विभिन्नता से ही विभिन्न प्रकार की अनुवृत्तिप्रतीतियों और व्यावृत्तिप्रतीतियों के होने पर भी निष्क्रमणादि क्रियाओं में कार्यों की विभिन्नता से ही अनुवृत्ति की प्रतीतियाँ और व्यावृत्ति की प्रतीतियाँ होती हैं । न्यायकन्दली इत्याह-कथमिति । तद् विवृणोति-अथ मतमित्यादिना । अत्र ब्रूम इति सिद्धान्तोपक्रमः । यत् त्योक्तं तन्न, अवयवानामवयविनश्च दिग्देशविशिष्टानां संयोगविभागानां भेदात् । अस्य सुगमं विवरणम् । अवयवकर्मसु पार्श्वतः संयोगविभागकारणेषु भ्रमणप्रत्ययः, अवयविक्रियायां कार्यभेदात् पतनप्रवेशनप्रत्ययावित्यर्थः । इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा इसी 'आक्षेपग्रन्थ' का विवरण देते हैं । 'अत्र ब्रूमः' इत्यादि ग्रन्थ से इस प्रसङ्ग में अपना सिद्धान्त कहने का उपक्रम करते हैं । अर्थात् तुमने जो आक्षेप किया है, वह ठीक नहीं है; क्योंकि विभिन्न दिग्देशों में विद्यमान अवयवों और अवयवियों के संयोग और विभाग भी विभिन्न ही होते हैं । इस भाष्यग्रन्थ की व्याख्या सुलभ है । अभिप्राय यह है कि अवयवों के संयोग और विभाग इन दोनों की कारणीभूत क्रियायें जब पार्श्व में होती हैं, तो उनमें 'भ्रमण' का व्यवहार होता है । एवं अवयवी की क्रिया से होनेवाले विभिन्न कार्यों से उसी में 'पतन-प्रवेशनादि' की प्रतीतियाँ भी होती हैं ।

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७०९

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७०९ प्रशस्तपादभाष्यम् अथ गमनत्वं किं कर्मत्वपर्यायः ? आहोस्विदपरं सामान्यमिति ? कुतस्ते संशयः ? समस्तेषूत्क्षेपणादिषु कर्मप्रत्ययवद् गमनप्रत्ययाविशेषात् कर्मत्वपर्याय इति गम्यते । यतस्तूत्क्षेपणादिवद् विशेषसंज्ञायाभिहितं तस्मादपरं सामान्यं स्यादिति । (प्र.) गमनत्व शब्द और कर्मत्व शब्द ये दोनों क्या एक ही अर्थ के वाचक हैं ? या गमनत्व नाम की (कर्मत्व व्याप्य) अलग स्वतन्त्र जाति है ? (उ.) तुम्हें यह संशय ही क्यों कर हुआ ? (प्र.) यतः उत्क्षेपणादि सभी क्रियाओं में 'यह कर्म है' इस आकार की प्रतीति की तरह सभी क्रियाओं में समान रूप से गमनत्व की भी प्रतीति होती है, इससे ऐसा आभास होता है कि कर्मत्व और गमनत्व ये दोनों शब्द एक ही अर्थ के वाचक हैं । एवं यतः उत्क्षेपणादि की तरह 'गमन' नाम की भी एक अलग क्रिया कही गयी है, अतः यह भी अनुभव होता है कि उत्क्षेपणात्वादि की तरह गमनत्व नाम की भी कर्मत्व व्याप्य एक स्वतन्त्र जाति ही है । न्यायकन्दली भवतुत्क्षेपणादीनां जातिभेदात् प्रत्ययभेदः । अथ गमनत्वं किं कर्मत्वपर्यायः, आहोस्वि- दपरं सामान्यमिति । सिद्धान्ती पृच्छति-कुतस्ते संशयः ? संशयोऽत्रानुपपन्न इत्यभिप्रायः । परः संशयमुपपादयति-समस्तेष्विति । उत्क्षेपणादिषु सर्वेषु यथा कर्मप्रत्ययश्चलनात्मक- कताप्रत्ययस्तथा तेषु गमनप्रत्ययः, ऊर्ध्वं गच्छत्यधो गच्छति मूलप्रदेशं गच्छत्यग्रदेशं गच्छ- तीति प्रत्ययो भवतीति । तेन गमनत्वं कर्मत्वपर्याय इति गम्यते, समस्तभेदव्यापकत्वात् । यतस्तूत्क्षेपणादिवद् गमनमपि पृथगभिहितं विशेषसंज्ञया, तस्माद् गमनत्वमपरं सामान्यं स्यात्, पूर्वपक्षवादी 'अथ गमनत्वम्' इत्यादि सन्दर्भ से पूछते हैं कि मान लिया कि उत्क्षेपणादि कर्मों की विभिन्न प्रतीतियाँ उत्क्षेपणात्वादि विभिन्न जातियों के कारण ही होती हैं; किन्तु यह 'गमनत्व' कौन-सी वस्तु है ? क्या यह कर्मत्व जाति का ही दूसरा नाम है ? अथवा कर्मत्व जाति से भिन्न यह कोई अलग ही जाति है ? 'कुतस्ते संशयः ?' इस वाक्य के द्वारा सिद्धान्ती पूर्वपक्षवादी से पूछते हैं कि तुम्हें यह संशय ही क्यों कर हुआ ? अर्थात् यह संशय यहाँ युक्त नहीं है । 'समस्तेषु' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा पूर्वपक्षवादी अपने संशय का उपपादन करते हैं । अभिप्राय यह है कि उत्क्षेपणादि सभी क्रियाओं में जैसे कि 'कर्मप्रत्यय' अर्थात् चलनस्वरूपता की प्रतीति होती है, उसी प्रकार 'गमनप्रत्यय' अर्थात् ऊपर की ओर जाता है, नीचे की ओर जाता है, मूलप्रदेश में जाता है, अग्रप्रदेश में जाता है, इत्यादि गमनविषयक प्रतीतियाँ भी होती हैं, अतः

७१० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ कर्मनिरूपण- प्रशस्तपादभाष्यम् न, कर्मत्वपर्यायत्वात् । आत्मत्वपुरुषत्ववत् कर्मत्वपर्याय एव गमनत्वमिति । अथ विशेषसंज्ञया किमर्थं गमनग्रहणं कृतमिति ? न, भ्रमणाद्यव- रोधार्थत्वात् । उत्क्षेपणादिशब्दैरनवरुद्धानां भ्रमणपतनस्पन्दनादी- (उ.) नहीं (अर्थात् उक्त संशय का यहाँ कोई हेतु नहीं है); क्योंकि गमनत्व और कर्मत्व दोनों ही शब्द एक ही जाति के वाचक हैं । जैसे कि आत्मत्व और पुरुषत्व ये दोनों ही शब्द एक ही जाति के वाचक हैं, उसी प्रकार गमनत्व शब्द और कर्मत्व शब्द दोनों एक ही जातिरूप अर्थ के वाचक हैं । (प्र.) फिर (उत्क्षेपणादि की तरह 'गमन' रूप) विशेष नाम के द्वारा गमन का उपादान क्यों किया गया है ? (उ.) नहीं, (अर्थात् गमन शब्द से गमनरूप क्रिया का अभिधान गमनत्व को कर्मत्वव्याप्य अतिरिक्त जातिरूप समझाने के लिए नहीं है, किन्तु) भ्रमणादि क्रियाओं के संग्रह के लिए है । (विशदार्थ यह है कि) उत्क्षेपणादि नामों के द्वारा संगृहीत. न्यायकन्दली अवान्तरभेद निरूपणावसरे तस्य सङ्कीर्तनात् । एवमुपपादिते परेण संशये सति मुनिः प्राह-नेति । न कर्तव्यः संशयः, कुतः ? गमनत्वस्य कर्मत्वपर्यायत्वात् । एतद् विवृणोति-आत्मत्वपुरुषत्ववत् कर्मत्वपर्याय एव गमनत्वमिति । यथात्मत्वस्य पर्यायः पुरुषत्वं समस्तभेदव्यापकत्वात्, तथा गमनत्वं कर्मत्वस्य पर्यायः । अथ किमर्थं विशेषसंज्ञया पृथग् गमनग्रहणं कृतम् ? इति चोदयति-अथेति । समझते हैं कि कर्मत्व का ही दूसरा नाम गमनत्व है । अर्थात् गमनत्व और कर्मत्व एक ही वस्तु हैं; क्योंकि क्रियाओं के जितने भी प्रकार हैं, उन सबों में गमनत्व की प्रतीति होती है, अतः गमनत्व और कर्मत्व एक ही वस्तु हैं । 'गमनत्व और कर्मत्व दोनों विभिन्न जातियाँ हैं' इस प्रसङ्ग में यह युक्ति है कि उत्क्षेपणादि विभिन्न क्रियाओं की पङ्क्ति में ही 'विशेष' नाम के द्वारा गमनरूप क्रिया का भी अलग से उल्लेख किया गया है, अतः समझते हैं गमनत्व नाम की कोई कर्मत्वव्याप्य अलग ही जाति है (अतः उक्त संशय होता है); क्योंकि क्रियाओं के अवान्तर भेदों का जहाँ निरूपण किया गया है, वहीं गमन का भी उल्लेख है । इस प्रकार पूर्वपक्षी के द्वारा संशय का उपपादन किये जाने पर 'न' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा (प्रशस्तदेव) मुनि ने अपना उत्कृष्ट उत्तर कहा है कि उक्त प्रकार से संशय करना युक्त नहीं है, यतः गमनत्व और कर्मत्व ये दोनों ही एक ही जाति के विभिन्न नाम हैं । 'आत्मत्वपुरुषत्ववत् कर्मत्वपर्याय एव गमनत्वम्' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा इसी का विवरण देते हैं । अर्थात् जिस प्रकार पुरुष के जितने भी भेद हैं, उन सबों में आत्मत्व का व्यवहार होने के कारण आत्मत्व और पुरुषत्व एक ही जाति के दो नाम हैं, उसी प्रकार गमनत्व और कर्मत्व भी एक ही जाति के दो नाम हैं । 'अथ' इत्यादि

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७१५

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७१५ प्रशस्तपादभाष्यम् नामवरोधार्थं गमनग्रहणं कृतमिति । अन्यथा हि यान्येव चत्वारि विशेषसंज्ञोक्तानि तान्येव सामान्यविशेषसंज्ञाविषयाणि प्रसज्येरन्निति । अथवा अस्वपरं सामान्यं गमनत्वम्, अनियतदिग्देश- न होनेवाले भ्रमण, पतन, स्पन्दनादि क्रियाओं के संग्रह के लिए ही 'गमन' शब्द का उपादान किया गया है । यदि ऐसी बात न होती—भ्रमणादि क्रियाओं के संग्रह के लिए 'गमन' शब्द का उपादान न किया जाता—तो जो भी चार कर्म उत्क्षेपण, अपक्षेपण, आकुञ्चन और प्रसारण इन चार नामों से कहे गये हैं, उतने ही कर्म समझे जाते (फलतः उत्क्षेपणादि चार क्रियाओं से भिन्न भ्रमणादि क्रियाओं का अभाव ही समझा जाता) । अथवा (कर्मत्व से भिन्न) गमनत्व नाम का अलग सामान्य ही मान लें, जो अनियमित दिशाओं और अनियत देशों में संयोगों और विभागों के उत्पादक न्यायकन्दली उत्तरमाह-नेति । उत्क्षेपणादिशब्दैरनवरुद्धा न संगृहीता भ्रमणादयः । यदि गमन- ग्रहणं न क्रियेत, तदा तेषां कर्मत्वेन सङ्ग्रहो न स्यात्; किन्तु विशेषसंज्ञयो- द्विष्ठानामुत्क्षेपणादीनामेव परं कर्मत्वसंज्ञाविषयत्वं भवेत् । भ्रमणादयोऽपि च कर्मत्वेन लोकप्रसिद्धाः, अतस्तेषां परिग्रहार्थं पृथग् गमनग्रहणं कृतमिति ग्रन्थार्थः । अथवा अस्वपरं सामान्यं गमनत्वम्, तत् केषु वर्तते, तत्राह-अनियतेति । पङ्क्ति से पूर्वपक्षी यह आक्षेप करते हैं कि (उत्क्षेपणादि की तरह) विशेष नाम के द्वारा गमन का उल्लेख क्यों किया गया है ? 'न' इत्यादि से इसी आक्षेप का उत्तर दिया है । अर्थात् यदि गमन शब्द का उल्लेख (उत्क्षेपणादि शब्दों की पङ्क्ति में) न किया जाता तो जिन भ्रमणादि क्रियाओं का अवरोध (संग्रह) उत्क्षेपणादि शब्दों के द्वारा सम्भव नहीं है, उस सबों का कर्म में संग्रह न हो सकता । (गमनशब्दघटित उक्त वाक्य से केवल) उत्क्षेपणादि क्रियाओं का ही संग्रह होता; किन्तु उत्क्षेपणादि से भिन्न भ्रमणादि क्रियाओं में भी कर्मत्व का व्यवहार लोक में होता है । अतः उन सबों के संग्रह के लिए ही 'गमन' शब्द का उल्लेख किया गया है । यही उक्त (सिद्धान्त भाष्य) ग्रन्थ का अभिप्राय है । 'अथवा अस्वपरं सामान्यं गमनत्वम्' (अर्थात् गमनत्व को भी उत्क्षेपणादि की तरह कर्मत्व का अवान्तर सामान्य ही मान लें, तब भी कोई क्षति नहीं है) । यह गमनत्व (कर्मत्वव्याप्य) जाति किन कर्मों में रहती है ? इसी प्रश्न का उत्तर 'अनियत' इत्यादि सन्दर्भ से दिया गया है । तो फिर उत्क्षेपणादि कर्मों में गमन की प्रतीति

७१२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ कर्मनिरूपण- प्रशस्तपादभाष्यम् संयोगविभागकारणेषु भ्रमणादिष्वेव वर्तते, गमनशब्दश्चोत्क्षेपणादिषु भाक्तो द्रष्टव्यः, स्वाश्रयसंयोगविभागकर्तृत्वसामान्यादिति । भ्रमणादि क्रियाओं में ही नियमित रूप से रहता है । भ्रमणादि क्रियाओं में अभिधावृत्ति के द्वारा प्रयुक्त होनेवाले 'गमन' शब्द का जो उत्क्षेपणादि क्रियाओं में भी प्रयोग होता है, उसका कारण है दोनों क्रियाओं में समान रूप से संयोग और विभाग को उत्पन्न करने की स्वतन्त्र क्षमता, इसी क्षमता या कर्तृत्वरूप सादृश्य के कारण ही उत्क्षेपणादि में भी गमन शब्द का प्रयोग होता है । अतः उत्क्षेपणादि क्रियाओं में गमन शब्द का प्रयोग गौण है । न्यायकन्दली कुतस्तर्ह्युत्क्षेपणादिषु गमनप्रत्ययः ? अत आह—गमनशब्दश्चेति । गमनशब्दग्रहणस्योप- लक्षणार्थत्वाद् गमनप्रत्यय उत्क्षेपणादिषु भाक्तो द्रष्टव्यः । उपचारस्य बीजमाह—स्वाश्रय- संयोगविभागकर्तृत्वसामान्यादिति । गमनं स्वाश्रयस्य संयोगविभागौ करोति, उत्क्षेपणा- दयोऽपि कुर्वन्ति, एतावता साधर्म्येणोत्क्षेपणादिषु गमनव्यवहारः । अनेन साधर्म्येण गमने कस्मादुत्क्षेपणादिव्यवहारो न भवति ? पैङ्ग्यपाटलत्वादिसाधर्म्येण वह्नावपि माणवकव्यवहारः क्यों कर होती है ? इस प्रश्न का समाधान 'गमनशब्दस्तु' इत्यादि से किया गया है । अर्थात् उत्क्षेपणादि कर्मों में प्रयुक्त गमन शब्द उपलक्षणार्थक है, अतः उत्क्षेपणादि के प्रत्ययों के लिए गमन शब्द के प्रयोग को गौण (लाक्षणिक) ही समझना चाहिए । 'स्वाश्रयसंयोगविभागकर्तृत्वसामान्यात्' इस वाक्य के द्वारा प्रकृत में लक्षणा का प्रयोजक धर्म (लक्ष्यतावच्छेदक) दिखलाया गया है । अर्थात् जिस प्रकार गमन अपने आश्रयीभूत द्रव्य में संयोग और विभाग को उत्पन्न करता है, उसी प्रकार उत्क्षेपणादि क्रियायें भी अपने आश्रयीभूत द्रव्यों में संयोगों और विभागों को उत्पन्न करती हैं, इस सादृश्य के कारण ही उत्क्षेपणादि क्रियाओं में भी गमन शब्द का गौण प्रयोग होता है । (प्र.) तो फिर इसी साधर्म्य के कारण गमन में उत्क्षेपणादि शब्दों का भी गौण प्रयोग क्यों नहीं होता ? (उ.) 'अग्निर्माणवकः' इत्यादि प्रयोग के द्वारा जिस प्रकार माणवक में अग्नि पद का गौण व्यवहार तेजस्वित्वादि धर्मों के कारण होता है, उसी प्रकार पिङ्गलवर्ण और रक्तवर्ण रूप सादृश्य के कारण अग्नि में माणवक का गौण व्यवहार भी क्यों नहीं होता ? यदि इसका यह परिहार उपस्थित करें कि केवल हेतु है, अतः उपचार की कल्पना नहीं की जाती; किन्तु उपचार या व्यवहार होने पर ही कारण की कल्पना की जाती है (अतः लोक में अग्नि में माणवक शब्द का व्यवहार न होने के

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७१३

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७१३ प्रशस्तपादभाष्यम् सप्रत्ययकर्मविधिः । कथम् ? चिकीर्षितेषु यज्ञाध्ययनदानकृष्यादिषु यथा हस्तमुत्क्षेप्तुमिच्छत्यवक्षेप्तुं वा, तदा हस्तवत्यात्मप्रदेशे प्रयत्नः सञ्जायते । तं प्रयत्नं गुरुत्वं चापेक्षमाणादात्महस्तसंयोगाद्धस्ते कर्म भवति, हस्तवत् सर्वशरीरावयवेषु पादादिषु शरीरे चेति । सप्रत्यय अर्थात् प्रयत्न से उत्पन्न क्रिया की उत्पत्ति की विधि कहते हैं । (प्र.) कैसे ? अर्थात् यह सप्रत्यय रूप कर्म किस प्रकार उत्पन्न होता है ? (उ.) यज्ञ, अध्ययन, दान अथवा कृषि प्रभृति कर्म के उत्पादन की इच्छा होने पर हाथ को नीचे या ऊपर करने के लिए आत्मा के हाथवाले प्रदेश में प्रयत्न की उत्पत्ति होती है । इसी प्रकार इस प्रयत्न, गुरुत्व एवं आत्मा और हाथ के संयोग इन तीनों कारणों से हाथ में क्रिया की उत्पत्ति होती है । हाथ की तरह शरीर के पैर प्रभृति अवयवों में एवं शरीररूप अवयवी में भी क्रिया की उत्पत्ति होती है । न्यायकन्दली कस्मान्न भवति ? अथोच्यते । न कारणसद्भावे सत्युपचारकल्पना; किन्तु स्थिते व्यवहारे कारणकल्पनेति । एवं चेदत्रापि स एव परिहारः । सप्रत्ययकर्मविधिः-प्रयत्नपूर्वककर्मप्रकारः कथ्यत इत्यर्थः । कथमिति पृष्टः सन्नाह-चिकीर्षितेष्विति । यज्ञादिषु कर्तुमभिप्रेतेषु सत्सु यदा पुरुषो हस्तमुत्क्षेप्तुमिच्छति, तदा हस्तवत्यात्मप्रदेशे प्रयत्नो जायते । तं प्रयत्नं निमित्त- कारणभूतमपेक्षमाणादात्महस्तसंयोगादसमवायिकारणाद्धस्ते कर्म भवति । कारण उक्त प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता) । (उ.) तो फिर प्रकृत में मेरे लिए भी यही परिहार है । अर्थात् लोक में उत्क्षेपणादि क्रियाओं में गमन का व्यवहार होता है, अतः उस व्यवहार के लिए हेतु की कल्पना करते हैं । गमन में उत्क्षेपणादि का व्यवहार लोक में नहीं होता है, अतः उसके लिए किसी चर्चा की आवश्यकता नहीं है । 'सप्रत्ययकर्मविधिः' अर्थात् प्रयत्न के द्वारा उत्पन्न कर्म की उत्पत्ति की रीति कहते हैं । 'किस प्रकार ?' यह पूछे जाने पर 'चिकीर्षितेषु' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा उसका उपपादन करते हैं । यज्ञादि कर्मों का अनुष्ठान पुरुष को अभिप्रेत रहने पर उसके लिए वह जिस समय हाथ को ऊपर की ओर उठाता है, उस समय आत्मा के हाथवाले प्रदेश में प्रयत्न उत्पन्न होता है । इस प्रयत्नरूप निमित्तकारण से हाथ में क्रिया उत्पन्न होती है, जिसका असमवायिकारण आत्मा और हाथ का संयोग है ।

पादादिषु शरीरे चेति' अर्थात् पैर में जो क्रिया की उत्पत्ति होगी, उसमें आत्मा के

७१४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ कर्मनिरूपण- प्रशस्तपादभाष्यम् तत्सम्बद्धेष्वपि कथम् ? यदा हस्तेन मुसलं गृहीत्वेच्छां करोति 'उत्क्षिपामि हस्तेन मुसलम्' इति, तदनन्तरं प्रयत्नस्तमपेक्षमाणा- (प्र.) शरीर और उनके अवयवों से संयुक्त द्रव्यों में कैसे ? (क्रिया उत्पन्न होती है ?) (उ.) जब मूसल को हाथ में लेकर कोई यह इच्छा करता है कि 'मैं हाथ से मूसल को ऊपर की ओर उछालूँ' उसके बाद प्रयत्न की उत्पत्ति होती है । इस प्रयत्न और हाथ एवं आत्मा के संयोग इन दोनों से उसी न्यायकन्दली सत्यपि प्रयत्ने गुरुत्वरहितस्य उत्क्षेपणा पक्षेपणयोरशक्यकरणत्वाद् गुरुत्वस्यापि कारणत्वम् । हस्तवत्सर्वशरीरावयवेषु पादादिषु शरीरे चेति । पादे कर्मोत्पत्तौ पादवत्यात्मप्रदेशे प्रयत्नो निमित्तकारणम्, पादात्मसंयोगोऽ- समवायिकारणम् । एवं सर्वत्र शरीरावयवक्रियोत्पत्तौ द्रष्टव्यम् । शरीरक्रियोत्पत्तावपि शरीरात्मसंयोगोऽसमवायिकारणम्, शरीरवदात्मप्रदेशे प्रयत्नो निमित्तकारणम् । तत्सम्बद्धेषु शरीरसम्बद्धेषु, शरीरावयवसम्बद्धेष्वपि कथं कर्मोत्पत्तिरिति प्रश्नार्थः । यदा हस्तेन मुसलं गृहीत्वेच्छां करोति 'उत्क्षिपामि हस्तेन मुसलम्' इति, तदनन्तरं तस्या इच्छाया अनन्तरम्, प्रयत्नः हस्तेन मुसलमूर्ध्वमुत्क्षि- पामीति हस्तमुसलयोर्युगपदुत्क्षेपणेच्छातः प्रयत्नो जायमानस्तयोर्युगपदुत्क्षेपण- प्रयत्न के रहते हुए भी गुरुत्व से सर्वथा रहित द्रव्य का ऊपर उठना या नीचे गिरना नहीं होता, अतः गुरुत्व भी उसका कारण है । 'हस्तवत् सर्वशरीरावयवेषु पादादिषु शरीरे चेति' अर्थात् पैर में जो क्रिया की उत्पत्ति होगी, उसमें आत्मा के पादवाले प्रदेश में उत्पन्न प्रयत्न निमित्तकारण होगा एवं पैर और आत्मा का संयोग असमवायिकारण होगा । इसी प्रकार यह भी समझना चाहिए कि शरीर (रूप अवयवी) में जो क्रिया की उत्पत्ति होगी, उसका असमवायिकारण शरीर और आत्मा का संयोग ही होगा और आत्मा के शरीरवाले प्रदेश में उत्पन्न प्रयत्न उसका निमित्तकारण होगा । 'तत्सम्बद्धेषु' इत्यादि प्रश्नवाक्य का अभिप्राय यह है कि शरीर के साथ और उसके अवयवों के साथ सम्बद्ध अन्य द्रव्यों में क्रिया की उत्पत्ति किस क्रम से होती है ? 'यदा हस्तेन मुसलं गृहीत्वेच्छां करोति--उत्क्षिपामि हस्तेन मुसलमिति' अर्थात् जिस समय हाथ में मूसल को लेकर पुरुष यह इच्छा करता है कि 'मैं मूसल को ऊपर की तरफ उछालूँ' 'तदनन्तरम्' अर्थात् उसके बाद 'प्रयत्नः' अर्थात् 'हाथ से मूसल को लेकर मैं ऊपर की तरफ उछालूँ' हाथ और मूसल को एक ही समय ऊपर की तरफ उछालने की इस आकार की इच्छा से उत्पन्न होनेवाला प्रयत्न, हाथ और मूसल को एक

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७१५ प्रशस्तपादभाष्यम् दात्महस्तसंयोगाद् यस्मिन्नेव काले हस्ते उत्क्षेपणकर्मोत्पद्यते, तस्मिन्नेव काले तमेव प्रयत्नमपेक्षमाणाद्धस्तमुसलसंयोगान्मुसलेऽपि कर्मेति । ततो दूरमुत्क्षिप्ते मुसले तदर्थेच्छा निवर्तते । पुनरप्यपक्षेपणेच्छो- त्पद्यते । तदनन्तरं प्रयत्नस्तमपेक्षमाणाद् यथोक्तात् संयोगाद्धस्तमुसलयो- र्युगपदपक्षेपणकर्मणी भवतः, ततोऽन्त्येन मुसलकर्मणोलूखल- समय हाथ में क्रिया उत्पन्न होती है । एवं उसी समय प्रयत्न और हाथ एवं मूसल के संयोग इन दोनों से मूसल में भी क्रिया उत्पन्न होती है । इसके बाद उस मूसल के दूर फेंके जाने पर उस मूसल विषयक इच्छा का नाश हो जाता है । फिर उसी के अपक्षेपण (नीचे ले आने) की इच्छा उत्पन्न होती है । इसके बाद प्रयत्न एवं उक्त (आत्मा और हाथ के) संयोग इन दोनों से एक ही समय हाथ और मूसल दोनों में ही अपक्षेपण- रूप क्रिया उत्पन्न होती है । मूसल की इस अन्तिम क्रिया से ऊखल में मूसल का अभिघात नाम का संयोग उत्पन्न होता है । उस कर्म और न्यायकन्दली समर्थो विशिष्ट एव जायते । तं प्रयत्नं विशिष्टं निमित्तमपेक्षमाणादात्महस्तसंयोगात् समवायि- कारणाद् यस्मिन्नेव काले हस्ते उत्क्षेपणकर्मोत्पद्यते, तस्मिन्नेव काले तमेव प्रयत्नमुभयार्थमुत्पन्न- मपेक्षमाणाद्धस्तमुसलसंयोगादसमवायिकारणान्मुसलेऽपि कर्म भवति, कारणयौगपद्यात् । ततो दूरमुत्क्षिप्ते मुसले तदर्थेच्छा निवर्तते उत्क्षेपणेच्छा निवर्तते । पुनरप्यपक्षेपणेच्छोत्पद्यते हस्तेन मुसलस्यापक्षेपणेच्छोपजायत इत्यर्थः । तदनन्तरं प्रयत्नः सोऽपि जायमान उत्क्षेपणप्रयत्नवद् विशिष्ट एव जायते । तं च प्रयत्नमपेक्षमाणाद् यथोक्तात् संयोगद्वया- ही समय ऊपर की ओर उछालने के सामर्थ्य से युक्त ही उत्पन्न होता है । उस प्रयत्न- रूप विशेष प्रकार के निमित्तकारण से जिस समय आत्मा और हाथ के संयोगरूप असमवायिकारण के द्वारा हाथ में उत्क्षेपण कर्म की उत्पत्ति होती है, उसी समय हाथ और मूसल दोनों की क्रिया के लिए उत्पन्न उक्त प्रयत्नरूप निमित्तकारण से ही हाथ और मूसल के संयोगरूप असमवायिकारण के द्वारा मूसल में भी कर्म की उत्पत्ति होती है; क्योंकि एक ही समय हाथ और मूसल दोनों में ही क्रियोत्पत्ति के सभी कारण वर्त्तमान हैं । 'ततो दूरमुत्क्षिप्ते मुसले तदर्थेच्छा निवर्तते' अर्थात् उत्क्षेपण की इच्छा नहीं रह जाती । 'पुनरप्यपक्षेपणेच्छोत्पद्यते' अर्थात् हाथ से मूसल को नीचे की ओर ले आने की इच्छा उत्पन्न होती है । 'तदनन्तरं प्रयत्नः' यह अपक्षेपण का प्रयत्न भी उत्क्षेपण के उक्त प्रयत्न की तरह (एक ही समय हाथ और मूसल को नीचे की ओर ले आने के सामर्थ्य से) युक्त ही उत्पन्न होता है । उक्त विशिष्ट

७५६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ कर्मनिरूपण- प्रशस्तपादभाष्यम् मुसलयोरभिघाताख्यः संयोगः क्रियते, स संयोगो मुसलगद्वेगमपेक्ष- माणोऽप्रत्ययं मुसले उत्पतनकर्म करोति । तत्कर्माभिघातापेक्षं मुसले संस्कारमारभते । तमपेक्ष्य मुसलहस्तसंयोगोऽप्रत्ययं हस्तेऽप्युत्पतनकर्म अभिघात इन दोनों से मूसल में संस्कार की उत्पत्ति होती है । इस संस्कार के साहाय्य से मूसल और हाथ में 'अप्रत्यय' अर्थात् बिना प्रयत्न के ही उत्क्षेपण क्रिया की उत्पत्ति होती है । यद्यपि पहले का संस्कार नष्ट हो गया रहता है, फिर भी मूसल और उलूखल का संयोग पटु (संस्कारजनक) कर्म को उत्पन्न करता है । वह संयोग ही अपनी विशिष्टता के कारण न्यायकन्दली दात्महस्तसंयोगाद्धस्तमुसलसंयोगाद्धस्तमुसलयोर्युगपदपक्षेपणकर्मणी भवतः । ततोऽन्त्येन मुसलकर्मणोलूखलमुसलयोरभिघाताख्यः संयोगः क्रियते । अपक्षिप्तस्य मुसलस्यान्येन कर्मणा उलूखलमुसलसमवेतो मुसलोत्पतनहेतुः संयोगः क्रियत इत्यर्थः । स संयोगो मुसलगद्वेगमपेक्षमाणोऽप्रत्ययमप्रयत्नपूर्वकं मुसले उत्पतनकर्म करोति । वेगो निमित्त- कारणम्, मुसलं समवायिकारणम् । तत्कर्माभिघातापेक्षं मुसले संस्कारमारभते उत्पतनकर्म स्वकारणाभिघाताख्यं संयोगमपेक्षमाणं मुसले वेगमारभते । तं संस्कारमपेक्ष्य हस्तमुसल- प्रयत्नरूप निमित्तकारण के साहाय्य से कथित दोनों संयोगरूप असमवायिकारण के द्वारा अर्थात् आत्मा और हाथ के संयोग एवं हाथ और मूसल के संयोग इन दोनों संयोगों से एक ही समय दो अपक्षेपण क्रियायें (अर्थात् हाथ और मूसल दोनों को नीचे की ओर ले आने की दो क्रियायें) उत्पन्न होती हैं । "ततोऽन्त्येन मुसलकर्मणा उलूखलमुसलयोरभिघाताख्यः संयोगः क्रियते" अर्थात् अपक्षेपण क्रिया से युक्त मूसल की अन्तिम क्रिया से उलूखल और मूसल इन दोनों में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाले उस संयोग की उत्पत्ति होती है, जिससे मूसल का उत्पतन होता है । यह संयोग मूसल में रहनेवाले वेग के साहाय्य से 'अप्रत्यय' अर्थात् बिना प्रयत्न के ही उस उत्पतन क्रिया को उत्पन्न करता है, जो मूसल में रहती है । इस (अप्रत्ययक्रिया का) वेग निमित्तकारण है और मूसल समवायिकारण है । 'तत्कर्माभिघातापेक्षं मुसले संस्कारमारभते' अर्थात् वह उत्पतनरूपा क्रिया अपने कारणीभूत उक्त अभिघात नाम के संयोग के द्वारा मूसल में वेग को उत्पन्न करती है । इसी (वेगाख्य) संस्कार के साहाय्य से हाथ और मूसल का संयोगरूप असमवायि- कारण हाथ में भी 'अप्रत्यय' अर्थात् प्रयत्न से निरपेक्ष क्रिया को उत्पन्न करता है । (प्र.) मूसल में पहले की अपक्षेपण क्रिया से उत्पन्न वेग नाम का संस्कार

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७१७

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७१७ प्रशस्तपादभाष्यम् करोति । यद्यपि प्राक्तनः संस्कारो विनष्टस्तथापि मुसलोलूखलयोः संयोगः पटुकर्मोत्पादकः संयोगविशेषभावात् तस्य संस्कारारम्भे साचिव्यसमर्थो भवति । अथवा प्राक्तन एव पटुः संस्कारोऽभिघाताद- संस्कार के उत्पादन का मुख्य अधिष्ठाता है । अथवा पहले का ही विशेष कार्यक्षम संस्कार अभिघात नाम के संयोग से नष्ट न होने के कारण न्यायकन्दली संयोगोऽसमवायिकारणभूतोऽप्रत्ययमप्रयत्नपूर्वकं हस्तेऽप्युत्पतनकर्म करोति । योऽसौ प्राक्तनोऽपक्षेपणसंस्कारो मुसलगूर्तः सोऽप्यभिघाताद् विनष्टः, तदभावे कथं मुसलेऽ- प्रत्ययमयुत्पतनकर्मोत्पतनसंस्कारमारभते ? अपेक्षाकारणाभावाद् अत आह-यद्यपि प्राक्तनः संस्कारो विनष्टः, तथापि मुसलोलूखलसंयोगः पटुकर्मोत्पादकः संस्कारजनककर्मो- त्पादकः । कुतः ? संयोगविशेषभावात् संयोगविशेषत्वात् । किमतो यद्येवम् ? तत्राह-- तस्य कर्मणः संस्कारारम्भे कर्तव्ये साचिव्यसमर्थो भवति, साहाय्ये समर्थो भवति । अस्मिन् पक्षे हस्तमुसलयोरुत्पतनकर्मणी क्रमेण भवतः । आशुभावाच्च यौगपद्यग्रहणम् । प्रकारान्तरमाह-अथवा प्राक्तन एव पटुः, संस्कारोऽभिघातादविनश्यन्न- वस्थित इति विशिष्टकारणजत्वात्प्रतिबलः संस्कारः स्पर्शवद्द्रव्यसंयोगेनापि अभिघातसंयोग के द्वारा विनष्ट हो चुका है । उस संस्कार के न रहने पर मूसल की वह प्रयत्ननिरपेक्ष क्रिया मूसल में उत्पन्नक्रिया से उत्पन्न होनेवाले संस्कार को कैसे उत्पन्न कर सकती है ? क्योंकि (प्राक्तन संस्काररूप) आवश्यक कारण वहाँ नहीं है । इसी प्रश्न का समाधान 'यद्यपि प्राक्तनः संस्कारो विनष्टः' इत्यादि से दिया गया है । इस सन्दर्भ के 'पटुकर्मोत्पादकः' इस वाक्य के द्वारा यह कहा गया है कि (मूसल और उलूखल का संयोग) ऐसे कर्म का उत्पादक है कि जिसमें (वेगाख्य) संस्कार को उत्पन्न करने की शक्ति है । कुतः ? अर्थात् संयोग में ही संस्कार की कारणता क्यों है ? इसी प्रश्न का उत्तर 'संयोगविशेषभावात्' इस वाक्य से दिया गया है । अर्थात् यतः वह संयोग अन्य संयोगों से विशेष प्रकार का है (अतः उससे संस्कार की उत्पत्ति होती है) । उक्त संयोग में यदि विशिष्टता है भी तो इसका प्रकृत में क्या उपयोग है ? इसी प्रश्न का उत्तर 'तस्य संस्कारारम्भे' इत्यादि से दिया गया है । अर्थात् उस संयोग में यही विशिष्टता है कि उसमें कर्म के द्वारा वेग (संस्कार) के उत्पादन में साहाय्य करने का सामर्थ्य है । इस पक्ष में हाथ में और मूसल में उत्पतन क्रियायें क्रमशः उत्पन्न होती हैं (युगपत् नहीं) । 'हस्तमुसलयोर्युगपद- पक्षेपणकर्मणी' इत्यादि वाक्य में जो यौगपद्य का ग्रहण किया गया है, उसका अर्थ केवल शीघ्रता है (अर्थात् दोनों में अतिशीघ्र उत्पतन कर्म की उत्पत्ति होती है । 'अथवा प्राक्तन एव पटुः संस्कारोऽभिघातादविनश्यन्नवस्थित इति' इस सन्दर्भ के द्वारा उक्त प्रश्न का ही दूसरे प्रकार से समाधान किया गया है । अभिप्राय

७१८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [कर्मनिरूपण- प्रशस्तपादभाष्यम् विनश्यन्नवस्थित इति । अतः संस्कारवति पुनः संस्कारारम्भो नास्त्यतो यस्मिन् काले संस्कारापेक्षादभिघातादप्रत्ययं मुसले उत्पतनकर्म, तस्मिन्नेव काले तमेव संस्कारमपेक्षमाणान्मुसलहस्तसंयोगादप्रत्ययं हस्तेऽप्युत्पतनकर्मेति । पाणिमुक्तेषु गमनविधिः, कथम् ? यदा तोमरं हस्तेन गृहीत्वो- त्क्षेप्तुमिच्छोत्पद्यते, तदनन्तरं प्रयत्नः, तमपेक्षमाणाद् यथोक्तात् तब तक विद्यमान रहता है । अतः एक संस्कार से युक्त वस्तु में पुनः दूसरे संस्कार की उत्पत्ति की सम्भावना न रहने पर भी जिस समय संस्कार और अभिघात (संयोग) इन दोनों से बिना प्रयत्न के मूसल में उत्पतन (उत्क्षेपण) क्रिया उत्पन्न होती है, उसी समय उसी संस्कार और मूसल एवं हाथ के संयोग इन दोनों से अप्रत्यय (प्रयत्नजन्य) उत्पतन (उत्क्षेपण) क्रिया उत्पन्न होती है । (प्र.) हाथ से फेंकी हुई वस्तुओं में गमन क्रिया किस प्रकार उत्पन्न होती है ? (उ.) जिस समय तोमर को हाथ में लेकर उसे उछालने की इच्छा (पुरुष को) होती है, उसके बाद प्रयत्न उत्पन्न होता है । आत्मा और हाथ के संयोग एवं हाथ और तोमर के संयोग इन दोनों संयोगों के द्वारा उक्त प्रयत्न के साहाय्य से तोमर और हाथ में एक ही समय दो आकर्षणात्मक न्यायकन्दली न विनश्यति । अतः संस्कारवति संस्कारान्तरारम्भो नास्ति, यतः प्राक्तना- पक्षेपणसंस्कारो न विनष्टः, अतः प्राक्तनसंस्कारवति मुसले संस्कारान्तरा- रम्भो नास्तीति प्रतीयते । यस्मिन् काले संस्कारापेक्षादभिघातादप्रत्ययं मुसले उत्पतनकर्म, तस्मिन्नेव काले तमेव संस्कारमपेक्षमाणाद्धस्तमुसलसंयोगादप्रत्ययं यह है कि वेगाख्य संस्कार (अन्य वेगाख्य संस्कारों के कारणों से) विशेष प्रकार के कारणों से उत्पन्न होता है । अतः अत्यन्त बलवान् होने के कारण (अन्य संस्कारों के विनाशक) स्पर्श से युक्त द्रव्य के संयोग से भी वह विनष्ट नहीं होता । यही कारण है कि उससे दूसरे संस्कार की उत्पत्ति नहीं होती; क्योंकि पहले अपक्षेपण क्रियाजनित संस्कार का विनाश नहीं हुआ है । इससे यह समझते हैं कि पहले के संस्कार से युक्त मूसल में दूसरे संस्कार की उत्पत्ति नहीं होती है । "यस्मिन् काले संस्कारापेक्षादभिघातादप्रत्ययं मुसले उत्पतनकर्म, तस्मिन्नेव काले तमेव संस्कारमपेक्ष- माणाद्धस्तमुसलसंयोगादप्रत्ययं हस्तेऽप्युत्पतनकर्मेति" इस पक्ष में हाथ और मूसल दोनों

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७१९

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७१९ प्रशस्तपादभाष्यम् संयोगद्वयात् तोमरहस्तयोर्युगपदाकर्षणकर्मणी भवतः । प्रसारिते च हस्ते तदाकर्षणार्थः प्रयत्नो निवर्तते । तदनन्तरं तिर्यगूर्ध्वं दूरमासन्नं वा क्षिपामीतीच्छा सञ्जायते । तदनन्तरं तदनुरूपः प्रयत्नस्तम- पेक्षमाणस्तोमरहस्तसंयोगो नोदनाख्यः । तस्मात् तोमरे कर्मोत्पन्नं नोदनापेक्षं तस्मिन् संस्कारमारभते । ततः संस्कारनोदनाभ्यां तावत् क्रियायें उत्पन्न होती हैं । हाथ को पसार लेने पर आकर्षण का कारण वह प्रयत्न नष्ट हो जाता है । इसके बाद 'इसको किसी पार्श्व में या ऊपर बहुत दूर या निकट में ही फेंक दूँ' यह इच्छा उत्पन्न होती है । फिर (इच्छा- विषयीभूत) उस क्रिया के अनुकूल प्रयत्न उत्पन्न होता है । इसके बाद इस प्रयत्न के साहाय्य से तोमर और हाथ में नोदन नाम के संयोग की उत्पत्ति होती है । नोदन नाम के संयोग से तोमर में उत्पन्न क्रिया उस नोदन की न्यायकन्दली हस्तेऽप्युत्पतनकर्मेति । अस्मिन् पक्षे हस्तमुसलोत्पतनकर्मणोर्वास्तवमेव यौगपद्यम् । पाणिमुक्तेषु गमनविधिः कथम् ? पाणिमुक्तेषु द्रव्येषु गमनविधिः गमनप्रकारः कथ- मुच्यत इति प्रश्ने कृते सत्याह-यदा तोमरमिति । युगपदाकर्षणेति, अनाकृष्योत्क्षेप्तुमशक्य- त्वात् । प्रयत्नो निवर्तत इति तयोर्हस्ततोमरयोराकर्षणप्रयोजनप्रयत्नो निवर्तते, तद्विरोधि- प्रसारणप्रयत्नोत्पादादित्यर्थः । तदनन्तरमिति । प्रसारणानन्तरम् । तिर्यगूर्ध्वं वा दूरमासन्नं वा क्षिपामीतीच्छोत्पद्यते । तदनन्तरं तदनुरूपः प्रयत्नः, तिर्यक्क्षेपणेच्छायां तिर्यक्क्षेपणप्रयत्नो में ही उत्पन्न कर्म वास्तव में एक ही समय उत्पन्न होते हैं (पहले पक्ष की तरह यहाँ यौगपद्य का शीघ्रतामूलक गौण प्रयोग नहीं है) । 'पाणिमुक्तेषु गमनविधिः कथम्' हाथ से फेंके हुए द्रव्यों की 'गमनविधि' गमन की रीति अर्थात् गमनक्रिया की उत्पत्ति किस प्रकार होती है ? यह प्रश्न किये जाने पर 'यदा तोमरम्' इत्यादि से समाधान किया गया है । 'युगपदाकर्षणेति' क्योंकि बिना आकर्षण के फेंकना सम्भव नहीं है । 'प्रयत्नो निवर्तत इति' अर्थात् हाथ और तोमर इन दोनों के आकर्षणरूप प्रयोजन का सम्पादन कर प्रयत्न निवृत्त हो जाता है; क्योंकि आकर्षण का विरोधी और प्रसारण का हेतुभूत प्रयत्न उत्पन्न हो गया रहता है । 'तदनन्तरम्' अर्थात् प्रसारण के बाद, टेढ़ा करके फेंके या ऊपर की ओर अथवा दूर फेंके अथवा समीप में फेंके, इस प्रकार की इच्छायें उत्पन्न होती हैं । 'तदनन्तरं तदनुरूपः प्रयत्नः' इसमें प्रयुक्त 'अनुरूप' शब्द के द्वारा यह अर्थ व्यक्त होता है कि

७२० न्यायकान्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [कर्मनिरूपण- प्रशस्तपादभाष्यम् कर्माणि भवन्ति यावद्धस्ततोमरविभाग इति । ततो विभागाग्नोदने निवृत्ते संस्कारादूर्ध्वं तिर्यग् दूरमासन्नं वा प्रयत्नानुरूपणि कर्माणि भवन्त्यापतनादिति । तथा यन्त्रमुक्तेषु गमनविधिः कथम् ? यो बलवान् कृतव्यायामो वामेन करेण धनुर्विष्टभ्य दक्षिणेन शरं सन्धाय सहायता से तोमर में संस्कार को उत्पन्न करती है । इसके बाद संस्कार और नोदन से तोमर में तब तक क्रियायें उत्पन्न होती रहती हैं, जब तक हाथ और तोमर का विभाग उत्पन्न नहीं हो जाता । इसके बाद विभाग से जब नोदन नाम के संयोग का नाश हो जाता है, तब उस संस्कार (वेग) से पतन के समय तक पार्श्व में, दूर में या समीप में फेंकी जाने की क्रियायें उत्पन्न होती रहती हैं । इसी प्रकार यन्त्र (धनुषादि) के द्वारा फेंकी हुई (शरादि) वस्तुओं में भी गमन क्रिया की रीति जाननी चाहिए । (प्र.) कैसे ? (उ.) न्यायकन्दली जायत इति । ऊर्ध्वक्षेपणेच्छायामूर्ध्वक्षेपणप्रयत्नो जायते । दूरक्षेपणेच्छायां महान् प्रयत्नः, आसन्नक्षेपणेच्छायां च शिथिलः प्रयत्नो जायत इति तदनुरूपशब्दार्थः । तमपेक्षमाण- स्तोमरहस्तसंयोगो नोदनाख्यो नोद्यस्य तोमरस्य नोदकस्य च हस्तस्य सहगमनहेतुत्वात् । तस्मान्नोदनाख्याद् यथोक्तादिच्छानुरूपप्रयत्नापेक्षात् तोमरे कर्मोत्पन्नम् । तत् कर्म नोदना- पेक्षम्, तस्मिन् तोमरे संस्कारमारभते । ततः संस्कारेति । तोमरस्य पतनं यावत् संस्कारात् तदनुरूपाणि कर्माणि भवन्तीत्यर्थः । कृतव्यायामः कृतायुधाभ्यासो वामेन करेण धनुर्विष्टभ्य गाढं गृहीत्वा दक्षिणेन शरं सन्धाय ज्यायां शरं संयोज्य सशरां ज्यां शरेण सह वर्तमानां टेढ़ा कर फेंकने की इच्छा के होने पर प्रयत्न भी तदनुकूल ही उत्पन्न होता है । एवं ऊपर की ओर फेंकने की इच्छा होने पर ऊपर फेंकने के अनुकूल ही प्रयत्न भी उत्पन्न होता है । दूर फेंकने की इच्छा होने पर बहुत बड़ा प्रयत्न उत्पन्न होता है । समीप में फेंकने की इच्छा होने पर शिथिल प्रयत्न उत्पन्न होता है । 'तमपेक्षमाणस्तोमरहस्तसंयोगो नोदनाख्यः' क्योंकि नोद्य जो तोमर एवं नोदक जो हाथ, इन दोनों के साथ-साथ ही वह गमन का भी कारण है । 'तस्मात्' अर्थात् कथित उस नोदन नाम के संयोग के द्वारा उक्त इच्छानुरूप प्रयत्न के साहाय्य से तोमर में क्रिया की उत्पत्ति होती है । यही क्रिया नोदन संयोग की सहायता से तोमर में संस्कार (वेग को) उत्पन्न करती है । 'ततः संस्कारेति' अर्थात् जब तक तोमर का पतन नहीं हो जाता, तब तक वेग से उसमें नोदन के अनुरूप क्रियाओं की उत्पत्ति होती है ।

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ७२१

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ७२१ प्रशस्तपादभाष्यम् सशरां ज्यां मुष्टिना गृहीत्वा आकर्षणेच्छां करोति, सज्येष्व्याकर्ष- याम्येतद् धनुरिति । तदनन्तरं प्रयत्नस्तमपेक्षमाणादात्महस्तसंयोगादाक- र्षणकर्म हस्ते यदैवोत्पद्यते तदैव तमेव प्रयत्नमपेक्षमाणाद्धस्तज्याशर- संयोगाद् ज्यायां शरे च कर्म, प्रयत्नविशिष्टहस्तज्याशरसंयोगमपेक्ष- माणाभ्यां ज्याकोटिसंयोगाभ्यां कर्मणी भवतो धनुष्कोट्योरित्येतत् धनुषादि चालन में निपुण व्यक्ति जिस समय बायें हाथ से धनुषादि को जोर से पकड़कर दाहिने हाथ से उसमें तीर को लगाता है और तीर सहित धनुष की डोरी को मुट्ठी से पकड़कर उसे खींचने की इस प्रकार की इच्छा करता है कि 'मैं शर और डोरी सहित धनुष को खीचूँ' उसके बाद प्रयत्न की उत्पत्ति होती है । आत्मा और हाथ के संयोग एवं उक्त प्रयत्न इन दोनों से जिस समय आकर्षणात्मक क्रिया की उत्पत्ति होती है, उसी समय उस प्रयत्न और हाथ का डोरी से संयोग और डोरी का तीर के साथ संयोग इन दोनों संयोग प्रभृति कारणों से डोरी और तीर दोनों में ही क्रियायें उत्पन्न होती हैं । धनुष के दोनों कोणों के साथ डोरी के दोनों संयोगों से धनुष के दोनों कोणों में दो क्रियाओं की उत्पत्ति होती है । इन दोनों क्रियाओं की उत्पत्ति में प्रयत्न से युक्त हाथ के साथ डोरी और तीर के न्यायकन्दली ज्यां मुष्टिना गृहीत्वा इच्छां करोति सज्येष्व्याकर्षयाम्येतद् धनुरिति । ज्येति धनुर्गुणस्याख्या, इषुरिति शरस्याभिधानम् । ज्या च इषुश्च ज्येषू, सह ज्येषुभ्यां वर्तत इति सज्येषु धनुरे तदाकर्षयामीतीच्छाया आकारो दर्शितः । तदनन्तरं प्रयत्नस्तमपेक्षमाणादात्महस्तसंयोगादाकर्षणकर्म हस्ते यदैवोत्पद्यते, तदैव तं प्रयत्नमपेक्षमाणाद्धस्तज्याशरसंयोगाज्ज्यायां शरे च कर्म हस्तशर- संयोगात् । प्रयत्नविशिष्टज्याहस्तसंयोगमपेक्षमाणाभ्यां ज्याकोटिसंयोगाभ्यां जो पुरुष अस्त्र चलाने का अभ्यास किया हो वही पुरुष 'कृतव्यायामः' शब्द से अभिप्रेत है । 'वामेन करेण धनुर्विष्ठभ्य' अर्थात् वह जब बायें हाथ से धनुष को दृढ़तापूर्वक पकड़कर 'दक्षिणेन शरं सन्धाय' अर्थात् धनुष की डोरी में तीर को लगाकर, 'सशरां ज्याम्' अर्थात् तीर में लगी हुई डोरी को, 'मुष्टिना गृहीत्वा' अर्थात् मुट्ठी से पकड़कर इच्छा करता है कि 'सज्येष्याकर्षयाम्येतद्धनुरिति' धनुष की डोरी का नाम 'ज्या' है । 'इषु' शब्द शर (तीर) का वाचक है । 'सज्येषुधनुः' यह शब्द 'ज्या च इषुश्च ज्येषू, सह ज्येषुभ्यां वर्तत इति सज्येषु धनुः' इस प्रकार की व्युत्पत्ति से निष्पन्न है । 'एतदाक- र्षयामि' इस वाक्य के द्वारा प्रकृत इच्छा का आकार दिखलाया गया है । 'तदनन्तरं प्रयत्नस्तमपेक्षमाणादात्महस्तसंयोगादाकर्षणकर्म हस्तशरसंयोगात, प्रयत्नविशिष्ट- ज्याहस्तसंयोगमपेक्षमाणाभ्यां ज्याकोटिसंयोगाभ्या कर्मणी धनुष्कोट्योरित्येतत् सर्वं

७२२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ कर्मनिरूपण- प्रशस्तपादभाष्यम् सर्वं युगपत् । एवमाकर्णादाकृष्टे धनुषि नातः परमेनैन गन्तव्यमिति यज्ज्ञानं ततस्तदाकर्षणार्थस्य प्रयत्नस्य विनाशस्ततः पुनर्मोक्षणेच्छा सञ्जायते, तदनन्तरं प्रयत्नस्तमपेक्षमाणादात्माङ्गुलिसंयोगादङ्गुलिकर्म, तस्माज्ज्याङ्गुलिविभागः, ततो विभागात् संयोगविनाशः, तस्मिन् विनष्टे प्रतिबन्धकाभावाद् यदा धनुषि वर्तमानः स्थितिस्थापकः संस्कारो मण्डलीभूतं धनुर्र्यथावस्थितं स्थापयति, तदा संयोग भी सहायक हैं । ये सभी काम एक ही समय होते हैं । इस प्रकार कान तक धनुष के खींचे जाने पर 'इसको इससे आगे नहीं जाना चाहिए' इस आकार का (संकल्पात्मक) ज्ञान (उत्पन्न होता है) । इस ज्ञान से आकर्षण के कारणीभूत प्रयत्न का विनाश हो जाता है । फिर उसे छोड़ने की इच्छा उत्पन्न होती है । इसके बाद तदनुकूल प्रयत्न की उत्पत्ति होती है । आत्मा और अङ्गुलि के संयोग से अङ्गुलि में क्रिया की उत्पत्ति होती है, जिसमें उक्त प्रयत्न का साहाय्य भी अपेक्षित होता है । अङ्गुलि की इस क्रिया से डोरी और अङ्गुलि में विभाग उत्पन्न होता है । इस विभाग से (डोरी और अङ्गुलि के) संयोग का विनाश होता है। उस संयोग के नष्ट हो जाने पर किसी प्रतिबन्धक के न रहने के कारण धनुष न्यायकन्दली कर्मणी धनुष्कोट्योरित्येतत् सर्वं युगपत्, कारणयौगपद्यात् । एवमाकर्णादाकृष्टे धनुषि नातः परमेनैन हस्तेन गन्तव्यमिति यद् ज्ञानं तस्मात् । तदाकर्षणार्थस्येति धनुरा- कर्षणार्थस्य प्रयत्नस्य विनाश इति । ततः शरस्य गुणस्य च मोक्षणेच्छा च । तदनन्तरं प्रयत्नो मोक्षणार्थः, तमपेक्षमाणादात्माङ्गुलिसंयोगादङ्गुलिकर्म । तस्माद् ज्याङ्गुलिविभागः, शरगुणाभ्याम् । युगपत्' क्योंकि सब की सामग्री एक ही समय उपस्थित है । 'एवमाकर्णादाकृष्टे धनुषि नातः परमेनैन हस्तेन गन्तव्यमिति यज्ज्ञानम्' अर्थात् उसी ज्ञान से 'तदाकर्षणार्थस्य' धनुष को अपनी ओर खींचने के लिए जो प्रयत्न था, उसका विनाश होता है । इसके बाद तीर और डोरी को छोड़ देने की इच्छा होती है, उसके बाद छोड़ने के अनुकूल प्रयत्न की उत्पत्ति होती है 'तमपेक्षमाणादात्माङ्गुलिसंयोगादङ्गुलिकर्म, तस्माज्ज्याङ्गुलिविभागः' अर्थात् डोरी का शर से और अङ्गुलि का डोरी से विभाग उत्पन्न होता है । इस विभाग से शर का और डोरी का संयोग और डोरी के

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७२३

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७२३ प्रशस्तपादभाष्यम् तमेव संस्कारमपेक्षमाणाद् धनुर्ज्यासंयोगाद् ज्यायां शरे च कर्मोत्पद्यते । तत् स्वकारणापेक्षं ज्यायां संस्कारं करोति । तमपेक्षमाण इषुज्यासंयोगो नोदनम्, तस्मादिषावाद्यं कर्म नोदनापेक्षमिषौ संस्कारमारभते । तस्मात् संस्कारान्नोदनसहायात् तावत् कर्माणि भवन्ति यावदिषुज्या- विभागः, विभागान्निवृत्ते नोदने कर्माण्युत्तरोत्तराणीषु- में रहनेवाला (स्थितिस्थापक) संस्कार नमे हुये उस धनुष को पहली अवस्था में ले आता है । उसी समय इस स्थितिस्थापक संस्कार एवं धनुष और डोरी के संयोग इन दोनों से तीर में क्रिया उत्पन्न होती है । यह क्रिया अपने कारणीभूत (धनुष और डोरी के संयोग) के साहाय्य से डोरी में (वेगाख्य) संस्कार को उत्पन्न करती है । इस संस्कार के द्वारा तीर एवं डोरी इन दोनों में 'नोदन' नाम के संयोग की उत्पत्ति होती है । इस नोदन संयोग के साहाय्य से तीर की पहली क्रिया तीर में (वेगाख्य) संस्कार को उत्पन्न करती है । यह संस्कार उक्त नोदनसंयोग की सहायता से तब तक क्रियाओं को उत्पन्न करता है, जब तक डोरी और तीर का न्यायकन्दली ततो विभागाच्छरगुणाङ्गुलिसंयोगविनाशात्तस्मिन् संयोगे विनष्टे प्रतिबन्धकाभावाद् यदा धनुषि वर्तमानः स्थितिस्थापकः संस्कारो मण्डलीभूतं धनुर्यथावस्थितं स्थाप- यति । तं संस्कारमपेक्षमाणाद् धनुर्ज्यासंयोगाद् ज्यायां शरे च कर्मोत्पद्यते । तत् कर्म स्वकारणापेक्षं धनुर्ज्यासंयोगापेक्षं ज्यायां संस्कारं वेगाख्यं करोति, तं च संस्कारमपेक्षमाण इषुज्यासंयोगो नोदनम्, नोद्यस्येषोर्नोदकस्य गुणस्य सहगमन- हेतुत्वात् । तस्माद् नोदनादिषावाद्यं कर्म संस्कारमारभते । तस्मात् संस्काराद् नोदनसहायात् तावत् कर्माणि भवन्ति यावदिषुज्याविभागः । साथ अङ्गुलि का संयोग इन दोनों संयोगों का विनाश हो जाता है । इन संयोगों के विनष्ट होने पर जिस समय धनुष में रहनेवाला स्थितिस्थापक संस्कार किसी प्रति- बन्धक के न रहने के कारण नमे हुये धनुष को अपनी पहली अवस्था में ले आता है, (उसी समय) इस स्थितिस्थापक संस्कार के साहाय्य से ही धनुष और डोरी के संयोग के द्वारा डोरी में और शर में क्रिया उत्पन्न होती है । 'तत्' अर्थात् वह कर्म 'स्वकारणा- पेक्षम्' अर्थात् धनुष और डोरी के संयोग का साहाय्य पाकर डोरी में संस्कार को अर्थात् वेग नाम के संस्कार को उत्पन्न करता है । उसी वेग से तीर और डोरी का 'नोदन', संयोग उत्पन्न होता है, (वह संयोग नोदनरूप इसलिए है कि) नोद्य (प्रेर्य) जो तीर और नोदक (प्रेरक) जो डोरी इन दोनों में साथ-साथ गमन क्रिया के उत्पादन का हेतु है । इस नोदन संयोग के साहाय्य से पहली क्रिया तीर में संस्कार को उत्पन्न करती है ।

७२४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् | कर्मनिरूपण- प्रशस्तपादभाष्यम् संस्कारादेवापतनादिति । बहूनि कर्माणि क्रमशः कस्मात् ? संयोगबहुत्वात् । एकस्तु संस्कारः, अन्तराले कर्मणोऽपेक्षाकारणाभावादिति । विभाग उत्पन्न नहीं हो जाता । विभाग से नोदन नाम के संयोग के विनष्ट हो जाने पर तीर के वेग नाम के संस्कार से ही आगे की क्रियायें तीर के गिरने तक होती रहती हैं । (प्र.) बहुत सी क्रियायें क्रमशः क्यों उत्पन्न होती हैं ? (उ.) यतः संयोग बहुत से हैं । किन्तु संस्कार उसमें एक ही रहता है, क्योंकि बीच में (संस्कार के उत्पादक प्रथम) कर्म को अपेक्षित अन्य कारणों का (सहयोग प्राप्त) नहीं है । न्यायकन्दली विभागात्रिवृत्ते नोदने कर्माणि उत्तराणि संस्कारादेव वेगाख्याद् भवन्ति यावत् पतनम्, इषोरेतस्य च पातो गुरुत्वप्रतिबन्धकसंस्कारक्षयात् । अत्र चोदयति-बहूनि कर्माणि क्रमशः कस्मादिति । ज्याविभक्तस्येषो- रन्तराले क्रमश्रो बहूनि कर्माणि भवन्तीति कस्मात् कल्प्यते ? एकमेव कर्म कुतो न कल्पितमित्यभिप्रायः । समाधत्ते-संयोगबहुत्वादिति । उत्तरसंयो- गान्तं कर्मेत्यवस्थितम् । क्षिप्तस्येषोरन्तराले बहवः संयोगा दृश्यन्ते । तेन बहूनि कर्माणि भवन्तीत्याश्रीयते । एकस्तु संस्कारः, अन्तराले कर्मणोऽपेक्षाकारणाभावात् । नोदनाभिघातयोरन्यतरापेक्षं कर्म संस्कारमारभते न कर्ममात्रम्, वेगाभावात् । नोदन से साहाय्यप्राप्त उस संस्कार से ही तब तक क्रियायें उत्पन्न होती रहती हैं, जब तक कि तीर और डोरी का विभाग उत्पन्न नहीं हो जाता । इस विभाग से जब उक्त नोदन संयोग का नाश हो जाता है, तब 'संस्कार' से ही अर्थात् वेग नाम के संस्कार से ही तब तक क्रियायें उत्पन्न होती रहती हैं जब तक कि तीर का पतन नहीं हो जाता । यह पतन गुरुत्व के प्रतिबन्धक संस्कार के नाश से उत्पन्न होता है । 'बहूनि कर्माणि क्रमशः कस्मात्' इस वाक्य के द्वारा फिर आक्षेप करते हैं । उक्त आक्षेपभाष्य का यह अभिप्राय है कि डोरी से विभक्त तीर में मध्यवर्ती अनेक क्रियाओं की कल्पना किस हेतु से की जाती है ? एक ही कर्म की कल्पना क्यों नहीं की जाती ? 'संयोगबहुत्वात्' इत्यादि से उक्त आक्षेप का समाधान करते है । यह निश्चित है कि क्रिया की सत्ता उत्तरदेश संयोग तक रहती है । एवं फेके हुए तीर के बीच में बहुत से संयोग देखे जाते हैं । अतः यह कल्पना करते हैं कि कर्म भी बहुत से उत्पन्न होते हैं । 'एकस्तु संस्कारोऽन्त- राले कर्मणोऽपेक्षाकारणाभावात्' नोदनसंयोग हो या अभिघातसंयोग हो, इन दोनों में से किसी एक का साहाय्य पाकर ही कर्म संस्कार को उत्पन्न करता है, केवल कर्म से वेगाख्य संस्कार की उत्पत्ति नहीं होती । बीच में न नोदनसंयोग की

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ७२५

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ७२५ प्रशस्तपादभाष्यम् एवमात्माधिष्ठितेषु सत्प्रत्ययमप्रत्ययं च कर्मोक्तम् । अनधिष्ठितेषु बाह्येषु चतुर्षु महाभूतेष्वप्रत्ययं कर्म गमनमेव नोदनादिभ्यो भवति । तत्र नोदनं गुरुत्वद्रवत्ववेगप्रयत्नान् समस्त- इस प्रकार आत्मा से अधिष्ठित द्रव्यों के प्रयत्नजनित और अप्रयत्न- जनित दोनों ही प्रकार के कर्म कहे गये हैं । आत्मा की अध्यक्षता के बिना बाह्य चारों महाभूतों में बिना प्रयत्न के केवल नोदनादि से गमन- रूप क्रिया की ही उत्पत्ति होती है (उत्क्षेपणादि क्रियाओं की नहीं) । यहाँ (कथित) 'नोदन' उस संयोग विशेष का नाम है जो कभी गुरुत्व, द्रवत्व, वेग और प्रयत्न सम्मिलित इन चार गुणों से, कभी इनमें से एक, दो या तीन गुणों से उत्पन्न होता है । यह विभाग को उत्पन्न न न्यायकन्दली न चान्तराले नोदनं नाप्यभिघातः, तस्मादेक एव शरज्यासंयोगापेक्षेण शरकर्मणा कृतो विशिष्टः संस्कारो यावत् पतनमनुवर्तते । यथा यथा चास्य कार्यकरणाच्छक्तिः क्षीयते, तथा तथा कार्यं मन्दतरतादिभेदभिन्नमुपजायते । यथा तरोस्तरुणस्य फलं प्रकृष्यतेऽपकृष्यते च जीर्णस्य । उपसंहरति- एवमिति । अनधिष्ठितेषु बाह्येषु चतुर्षु महाभूतेष्वप्रत्ययं गमनमेव नोदनादिभ्यो भवति । आत्मना असाधारणेन सम्बन्धिनानधि- ष्ठितेषु बाह्येष्वप्रयत्नपूर्वकं गमनाख्यमेव कर्म भवति, नोत्क्षेपणापक्षेपणादिक- मित्यर्थः । महाभूतेषु नोदनादिभ्यः कर्म भवतीत्युक्तम् । अथ किं नोदनमत आह- उत्पत्ति होती है, न अभिघातसंयोग की । अतः तीर और डोरी के एक ही संयोग के साहाय्य से तीर की क्रिया के द्वारा जिस विशेष प्रकार के वेगाख्य संस्कार की उत्पत्ति होती है, वही तीर के पतन होने तक बराबर बना रहता है । जैसे-जैसे उससे कार्य होते जाते हैं, उसकी शक्ति क्षीण होती है, एवं कार्य भी (शक्ति की क्षीणता से) क्रमशः मन्द, मन्दतर और मन्दतम होते जाते हैं । जैसे कि तरुणवृक्ष का फल बढ़िया होता है और जीर्ण वृक्ष का फल घटिया । 'एवम्' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा इस प्रसङ्ग का उपसंहार करते हैं । "अनधिष्ठितेषु बाह्येषु चतुर्षु महाभूतेष्वप्रत्ययं गमनमेव नोदनादिभ्यो भवति" । अर्थात् आत्मारूप असाधारण आश्रय से असम्बद्ध पृथिव्यादि बाह्य चारों द्रव्यों में बिना प्रयत्न (अप्रयत्नपूर्वकम्) के (नोदनादि संयोगों के द्वारा) गमन नाम का कर्म ही उत्पन्न होता है, उत्क्षेपण या अपक्षेपण प्रभृति कर्म नहीं ।