वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
७२० न्यायकान्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [कर्मनिरूपण- प्रशस्तपादभाष्यम् कर्माणि भवन्ति यावद्धस्ततोमरविभाग इति । ततो विभागाग्नोदने निवृत्ते संस्कारादूर्ध्वं तिर्यग् दूरमासन्नं वा प्रयत्नानुरूपणि कर्माणि भवन्त्यापतनादिति । तथा यन्त्रमुक्तेषु गमनविधिः कथम् ? यो बलवान् कृतव्यायामो वामेन करेण धनुर्विष्टभ्य दक्षिणेन शरं सन्धाय सहायता से तोमर में संस्कार को उत्पन्न करती है । इसके बाद संस्कार और नोदन से तोमर में तब तक क्रियायें उत्पन्न होती रहती हैं, जब तक हाथ और तोमर का विभाग उत्पन्न नहीं हो जाता । इसके बाद विभाग से जब नोदन नाम के संयोग का नाश हो जाता है, तब उस संस्कार (वेग) से पतन के समय तक पार्श्व में, दूर में या समीप में फेंकी जाने की क्रियायें उत्पन्न होती रहती हैं । इसी प्रकार यन्त्र (धनुषादि) के द्वारा फेंकी हुई (शरादि) वस्तुओं में भी गमन क्रिया की रीति जाननी चाहिए । (प्र.) कैसे ? (उ.) न्यायकन्दली जायत इति । ऊर्ध्वक्षेपणेच्छायामूर्ध्वक्षेपणप्रयत्नो जायते । दूरक्षेपणेच्छायां महान् प्रयत्नः, आसन्नक्षेपणेच्छायां च शिथिलः प्रयत्नो जायत इति तदनुरूपशब्दार्थः । तमपेक्षमाण- स्तोमरहस्तसंयोगो नोदनाख्यो नोद्यस्य तोमरस्य नोदकस्य च हस्तस्य सहगमनहेतुत्वात् । तस्मान्नोदनाख्याद् यथोक्तादिच्छानुरूपप्रयत्नापेक्षात् तोमरे कर्मोत्पन्नम् । तत् कर्म नोदना- पेक्षम्, तस्मिन् तोमरे संस्कारमारभते । ततः संस्कारेति । तोमरस्य पतनं यावत् संस्कारात् तदनुरूपाणि कर्माणि भवन्तीत्यर्थः । कृतव्यायामः कृतायुधाभ्यासो वामेन करेण धनुर्विष्टभ्य गाढं गृहीत्वा दक्षिणेन शरं सन्धाय ज्यायां शरं संयोज्य सशरां ज्यां शरेण सह वर्तमानां टेढ़ा कर फेंकने की इच्छा के होने पर प्रयत्न भी तदनुकूल ही उत्पन्न होता है । एवं ऊपर की ओर फेंकने की इच्छा होने पर ऊपर फेंकने के अनुकूल ही प्रयत्न भी उत्पन्न होता है । दूर फेंकने की इच्छा होने पर बहुत बड़ा प्रयत्न उत्पन्न होता है । समीप में फेंकने की इच्छा होने पर शिथिल प्रयत्न उत्पन्न होता है । 'तमपेक्षमाणस्तोमरहस्तसंयोगो नोदनाख्यः' क्योंकि नोद्य जो तोमर एवं नोदक जो हाथ, इन दोनों के साथ-साथ ही वह गमन का भी कारण है । 'तस्मात्' अर्थात् कथित उस नोदन नाम के संयोग के द्वारा उक्त इच्छानुरूप प्रयत्न के साहाय्य से तोमर में क्रिया की उत्पत्ति होती है । यही क्रिया नोदन संयोग की सहायता से तोमर में संस्कार (वेग को) उत्पन्न करती है । 'ततः संस्कारेति' अर्थात् जब तक तोमर का पतन नहीं हो जाता, तब तक वेग से उसमें नोदन के अनुरूप क्रियाओं की उत्पत्ति होती है ।
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ७२१
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ७२१ प्रशस्तपादभाष्यम् सशरां ज्यां मुष्टिना गृहीत्वा आकर्षणेच्छां करोति, सज्येष्व्याकर्ष- याम्येतद् धनुरिति । तदनन्तरं प्रयत्नस्तमपेक्षमाणादात्महस्तसंयोगादाक- र्षणकर्म हस्ते यदैवोत्पद्यते तदैव तमेव प्रयत्नमपेक्षमाणाद्धस्तज्याशर- संयोगाद् ज्यायां शरे च कर्म, प्रयत्नविशिष्टहस्तज्याशरसंयोगमपेक्ष- माणाभ्यां ज्याकोटिसंयोगाभ्यां कर्मणी भवतो धनुष्कोट्योरित्येतत् धनुषादि चालन में निपुण व्यक्ति जिस समय बायें हाथ से धनुषादि को जोर से पकड़कर दाहिने हाथ से उसमें तीर को लगाता है और तीर सहित धनुष की डोरी को मुट्ठी से पकड़कर उसे खींचने की इस प्रकार की इच्छा करता है कि 'मैं शर और डोरी सहित धनुष को खीचूँ' उसके बाद प्रयत्न की उत्पत्ति होती है । आत्मा और हाथ के संयोग एवं उक्त प्रयत्न इन दोनों से जिस समय आकर्षणात्मक क्रिया की उत्पत्ति होती है, उसी समय उस प्रयत्न और हाथ का डोरी से संयोग और डोरी का तीर के साथ संयोग इन दोनों संयोग प्रभृति कारणों से डोरी और तीर दोनों में ही क्रियायें उत्पन्न होती हैं । धनुष के दोनों कोणों के साथ डोरी के दोनों संयोगों से धनुष के दोनों कोणों में दो क्रियाओं की उत्पत्ति होती है । इन दोनों क्रियाओं की उत्पत्ति में प्रयत्न से युक्त हाथ के साथ डोरी और तीर के न्यायकन्दली ज्यां मुष्टिना गृहीत्वा इच्छां करोति सज्येष्व्याकर्षयाम्येतद् धनुरिति । ज्येति धनुर्गुणस्याख्या, इषुरिति शरस्याभिधानम् । ज्या च इषुश्च ज्येषू, सह ज्येषुभ्यां वर्तत इति सज्येषु धनुरे तदाकर्षयामीतीच्छाया आकारो दर्शितः । तदनन्तरं प्रयत्नस्तमपेक्षमाणादात्महस्तसंयोगादाकर्षणकर्म हस्ते यदैवोत्पद्यते, तदैव तं प्रयत्नमपेक्षमाणाद्धस्तज्याशरसंयोगाज्ज्यायां शरे च कर्म हस्तशर- संयोगात् । प्रयत्नविशिष्टज्याहस्तसंयोगमपेक्षमाणाभ्यां ज्याकोटिसंयोगाभ्यां जो पुरुष अस्त्र चलाने का अभ्यास किया हो वही पुरुष 'कृतव्यायामः' शब्द से अभिप्रेत है । 'वामेन करेण धनुर्विष्ठभ्य' अर्थात् वह जब बायें हाथ से धनुष को दृढ़तापूर्वक पकड़कर 'दक्षिणेन शरं सन्धाय' अर्थात् धनुष की डोरी में तीर को लगाकर, 'सशरां ज्याम्' अर्थात् तीर में लगी हुई डोरी को, 'मुष्टिना गृहीत्वा' अर्थात् मुट्ठी से पकड़कर इच्छा करता है कि 'सज्येष्याकर्षयाम्येतद्धनुरिति' धनुष की डोरी का नाम 'ज्या' है । 'इषु' शब्द शर (तीर) का वाचक है । 'सज्येषुधनुः' यह शब्द 'ज्या च इषुश्च ज्येषू, सह ज्येषुभ्यां वर्तत इति सज्येषु धनुः' इस प्रकार की व्युत्पत्ति से निष्पन्न है । 'एतदाक- र्षयामि' इस वाक्य के द्वारा प्रकृत इच्छा का आकार दिखलाया गया है । 'तदनन्तरं प्रयत्नस्तमपेक्षमाणादात्महस्तसंयोगादाकर्षणकर्म हस्तशरसंयोगात, प्रयत्नविशिष्ट- ज्याहस्तसंयोगमपेक्षमाणाभ्यां ज्याकोटिसंयोगाभ्या कर्मणी धनुष्कोट्योरित्येतत् सर्वं
७२२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ कर्मनिरूपण- प्रशस्तपादभाष्यम् सर्वं युगपत् । एवमाकर्णादाकृष्टे धनुषि नातः परमेनैन गन्तव्यमिति यज्ज्ञानं ततस्तदाकर्षणार्थस्य प्रयत्नस्य विनाशस्ततः पुनर्मोक्षणेच्छा सञ्जायते, तदनन्तरं प्रयत्नस्तमपेक्षमाणादात्माङ्गुलिसंयोगादङ्गुलिकर्म, तस्माज्ज्याङ्गुलिविभागः, ततो विभागात् संयोगविनाशः, तस्मिन् विनष्टे प्रतिबन्धकाभावाद् यदा धनुषि वर्तमानः स्थितिस्थापकः संस्कारो मण्डलीभूतं धनुर्र्यथावस्थितं स्थापयति, तदा संयोग भी सहायक हैं । ये सभी काम एक ही समय होते हैं । इस प्रकार कान तक धनुष के खींचे जाने पर 'इसको इससे आगे नहीं जाना चाहिए' इस आकार का (संकल्पात्मक) ज्ञान (उत्पन्न होता है) । इस ज्ञान से आकर्षण के कारणीभूत प्रयत्न का विनाश हो जाता है । फिर उसे छोड़ने की इच्छा उत्पन्न होती है । इसके बाद तदनुकूल प्रयत्न की उत्पत्ति होती है । आत्मा और अङ्गुलि के संयोग से अङ्गुलि में क्रिया की उत्पत्ति होती है, जिसमें उक्त प्रयत्न का साहाय्य भी अपेक्षित होता है । अङ्गुलि की इस क्रिया से डोरी और अङ्गुलि में विभाग उत्पन्न होता है । इस विभाग से (डोरी और अङ्गुलि के) संयोग का विनाश होता है। उस संयोग के नष्ट हो जाने पर किसी प्रतिबन्धक के न रहने के कारण धनुष न्यायकन्दली कर्मणी धनुष्कोट्योरित्येतत् सर्वं युगपत्, कारणयौगपद्यात् । एवमाकर्णादाकृष्टे धनुषि नातः परमेनैन हस्तेन गन्तव्यमिति यद् ज्ञानं तस्मात् । तदाकर्षणार्थस्येति धनुरा- कर्षणार्थस्य प्रयत्नस्य विनाश इति । ततः शरस्य गुणस्य च मोक्षणेच्छा च । तदनन्तरं प्रयत्नो मोक्षणार्थः, तमपेक्षमाणादात्माङ्गुलिसंयोगादङ्गुलिकर्म । तस्माद् ज्याङ्गुलिविभागः, शरगुणाभ्याम् । युगपत्' क्योंकि सब की सामग्री एक ही समय उपस्थित है । 'एवमाकर्णादाकृष्टे धनुषि नातः परमेनैन हस्तेन गन्तव्यमिति यज्ज्ञानम्' अर्थात् उसी ज्ञान से 'तदाकर्षणार्थस्य' धनुष को अपनी ओर खींचने के लिए जो प्रयत्न था, उसका विनाश होता है । इसके बाद तीर और डोरी को छोड़ देने की इच्छा होती है, उसके बाद छोड़ने के अनुकूल प्रयत्न की उत्पत्ति होती है 'तमपेक्षमाणादात्माङ्गुलिसंयोगादङ्गुलिकर्म, तस्माज्ज्याङ्गुलिविभागः' अर्थात् डोरी का शर से और अङ्गुलि का डोरी से विभाग उत्पन्न होता है । इस विभाग से शर का और डोरी का संयोग और डोरी के
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७२३
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७२३ प्रशस्तपादभाष्यम् तमेव संस्कारमपेक्षमाणाद् धनुर्ज्यासंयोगाद् ज्यायां शरे च कर्मोत्पद्यते । तत् स्वकारणापेक्षं ज्यायां संस्कारं करोति । तमपेक्षमाण इषुज्यासंयोगो नोदनम्, तस्मादिषावाद्यं कर्म नोदनापेक्षमिषौ संस्कारमारभते । तस्मात् संस्कारान्नोदनसहायात् तावत् कर्माणि भवन्ति यावदिषुज्या- विभागः, विभागान्निवृत्ते नोदने कर्माण्युत्तरोत्तराणीषु- में रहनेवाला (स्थितिस्थापक) संस्कार नमे हुये उस धनुष को पहली अवस्था में ले आता है । उसी समय इस स्थितिस्थापक संस्कार एवं धनुष और डोरी के संयोग इन दोनों से तीर में क्रिया उत्पन्न होती है । यह क्रिया अपने कारणीभूत (धनुष और डोरी के संयोग) के साहाय्य से डोरी में (वेगाख्य) संस्कार को उत्पन्न करती है । इस संस्कार के द्वारा तीर एवं डोरी इन दोनों में 'नोदन' नाम के संयोग की उत्पत्ति होती है । इस नोदन संयोग के साहाय्य से तीर की पहली क्रिया तीर में (वेगाख्य) संस्कार को उत्पन्न करती है । यह संस्कार उक्त नोदनसंयोग की सहायता से तब तक क्रियाओं को उत्पन्न करता है, जब तक डोरी और तीर का न्यायकन्दली ततो विभागाच्छरगुणाङ्गुलिसंयोगविनाशात्तस्मिन् संयोगे विनष्टे प्रतिबन्धकाभावाद् यदा धनुषि वर्तमानः स्थितिस्थापकः संस्कारो मण्डलीभूतं धनुर्यथावस्थितं स्थाप- यति । तं संस्कारमपेक्षमाणाद् धनुर्ज्यासंयोगाद् ज्यायां शरे च कर्मोत्पद्यते । तत् कर्म स्वकारणापेक्षं धनुर्ज्यासंयोगापेक्षं ज्यायां संस्कारं वेगाख्यं करोति, तं च संस्कारमपेक्षमाण इषुज्यासंयोगो नोदनम्, नोद्यस्येषोर्नोदकस्य गुणस्य सहगमन- हेतुत्वात् । तस्माद् नोदनादिषावाद्यं कर्म संस्कारमारभते । तस्मात् संस्काराद् नोदनसहायात् तावत् कर्माणि भवन्ति यावदिषुज्याविभागः । साथ अङ्गुलि का संयोग इन दोनों संयोगों का विनाश हो जाता है । इन संयोगों के विनष्ट होने पर जिस समय धनुष में रहनेवाला स्थितिस्थापक संस्कार किसी प्रति- बन्धक के न रहने के कारण नमे हुये धनुष को अपनी पहली अवस्था में ले आता है, (उसी समय) इस स्थितिस्थापक संस्कार के साहाय्य से ही धनुष और डोरी के संयोग के द्वारा डोरी में और शर में क्रिया उत्पन्न होती है । 'तत्' अर्थात् वह कर्म 'स्वकारणा- पेक्षम्' अर्थात् धनुष और डोरी के संयोग का साहाय्य पाकर डोरी में संस्कार को अर्थात् वेग नाम के संस्कार को उत्पन्न करता है । उसी वेग से तीर और डोरी का 'नोदन', संयोग उत्पन्न होता है, (वह संयोग नोदनरूप इसलिए है कि) नोद्य (प्रेर्य) जो तीर और नोदक (प्रेरक) जो डोरी इन दोनों में साथ-साथ गमन क्रिया के उत्पादन का हेतु है । इस नोदन संयोग के साहाय्य से पहली क्रिया तीर में संस्कार को उत्पन्न करती है ।
७२४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् | कर्मनिरूपण- प्रशस्तपादभाष्यम् संस्कारादेवापतनादिति । बहूनि कर्माणि क्रमशः कस्मात् ? संयोगबहुत्वात् । एकस्तु संस्कारः, अन्तराले कर्मणोऽपेक्षाकारणाभावादिति । विभाग उत्पन्न नहीं हो जाता । विभाग से नोदन नाम के संयोग के विनष्ट हो जाने पर तीर के वेग नाम के संस्कार से ही आगे की क्रियायें तीर के गिरने तक होती रहती हैं । (प्र.) बहुत सी क्रियायें क्रमशः क्यों उत्पन्न होती हैं ? (उ.) यतः संयोग बहुत से हैं । किन्तु संस्कार उसमें एक ही रहता है, क्योंकि बीच में (संस्कार के उत्पादक प्रथम) कर्म को अपेक्षित अन्य कारणों का (सहयोग प्राप्त) नहीं है । न्यायकन्दली विभागात्रिवृत्ते नोदने कर्माणि उत्तराणि संस्कारादेव वेगाख्याद् भवन्ति यावत् पतनम्, इषोरेतस्य च पातो गुरुत्वप्रतिबन्धकसंस्कारक्षयात् । अत्र चोदयति-बहूनि कर्माणि क्रमशः कस्मादिति । ज्याविभक्तस्येषो- रन्तराले क्रमश्रो बहूनि कर्माणि भवन्तीति कस्मात् कल्प्यते ? एकमेव कर्म कुतो न कल्पितमित्यभिप्रायः । समाधत्ते-संयोगबहुत्वादिति । उत्तरसंयो- गान्तं कर्मेत्यवस्थितम् । क्षिप्तस्येषोरन्तराले बहवः संयोगा दृश्यन्ते । तेन बहूनि कर्माणि भवन्तीत्याश्रीयते । एकस्तु संस्कारः, अन्तराले कर्मणोऽपेक्षाकारणाभावात् । नोदनाभिघातयोरन्यतरापेक्षं कर्म संस्कारमारभते न कर्ममात्रम्, वेगाभावात् । नोदन से साहाय्यप्राप्त उस संस्कार से ही तब तक क्रियायें उत्पन्न होती रहती हैं, जब तक कि तीर और डोरी का विभाग उत्पन्न नहीं हो जाता । इस विभाग से जब उक्त नोदन संयोग का नाश हो जाता है, तब 'संस्कार' से ही अर्थात् वेग नाम के संस्कार से ही तब तक क्रियायें उत्पन्न होती रहती हैं जब तक कि तीर का पतन नहीं हो जाता । यह पतन गुरुत्व के प्रतिबन्धक संस्कार के नाश से उत्पन्न होता है । 'बहूनि कर्माणि क्रमशः कस्मात्' इस वाक्य के द्वारा फिर आक्षेप करते हैं । उक्त आक्षेपभाष्य का यह अभिप्राय है कि डोरी से विभक्त तीर में मध्यवर्ती अनेक क्रियाओं की कल्पना किस हेतु से की जाती है ? एक ही कर्म की कल्पना क्यों नहीं की जाती ? 'संयोगबहुत्वात्' इत्यादि से उक्त आक्षेप का समाधान करते है । यह निश्चित है कि क्रिया की सत्ता उत्तरदेश संयोग तक रहती है । एवं फेके हुए तीर के बीच में बहुत से संयोग देखे जाते हैं । अतः यह कल्पना करते हैं कि कर्म भी बहुत से उत्पन्न होते हैं । 'एकस्तु संस्कारोऽन्त- राले कर्मणोऽपेक्षाकारणाभावात्' नोदनसंयोग हो या अभिघातसंयोग हो, इन दोनों में से किसी एक का साहाय्य पाकर ही कर्म संस्कार को उत्पन्न करता है, केवल कर्म से वेगाख्य संस्कार की उत्पत्ति नहीं होती । बीच में न नोदनसंयोग की
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ७२५
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ७२५ प्रशस्तपादभाष्यम् एवमात्माधिष्ठितेषु सत्प्रत्ययमप्रत्ययं च कर्मोक्तम् । अनधिष्ठितेषु बाह्येषु चतुर्षु महाभूतेष्वप्रत्ययं कर्म गमनमेव नोदनादिभ्यो भवति । तत्र नोदनं गुरुत्वद्रवत्ववेगप्रयत्नान् समस्त- इस प्रकार आत्मा से अधिष्ठित द्रव्यों के प्रयत्नजनित और अप्रयत्न- जनित दोनों ही प्रकार के कर्म कहे गये हैं । आत्मा की अध्यक्षता के बिना बाह्य चारों महाभूतों में बिना प्रयत्न के केवल नोदनादि से गमन- रूप क्रिया की ही उत्पत्ति होती है (उत्क्षेपणादि क्रियाओं की नहीं) । यहाँ (कथित) 'नोदन' उस संयोग विशेष का नाम है जो कभी गुरुत्व, द्रवत्व, वेग और प्रयत्न सम्मिलित इन चार गुणों से, कभी इनमें से एक, दो या तीन गुणों से उत्पन्न होता है । यह विभाग को उत्पन्न न न्यायकन्दली न चान्तराले नोदनं नाप्यभिघातः, तस्मादेक एव शरज्यासंयोगापेक्षेण शरकर्मणा कृतो विशिष्टः संस्कारो यावत् पतनमनुवर्तते । यथा यथा चास्य कार्यकरणाच्छक्तिः क्षीयते, तथा तथा कार्यं मन्दतरतादिभेदभिन्नमुपजायते । यथा तरोस्तरुणस्य फलं प्रकृष्यतेऽपकृष्यते च जीर्णस्य । उपसंहरति- एवमिति । अनधिष्ठितेषु बाह्येषु चतुर्षु महाभूतेष्वप्रत्ययं गमनमेव नोदनादिभ्यो भवति । आत्मना असाधारणेन सम्बन्धिनानधि- ष्ठितेषु बाह्येष्वप्रयत्नपूर्वकं गमनाख्यमेव कर्म भवति, नोत्क्षेपणापक्षेपणादिक- मित्यर्थः । महाभूतेषु नोदनादिभ्यः कर्म भवतीत्युक्तम् । अथ किं नोदनमत आह- उत्पत्ति होती है, न अभिघातसंयोग की । अतः तीर और डोरी के एक ही संयोग के साहाय्य से तीर की क्रिया के द्वारा जिस विशेष प्रकार के वेगाख्य संस्कार की उत्पत्ति होती है, वही तीर के पतन होने तक बराबर बना रहता है । जैसे-जैसे उससे कार्य होते जाते हैं, उसकी शक्ति क्षीण होती है, एवं कार्य भी (शक्ति की क्षीणता से) क्रमशः मन्द, मन्दतर और मन्दतम होते जाते हैं । जैसे कि तरुणवृक्ष का फल बढ़िया होता है और जीर्ण वृक्ष का फल घटिया । 'एवम्' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा इस प्रसङ्ग का उपसंहार करते हैं । "अनधिष्ठितेषु बाह्येषु चतुर्षु महाभूतेष्वप्रत्ययं गमनमेव नोदनादिभ्यो भवति" । अर्थात् आत्मारूप असाधारण आश्रय से असम्बद्ध पृथिव्यादि बाह्य चारों द्रव्यों में बिना प्रयत्न (अप्रयत्नपूर्वकम्) के (नोदनादि संयोगों के द्वारा) गमन नाम का कर्म ही उत्पन्न होता है, उत्क्षेपण या अपक्षेपण प्रभृति कर्म नहीं ।
७२६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ कर्मनिरूपण- प्रशस्तपादभाष्यम् व्यस्तानपेक्षमाणो यः संयोगविशेषः । नोदनमविभागहेतोरेकस्य कर्मणः कारणम्, तस्माच्चतुर्ष्वपि महाभूतेषु कर्म भवति । यथा पङ्काख्यायां पृथिव्याम् । करनेवाले कर्म का ही कारण है । इस (संयोग) से चारों महाभूतों में क्रियाओं की उत्पत्ति होती है । जैसे कि पङ्क नाम की पृथ्वी में (नोदन संयोग से क्रिया की उत्पत्ति होती है) । न्यायकन्दली तत्र नोदनं गुरुत्वद्रवत्वप्रयत्नवेगान् समस्तव्यस्तानपेक्षमाणो यः संयोगविशेषः । कथं संयोगविशेषो नोदनमुच्यते, तत्राह-नोदनमविभागहेतोः कर्मणः कारणमिति । नोद्यनोदकयोः परस्परविभागं न करोति यत् कर्म तस्य कारणं नोदनम् । किमुक्तं स्यात् ? अनेन संयोगेन सह नोदको नोद्यं नोदयति नान्यथा, तेनायं नोदनमुच्यते । नोदनं तु क्व कर्मकारणमत्राह-यथा पङ्काख्यायां पृथिव्यामिति । यदा पङ्कस्योपरि मन्दव्यवस्थापिता प्रस्तरगुटिका क्रमशः पङ्केन सममधो गच्छति । तदा गुरुत्वापेक्षः प्रस्तरपङ्कसंयोगो नोदनम् । यदा प्रयत्नेन दूरमुत्थाप्य प्रस्तरेणाभिहन्यते पङ्कस्तदा गुरुत्वप्रयत्नवेगापेक्षः संयोगो नोदनम्, यदा जलेनाहन्यते तदा समस्तापेक्षः संयोगो नोदनमिति यथासम्भवमूह्यमिति । अभी कहा है कि पृथिव्यादि महाभूतों में नोदनादि से क्रिया की उत्पत्ति होती है, अतः प्रश्न उठता है कि यह 'नोदन' कौन-सी वस्तु है ? इसी प्रश्न का उत्तर 'तत्र नोदनं गुरुत्वद्रवत्वप्रयत्नवेगान् समस्तव्यस्तानपेक्षमाणो यः संयोगविशेषः' इस वाक्य से दिया गया है । उक्त विशेष प्रकार के संयोग को ही नोदन क्यों कहते हैं ? इसी प्रश्न का उत्तर 'नोदनमविभागहेतोः कर्मणः कारणम्' इस वाक्य से दिया गया है । नोद्य और नोदक इन दो द्रव्यों में जिस क्रिया से विभाग की उत्पत्ति नहीं होती है, नोदन ही उस क्रिया का हेतु है । इससे क्या निष्कर्ष निकला ? यही कि नोदनरूप संयोग के साथ ही नोदक अपने नोद्य का नोदन करता है, अन्यथा नहीं । इसी कारण यह संयोग 'नोदन' कहलाता है । नोदनसंयोग से क्रिया की उत्पत्ति कहाँ होती है ? इसी प्रश्न का उत्तर 'यथा पङ्काख्यायां पृथिव्याम्' इस वाक्य के द्वारा दिया गया है । जिस समय पङ्क के ऊपर धीरे से रक्खा हुआ पत्थर का टुकड़ा क्रमशः पङ्क के साथ नीचे की ओर जाता है, वहाँ पत्थर और पङ्क का संयोगरूप नोदन केवल गुरुत्व से उत्पन्न होता है । जिस समय प्रयत्न के द्वारा पत्थर को दूर उछाल कर पङ्क को आघात पहुँचाया जाता है, वहाँ जिस नोदन संयोग की उत्पत्ति होती है, उसका गुरुत्व, प्रयत्न और वेग ये तीनों कारण हैं । जिस समय वही पङ्क जल के द्वारा आहत किया जाता है, वहाँ का नोदन उन सभी कारणों से उत्पन्न होता है । इसी प्रकार जहाँ जिस प्रकार की सम्भावना हो उसके अनुसार कल्पना करनी चाहिए ।
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ७२७
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ७२७ प्रशस्तपादभाष्यम् वेगापेक्षो यः संयोगविशेषो विभागहेतोरेकस्य कर्मणः कारणं सोऽभिघातः । तस्मादपि चतुर्षु महाभूतेषु कर्म भवति, यथा पाषाणादिषु निष्ठुरे वस्तुन्य- भिपतितेषु, तथा पादादिभिर्नुद्यमानायामभिहन्यमानायां वा । पङ्काख्यायां पृथिव्यां यः संयोगो नोदनाभिघातयोरन्यतरापेक्ष उभयापेक्षो वा स संयुक्तसंयोगः, तस्मादपि पृथिव्यादिषु कर्म भवति । ये च प्रदेशा न नुद्यन्ते नाप्यभिहन्यन्ते तेष्वपि कर्म जायते । 'अभिघात' उस विशेष प्रकार के संयोग का नाम है जो वेग की सहायता से विभाग को उत्पन्न करनेवाले कर्म का कारण हो । अभिघात नाम के संयोग से भी चारों महाभूतों में क्रियाओं की उत्पत्ति होती है । जैसे कि पत्थर प्रभृति कठिन द्रव्यों पर गिरे हुए द्रव्यों में (क्रिया की उत्पत्ति होती है ) एवं पैर प्रभृति से केवल छुये जाने पर या अभिहत होने पर पङ्क नाम की पृथिवी में (कथित) नोदन और अभिघात नाम के दोनों संयोगों से या दोनों में से किसी एक संयोग से जिस संयोग की उत्पत्ति होती है, उसे 'संयुक्तसंयोग' कहते हैं । इस संयुक्तसंयोग से भी पृथिव्यादि भूतों में क्रिया की उत्पत्ति होती है । न्यायकन्दली वेगापेक्षो यः संयोग एकस्य विभागकृतः कर्मणः कारणं सोऽभिघातः, अभिघात्याभिघातकयोः परस्परविभागो यतः कर्मणो जायते तस्यैवैकस्य हेतुर्यः संयोगविशेषः सोऽभिघातः । तस्मादपि चतुर्षु महाभूतेषु कर्म भवति । यथा पाषा- णादिषु निष्ठुरे वस्तुन्यभिपतितेषु । नोदनं परस्परविभागहेतोरेवैकस्य कर्मणः कारणं न परस्परविभागहेतोः, एवमभिघातोऽपि परस्परविभागहेतोरेवैकस्य कर्मणः कारणं न परस्परविभागहेतोरिदमुक्तमेकस्य कर्मणः कारणम् । "वेगापेक्षो यः संयोग एकस्य विभागकृतः कर्मणः कारणं सोऽभिघातः" अर्थात् अभिघात्य और अभिघातक इन दोनों में परस्पर विभाग की उत्पत्ति जिस एक क्रिया से हो, उस क्रिया का कारणीभूत विशेष प्रकार का संयोग ही 'अभिघात' है । 'तस्मादपि चतुर्षु महाभूतेषु कर्म भवति, यथा पाषाणादिषु निष्ठुरे वस्तुन्यभि- पतितेषु' (जिस प्रकार) परस्पर विभाग के अकारणीभूत एक क्रिया का ही कारण 'नोदन' है, परस्पर विभाग के कारणीभूत एक क्रिया का कारण नोदन नहीं है । उसी प्रकार (ठीक उससे विपरीत) अभिघात भी परस्पर विभाग के हेतुभूत एक क्रिया का ही कारण है, वह परस्पर विभाग के अहेतुभूत एक क्रिया का कारण नहीं है।
७२८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ कर्मनिरूपण- प्रशस्तपादभाष्यम् पृथिव्युदकयोर्गुरुत्वविधारकसंयोगप्रयत्नवेगाभावे सति गुरुत्वाद् यदधोगमनं तत् पतनम् । यथा मुसलशरीरादिषूक्तम् । तत्राद्यं गुरुत्वात्, द्वितीयादीनि तु गुरुत्वसंस्काराभ्याम् । जो प्रदेश किसी से छुये नहीं जाते या अभिहत नहीं होते, उनमें भी क्रिया की उत्पत्ति होती है । गुरुत्व के विरोधी संयोग, प्रयत्न और वेग इन सबों के न रहने पर भी पृथिव्यादि द्रव्य केवल गुरुत्व के द्वारा जो नीचे की तरफ गिरते हैं, उस क्रिया को ही 'पतन' कहते हैं । जैसा कि मूसल और तीर प्रभृति द्रव्यों में कह आये हैं । उनमें पहली क्रिया गुरुत्व से उत्पन्न होती है और दूसरी क्रियायें गुरुत्व और वेग दोनों से उत्पन्न होती हैं । न्यायकन्दली संयुक्तसंयोगं व्याचष्टे- पादादिभिर्नुद्यमानायामिति । एकत्र पृथिव्यां पादेन नुद्यमा- नायामभिहन्यमानायां वा ये प्रदेशा न नुद्यन्ते नाप्यभिहन्यन्ते तेष्वपि कर्म दृश्यते । तत्र चलतां प्रदेशान्तराणां नुद्यमानाभिहन्यमानभूप्रदेशैः सह संयुक्तप्रदेशसंयोगः कारणम् । यत्राभिघातकं द्रव्यं भूप्रदेशमभिहत्य किञ्चिदधो नीत्वोत्पतति, तत्र प्रदेशान्तरक्रियाया- मुभयापेक्षः संयुक्तसंयोगो हेतुः । गुरुत्वस्य कर्मकारणत्वमाह-पृथिव्युदकयोर्गुरुत्वविधारकसंयोगप्रयत्न- वेगाभावे गुरुत्वाद् यदधोगमनं तत् पतनम् । यथा मुसलशरीरादिषूक्तम् । गुरुत्वप्रतिबन्धकस्य हस्तसंयोगस्याभावे मुसलस्य यदधोगमनं तत् पतनं गुरुत्वाद् भवति । एवं गुरुत्वविधारकप्रयत्नाभावे शरीरस्य पतनम्, क्षिप्तस्येषोरन्तराले 'पादादिभिर्नुद्यमानायाम्' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा 'संयुक्तसंयोग' की व्याख्या करते हैं । पृथिवी का एकदेश पैर के द्वारा छुये जाने पर या अभिहत होने पर (उस देश से सम्बद्ध) पृथिवी के अन्य प्रदेशों में भी-जो पैर से न छुवे गये हैं और न अभिहत ही हुए हैं-क्रिया देखी जाती है । उस क्रिया का कारण वह संयुक्तसंयोग है, जो क्रिया से युक्त भूप्रदेश के साथ पैर से छुए हुए या अभिहत हुए दूसरे भूप्रदेश का है । जहाँ अभिघात करनेवाला द्रव्य भूप्रदेश में अभिघात को उत्पन्न कर थोड़ा-सा नीचे जाकर ऊपर की ओर उठता है । वहाँ जो दूसरे भूप्रदेश में क्रिया की उत्पत्ति होती है, उसका कारण (वेग और संयोग) इन दोनों से साहाय्यप्राप्त संयुक्तसंयोग ही है । 'पृथिव्युदकयोः' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा गुरुत्व से कर्म की उत्पत्ति कही गयी है । मूसल में हाथ का जो संयोग है, वह गुरुत्व का प्रतिबन्धक है । उसके न रहने पर ही मूसल नीचे की ओर जाता है, मूसल की वह पतन क्रिया गुरुत्व से उत्पन्न होती है । गुरुत्व एवं शरीरधारण के उपयुक्त प्रयत्न का अभाव, इन दोनों के रहने पर जो शरीर का पतन होता है, उसका कारण भी गुरुत्व ही है । इसी प्रकार फेंके हुए तीर में वेग के
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७२९
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७२९ प्रशस्तपादभाष्यम् स्रोतोभूतानामपां स्थलात्रिम्नाभिसर्पणं यत् तद् द्रवत्वात् स्यन्दनम् । कथम् ? समन्ताद् रोधःसंयोगेनावयविद्रवत्वं प्रति- बद्धम्, अवयवद्रवत्वमप्येकार्थसमवेतं तेनैव प्रतिबद्धम्, उत्तरोत्तरावयवद्रव- त्यानि संयुक्तसंयोगैः प्रतिबद्धानि । यदा तु मात्रया सेतुभेदः धारारूपी जल का अपने आश्रयरूप स्थल से नीचे की ओर फैलना ही 'स्यन्दन' नाम की क्रिया है, जो द्रवत्व से उत्पन्न होती है । (प्र.) किस प्रकार ? (उ.) नदी के जल किनारों के सभी अवयवों के साथ पूर्ण रूप से संयुक्त रहने के कारण अवयवी (रूप जल) का द्रवत्व प्रतिरुद्ध हो जाता है । उस अवयवी के सभी अवयवों के द्रवत्व भी उस अवयवी में एकार्थ- समवाय सम्बन्ध से रहने के कारण किनारों के उसी संयोग से प्रतिरुद्ध रहते हैं । उन अवयवों के आगे-आगे के अवयवों के द्रवत्व भी उक्त संयुक्त- संयोगों से प्रतिरुद्ध रहते हैं । जब थोड़ा-सा भी बाँध काट दिया न्यायकन्दली वेगाभावात् पतनं गुरुत्वात् । तत्राद्यं कर्म गुरुत्वात्, द्वितीयादीनि तु गुरुत्व- संस्काराभ्याम् । तेषु मुसलादिष्वाद्यं कर्म गुरुत्वाद् भवति तेन कर्मणा संस्कारः क्रियते, तदनन्तरमुत्तरकर्माणि गुरुत्वसंस्काराभ्यां जायन्ते, द्वयोरपि प्रत्येकमन्यत्र सामर्थ्याव- धारणात् । द्रवत्वस्य कारणत्वं कथयति-स्रोतोभूतानामपां स्थलात्रिम्नाभिसर्पणं यत् तद् द्रवत्वात् स्यन्दनम् । अपां यत्र स्थलात्रिम्नाभिसर्पणं तत् स्यन्दनं द्रवत्या- दुपजायत इत्यर्थः । कथमिति प्रश्नः । समन्तादित्युत्तरम् । न रहने पर बीच में ही जो पतन हो जाता है, उसका कारण भी गुरुत्व ही है । इनमें पहला कर्म गुरुत्व से उत्पन्न होता है और बाद के कर्म गुरुत्व और वेगाख्य संस्कार इन दोनों से उत्पन्न होते हैं । इनमें मूसल की पहली क्रिया उसके गुरुत्व से उत्पन्न होती है । उस क्रिया से मूसल में वेग उत्पन्न होता है । इसके बाद की मूसल की क्रियायें गुरुत्व और वेग इन दोनों से ही होती है; क्योंकि इन दोनों में से प्रत्येक में क्रिया को उत्पन्न करने का सामर्थ्य अन्यत्र निश्चित हो चुका है । 'स्रोतोभूतानामपाम्' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा द्रवत्व से स्यन्दनरूप क्रिया की उत्पत्ति की रीति कही गयी है । किसी ऊँची जगह से जल जो नीचे की ओर फैलता है, उसे 'स्यन्दन' कहते हैं, यह स्यन्दनरूप क्रिया द्रवत्व से उत्पन्न होती है । 'कथम्' यह पद प्रश्न का बोधक है और 'समन्तात्' इत्यादि से इस प्रश्न का उत्तर दिया गया है ।
७३० न्यायकन्दलीसंवल्लितप्रशस्तपादभाष्यम् [ कर्मनिरूपण- प्रशस्तपादभाष्यम् कृतो भवति, तदा समन्तात् प्रतिबद्धत्यादवयविद्रवत्वस्य कार्या- रम्भो नास्ति । सेतुसमीपस्थस्यावयवद्रवत्वस्योत्तरेषामवयव- द्रवत्यानां प्रतिबन्धकाभावाद् वृत्तिलाभः । ततः क्रमशः संयुक्ताना- जाता है, उस समय सभी किनारों के साथ संयुक्त रहने के कारण अवयवी के द्रवत्व प्रतिरुद्ध रहते हैं, अतः अपना (स्यन्दन) क्रियारूप काम नहीं कर सकते । अतः कोई प्रतिबन्ध न रहने के कारण बाँध के समीप में रहनेवाले जलावयवों के द्रवत्व ही अपने कार्य करने को उन्मुख रहते हैं । उसके बाद बाँध से संयुक्त जलावयवों में ही 'अपसर्पण' (नीचे की तरफ फैलने की) क्रियाओं की उत्पत्ति होती है । इसके बाद पहले द्रव्य का न्यायकन्दली समन्तात् सर्वतो रोधःसंयोगे कूलसंयोगे सति अवयविनो द्रवत्वं प्रतिबद्धं स्यन्दनं वा न करोति । अवयवद्रवत्वमप्येकार्थसमवेतं तेनैव प्रतिबद्धम्, यस्मिन्नवयवे साक्षाद् रोधःसंयोगोऽस्ति तदवयवगतद्रवत्वं तेनैव रोधःसंयोगेन प्रतिबद्धम्, उत्तरोत्तराणि त्ववयवद्रवत्वानि संयुक्तसंयोगैः प्रतिबद्धानि, रोधःसंयुक्तेनावयवेन सह संयोगादय- म्वान्तरस्य द्रवत्वं प्रतिबद्धमिति । तत्संयोगादपरस्य प्रतिबद्धमित्यनेनैव न्यायेनोत्तरोत्तर- द्रवत्वानि प्रतिबद्धानि । यदा तु मात्रया सेतुभेदः कृतो भवति, तदा समन्तात् प्रतिबद्धस्यावयविद्रवत्वस्य कार्यारम्भो नास्ति, दीर्घतरेण सेतुना समन्तात् प्रतिबद्ध- स्यावयविनो महापरिमाणस्यैकदेशकृतेनाल्पीयसा मार्गेण निर्गमाभावात् । सेतुसमीपस्थस्य 'समन्तात्' अर्थात् सभी कूल के अवयवों में 'रोधःसंयोगेन' दोनों किनारे के साथ जल का संयोग उसके द्रवत्व को प्रतिरुद्ध कर देता है । 'अवयवद्रवत्वमप्येकार्थ- समवेतं तेनैव प्रतिबद्धम्' जिस अवयव का किनारे के साथ साक्षात् संयोग है, उस अवयव में रहनेवाला द्रवत्व भी अवयव और किनारे के संयोग से ही प्रतिरुद्ध हो जाता है । 'उत्तरोत्तराणि त्ववयवद्रवत्वानि संयुक्तसंयोगैः प्रतिबद्धानि' अर्थात् किनारे से संयुक्त अवयव के साथ संयोग के कारण ही अन्य अवयवों का द्रवत्व भी प्रतिरुद्ध होता है । उस अन्य अवयव के संयोग से तीसरे अवयव का द्रवत्व प्रतिरुद्ध होता है । इसी रीति से अन्य अवयवों के द्रवत्व भी प्रतिरुद्ध होते हैं । 'यदा मात्रया सेतुभेदः कृतो भवति तदा समन्तात् प्रतिबद्धस्यावयविद्रवत्वस्य कार्या- रम्भो नास्ति' क्योंकि बहुत बड़े बाँध से घिरे हुए उस महत् परिमाणवाले अवयवी रूप जल का किसी एक ओर बनाये गये छोटे मार्ग से निकलना सम्भव नहीं है; किन्तु उस बाँध के समीप में जो थोड़े से जल के अवयव हैं, उनका उस छोटे से मार्ग से निकलना सम्भव है । इस प्रकार जल के कुछ अवयवों
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ७३१
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ७३१ प्रशस्तपादभाष्यम् मेवाभिसर्पणम्। ततः पूर्वद्रव्यविनाशे सति प्रबन्धेनावस्थितैरवयवैर्दीर्घं द्रव्य- मारभ्यते । तत्र च कारणगुणपूर्वक्रमेण द्रवत्वमुत्पद्यते । तत्र च कारणानां संयुक्तानां प्रबन्धेन गमने यद्वयविनि कर्मोत्पद्यते तत् स्यन्दनाख्यमिति । विनाश हो जाने पर संयुक्त रूप से अवस्थित जलावयवों से ही बड़े द्रव्य की उत्पत्ति होती है । इस बड़े द्रव्य में कारणगुणक्रम से द्रवत्व की उत्पत्ति होती है । वहाँ पर किनारों के साथ सम्बद्ध अवयवों का संयुक्त रूप से गमन होने पर जो अवयवी में क्रिया उत्पन्न होती है, उसी का नाम 'स्यन्दन' है । न्यायकन्दली त्ववयवद्रवत्वस्य वृत्तिलाभो भवति, अल्पस्यावयवस्य तेन मार्गेण निर्गतिसम्भवात् । तस्य वृत्तिलाभे चोत्तरेषामवयवद्रवत्वानामापि प्रतिबन्धकाभावाद् वृत्तिलाभः स्वकार्यकर्तृत्वं स्यात् । ततः क्रमशः संयुक्तानामेवाभिसर्पणम् । सेतुसमीपस्थोऽवयवः प्रथममभिसर्पति, तदनु तत्समीपस्थस्ततस्तत्समीपस्थ इत्यनेन क्रमेण सर्वेऽवयवा अभिसर्पन्ति । ते चाभिसर्पन्तो न परस्परविभ्रंशा अभिसर्पन्ति; किन्तु तथाभिसर्पन्ति यथा परस्परसंयुक्ता भवन्तीत्येतद्द्योतनार्थमुक्तं संयुक्तानामेवाभिसर्पणम् । न पुनरस्यायमर्थोऽप्रच्युत- प्राच्यसंयोगानामेवाभिसर्पणमिति, संस्थानान्तरोपलम्भात् । ततः प्राक्तनसंयोगविनाशे पूर्वद्रव्यविनाशे प्रबन्धेनावस्थितैरवयवैः संयुक्तीभावेनावस्थितैरवयवैर्दीर्घं द्रव्यमारभ्यते । तत्र च कारणगुणपूर्वक्रमेण द्रवत्वमुत्पद्यते । अवयवद्रवत्वेभ्यो दीर्घतरेऽ- के द्रवत्व से कार्य करना सम्भव होने पर 'उत्तरेषामवयवद्रवत्वानापि प्रतिबन्धकाभावाद् वृत्तिलाभः' अर्थात् अपने-अपने कार्य करने में वे समर्थ होंगे । "ततः क्रमशः संयुक्तानामेवाभिसर्पणम्" अर्थात् पहले बाँध के समीप का अवयव निकलता है । उसके बाद उस अवयव के साथ संयुक्त दूसरा अवयव निकलता है । उनके बाद उस दूसरे अवयव के साथ सम्बद्ध तीसरा अवयव निकलता है । इसी क्रम से जल के सभी अवयव निकल जाते हैं । जल के वे अवयव ऐसे नहीं निकलते कि एक-दूसरे से बिलकुल अलग होकर भिन्न देशों में चले जाँय; किन्तु इस प्रकार निकलते हैं कि जिससे परस्पर संयुक्त होकर ही निकलें । इसी वस्तुस्थिति को सूचित करने के लिए 'संयुक्तानामेवाभिसर्पणम्' यह वाक्य लिखा गया है । उक्त वाक्य का यह अर्थ नहीं है कि पहले के अविनष्ट संयोग से युक्त अवयवों का ही निःसरण होता है; क्योंकि निःसरण के बाद दूसरे प्रकार के अवयव- संयोगों से युक्त अवयवियों की उपलब्धि होती है । 'ततः' अर्थात् पहले के संयोग के विनष्ट हो जाने पर 'पूर्वद्रव्यविनाशे प्रबन्धेनावस्थितैरवयवैः' अर्थात् परस्पर संयुक्त होकर अवस्थित अवयवों से "दीर्घं द्रव्यमारभ्यते, तत्र च कारण- गुणपूर्वक्रमेण द्रवत्वमुत्पद्यते" अर्थात् अवयवों में रहनेवाले द्रवत्वों से बड़े अवयवी
७३२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ कर्मनिरूपण- प्रशस्तपादभाष्यम् संस्कारात् कर्म इष्वादिषूक्तम् । तथा चक्रादिष्ववयवानां पार्श्वतः प्रतिनियतदिग्देशसंयोगविभागोत्पत्तौ यदवयविनः संस्काराद- तीर प्रभृति में संस्कार के द्वारा कर्म की उत्पत्ति कह चुके हैं । उसी प्रकार चक्र (मिट्टी के बर्तन बनाने की चक्की) प्रभृति में उनके न्यायकन्दली वयविनि द्रव्यत्वमुत्पद्यते । तत्र च कारणानां संयुक्तानां प्रबन्धेन गमने यदवयविनि कर्मोत्पद्यते द्रवत्वात् तत् स्यन्दनम् । तत्र तस्मिन् द्रव्यत्वे उत्पन्ने सति कारणानामवयवानां प्रबन्धेन गमने पङ्क्तीभावेनाभिन्नदेशतया गमने यदवयविनि द्रवत्वात् कर्मोत्पद्यते तत् स्यन्दनाख्यम् । संस्कारात् कर्मेष्वादिषूक्तम्, तथा चक्रादिषु । तथाशब्दो यथाशब्दमपेक्षते, यत्तदोर्नित्यसम्बन्धात् । यथा इष्वादिषु संस्कारात् कर्म कथितम्, तथा चक्रादिष्वपि भवतीत्यर्थः । एतदेव दर्शयति-अवयवानां पार्श्वतः प्रतिनियतदिग्देशसंयोगविभा- गोत्पत्तौ यदवयविनः संस्कारादनियतदिग्देशसंयोगविभागनिमित्तं कर्म तद् भ्रमणम् । पार्श्वतः प्रतिनियता ये दिग्देशास्तैः सहावयवानां संयोगविभागयोरुत्पत्तौ सत्यां यदवयविनः संस्कारादनियतदिग्देशैः सर्वतो दिक्कैर्विभागसंयोगनिमित्तं कर्म जायते तद् भ्रमणम् । प्रथमं चक्रावयविनि दण्डसंयोगात् कर्मोत्पद्यते । उत्तरोत्तराणि कर्माणि द्रव्य में द्रवत्व की उत्पत्ति होती है । "तत्र च कारणानां प्रबन्धे गमने यदवयविनि कर्मोत्पद्यते द्रवत्वात् तत् स्यन्दनम्" वहाँ बड़े द्रव्य में द्रवत्व के उत्पन्न होने पर 'कारणों का' अर्थात् उसके अवयवों का 'प्रबन्ध से' अर्थात् पङ्क्तिबद्ध होकर एक देश में गमन होने पर द्रवत्व से अवयवी में जो कर्म उत्पन्न होता है, उसी कर्म का नाम 'स्यन्दन' है । "संस्कारात् कर्मेष्वादिषूक्तम्, तथा चक्रादिषु" । 'तथा' शब्द 'यथा' शब्द की अपेक्षा रखता है; क्योंकि 'यत्' शब्द और 'तत्' शब्द परस्पर नित्यसाकाङ्क्ष हैं । तदनुसार उक्त भाष्यग्रन्थ का यह आशय है कि जिस प्रकार तीर प्रभृति में वेगाख्य संस्कार के द्वारा कर्म की उत्पत्ति कही गयी है, उसी प्रकार चक्रादि में भी (वेग से ही संस्कार की उत्पत्ति) होती है । "अवयवानां पार्श्वतः प्रतिनियतदिग्देशसंयोगविभागनिमित्तं कर्म तद् भ्रमणम्" इस भाष्यसन्दर्भ के द्वारा इसी अर्थ का प्रतिपादन किया गया है । (इस सन्दर्भ का अक्षरार्थ यह है कि) अवयवी के चारों ओर नियत जो दिग्देश हैं, उन देशों के साथ उनके अवयवों के संयोग और विभाग उत्पन्न होते हैं, उनके उत्पन्न होने पर अवयवी में रहनेवाले वेगाख्य संस्कार से अनियमित दिग्देशों के साथ अर्थात् सभी दिशाओं के साथ संयोग और विभाग की उत्पत्ति होती है, इस संयोग या विभाग से जिस कर्म की उत्पत्ति
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७३३
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७३३ प्रशस्तपादभाष्यम् नियतदिग्देशसंयोगविभागनिमित्तं कर्म तद् भ्रमणमिति । एवमादयो गमन- विशेषाः । प्राणाख्ये तु वायौ कर्म आत्मवायुसंयोगादिच्छाद्वेषपूर्वकप्रयत्नापेक्षाज्जाग्रत इच्छानुविधानदर्शनात्, सुप्तस्य तु जीवनपूर्वकप्रयत्नापेक्षात् । अवयवों का अनियत दिशाओं के साथ संयोग और विभागों की जनक क्रियाओं की उत्पत्ति होती है, उसी प्रकार की क्रियाओं को 'भ्रमण' कहते हैं । ये सभी (स्यन्दन, भ्रमणादि) कर्म विशेष प्रकार के गमनरूप ही हैं । जागते हुए व्यक्ति के प्राण नाम के वायु में आत्मा और वायु के संयोग से क्रिया उत्पन्न होती है, जिसमें (उक्त संयोग को) इच्छा या द्वेष से उत्पन्न होनेवाले प्रयत्न के साहाय्य की भी आवश्यकता होती है; क्योंकि जगे हुए व्यक्ति की सभी क्रियाओं में इच्छा (या द्वेष) का अन्वय और व्यतिरेक देखा जाता है । सोये हुए व्यक्ति के प्राणवायु की क्रिया (यद्यपि आत्मा और वायु के संयोग से ही होती है, किन्तु उसे) जीवनयोनियत्न का ही साहाय्य अपेक्षित होता है (इच्छापूर्वक या द्वेष- पूर्वक प्रयत्न का नहीं) । न्यायकन्दली नोदनादभिघातात् कर्मजात् संस्काराच्च भवन्ति । एवं वेगाद् दण्डसंयुक्ते चक्रावयवे आद्यं कर्म दण्डसंयोगात्, अवयवान्तरेषु च संयुक्तसंयोगात्, दण्डसंयुक्तस्यावयवस्योत्त- रोत्तरकर्माणि संस्कारान्नोदनाच्च । अपरेषां संस्कारात्, संयुक्तसंयोगाच्च । दण्डविगमे तु चक्रे तदवयवेषु च संस्कारादेव केवलात् । उपसंहरति-एवमादयो गमनविशेषा इति । होती है, वही 'भ्रमण है । पहले चक्ररूप अवयवी में दण्ड के संयोग से क्रिया की उत्पत्ति होती है । आगे-आगे की क्रियायें कर्मजनित अभिघात या नोदन से और संस्कार से उत्पन्न होती हैं । इसी प्रकार वेग के कारण दण्ड से संयुक्त चक्र के अवयवों में पहली क्रिया की उत्पत्ति दण्ड के संयोग से होती है । अन्य अवयवों में पहली क्रिया संयुक्तसंयोग से होती है । दण्ड के साथ संयुक्त चक्र के अवयव की आगे-आगे की क्रियायें संस्कार और नोदन से होती हैं । इससे भिन्न अवयवों की पहली क्रिया संस्कार से और संयुक्तसंयोग से होती है । दण्ड के हटा लेने पर चक्र में और उसके अवयवों में जो क्रियायें होती रहती हैं, उनका कारण केवल संस्कार ही है । 'एवमादयो गमनविशेषाः' इस सन्दर्भ से गमनरूप क्रिया के प्रसङ्ग का उपसंहार करते हैं ।
७३४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [कर्मनिरूपण- प्रशस्तपादभाष्यम् आकाशकालदिगात्मनां सत्यपि द्रव्यभावे निष्क्रियत्वं सामान्यादिवदमूर्त्तत्वात् । मूर्त्तिस्सर्वगतद्रव्यपरिमाणम्, तदनुविधायिनी आकाश, काल, दिशा और आत्मा ये सभी द्रव्य होने पर भी क्रिया से रहित हैं; क्योंकि ये सभी सामान्यादि पदार्थों की तरह अमूर्त्त हैं । सभी द्रव्यों के साथ असंयुक्त (कुछ ही द्रव्यों के साथ संयुक्त) द्रव्य के न्यायकन्दली प्राणाख्ये वायौ कर्म आत्मवायुसंयोगादिच्छाद्वेषपूर्वकप्रयत्नापेक्षाद् भवतीति । कथमिदं जातमत्त आह-इच्छानुविधानदर्शनात् । रेचकपूरकादिप्रयोगेष्विच्छानुविधायिनी प्राणक्रियोपलभ्यते । नासारन्ध्रप्रविष्टे रजसि तन्निरासार्थं प्राणक्रिया द्वेषादपि भवति, अतः प्रयत्नपूर्वकेत्यवगम्यते । सुप्तस्य जीवनपूर्वकप्रयत्नापेक्षादात्मवायुसंयोगात् । सुप्तस्य प्राण- क्रिया प्रयत्नकार्या प्राणक्रियात्वात्, जाग्रतः प्राणक्रियावत् । स चेच्छाद्वेषपूर्वको न भवति, सुप्तस्येच्छाद्वेषयोरभावात् । तस्माज्जीवनपूर्वक एव निश्चीयते, प्राणधारणस्य तत्पूर्वकत्वात् । चतुर्षु महाभूतेष्विवाकाशादिषु कस्मात् क्रियोत्पत्तिर्न चिन्तितेत्याह- आकाशकालदिगात्मनामिति । क्रियावत्त्वं मूर्त्तत्वेन व्याप्तं मूर्त्तत्वं चाकाशादिषु "प्राणाख्ये वायौ कर्म आत्मवायुसंयोगादिच्छाद्वेषपूर्वकप्रयत्नापेक्षाद् भवतीति" प्राणवायु में उक्त प्रकार से क्रिया की उत्पत्ति कैसे होती है? इसी प्रश्न का उत्तर 'इच्छानुविधानदर्शनात्' इस वाक्य से दिया गया है । अर्थात् रेचक, पूरक प्रभृति प्राणायाम में प्राणवायु की क्रियायें इच्छा के अनुरूप देखी जाती हैं । इसी प्रकार नाक के छिद्र में जब धूल चली जाती है, तो उसे निकालने के लिए द्वेष से भी प्राणवायु में क्रिया देखी जाती है । अतः यह समझते हैं कि प्राणवायु की क्रिया का प्रयत्न कारण है । सुप्त पुरुष के प्राणवायु की क्रिया आत्मा और वायु के संयोग से उत्पन्न होती है, जिसमें उस संयोग को जीवनयोनियल का साहाय्य भी अपेक्षित होता है । इस प्रसङ्ग में यह अनुमान भी है कि जिस प्रकार जाग्रत् पुरुष के प्राणवायु की क्रिया केवल प्राण की क्रिया होने के कारण ही प्रयत्न से उत्पन्न होती है, उसी प्रकार सुषुप्त पुरुष के प्राणवायु की क्रिया भी प्रयत्न से उत्पन्न होती है; क्योंकि वह भी प्राण की ही क्रिया है । सुषुप्त पुरुष के प्राणवायु में क्रिया का उत्पादक-प्रयत्न, इच्छा और द्वेष से उत्पन्न नहीं हो सकता; क्योंकि सुषुप्त पुरुष में इच्छा और द्वेष का रहना सम्भव नहीं है। अतः सुषुप्त पुरुष के प्राणवायु में क्रिया का उत्पादक जीवनपूर्वक प्रयत्न ही है; क्योंकि प्राण का धारण उसी प्रयत्न से होता है । 'आकाशकालदिगात्मनाम्' इत्यादि सन्दर्भ से इस प्रश्न का उत्तर दिया गया है कि जिस प्रकार पृथिवी प्रभृति चार द्रव्यों में क्रिया की उत्पत्ति का विचार किया है, उसी
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७३५
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७३५ प्रशस्तपादभाष्यम् च क्रिया, सा चाकाशादिषु नास्ति । तस्मान्न तेषां क्रियासम्बन्धोऽस्तीति । सविग्रहे मनसीन्द्रियान्तरसम्बन्धार्थं जाग्रतः कर्म आत्ममनः- संयोगादिच्छाद्वेषपूर्वकप्रयत्नापेक्षात्, अन्यभिप्रायमिन्द्रियान्तरेण विषया- परिमाण को 'मूर्त्ति' कहते हैं । यह 'मूर्त्ति' जहाँ रहती है, क्रिया वहीं होती है । यह (मूर्त्ति) आकाशादि द्रव्यों में नहीं है, अतः उनमें क्रिया का सम्बन्ध भी नहीं है । शरीर के सम्बन्ध से युक्त जागते हुए व्यक्ति के मन की क्रिया आत्मा और मन के संयोग से उत्पन्न होती है, जिसमें उसे इच्छा या द्वेष से उत्पन्न प्रयत्न के साहाय्य की भी आवश्यकता होती है; क्योंकि न्यायकन्दली नास्ति, अतः क्रियावत्त्वमपि न वियत इत्यर्थः । एतदेव विवृणोति- मूर्त्तिरित्यादिना । तद् व्यक्तम् । मनसि कर्मकारणमाह-सविग्रह इति । जाग्रतः पुरुषस्य सविग्रहे मनसि सशरीरे मनसी- न्द्रियान्तरसम्बन्धार्थं कर्म आत्ममनःसंयोगादिच्छाद्वेषपूर्वकप्रयत्नापेक्षाद् भवति । इच्छाद्वेष- पूर्वकः प्रयत्नो जाग्रतो मनसि क्रियाहेतुरिति । कथमेतदवगतं तत्राह- अन्यभिप्रायमिन्द्रिया- न्तरेण विषयोपलब्धिदर्शनात् । जागरावस्थायामभिप्रायमनतिक्रमेणेन्द्रियान्तरेण चक्षुरादिना विषयोपलब्धिर्दृश्यते । यदा रूपं जिघृक्षते पुरुषस्तदा रूपं पश्यति, यदा रसं जिघृक्षते तदा रसं रसयति । न चान्तःकरणसम्बन्धमन्तरेण बाह्येन्द्रियस्य विषयग्राहकत्व- प्रकार आकाश, काल, दिक् और आत्मा इन चार महान् द्रव्यों में भी क्रिया की उत्पत्ति का विचार क्यों नहीं किया गया ? इस प्रश्न के उत्तरग्रन्थ का अभिप्राय है कि यह व्याप्ति है कि क्रिया मूर्त द्रव्यों में ही रहे । आकाशादि कथित चारों द्रव्य मूर्त नहीं हैं, अतः उनमें क्रिया भी नहीं है । 'मूर्तिः' इत्यादि सन्दर्भ से इसी का विवरण दिया गया है । इस भाष्य-ग्रन्थ का अर्थ स्पष्ट है । 'सविग्रहे' इत्यादि सन्दर्भ से मन में जो कर्म उत्पन्न होता है, उसका कारण दिख- लाया गया है । जागते हुए पुरुष के 'सविग्रहे मनसि' अर्थात् शरीर सम्बन्ध से युक्त मन में "इन्द्रियान्तरसम्बन्धार्थं कर्म, आत्ममनःसंयोगादिच्छाद्वेषपूर्वकप्रयत्नापेक्षात्" अर्थात् इच्छा या द्वेष से उत्पन्न प्रयत्न ही जागते हुए पुरुष के मन में क्रिया का कारण हैं । यह कैसे समझा ? इसी प्रश्न का उत्तर "अन्यभिप्रायमिन्द्रियान्तरेण विषयोपलब्धिदर्श- नात्" इस वाक्य से दिया गया है । अर्थात् जाग्रत् अवस्था में इच्छा के अनुसार ही 'इन्द्रियान्तरेण' अर्थात् चक्षुरादि इन्द्रियों से विषयों की उपलब्धि देखी
७३६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [कर्मनिरूपण- प्रशस्तपादभाष्यम् न्तरोपलब्धिदर्शनात् । सुप्तस्य प्रबोधकाले जीवनपूर्वकप्रयत्नापेक्षात् । अपसर्पणकर्मोपसर्पणकर्म चात्ममनःसंयोगाददृष्टापेक्षात् । कथम् ? यदा जीवनसहकारिणोधर्माधर्मयोरुपभोगात् प्रक्षयोऽन्योन्याभिभवो इच्छा के बाद ही इन्द्रियों से विषयों की उपलब्धि होती है । (किन्तु) सोते हुए व्यक्ति के जागने के समय (उसके मन की क्रिया यद्यपि) आत्मा और मन के संयोग से ही उत्पन्न होती है; किन्तु उसमें जीवनयोनियत्न का साहाय्य भी अपेक्षित होता है (इच्छा-द्वेष या जनित प्रयत्न का नहीं) । मन की 'उपसर्पण' और 'अपसर्पण' नाम की दोनों क्रियायें आत्मा और मन के संयोग से उत्पन्न होती हैं । जिसमें अदृष्ट का साहाय्य भी अपेक्षित होता है । (प्र.) किस प्रकार ? (उ.) जिस समय भोग से जीवन के सहकारी धर्म और अधर्म का विनाश हो जाता है अथवा परस्पर एक-दूसरे से ही दोनों की कार्योत्पादन शक्ति अवरुद्ध हो जाती है, उस समय जीवन के दोनों सहायकों के अभाव के कारण उनसे उत्पन्न होनेवाले प्रयत्न का भी विनाश हो जाता है । प्रयत्न के इस अभाव से ही प्राण का नाश होता है । इसके बाद अपने कार्य के उत्पादन में उन्मुख दूसरे धर्म और अधर्म से उस अपसर्पण नाम की क्रिया की उत्पत्ति होती है, जिससे (ऐहिक न्यायकन्दली मस्ति । तस्मादिच्छाद्वेषपूर्वकात् प्रयत्नान्मनसि क्रिया भूतेति गम्यते । सुप्तस्येति । सुप्तस्य पुरुषस्येन्द्रियान्तरसम्बन्धार्थं प्रबोधकाले मनसि क्रिया जीवनपूर्वकप्रयत्नापेक्षादात्ममनसोः संयोगात् । अपसर्पणेति । एतदपि कथमित्यादिना प्रश्नपूर्वकं कथयति । विशिष्टात्म- मनःसंयोगो जीवनम्, तस्य स्वकार्यकरणे धर्माधर्मौ सहकारिणौ । यदा जाती है । पुरुष जिस समय रूप को देखना चाहता है, उस समय रूप को ही देखता है । एवं जिस समय रस का आस्वादन करना चाहता है, उस समय रस का ही आस्वादन करता है । अन्तःकरण (मन) के सम्बन्ध के बिना बाह्य इन्द्रियों में विषयों को ग्रहण करने का सामर्थ्य नहीं है । अतः समझते हैं कि इच्छा या द्वेष से उत्पन्न प्रयत्न से ही मन में क्रिया उत्पन्न होती है । 'सुप्तस्येति' अर्थात् सोते हुए पुरुष के मन में दूसरी इन्द्रियों के साथ सम्बन्ध के लिए जागते समय जो क्रिया उत्पन्न होती है, वह आत्मा और मन के संयोग से होती है, जिसे जीवनयोनियत्न के साहाय्य की भी अपेक्षा रहती है । 'अपसर्पणेति' मन में यह अपसर्पणादि क्रियायें किस प्रकार होती हैं ? यह प्रश्न कर उसका उत्तर देते हैं । आत्मा और मन का एक विशेष प्रकार
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७३७
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७३७ प्रशस्तपादभाष्यम् वा तदा जीवनसहाययोर्वैकल्यात् तत्पूर्वकप्रयत्नवैकल्यात् प्राणनिरोधे सत्यन्याभ्यां लब्धवृत्तिभ्यां धर्माधर्माभ्यामात्म- मनःसंयोगसहायाभ्यां मृतशरीराद् विभागकारणमपसर्पणकर्मोत्पद्यते । मृत) शरीर से मन का विभाग उत्पन्न होता है । इस विभाग के उत्पादन में उन्हें आत्मा और मन के संयोग के साहाय्य की भी अपेक्षा होती है । इस विभाग से ही मन में 'अपसर्पण' नाम की क्रिया उत्पन्न होती है । उस न्यायकन्दली तयोरुपभोगात् प्रक्षयो विनाशोऽन्योन्याभिभवो वा परस्परप्रतिबन्धात् स्वकार्याकरणं वा, ततो जीवनसहाययोः धर्माधर्मयोर्वैकल्येऽभावे सति तत्पूर्वकप्रयत्नवैकल्याद् जीवन- पूर्वकस्य प्रयत्नस्य वैकल्यादभावात् प्राणवायोनिरोधे सति पतितेऽस्मिन् शरीरे याभ्यां धर्माधर्माभ्यां देहान्तरे फलं भोजयितव्यं तौ लब्धवृत्ती भूतौ यैहिकशरीरोपभोग्यधर्माधर्म- प्रतिबद्धत्वाद् देहान्तरोपभोग्याभ्यां धर्माधर्माभ्यां कार्यं न कृतम् । यदा त्वैहिकशरीरोपभोग्यौ धर्माधर्मौ प्रक्षीणौ तदा देहान्तरोपभोग्यधर्माधर्मयोर्वृत्तिलाभः प्रतिबन्धाभावाज्जातः । ताभ्यां लब्धवृत्तिभ्यामैहिकदेहोपभोग्यात् कर्मणोऽन्याभ्यामात्ममनःसंयोगसहायाभ्यां मृतशरीरा- न्मनसो विभागकारणमपसर्पणकर्मोत्पद्यते । का संयोग ही 'जीवन' है । इस जीवन से जो कार्य उत्पन्न होंगे, धर्म और अधर्म उनके सहकारिकारण हैं । जिस समय उपभोग से उनका 'प्रक्षय' अर्थात् विनाश हो जाएगा या 'अन्योन्याभिभव' अर्थात् परस्पर एक-दूसरे के प्रतिरोध के कारण दोनों अपने काम में अक्षम हो जाते हैं, उस समय जीवन (उक्त आत्ममनःसंयोग) के सहायक धर्म और अधर्म के 'वैकल्य' से अर्थात् अभाव के कारण 'तत्पूर्वकप्रयत्नवैकल्यात्' अर्थात् जीवन से उत्पन्न होने वाले प्रयत्न के अभाव से प्राणवायु का निरोध हो जाता है । जिससे इस शरीर का पतन हो जाता है । इस शरीर के पतन के बाद जिन धर्मों और अधर्मों से दूसरे शरीर के द्वारा उपभोग करना है, उन धर्मों और अधर्मों में कार्य करने की क्षमता आ जाती है । वर्तमान शरीर के द्वारा उपभोग के कारणीभूत धर्म और अधर्म से प्रतिरुद्ध होने के कारण ही वे धर्म और अधर्म अपने उन उपभोगरूप कार्यों से विरत रहते हैं, जिनका सम्पादन दूसरे शरीर से होना है । जिस समय ऐहिक शरीर के धर्म और अधर्म नष्ट हो जाते हैं या असमर्थ हो जाते हैं, उस समय दूसरे शरीर के द्वारा उपभुक्त होनेवाले धर्म और अधर्म अपना कार्य प्रारम्भ कर देते हैं; क्योंकि उनका कोई प्रतिबन्धक नहीं रह जाता । ऐहिक शरीर से उपभोग्य इन धर्म और अधर्म से भिन्न एवं जीवनरूप आत्ममनःसंयोग के सहायक अथ च कार्यक्षम इन दूसरे धर्म और अधर्म से मन में अपसर्पण क्रिया उत्पन्न होती है, जिससे मृत शरीर से मन का विभाग उत्पन्न होता है ।
७३८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ कर्मनिरूपण- प्रशस्तपादभाष्यम् ततः शरीराद् बहिरपगतं ताभ्यामेव धर्माधर्माभ्यां समुत्पन्नेनातिवाहिकशरीरेण सम्बध्यते, तत्संक्रान्तं च स्वर्गं नरकं वा गत्वा आशयानुरूपेण शरीरेण सम्बद्ध्यते, तत्संयोगार्थं कर्मोपसर्पणमिति । शरीर से निकला हुआ मन उन्हीं धर्मों और अधर्मों से उत्पन्न आतिवाहिक शरीर के साथ सम्बद्ध होता है । उस शरीर के साथ सम्बद्ध होकर ही मन स्वर्ग या नरक को जाता है और वहाँ जाकर स्वर्ग या नरक के भोगजनक धर्म और अधर्म के अनुरूप दूसरे शरीर के साथ सम्बद्ध न्यायकन्दली अपसर्पणकर्मोत्पत्तावात्ममनः संयोगोऽसमवायिकारणम्, मनः समवायिकारणम्, लब्ध- वृत्ती धर्माधर्मौ निमित्तकारणम् । ततस्तदनन्तरं तन्मनो मृतशरीराद् बहिर्निर्गतं ताभ्यामेव लब्धवृत्तिभ्यां धर्माधर्माभ्यां सकाशादुत्पन्नेनातिवाहिकशरीरेण सम्बद्ध्यत । तत्संक्रान्तं तदातिवाहिकशरीरसंक्रान्तं मनः स्वर्गं नरकं वा गच्छति । तत्र गत्वा आशयानुरूपेण कर्मानुरूपेण शरीरेण सम्बद्ध्यते । स्वर्गे नरके वा यदुपजातं शरीरं तत्र तावन्मनःसम्बन्धेन भवितव्यम्, अन्यथा तस्मिन् देशे भोगासम्भवात् । न चात्मवद्गत्यैव मनसो देहान्तरसम्बन्धोऽस्ति, अव्यापकत्वात् । गमनं च तस्येतावद् दूरं केवलस्य न सम्भवति, महाप्रलयानन्तरावस्थाव्यतिरेकेणाशरीरस्य मनसः कर्माभावात् । तस्मान्मृत- शरीरप्रत्यासन्नमदृष्टवशादुपजातक्रियैरणुभिर्ह्यणुकादिप्रक्रमेणारब्धमतिसूक्ष्ममनुपलब्धियोग्यं आत्मा और मन का संयोग मन की इस अपसर्पण क्रिया का असमवायिकारण है एवं मन समवायिकारण है तथा कार्यक्षम धर्म और अधर्म उसके निमित्तकारण हैं । 'ततः' अर्थात् इसके बाद मृत शरीर से निकला हुआ वही मन अपने कार्य के उत्पादन में पूर्णक्षम उन्हीं धर्म और अधर्म से उत्पन्न आतिवाहिक शरीर के साथ सम्बद्ध होता है । 'तत्संक्रान्तम्' अर्थात् आतिवाहिक शरीर के साथ सम्बद्ध मन स्वर्ग या नरक में चला जाता है । वहाँ जाकर आशय के अनुरूप अर्थात् अपने कर्मों के अनुसार फल-भोग के अनुरूप शरीर के साथ सम्बद्ध हो जाता है । शरीर की उत्पत्ति स्वर्ग में हो या नरक में, उसमें मन का सम्बन्ध रहना आवश्यक है, उसके बिना स्वर्गादि देशों में भी भोग नहीं हो सकता । जिस प्रकार विभु होने के कारण आत्मा स्वर्गादि देशों में न जाकर भी उन देशों में उत्पन्न शरीरों के साथ सम्बद्ध हो जाता है, उसी प्रकार से मन के बिना वहाँ गये, उन दूसरे शरीरों के साथ सम्बन्ध नहीं हो सकता; क्योंकि मन विभु नहीं है । इतनी दूर (शरीर से असम्बद्ध) केवल मन का जाना भी सम्भव नहीं है; क्योंकि महाप्रलय को
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७३९
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७३९ प्रशस्तपादभाष्यम् योगिनां च बहिरुद्वेचितस्य मनसोऽभिप्रेतदेशगमनं प्रत्यागमनं च, तथा सर्गकाले प्रत्यग्रेण शरीरेण सम्बन्धार्थं कर्मादृष्टकारितम्। एवमन्यदपि महाभूतेषु यत् प्रत्यक्षानुमानाभ्यामनुपलभ्यमानकारण- होता है । इस शरीर के साथ मन के संयोग को उत्पन्न करनेवाली मन की क्रिया का नाम 'अपसर्पण' क्रिया है । एवं बाहर (विषय ग्रहण के लिए) निकला हुआ योगियों का मन जो उनके अभिप्रेत देश में ही जाता है और वहीं से लौट आता है, मन की वह क्रिया अदृष्ट से उत्पन्न होती है । इसी प्रकार सृष्टि के आदि में शरीर के साथ मन का संयोग जिस क्रिया से होता है, उसका कारण न्यायकन्दली शरीरं परिकल्प्यते । तच्च मृतशरीरमतिक्रम्य मनसः स्वर्गनरकादिदेशातिवाहनधर्म- कत्यादातिवाहिकमित्युच्यते । मरणजन्मनोरन्तराले मनसः कर्म शरीरोपगृहीतस्यैवोपपद्यते, महाप्रलयानन्तरावस्थाभाविनमनःकर्मव्यतिरिक्तत्वे सति मनःकर्मत्वाद् दृश्यमानशरीरवृत्ति- मनःकर्मवत् । आगमश्चात्र संवादको दृश्यत इति । तत्संयोगार्थं च कर्मोपसर्पणमिति । तेन स्वर्गे नरके वा प्रत्यग्रजातेन शरीरेण मनःसंयोगार्थं कर्मोपसर्पणमिति । छोड़कर और किसी भी समय शरीर से असम्बद्ध मन में क्रिया की उत्पत्ति नहीं होती है । अतः स्थूल मृत शरीर के ही समीप में एक अतिसूक्ष्म, उपलब्धि के सर्वथा अयोग्य, आतिवाहिक शरीर की कल्पना करते हैं, जिसकी उत्पत्ति सक्रिय परमाणुओं के द्वारा द्व्यणुकादि क्रम से होती है । उन परमाणुओं में क्रिया की उत्पत्ति अदृष्ट से होती है । उस सूक्ष्म शरीर का 'आतिवाहिक शरीर' यह अन्वर्थ नाम इसलिए है कि मन को इस मृतशरीर से छुड़ाकर स्वर्गादि देशों तक 'अतिवहन' कर ले जाता है । इस वस्तुस्थिति के उपयुक्त यह अनुमान है कि शरीर से सम्बद्ध मन में ही वर्त्तमान में क्रिया देखी जाती है (महाप्रलयरूप एक ही ऐसा समय है, जिस समय शरीर से असम्बद्ध मन में क्रिया रहती है), अतः अनुमान करते हैं कि मृत्यु के बाद और पुनः जन्म लेने से पहले इस बीच मन में जो क्रिया उत्पन्न होती है, उस समय भी मन का किसी शरीर के साथ सम्बन्ध अवश्य रहता है; क्योंकि मन की यह क्रिया भी महाप्रलयकालिक क्रिया से भिन्न मन की ही क्रिया है । इस सिद्धान्त को शास्त्ररूप शब्दप्रमाण का समर्थन भी प्राप्त है । "तत्संयोगार्थञ्च कर्मोपसर्पणमिति" सद्यः उत्पन्न उस स्वर्गीय या नारकीय शरीर के साथ सम्बन्ध के लिए ही मन में 'उपसर्पण' नाम की क्रिया उत्पन्न होती है ।